Wednesday, 1 May 2013

रंगमंच और सिनेमा की अप्रतिम प्रतिभा बलराज साहनी....................47113

रंगमंच और सिनेमा की अप्रतिम प्रतिभा बलराज साहनी

बलराज साहनी (जन्म: 1 मई, 1913 - मृत्यु: 13 अप्रैल, 1973) हिन्दी फ़िल्मों के अभिनेता थे। बलराज साहनी का रावलपिंडी (पाकिस्तान) में हुआ था। बलराज साहनी ख्यातिप्राप्त लेखक भीष्म साहनी के बड़े भाई व चरित्र अभिनेता परीक्षत साहनी के पिता हैं। बलराज साहनी रंगमंच और सिनेमा की अप्रतिम प्रतिभा थे। बलराज साहनी ऐसे अभिनेता थे जिन्हें रंगमंच और फ़िल्म दोनों माध्यमों में समान दिलचस्पी थी।

जीवन परिचय

रावलपिंडी में एक मध्यम वर्गीय व्यवसायी परिवार में 1 मई, 1913 को जन्मे बलराज साहनी का मूल नाम 'युधिष्ठर साहनी', का झुकाव बचपन से ही पिता के पेशे की ओर न होकर अभिनय की ओर था। उन्होंने अंग्रेज़ी साहित्य में स्नात्तकोत्तर की शिक्षा लाहौर के मशहूर 'गवर्नमेंट कॉलेज' से पूरी की। पढ़ाई पूरी करने के बाद बलराज साहनी रावलपिंडी लौट गये और पिता के व्यापार में उनका हाथ बंटाने लगे। वर्ष 1930 के अंत मे बलराज साहनी और उनकी पत्नी दमयंती रावलपिंडी को छोड़कर गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर के शांति निकेतन पहुंचे, जहां बलराज साहनी अंग्रेज़ी के शिक्षक नियुक्त हुए। वर्ष 1938 में बलराज साहनी ने महात्मा गांधी के साथ भी काम किया। इसके एक वर्ष के पश्चात महात्मा गांधी के सहयोग से बलराज साहनी को बी.बी.सी के हिन्दी के उदघोषक के रूप में इंग्लैंड में नियुक्त किया गया। लगभग पांच वर्ष के इग्लैंड प्रवास के बाद वह 1943 में भारत लौट आये।[1]

आरंभिक जीवन
बलराज साहनी बचपन का शौक पूरा करने के लिये इंडियन प्रोग्रेसिव थियेटर एसोसियेशन (इप्टा) में शामिल हो गये। इप्टा में वर्ष 1946 में उन्हें सबसे पहले फणी मजमूदार के नाटक 'इंसाफ' में अभिनय करने का मौका मिला। इसके साथ ही ख्वाजा अहमद अब्बास के निर्देशन में इप्टा की ही निर्मित फ़िल्म 'धरती के लाल' में भी बलराज साहनी को बतौर अभिनेता काम करने का मौका मिला। इप्टा से जुडे रहने के कारण बलराज साहनी को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उन्हें अपने क्रांतिकारी और कम्युनिस्ट विचारों के कारण जेल भी जाना पडा। उन दिनों वह फ़िल्म 'हलचल' की शूटिंग में व्यस्त थे और निर्माता के आग्रह पर विशेष व्यवस्था के तहत फ़िल्म की शूटिंग किया करते थे। शूटिंग खत्म होने के बाद वापस जेल चले जाते थे।

जनमानस के अभिनेता

साम्यवादी विचारधारा के मुखर समर्थक साहनी जनमानस के अभिनेता थे, जो अपने सशक्त अभिनय से दर्शकों को पर्दे के पात्र से भावनात्मक रूप से जोड़ देते थे। जब पर्दे पर वह अपनी दो बीघा ज़मीन फ़िल्म में ज़मीन गंवा चुके मज़दूर, रिक्शाचालक की भूमिका में नज़र आए तो कहीं से नहीं महसूस हुआ कि कोलकाता की सड़कों पर रिक्शा खींच रहा रिक्शाचालक शंभु नहीं बल्कि कोई स्थापित अभिनेता है। दरअसल पात्रों में पूरी तरह डूब जाना उनकी खूबी थी। यह काबुली वाला, लाजवंती, हक़ीक़त, दो बीघा ज़मीन, धरती के लाल, गर्म हवा, वक़्त, दो रास्ते सहित उनकी किसी भी फ़िल्म में महसूस किया जा सकता है।

