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Friday, 10 May 2013

10 मई क्रांति दिवस विशेष :: 156 साल पहले का वह सवेरा..................51513

10 मई क्रांति दिवस विशेष :: 156 साल पहले का वह सवेरा

- फूट पड़ा था अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ खदबदा रहा लावा

मेरठ : इतिहास हमें अक्सर आईना दिखाता है और अच्छा यह है कि हम अक्स देखते हुए बहुत कुछ सीखते और गढ़ लेते हैं। हालांकि इतिहास के अनगिनत पन्नों में सुबह की तवारीख का जिक्र कम मिलता है। यह अलग है कि भारत के इतिहास में मेरठ की एक खास सुबह को बड़े गुमान से जगह दी गई है। यह सवेरा आज से ठीक 156 साल पहले 10 मई, 1857 को आया था। फिर उस तारीख में जो कुछ हुआ, उसमें धीरे-धीरे हमारी चेतना और संस्कार की जड़ता मिटती चली गई। इस सुबह के बाद नया विहान बेशक नौ दशक बाद 15 अगस्त, 1947 को आया, लेकिन मेरठ छावनी के इस सिपाही गदर ने ब्रितानी हुकूमत के भाल पर यह अमिट संदेश उकेर दिया कि दासता की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। आइए, करीब डेढ़ सदी पहले की उस सुबह की सैर पर निकलते हैं।
ब्रितानी हुकूमत के जुल्म-ओ-सितम से छटपटाते तत्कालीन हिंदुस्तान के कई स्थानों पर असंतोष का लावा पक रहा था। बंगाल की बैरकपुर सैन्य छावनी में मंगल पांडे की बगावत की चिंगारी यहां मेरठ छावनी में पहुंच चुकी थी। अंग्रेजी फौज के हिंदुस्तानी सैनिकों में चर्बी वाले कारतूस के इस्तेमाल को लेकर पहले से ही असंतोष सुलग रहा था। अनुशासन के नाम पर अंग्रेज सैन्य अफसरों ने पुरानी और नई जेल में ऐसे सैकड़ों असंतुष्ट फौजियों और आमलोगों को लोहे की जंजीरों में जकड़ रखा था। मेरठ शहर और उसके देहात के इलाके इस अपमान और ज्यादती के खिलाफ महीनों से सुलग रहे थे। इतिहास के पन्ने साक्षी हैं कि 1857 की नौ मई बड़ी बेचैन और उमस की तारीख थी। देसी सैनिकों के अलावा आम जनमानस के चेहरों पर एक सख्ती, एक तनाव, सुलगती आंखें और भिंचती मुट्ठियां।
अंग्रेज अफसरों को कई खुफिया सूचनाएं मिलीं भी, लेकिन शायद उन्हें इस बात का भान नहीं था कि बगावत का लावा यहां मेरठ से फूटेगा। 10 मई की शांत सुबह के बीच छावनी के बैरकों के अलावा सदर बाजार और शहर कोतवाली इलाके की हलचल को भी अंग्रेज अफसरों ने अनदेखा करने की चूक दोहराई। फिर वही आश्वस्ति कि भला मेरठ में क्या हो सकता है? दूसरी ओर, मेरठ तो इतिहास गढ़ने की धुन में मगन था। लिहाजा शाम के धुंधलके में जैसे ही सदर बाजार और कोतवाली इलाके से हो-हल्ला और पकड़ो-मारो-काटो की आवाजें फिजां में गहराने लगीं, अंग्रेज अफसरों के शाम के पैमाने भी आशंका की हलचल में छलकने लगे। फिर रात भर शहर में अंग्रेजों के पीछे मुक्तिपायी भीड़ दौड़ती रही। इसमें सैनिकों के साथ-साथ आमलोग भी थे। ये मतवाले लिंग और उम्र का भेद विस्मृत कर सिर्फ गोरी चमड़ी देख हमला कर रहे थे।
रात भर के इस अभियान में नई और पुरानी जेलों से करीब नौ सौ कैदियों की बेड़ियां लुहारों ने खुलेआम जेलरों की आंखों के सामने काट डालीं। आजाद कैदी भी मतवाली भीड़ का हिस्सा बन गए और रातभर अंग्रेज अफसरों के घर और बैरक जलाए गए। राष्ट्रीय संग्रहालय में 10 मई की मध्यरात्रि को सुलगती छावनी के कई रेखाचित्र मौजूद हैं, जो यह बताने के लिए काफी हैं कि मेरठ ने स्वाधीनता की अलख जगा दी थी। इसी राह पर चलते हुए हमने 15 अगस्त, 1947 को दासता को हमेशा-हमेशा के लिए पैरों तले रौंद डाला।

