Popads

Saturday, 4 May 2013

सि‍नेमा के 100 साल: बॉलीवुड की पहली ड्रीम गर्ल को लव लेटर लिखा करते थे पंडित नेहरू....................48413


सौ बरस के सफर में हिंदी सिनेमा जिंदगी का हिस्सा बन गया। फिल्में रंगीन हुईं, सपनों में रंग भरने लगे...यहां तक कि भावनाएं भी फिल्मों को देखकर व्यक्त होने लगीं। इस स्वर्णिम सफर में कई उतार-चढ़ाव भी आए। लेकिन बॉलीवुड रुका नहीं, आगे ही बढ़ता गया और दुनियाभर में अपनी जगह बना ली। इसका श्रेय जाता है उन निर्देशकों, कलाकारों, संगीतकारों, गायकों और परदे के पीछे के उन महत्वपूर्ण लोगों को जिन्होंने फिल्मों को न सिर्फ बनाया बल्कि जीया। इन्हीं लोगों की कोशिशों ने आज हिंदी फिल्म जगत को शीर्ष पर पहुंचा दिया।
ऐसे मिली हमारी फिल्मों को नायिका
‘मैं बन की चिडिय़ा बनके...’ यह गाना फिल्म ‘अछूत कन्या’ में देविका रानी पर फिल्माया हुआ है। फर्स्टद लेडी ऑफ इंडियन स्क्रीन... देविका रानी। इतनी पढ़ी-लिखी। इतनी आधुनिक। फिर भी उस जमाने की फिल्में देखिए कि चिडिय़ा उड़ती है, डालें हिलती हैं, पत्ते हिलते हैं, लेकिन हीरोइन नहीं हिलती। और आज की हीरोइन। चिकनी चमेली, जलेबी बाई, शीला, मुन्नी, बबली बदमाश। ये फासला तो सिर्फ 70 साल की हीरोइन के रूप का है। आइए चलते हैं, हीरोइन के जन्मकाल में...
ओ माइ गॉड... कितने परेशान रहे होंगे दादा साहेब फालके। कल्पना कीजिए 100 साल पहले की, 1913 की। जब औरतें फिल्मों में काम करने को वेश्यावृत्ति से भी नीचा काम समझती थीं। ‘राजा हरिश्चंद’ की रूपरेखा बना चुके दादा साहेब फालके तारामती के रोल के लिए वेश्याओं के पास गए, लेकिन उनसे तक ‘न’ सुनने को मिली। फिर गए एक कैंटीन में। टेंशन मिटाने के लिए। एक कप चाय पीने के लिए। और वहां उन्हें मिली उनकी हीरोइन। सालुंखे। जी नहीं, यह कोई नहीं थी। वेटर था, लेकिन चाल-ढाल स्त्रिक‍यों जैसी। चाय का गिलास पकड़ाते वक्त सालुंखे की उंगलियां जो फालके साहेब की उंगलियों से छू गई, उन्हें करंट-सा लगा और ढेर सारे पैसे का लालच देकर सालुंखे को बना दिया तारामती।
लेकिन सालुंखे और उस जैसे पुरुषों का भविष्य बतौर हीरोइन ज्यादा उज्जल नहीं था। दादा साहेब को उसी साल अपनी फिल्म ‘मोहिनी भस्मासुर’ में पार्वती के रोल के लिए किसी पुरुष एक्टर को तलाशने की जरूरत नहीं पड़ी। इस बार उन्हें मिली कमला बाई। घरेलू हालात से परेशान। पैसे के लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार। फिल्मों के जरिए कमला बाई की अमीरी और लोकप्रियता ने वेश्याओं को फिल्मों की ओर खूब आकर्षित किया।
जल्दी ही खुले माहौल में पली-बढ़ी एंग्लो इंडियन लड़कियां भी हीरोइन बनने के लिए कतार लगाने लगीं। पेशेंस कूपर, सुसान सोलोमा आदि के अलावा कई एंग्लो इंडियन लड़कियां तो नाम बदलकर फिल्मों में हीरोइन बनीं। जैसे कि रशेल चोहेन फिल्मों में रामला देवी हो गईं तो एस्थर अब्राहम, प्रमिला बन गईं। धीरे-धीरे दूसरे तबकों से भी औरतें फिल्मों में आने लगीं। तारक बाला, सीता देवी, सुल्ताना, जुबैदा आदि उस साइलेंट ईरा की स्टार थीं तो सुपर स्टार थीं रूबी मायर्स यानी सुलोचना। देखा जाए तो सुलोचना उस जमाने की कैटरीना कैफ थीं। हिंदी नहीं आती थी, खूबसूरत बहुत थीं, उनकी खूबसूरती के दम पर फिल्में चलती थीं। दुर्भाग्य से 1931 में फिल्म ‘आलम आरा’ के जरिए सिनेमा ने आवाज पा ली और साइलेंट सिनेमा की ज्यादातर हीरोइनें संवाद ठीक से न बोल पाने के कारण हाशिए पर चली गईं, फिर भी सुलोचना के भाग्य ने साथ न छोड़ा। कैटरीना की तरह सुलोचना के मुंह से खराब हिंदी सुनकर भी दर्शक एक्स्ट्रा एंज्वाय करते थे। सुलोचना ने साइलेंट ईरा की उन सुपर स्टार गौहर तक की दुकान बंद कर दी, जिन गौहर का फोटो माचिस पर छापने से बंद होती माचिस फैक्ट्री न सिर्फ चल निकली थी, बल्कि टॉप पर पहुंची थी।
और फिर पर्दे पर आईं देविका रानी, जिन्होंने हीरोइन के वजूद को ही बदल डाला। बेहद पढ़ी-लिखी और संभ्रांत परिवार की देविका रानी के हीरोइन बनने से हीरोइन के प्रति देश की सोच ही बदलने लगी। उनके दीवानों में पंडित जवाहर लाल नेहरू भी शामिल थे और वे उन्हेंर लव लेटर लिखा करते थे । देविका रानी सम्मानित परिवारों से लड़कियों का फिल्मों में आना शुरू हुआ। उनके बाद तो ऐसी हीरोइनों की लंबी सूची है। वैजयंती माला, हेमा मालिनी, माला सिन्हा, शर्मिला टैगोर, श्रीदेवी, माधुरी दीक्षित, करिश्मा कपूर, काजोल, करीना कपूर से लेकर सोनाक्षी सिन्हा तक।
हीरोइन की सौ साल की यात्रा का नतीजा यह है कि आज बहुत से माता-पिता अपनी बेटी को हीरोइन बनने में मदद करते हैं या बनाना चाहते हैं। आज करिश्मा, करीना के हीरोइन बनने पर बबीता-रणधीर कपूर को नाज है तो सोनाक्षी सिन्हा पर शत्रुघ्न सिन्हा और पूनम सिन्हा को भी कम फख्र नहीं है।
-->

No comments:

Post a Comment