Wednesday, 22 May 2013

सिख धर्म और जातिवाद..........................57313

सिख धर्म और जातिवाद
सिख मत हिन्दू धर्म के ही एक सुधारवादी आन्दोलन के रूप में स्थापित हुआ था जिसका उद्देश्य हिन्दू समाज पर धर्मान्धता के रूप में आई हुई इस्लामिक व्याधि का उपचार करना था और उसे फिर से प्राचीन भारत के गौरव को स्थापित करना था। इस कड़ी में उस काल का सबसे बड़ा मानसिक चिकित्सक अगर मैं किसी को मानता हूँ तो वे हैं गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज । जहाँ गुरु नानक से लेकर गुरु तेग बहादुर तक सभी गुरु साहिबान धर्म, नैतिकता और भाई चारे का उपदेश करते थे वही इस्लामिक चोट से आक्रांत हिन्दू कौम में फिर से क्षात्र धर्म की स्थापना करने वाले, उनके भीतर से अन्धविश्वास और जातिवाद के भूत को निकालने वाले गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज ने सशस्त्र क्रांति का आवाहन किया था।
गुरु गोबिंद सिंह की सेवा में सभी वर्णों के लोग थे। जहाँ उनके पञ्च प्यारों में एक नाई ,एक कुम्हार और एक दर्जी भी था। वही उनकी सेवा में चमार जाति से एक पिता पुत्र घसीटा और जिउना की वीर गाथा बहुचर्चित हैं। इससे यह भी सिद्ध होता हैं की गुरु गोबिंद सिंह जातिवाद के घृणित मानते थे और अपने साथ सभी वर्णों के लोगों को रखकर अपने शिष्यों को इस बुराई को खत्म करने का उपदेश देते थे।
घसीटा और जिउना की वीर गाथा को सुनकर सभी दलित भाइयों की छाती गर्व से चोड़ी हो जानी चाहिए। यह गाथा खालसा सेना की स्थापना करने से पहले की हैं।
औरंगजेब ने गुरु तेग बहादुर की दिल्ली बुलाकर उनका सर कटवा दिया। गुरु ने अपना बलिदान दे दिया पर अपना धर्म न छोड़ा।
जब यह समाचार गुरु गोबिन्द सिंह को मिला तो उन्होंने सिखों के एक बड़ी सभा करी और यह कहा की तुममे से कौन मेरा प्यारा सिख हैं जो मेरे पिता गुरु तेग बहादुर का मृत शरीर लेकर आयेगा जिससे उनका विधिवत संस्कार हो सके। सब लोग चुप बैठे थे। घसीटा नामक एक चमार जाति से सम्बन्ध रखने वाला वीर और जिउना नामक उसका बेटा आगे बढ़े। और गुरु से इस कार्य को पूरा करने का निवेदन किया। गुरु ने बड़ी प्रसन्नता से यह आज्ञा दी। दोनों लम्बी दौड़ धूप करते हुए दिल्ली पहुँचे। एक बंद जेल से शव की निकालना आसान काम न था। रात को दोनों जेल के समीप पहुँच गए तो पाया की सभी पहरेदार बेख़बर सो रहे हैं।
दीवार फोड़ कर दोनों जेल के अन्दर दाखिल हो गए।लोथ के पास आकार दोनों ने उनके चरणों में अपना माथा उनके पैरों को स्पर्श किया। बाप और बेटे दोनों में बातचीत शुरू हो गयी। दोनों ने सोचा की अगर वे इस लोथ को उठा कर ले जायेंगे तो औरंगजेब को मालूम चल जायेगा और वे पकड़े जाने का खतरा हैं । ले जाने की उचित विधि यह रहेगी की उन दोनों में से कोई एक यहाँ पर लाश के स्थान पर लेट जाये।
घसीटा ने अपने बेटे से कहा की तुम जवान हो, बलशाली हो मुझे मार कर गुरु के शव को यहाँ से निकाल ले जाओ। बेटे ने कहा की दुनिया में कहीं ऐसा हुआ हैं की बेटे ने बाप को अपने हाथों से मारा हो। अपने मुझे जन्म दिया हैं इसलिए आप मुझे मार कर यहाँ पर फेंक जाओ।
बाप और बेटे दोनों में बहस आरंभ हो गयी की गुरु की जगह कौन अपना शरीर कुर्बान करेगा।
कुछ देर में फैसला हो गया। बेटा गुरु को शरीर को कंधे पर रखकर चल पड़ा और बाप ने अपनी तलवार से अपने आपको मार डाला।
बेटा गुरु साहिब का शव लेकर जल्दी ही गुरु गोबिंद सिंह के पास पहुँच गया जिससे उनका विधिवत संस्कार कर दिया गया।
जब तक सिख धर्म कायम रहेगा तब तक घसीटा चमार का नाम सदा आदर से लिया जायेगा।
यह वीर गाथा मैंने इसलिए लिखी हैं की जिस सिख मत की स्थापना जातिवाद की विष वृक्ष को जड़ से उखाड़ने के लिए हुई थी उसी सिख मत में मज़हबी सिख, रविदासिया सिख आदि आदि के नाम से नये नये पंथ कालांतर में इसी जातिवाद के कारण बन गए। अपने आपको सिख अर्थात शिष्य कहने वाले भाई एक दूसरे से जातिवाद के कारण भेद करते हैं। उनके गुरूद्वारे अलग,ग्रन्थि अलग,शमशान स्थान अलग अलग हैं।
क्या इसीलिए गुरु साहिबान ने सिख धर्म की स्थापना की थी?
आज पंजाब में ही सिखों की नाक के नीचे बड़े पैमाने पर मज़हबी सिख जातिवाद और गरीबी से त्रस्त होकर ईसाई बन रहे हैं जबकि सिख समाज अफीम के नशे के समान सोया हुआ हैं जबकि विधर्मी उसके सहयोगियों , उसके भाइयों को दूर करते जा रहे हैं।
डॉ विवेक आर्य
http://www.voiceofaryas.com/dalit/jativad-2/
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