~ मनोज झा
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आज 10 मई है। इस दिन का भारतीय इतिहास में
 
 
 एक विशिष्ट स्थान है। 1857 में भारत का प्रथम
 
 
 स्वतंत्रता संग्राम इसी दिन आरंभ हुआ था. 1857 
 
 
वह वर्ष है, जब भारतीय वीरों ने अपने शौर्य की
 
 
 कलम को रक्त में डुबो कर काल की शिला पर
 
 
 अंकित किया था और ब्रिटिश साम्राज्य को कड़ी 
 
 
चुनौती देकर उसकी जडे़ं हिला दी थीं। 1857 का
 
 
 वर्ष वैसे भी उथल-पुथल वाला रहा है। इसी वर्ष 
 
 
कैलिफोर्निया के तेजोन नामक स्थान पर 7.9 स्केल
 
 
 का भूकम्प आया था तो टोकियो में आये भूकम्प में
 
 
 लगभग एक लाख लोग और इटली के नेपल्स में
 
 
 आये 6.9 स्केल के भूकम्प में लगभग 11,000
 
 
 लोग मारे गये थे। 1857 की क्रान्ति इसलिये और
 
 
 भी महत्वपूर्ण हो जाती है कि ठीक सौ साल पहले 
 
 
सन् 1757 में प्लासी के युद्ध में विजय प्राप्त कर
 
 
 राबर्ट क्लाइव ने अंग्रेजी राज की भारत में नींव
 
 
 डाली थी। विभिन्न इतिहासकारों और विचारकांे ने
 
 
 इसकी अपने-अपने दृष्टिकोण से व्याख्यायें की हैं।
 
 
 भारत के प्रथम प्रधानमंत्री और महान चिन्तक पं0 
 
 
 जवाहरलाल नेहरू ने लिखा कि- ‘‘यह केवल एक
 
 
 विद्रोह नहीं था, यद्यपि इसका विस्फोट सैनिक 
 
 
विद्रोह के रूप में हुआ था, क्योंकि यह विद्रोह शीघ्र
 
 
 ही जन विद्रोह के रूप में परिणित हो गया था।’’ 
 
 
बेंजमिन डिजरायली ने ब्रिटिश संसद में इसे
 
 
 ‘‘राष्ट्रीय विद्रोह’’ बताया। प्रखर विचारक
 
 
 बी0डी0सावरकर व पट्टाभि सीतारमैया ने इसे 
 
 
”भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम”, जान
 
 
 विलियम ने ”सिपाहियों का वेतन सुविधा वाला
 
 
 मामूली संघर्ष“ व जान ब्रूस नार्टन ने ‘‘जन-विद्रोह’’
 
