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Wednesday, 1 May 2013

आज 1 मई यानी 'मजदूर दिवस'..........................46913

आज 1 मई यानी 'मजदूर दिवस' 


मई दिवस या 'मजदूर दिवस' या 'श्रमिक दिवस' 1 मई को सारे विश्व में मनाया जाता है। 'मई दिवस' के विषय में अधिकांश तथ्य उजागर हो चुके हैं, फिर भी कुछ ऐसे पहलू हैं, जो अभी तक अज्ञात है। कुछ भ्रांतियों का स्पष्टीकरण और इस विषय पर भारत तथा विश्व के बारे में कम ज्ञात तथ्यों को उजागर करने की आवश्यकता है। यह उल्लेखनीय है कि 'श्रमिक दिवस' का उदय 'मई दिवस' के रूप में नहीं हुआ था। वास्तव में अमरीका में श्रमिक दिवस मनाने की पुरानी परम्परा रही है, जो बहुत पहले से ही चली आ रही थी। मई दिवस भारत में 15 जून, 1923 ई. में पहली बार मनाया गया था।

इतिहास

अमरीका में 'मजदूर आंदोलन' यूरोप व अमरीका में आए औद्योगिक सैलाब का ही एक हिस्सा था। इसके फलस्वरूप जगह-जगह आंदोलन हो रहे थे। इनका संबंध 1770 के दशक की अमरीका की आज़ादी की लड़ाई तथा 1860 ई. का गृहयुद्ध भी था। इंग्लैंड के मजदूर संगठन विश्व में सबसे पहले अस्तित्व में आए थे। यह समय 18वीं सदी का मध्य काल था। मजदूर एवं ट्रेंड यूनियन संगठन 19वीं सदी के अंत तक बहुत मज़बूत हो गए थे, क्योंकि यूरोप के दूसरे देशों में भी इस प्रकार के संगठन अस्तित्व में आने शुरू हो गए थे। अमरीका में भी मजदूर संगठन बन रहे थे। वहाँ मजदूरों के आरम्भिक संगठन 18वीं सदी के अंत में और 19वीं सदी के आरम्भ में बनने शुरू हुए। मिसाल के तौर पर फ़िडेलफ़िया के शूमेकर्स के संगठन, बाल्टीमोर के टेलर्स के संगठन तथा न्यूयार्क के प्रिन्टर्स के संगठन 1792 में बन चुके थे। फ़र्नीचर बनाने वालों में 1796 में और 'शिपराइट्स' में 1803 में संगठन बने। हड़ताल तोड़ने वालों के ख़िलाफ़ पूरे अमरीका में संघर्ष चला, जो उस देश में संगठित मजदूरों का अपनी तरह एक अलग ही आंदोलन था। हड़ताल तोड़ना घोर अपराध माना जाता था और हड़ताल तोड़ने वालों को तत्काल यूनियन से निकाल दिया जाता था।

कार्य समय घटाने का माँग

अमरीका में 18वें दशक में ट्रेंड यूनियनों का शीघ्र ही विस्तार होता गया। विशिष्ट रूप से 1833 और 1837 के समय। इस दौरान मजदूरों के जो संगठन बने, उनमें शामिल थे- बुनकर, बुक वाइन्डर, दर्जी, जूते बनाने वाले लोग, फ़ैक्ट्री आदि में काम करने वाले पुरुष तथा महिला मजदूरों के संगठन। 1836 में '13 सिटी इंटर ट्रेंड यूनियन ऐसासिएशन' मोजूद थीं, जिसमें 'जनरल ट्रेंड यूनियन ऑफ़ न्यूयार्क' (1833) भी शामिल थी, जो अति सक्रिय थी। इसके पास स्थाई स्ट्राइक फ़ंड भी था, तथा एक दैनिक अख़बार भी निकाला जाता था। राष्ट्रव्यापी संगठन बनाने की कोशिश भी की गयी यानी 'नेशनल ट्रेंड्स यूनियन', जो 1834 में बनायी गयी थी। दैनिक काम के घंटे घटाने के लिए किया गया संघर्ष अति आरम्भिक तथा प्रभावशाली संघर्षों में एक था, जिसमें अमरीकी मजदूर 'तहरीक' का योगदान था। 'न्यू इंग्लैंड के वर्किंग मेन्स ऐसासिएशन' ने सन 1832 में काम के घंटे घटाकर 10 घंटे प्रतिदिन के संघर्ष की शुरुआत की।

श्रमिकों की सफलता

1835 तक अमरीकी मजदूरों ने काम के 10 घंटे प्रतिदिन का अधिकार देश के कुछ हिस्सों में प्राप्त कर लिया था। उस वर्ष मजदूर यूनियनों की एक आम हड़ताल फ़िलाडेलफ़िया में हुई। शहर के प्रशासकों को मजबूरन इस मांग को मानना पड़ा। 10 घंटे काम का पहला क़ानून 1847 में न्यायपालिका द्वारा पास करवाकर हेम्पशायर में लागू किया गया। इसी प्रकार के क़ानून मेन तथा पेन्सिल्वानिया राज्यों द्वारा 1848 में पास किए गए। 1860 के दशक के शुरुआत तक 10 घंटे काम का दिन पूरे अमरीका में लागू हो गया।