स्वाभिमानी व्यक्तित्व

बलराज साहनी का फ़िल्मों में आना संयोग ही रहा। उन्होंने हंस पत्रिका को एक कहानी लिखी थी जो अस्वीकृत होकर लौट आई। उन्होंने खुद ही लिखा है कि वह उन भाग्यशाली लेखकों में थे जिनकी भेजी हुई कोई रचना अस्वीकृत नहीं हुई थी। लेकिन बीच में चार साल तक उन्होंने कोई कहानी नहीं लिखी। जब छूटे अभ्यास को बहाल करने का प्रयास करते हुए उन्होंने एक कहानी लिखी और उसे हंस पत्रिका को भेज दिया लेकिन वह अस्वीकृत होकर वापस आ गई। इससे उनके स्वाभिमान को ठेस लगी और उसके बाद उन्होंने कोई कहानी नहीं लिखी। उन्होंने अपने एक आलेख में लिखा था कि फ़िल्मों का मार्ग अपनाने का कारण वह अस्वीकृत कहानी भी रही।

प्रमुख फ़िल्में

गर्म हवा
दो बीघा ज़मीन
धरती के लाल
हमलोग
गर्म हवा
सीमा
वक़्त
कठपुतली
लाजवंती
सोने की चिडिया
घर संसार
सट्टा बाजार
भाभी की चूड़ियाँ
हक़ीक़त
दो रास्ते
एक फूल दो माली
मेरे हमसफर

दो बीघा ज़मीन...

वर्ष 1953 में बिमल राय के निर्देशन मे बनी फ़िल्म दो बीघा जमीन बलराज साहनी के कैरियर मे अहम पड़ाव साबित हुई। फ़िल्म दो बीघा जमीन की कामयाबी के बाद बलराज साहनी शोहरत की बुंलदियों पर जा पहुंचे। इस फ़िल्म के माध्यम से उन्होंने एक रिक्शावाले के किरदार को जीवंत कर दिया। रिक्शावाले को फ़िल्मी पर्दे पर साकार करने के लिये बलराज साहनी ने कलकत्ता की सड़कों पर 15 दिनों तक खुद रिक्शा चलाया और रिक्शेवालों की जिंदगी के बारे में उनसे जानकारी हासिल की। फ़िल्म की शुरूआत के समय निर्देशक बिमल राय सोचते थे कि बलराज साहनी शायद ही फ़िल्म मे रिक्शावाले के किरदार को अच्छी तरह से निभा सकें। वास्तविक जिंदगी मे बलराज साहनी बहुत पढे लिखे इंसान थे। लेकिन उन्होंने बिमल राय की सोच को गलत साबित करते हुये फ़िल्म में अपने किरदार के साथ पूरा न्याय किया। दो बीघा जमीन को आज भी भारतीय फ़िल्म इतिहास की सर्वश्रेष्ठ कला फ़िल्मों में शुमार किया जाता है। इस फ़िल्म को अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी काफी सराहा गया तथा कांस फ़िल्म महोत्सव के दौरान इसे अंतराष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।

साहित्यकार के रुप में

बलराज साहनी बेहतरीन साहित्यकार भी थे, जिन्होंने 'पाकिस्तान का सफ़र' और 'रूसी सफरनामा' जैसे चर्चित यात्रा वृतांतों की रचना की, जिनमें उन देशों की राजनीतिक, भौगोलिक, आर्थिक और सामाजिक परिस्थतियों का शानदार चित्रण किया गया है।

मृत्यु

बलराज साहनी की मृत्यु 13 अप्रैल 1973 को मुंबई में हुआ।
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