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Sunday, 12 May 2013

माँ.................Hindi Poems.............Happy Mother's Day.....................53113

नशे में  नाजनीं, महफ़िल  में  शोहरत नाकामयाबी  में   दगाबाजी  याद आई  याद आये और भी बहुत जब दौलत थी दर्दे मुफलिशी में याद आई तो माँ आई-
उसके न रहने पर भी रूह कहती है माँ ! जुबां  पर   आवाज  आई  तो  माँ  आई-  एक  ठोकर  भी लगा  माँ  को  बुलाते हैं  अपने लाल  को उठाने आई तो माँ आई -
जब ज़माने ने पूछा तेरी पहचान क्या है  ये मेरा बेटा  है ,शिनाख्त करने माँ आई जन्नत भी पनाह में है माँ के कदमों की  जिंदगी  की  सौगात, लायी तो माँ लायी- 
हिस्सेदार  थे  सभी  उसकी   उल्फत  के  खामोश शब-ए-गम को तन्हा सहती रही बेख़ौफ़ थी  वो  तीरगी  और  तूफानों  से  लेकर  हाथो में  मशाल  आई तो माँ आई-   
                                  -
  उदय वीर सिंह   
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माँ वो अहसास है 
जिसे अजन्मे ही महसूस किया जाता है । 

माँ वो शब्द है  जो जन्म से मरण तक  होती है हमारे साथ । 

माँ वो राग  है  जिसे किसी भी सुर में  बाँधा नहीं जा सकता ।  

माँ वो स्पर्श है  जिसे बंद आँखों से भी  महसूस किया जाता है । 


माँ वो आवाज है  जो कानो में पड़ते ही  ताकत बन जाती है । 


माँ वो साथ है  जो साथ न होकर भी  हरपल होती है साथ ।  
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माँ, मैं तेरी बगिया की
कोमल सी इक फूलकली थी
मुझको सहलाती
मुझको दुलराती
अपने अँगना को तू महकाती
मेरी एक हंसी पर तू
क्षण क्षण न्योछावर हो जाती
मुझको अपने गले लगाकर
बिन कहे सब कुछ कह जाती
बहुत अकल तब नहीं थी मुझको
पर तेरा अनकहा विस्मित कर जाता
पकड़ के तेरी ऊँगली
डग डग भरती मैं शान से चलती
जब जब रिजल्ट आता था मेरा
सौ सौ बलाएँ तू लेती थी
मुझे बनाया दुल्हन जब
काला ढिठौना जड़ दी थी तू|

माँ, आज तू बिल्कुल बूढ़ी है
पर मुझको बच्ची सी लगती है
कुछ बातों पर रूठती
कुछ पर खिलखिल हंसती है
तुझको सहलाती
तुझको दुलराती
तेरी सेवा करती हुई
मैं तेरी माँ बन जाती हूँ|
जब भी तू जो खाना चाहे
उसे पकाती उसे खिलाती
मैं तेरी माँ बन जाती हूँ|
कभी अनजानी किसी भूलपर
तू रूठ के आँसू भर लेती है
तुझे मनाने को तत्पर
मैं तेरी माँ बन जाती हूँ|
अपनी ख्वाहिश तू कहती है
जब भी जाऊँ इस जग से
मुझको खूब सजाना तू
अब माँ तू बतला दे मुझको
तेरी माँ बनकर क्या मैं
काला ढिठौना लगा पाऊँगी?

एक तरफ बिटिया है मेरी
एक तरफ तू खड़ी है माँ
दोनो की ही माँ बनकर
क्या दोनों के होठों पर
मुस्कान के मोती जड़ पाऊँगी
माँ एक बात बतला दे मुझको
यह वक्त क्यूँ बदल जाता है माँ?
................ऋता शेखर ‘मधु’
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'नहीं जी ऐसा नहीं है '
आज माँ ने कहा था
जीवन भर
पिता के सामने 'हूँ ','हाँ '
करते ही सुना था
शायद
अब उसे
बड़े हुए बच्चों का
सहारा मिल गया था
-0-
 उनके कुछ कहते ही
एक भारी  रोबीली आवाज
और कुछ कटीले शब्द
यहाँ वहां उछलने लगे
रात मैने  देखा
माँ
अपनी ख्वाहिशों पर
हल्दी प्याज का लेप लगा रही थी
-0-
 आज
उस पुराने बक्से में
मिली माँ की
कुछ धुंधली साड़ियाँ
जिनका एक कोना
कुछ चटकीला था
जानी  पहचानी
गंध से भरा हुआ l
काम करते करते
अक्सर यहीं
हाथ पोछा करती थी माँ l
-0-
कल रात
 कुछ खट्टे सपने
पलकों में उलझे थे
झड रही थी उनसे
भुने मसलों की खुशबू
माँ ने शायद फिर
आम का आचार
डाला होगा
-०-
मेरे माथे पर
हल्दी कुमकुम का टीका  है
कल मेरे सपने में
शायद फिर से आई थी माँ
-०- 
by Rachana
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माँ




अक्सर चाहता हूँ मैं माँ!
फिर से करूँ तुमसे बातें तमाम..
बेहिचक नादानी भरी, मन की जजबातें
जैसे करता था बचपन मे..अठखेली

क्यों रोक लेता है मेरा मन ,
क्यों रुठ जाते हैं बोल,
कपकंपा जातें हैं होंठ,
मन करता है बार-बार सवाल,
आखिर क्यों...?

