Wednesday, 22 May 2013

Hindi vyangya poem....................

श्रीसंतों का कैसा हो बसंत ? 

आ रही सट्टालय से पुकार 
है बुकी गरजता बार - बार 
कर फिक्सिंग तू बटोर नोट अपार  
सब कुछ मिले है तुरंत - फुरंत ।
 
श्रीसंतों का कैसा हो बसंत ?  
 
फिक्सिंग स्पोटों में भर गया रंग 
धन लेकर आ पहुंचा भदन्त 
मुदित, प्रमुदित, पुलकित अंग - अंग 
भरे चोर देश में किन्तु अनंत । 

श्रीसंतों का कैसा हो बसंत ?
 
भर रही कॉलगर्ल इधर तान 
दलाल की सूख रही इधर जान 
है रन और धन का विधान 
होटल में आई है छिपते छिपंत । 

श्रीसंतों का कैसा हो बसंत ?

कर दे अब तू अश्रुपात 
आंसुओं से लगा दे आग 
ऐ रन क्षेत्र में लगे दाग, जाग 
बतला अपने अनुभव अनंत । 

श्रीसंतों का कैसा हो बसंत ?

भज्जी पाजी के शिकार संत 
ऐ मुर्ग, सुरा चढ़ा के आकंठ 
कर नाच इस कदर प्रचंड, 
पर सबसे पहले कर खिड़कियाँ बंद 

श्रीसंतों का कैसा हो बसंत ?

अब कोक अथवा पेप्सी के स्टंट नहीं
कर लो कुछ भी, पर स्टिंग नहीं
है बॉल बंधी अब स्वच्छंद नहीं 
फिर आई पी एल में जाए कौन हन्त ?

श्रीसंतों का कैसा हो बसंत ? 
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