 
 कहा। माक्र्सवादी विचारक डा0 राम विलास शर्मा ने
 
 
 इसे संसार की प्रथम साम्राज्य विरोधी व सामन्त 
 
 
विरोधी क्रान्ति बताते हुए 20वीं सदी की जनवादी
 
 
 क्रान्तियों की लम्बी श्रृंखला की प्रथम महत्वपूर्ण
 
 
 कड़ी बताया। प्रख्यात अन्तर्राष्ट्रीय राजनैतिक
 
 
 विचारक मैजिनी तो भारत के इस प्रथम स्वाधीनता
 
 
 संग्राम को अन्तर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखते थे और
 
 
 उनके अनुसार इसका असर तत्कालीन इटली, हंगरी
 
 
 व पोलैंड की सत्ताओं पर भी पड़ेगा और वहाँ की
 
 
 नीतियाँ भी बदलेंगी।
 

1857 की क्रान्ति को लेकर तमाम विश्लेषण किये 
 
 
गये हैं। इसके पीछे राजनैतिक-सामाजिक-धार्मिक-
 
 
आर्थिक सभी तत्व कार्य कर रहे थे, पर इसका सबसे
 
 
 सशक्त पक्ष यह रहा कि राजा-प्रजा, हिन्दू-
 
 
मुसलमान, जमींदार-किसान, पुरूष-महिला सभी
 
 
 एकजुट होकर अंग्रेजों के विरुद्ध लड़े। 1857 की 
 
 
क्रान्ति को मात्र सैनिक विद्रोह मानने वाले इस
 
 
 तथ्य 
 
 
की अवहेलना करते हैं कि कई ऐसे भी स्थान थे,
 
 
 जहाँ सैनिक छावनियाँ न होने पर भी ब्रिटिश सत्ता
 
 
 के विरूद्ध क्रान्ति हुयी। इसी प्रकार वे यह भूल जाते
 
 
 है कि वास्तव में ये सिपाही सैनिक वर्दी में किसान
 
 
 थे और किसी भी व्यक्ति के अधिकारों के हनन का 
 
 
सीधा तात्पर्य था कि किसी-न-किसी सैनिक के
 
 
 अधिकारों का हनन, क्योंकि हर सैनिक या तो किसी
 
 
 का पिता, बेटा, भाई या अन्य रिश्तेदार है। यह एक
 
 
 तथ्य है कि अंगे्रजी हुकूमत द्वारा लागू नये 
 
 
भू-राजस्व कानून के खिलाफ अकेले सैनिकों की ओर
 
 
 से 15,000 अर्जियाँ दायर की गयी थीं। डाॅ0
 
 
 लक्ष्मीमल्ल सिंघवी के शब्दों में- ‘‘सन् 1857 की
 
 
 क्रान्ति को चाहे सामन्ती सैलाब या सैनिक गदर
 
 
 कहकर खारिज करने का प्रयास किया गया हो, पर
 
 
 वास्तव में वह जनमत का राजनीतिक-सांस्कृतिक
 
 
 विद्रोह था। भारत का जनमानस उसमें जुड़ा था, 
 
 
लोक साहित्य और लोक चेतना उस क्रान्ति के आवेग
 
 
 से अछूती नहीं थी। स्वाभाविक है कि क्रान्ति सफल 
 
 
न हो तो इसे ‘विप्लव’ या ‘विद्रोह’ ही कहा जाता है।’’
 