वजह...
मेरा बढ़ाता कद है या
झूठे अभिमान की चादर,
या फिर...
तुम्हारे पुराने ख्यालात...!!
उलझ जाता हूँ मैं ,
करूं क्या उपाय, पूछता हूँ खुद से रोज-ब-रोज...!!

शायद मैं ! अब बड़ा हो गया हूँ..
उम्र से, कद से, या फिर अहम से
या फिर...
संकोच के बादल से घिर गए है मन मे...!!

यही सच है...हाँ, यही सच है
शब्द ऐसे ही गूंजते हैं मन मे..
हाँ ,यही सच हैं..?

लेटा जो एक दिन .माँ के गोंद में सर रखकर..
मुड के देखा माँ की आँखों में...
वही दुलार, वही प्यार, वही अपनापन,
देखकर चौक गया मै...

माँ ने दुलारा जो मुझे प्यार से,
बह चले चंद आंसू ,निर्मल आँखों से...
बह चला साथ ही सारा संकोच,सारा अभिमान...
रह गए तो बस.. हिलोरे लेतीं यादें..

पल में भूल गया खुद को...
याद रहा तो बस...
माँ तेरे स्पर्श, छुवन, प्रेणना और आदर्श...
हां !...माँ बस तेरा दुलार, तेरा अपनापन....
बस तेरा अपनापन................. {अधीर}

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सुदर्शन रत्नाकर


 मीठी -सी याद

अब भी भीतर है

कचोटती है,

ठंडे हाथों का स्पर्श

होता है मुझे

हवा जब छूती है

मेरे माथे को

दूर होकर भी माँ

बसी हो कहीं

मन की सतह में,

आँचल तेरा

ममता की छाँव का

नहीं भूलता,

बड़ी याद आती है

जब बिटिया

मुझे माँ बुलाती है

जैसे बुलाती थी मैं

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माँ 
धुल -धुँआ दीवारें काली याद अभी कुछ बाकी है 
चूल्हे पर फुंकनी का मीठा स्पर्श अभी कुछ बाकी है
 
गर्म लपट से झुलसा चेहरा तेज अभी कुछ बाकी है 
रोटी से आती धुंए की गंध अभी कुछ बाकी है
 
कैसे भूल सकूंगा उसको जिसने मुझको जन्म दिया
खूब कमाया फिर भी उसका ​​कर्ज़ अभी कुछ बाकी है
 
रात-रात भर जाग के जिसने मुझको ख़ूब सुलाया था 
जाग-जाग कर अब सोचूँ अहसास अभी कुछ बाकी है
 
ख़ूद भूखे रहकर भी जिसने मुझको ख़ूब खिलाया था 
हाथों के पोरों पर अब भी स्वाद वो थोड़ा बाकी है
 
आज हवा में उड़ लूं चाहे सड़कों पर कारों में चलूं
तेरी गोद में लेटूँ फिर से ख्वाइश ये कुछ बाकी है 
 
मुश्किल कैसी भी जीवन में हो कैसी भी कठिनाई 
तेरा आँचल होगा सर पर ये विश्वास भी बाकी है  
 
कोशिश चाहे लाख करूँ पर भूल कभी ना पाउँगा 
चहरे की झुर्रियों में कुछ इतिहास अभी भी बाकी है
 
संस्कारों ने तेरे मुझको लड़ना बहुत सिखाया है 
कुछ तो छूट गया पीछे पर आगे भी कुछ बाकी है
 
-दिलीप लोकरे
E-36, सुदामानगर, इंदौर-452009,म . प्र .
diliplokreindore@gmail.com
Mobile-9425082194  
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दोहे

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(1)

जग में जितने जीव हैं, सबकी तुम आधार।

माँ तुम यदि होती नहीं, होता ना संसार।।

(2)