 
 यह क्रान्ति कोई यकायक घटित घटना नहीं थी,
 
 
 वरन् इसके मूल में विगत कई सालों की घटनायें
 
 
 थीं, जो कम्पनी के शासनकाल में घटित होती रहीं।
 
 
 एक ओर भारत की परम्परा, रीतिरिवाज और
 
 
 संस्कृति के विपरीत अंग्रेजी सत्ता एवं संस्कृति
 
 
 सुदृढ हो रही थी तो दूसरी ओर भारतीय राजाओं के
 
 
 साथ अन्यायपूर्ण कार्रवाई, अंग्रेजों की हड़पनीति,
 
 
 भारतीय जनमानस की भावनाओं का दमन एवं
 
 
 विभेदपूर्ण व उपेक्षापूर्ण व्यवहार से राजाओं,
 
 
 सैनिकों 
 
 
व जनमानस में विद्रोह के अंकुर फूट रहे थे।

इसमें कोई शक नहीं कि 1757 से 1856 के मध्य
 
 
 देश के विभिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न वर्गों
 
 
 द्वारा कई विद्रोह किये गये। यद्यपि अंग्रेजी सेना
 
 
 बार-बार इन विद्रोहों को कुचलती रही पर उसके
 
 
 बावजूद इन विद्रोहों का पुनः सर उठाकर खड़ा हो
 
 
 जाना भारतीय जनमानस की जीवटता का ही 
 
 
परिचायक कहा जायेगा। 1857 के विद्रोह को इसी
 
 
 पृष्ठभूमि में देखे
 
 
 जाने की जरूरत है। अंग्रेज इतिहासकार फॅारेस्ट ने
 
 
 एक जगह सचेत भी किया है कि- ‘‘1857 की
 
 
 क्रान्ति हमें इस बात की याद दिलाती है कि हमारा
 
 
 साम्राज्य एक ऐसे पतले छिलके के ऊपर कायम है,
 
 
 जिसके किसी भी समय सामाजिक परिवर्तनों और
 
 
 धार्मिक क्रान्तियों की प्रचण्ड ज्वालाओं द्वारा 
 
 
टुकडे़-
 
 
टुकडे़ हो जाने की सम्भावना है।’’ अंग्रेजी हुकूमत को
 
 
 भी 1757 से 1856 तक चले घटनाक्रमों से यह 
 
 
आभास हो गया था कि वे अब अजेय नहीं रहे। तभी
 
 
 तो लार्ड केनिंग ने फरवरी 1856 में गर्वनर 
 
 
जनरल 
 
 
का कार्यभार ग्रहण करने से पूर्व कहा था कि - ‘‘मैं
 
 
 चाहता हूँ कि मेरा कार्यकाल शान्तिपूर्ण हो। मैं नहीं 
 
 
भूल सकता कि भारत के गगन में, जो अभी शान्त 
 
 
है, कभी भी छोटा सा बादल, चाहे वह एक हाथ
 
 
जितना ही क्यों न हो, निरन्तर विस्तृत होकर फट 
 
 
सकता है, जो हम सबको तबाह कर सकता है।’’
 
 
 लार्ड 
 
 
 केनिंग की इस स्वीकारोक्ति में ही 1857 की
 
 
 क्रान्ति
 
 
 के बीज छुपे हुये थे।


1857 की क्रान्ति की सफलता-असफलता के 
 
 
अपने-अपने तर्क हैं पर यह भारत की आजादी का
 
 
 पहला ऐसा संघर्ष था, जिसे अंग्रेज समर्थक सैनिक
 
 
 विद्रोह अथवा असफल विद्रोह साबित करने पर तुले
 
 
 थे, परन्तु सही मायनों में यह पराधीनता की 
 
 
 बेड़ियों 
 
 
से मुक्ति पाने का राष्ट्रीय फलक पर हुआ प्रथम
 
 
 महत्वपूर्ण संघर्ष था। अमरीकी विद्वान प्रो0 जी0 
 
 
एफ0 हचिन्स के शब्दों में-‘‘1857 की क्रान्ति को 
 
 
अंग्रेजों ने केवल सैनिक विद्रोह ही कहा क्योंकि वे 
 
 
इस घटना के राजद्रोह पक्ष पर ही बल देना चाहते थे
 
 
 और कहना चाहते थे कि यह विद्रोह अंग्रेजी सेना के
 
 
 केवल भारतीय सैनिकों तक ही सीमित था। परन्तु
 
 
 आधुनिक शोध पत्रों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि
 
 
 यह आरम्भ से सैनिक विद्रोह के ही रूप में हुआ,
 
 
 परन्तु शीघ्र ही इसमें लोकप्रिय विद्रोह का रूप
 
 
 धारण 
 
 
कर लिया।’’ वस्तुतः इस क्रान्ति को भारत में अंग्रेजी
 
 
 हुकूमत के विरुद्ध पहली प्रत्यक्ष चुनौती के रूप में 
 
 
देखा जा सकता है। यह आन्दोलन भले ही भारत को 
 
 
 अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति न दिला पाया हो,
 
 
 लेकिन लोगों में आजादी का जज्बा जरूर पैदा कर
 
 
 गया। 1857 की इस क्रान्ति को कुछ इतिहासकारों
 
 
 ने महास्वप्न की शोकान्तिका कहा है, पर इस
 
 
 गर्वीले
 
 
 उपक्रम के फलस्वरूप ही भारत का नायाब मोती
 
 
 ईस्ट इण्डिया कम्पनी के हाथों से निकल गया और
 
 
 जल्द ही कम्पनी भंग हो गयी। 1857 के संग्राम
 
 
 की
 
 
 विशेषता यह भी है कि इससे उठे शंखनाद के बाद
 
 
 जंगे-आजादी 90 साल तक अनवरत चलती रही
 
 
 और
 
 
 अंतत: 15 अगस्त, 1947 को हम आजाद हुए !!
 
 
 

 
 
 
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