ढोती है नौ माह तक, गर्भ तले संतान।

प्रसव पीड़ हँसकर सहे, देती जीवनदान।।

(3)
माँ अपनी संतान का, पल-पल रखती ध्यान।

उसकी नींदों के लिए, नींद करे बलिदान।।

(4)
हे निर्धन माँ तुझे कब, अपना रहा ख़याल।

भूखी रहकर तू रही, संतानों को पाल।।

(5)
विद्यालय तो मैं गया, बहुत दिनों के बाद।

पहली शिक्षक माँ बनी, भली-भाँति है याद।।

(6)
माता तुम सद्गुणों की, हो अक्षय भंडार।

संस्कार तुमसे मिला, सीखा शिष्टाचार।।

(7)
तीर्थ करूँ तो भी नहीं, शायद हो उद्धार।

माँ तुमको पूजूँ अगर, होगा बेड़ा पार।।

(8)
मक्का काबा काशि का, केवल बस है नाम।

माता के आँचल तले, मिलते चारो धाम।।

(9)
जग में हर इक वस्तु का, हो सकता है मोल।

लेकिन माँ का स्नेह औ', ममता है अनमोल।।

(10)
सभी ऋणों से मुक्त हूँ, उतरा सारा भार।

माँ तेरा ऋण मैं कभी, सकता नहीं उतार।।

(11)
सबसे छोटा शब्द 'माँ', पर इतना विस्तार।

इस छोटे से शब्द में, है सारा संसार।।

(12)
सच है माँ संसार में, होती सर्वमहान।

आँसू जब इसके गिरे, रोते हैं भगवान।।

(13)
माँ तुझको कटु वचन का, मारूँ मैं ना बाण।

तोड़ू जिस क्षण दिल तेरा, जाये मेरा प्राण।।

(14)
बड़े अभागे लोग वो, जग से नाता तोड़।

बचपन में ही माँ जिन्हें, चली गई हो छोड़।।

(15)
माँ के आँचल का करो, श्रद्धा से सम्मान।

इस आँचल में खेलने, को तरसें भगवान।
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ग़ज़ल

मुझे गुज़रा हुआ ऐ माँ ज़माना याद आता है।
अपने बचपन का बीता हर फ़साना याद आता है।

मेरे ख़ातिर तू कितने प्यार से रोटी बनाती थी,
मुझे खाना तेरी हाथों से खाना याद आता है।

मेरे रोने की तू आवाज़ सुनकर दौड़ आती थी,
छोड़ हर काम गोदी में उठाना याद आता है।

नींद आती न थी जब तो मेरे माथे को सहलाकर,
तेरी मीठी वो लोरी गुनगुनाना याद आता है।

बहुत छोटा था जब रातों को अक्सर जाग जाता था,
तेरी वो थपकियाँ देकर सुलाना याद आता है।

अकेले में अँधेरों से डरा करता था मैं जब भी,
मुझे आँचल तले तेरा छुपाना याद आता है।

पिता जी जब भी मेरी गलतियों पे पीटने आते,
उनके गुस्से से माँ तेरा बचाना याद आता है।

जब भी मैं गालियाँ देता, ग़लत कुछ काम करता था,
सलीके से मुझे समझाने आना याद आता है।


जब भी बीमार पड़ता था तुझे तक़लीफ़ होती थी,
दुआ वो माँगना आँसू बहाना याद आता है।

तेरे ममता का साया छोड़ जाएगा कहाँ 'सौरभ'
नहीं अब दूसरा कोई ठिकाना याद आता है।

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© सुरेश कुमार 'सौरभ'
 
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 - सुरेश कुमार 'सौरभ'
पता- ज़मानियॉ क़स्बा, ज़िला-ग़ाज़ीपुर, उत्तर प्रदेश
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मेरी और आप सबकी कहानीः-
बेटी :- ' मम्मी, मेरी ब्लू वाली शर्ट कहां है ??
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मम्मीः-" वो अंदर की अलमारी में है.. :))
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बेटी :- 'मम्मी, खाने में क्या है ??
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मम्मी:" दाल, चावल, आलू की सब्जी, रोटी और
दही... :))
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बेटी :- "मम्मी जूते कहां रखे हैं??
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मम्मीः-' बिटिया , तुम्हारे बेड के नीचे:))
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एक दिन
पापा" अरे गुडिया , कभी मुझसे भी कुछ पूछ
लिया कर :-))
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बेटी :- "पापा... मम्मी कहां है ??
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वह अटल है, वह सकल है,
वह अजर है, वह अमर है...
वह अगन है, वह तपन है,
वह लगन है, वह भजन है..

इन चक्षुओं का मीत है,
वह आत्मा का गीत है...
वह हर पवन का राग है,
वह त्याग है, वह भाग है...

वह प्रेम है, वह धर्म है,
वह तत्व है वह मर्म है...
वह जलज है, है जल वही
वह रोशनी, दीपक वही...

वह आस है, विश्वास है,
वह दर्द है परिहास है...
वह ये गगन, वह चंद्रमा,
वह ये ज़मीं, वह ज्योत्सना...

मेरी श्वास वो मेरी जान है
माता मेरी पहचान है..
प्रभु ने दी ये सौगात मुझे,
माँ ही मेरी भगवान है...

हर सांस में.. हर पल.. मैं मनाता था.. मनाता हूँ.. मनाता रहूँगा.. मातृ दिवस !
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Mother de special¡¡¡

Har Maa ka sapna hota hai ki uske Beti ko 1 achha ladka mile..
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Ab aap hi Batao, . . . . .
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Akela main kis-kis maa ka sapna pura karu? :D :p
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