प्रथम पार्टी का गठन

प्रथम मजदूर राजनैतिक पार्टी सन 1828 ई. में फ़िलाडेल्फ़िया, अमरीका में बनी थी। इसके बाद ही 6 वर्षों में 60 से अधिक शहरों में मजदूर राजनैतिक पार्टियों का गठन हुआ। इनकी मांगों में राजनैतिक सामाजिक मुद्दे थे, जैसे-
* 10 घंटे का कार्य दिवस
* बच्चों की शिक्षा
* सेना में अनिवार्य सेवा की समाप्ति
* कर्जदारों के लिए सज़ा की समाप्ति
* मजदूरी की अदायगी मुद्रा में
* आयकर का प्रावधान इत्यादि।
मजदूर पार्टियों ने नगर पालिकाओं तथा विधान सभाओं इत्यादि में चुनाव भी लड़े। सन 1829 में 20 मजदूर प्रत्याशी फ़ेडरेलिस्टों तथा डेमोक्रेट्स की मदद से फ़िलाडेलफ़िया में चुनाव जीत गए। 10 घंटे कार्य दिवस के संघर्ष की बदौलत न्यूयार्क में 'वर्किंग मैन्स पार्टी' बनी। 1829 के विधान सभा चुनाव में इस पार्टी को 28 प्रतिशत वोट मिले तथा इसके प्रत्याशियों को विजय हासिल हुई।

श्रमिक उत्सव

18 मई, 1882 में 'सेन्ट्रल लेबर यूनियन ऑफ़ न्यूयार्क' की एक बैठक में पीटर मैग्वार ने एक प्रस्ताव रखा, जिसमें एक दिन मजदूर उत्सव मनाने की बात कही गई थी। उसने इसके लिए सितम्बर के पहले सोमवार का दिन सुझाया। यह वर्ष का वह समय था, जो जुलाई और 'धन्यवाद देने वाला दिन' के बीच में पड़ता था। भिन्न-भिन्न व्यवसायों के 30,000 से भी अधिक मजदूरों ने 5 दिसम्बर को न्यूयार्क की सड़कों पर परेड निकाली और यह नारा दिया कि "8 घंटे काम के लिए, 8 घंटे आराम के लिए तथा 8 घंटे हमारी मर्जी पर।" इसे 1883 में पुन: दोहराया गया। 1884 में न्यूयार्क सेंट्रल लेबर यूनियन ने मजदूर दिवस परेड के लिए सितम्बर माह के पहले सोमवार का दिन तय किया। यह सितम्बर की पहली तारीख को पड़ रहा था। दूसरे शहरों में भी इस दिन को अंतर्राष्ट्रीय त्योहार के रूप में मनाने के लिए कई शहरों में परेड निकाली गई। मजदूरों ने लाल झंडे, बैनरों तथा बाजूबंदों का प्रदर्शन किया। सन 1884 में एफ़ओटीएलयू ने हर वर्ष सितम्बर के पहले सोमवार को मजदूरों के राष्ट्रीय अवकाश मनाने का निर्णय लिया। 7 सितम्बर, 1883 को पहली बार राष्ट्रीय पैमाने पर सितम्बर के पहले सोमवार को 'मजदूर अवकाश दिवस' के रूप में मनाया गया। इसी दिन से अधिक से अधिक राज्यों ने मजदूर दिवस के दिन छुट्टी मनाना प्रारम्भ किया।

मजदूर दिवस मनाने का निर्णय

इन यूनियनों तथा उनके राष्ट्रों की संस्थाओं ने अपने वर्ग की एकता, विशेषकर अपने 8 घंटे प्रतिदिन काम की मांग को प्रदर्शित करने हेतु 1 मई को 'मजदूर दिवस' मनाने का फैसला किया। उन्होंने यह निर्णल लिया कि यह 1 मई, 1886 को मनाया जायेगा। कुछ राज्यों में पहले से ही आठ घंटे काम का चलन था, परन्तु इसे क़ानूनी मान्यता प्राप्त नहीं थी; इस मांग को लेकर पूरे अमरीका में 1 मई, 1886 को हड़ताल हुई। मई 1886 से कुछ वर्षों पहले देशव्यापी हड़ताल तथा संघर्ष के दिन के बारे में सोचा गया। वास्तव में मजदूर दिवस तथा कार्य दिवस संबंधी आंदोलन राष्ट्रीय यूनियनों द्वारा 1885 और 1886 में सितम्बर के लिए सोचा गया था, लेकिन बहुत से कारणों की वजह से, जिसमें व्यापारिक चक्र भी शामिल था, उन्हें मई के लिए परिवर्तित कर दिया। इस समय तक काम के घंटे 10 प्रतिदिन का संघर्ष बदलकर 8 घंटे प्रतिदिन का बन गया।

भारत में 'मई दिवस'

कुछ तथ्यों के आधार पर जहाँ तक ज्ञात है, 'मई दिवस' भारत में 1923 ई. में पहली बार मनाया गया था। 'सिंगारवेलु चेट्टियार' देश के कम्युनिस्टों में से एक तथा प्रभावशाली ट्रेंड यूनियन और मजदूर तहरीक के नेता थे। उन्होंने अप्रैल 1923 में भारत में मई दिवस मनाने का सुझाव दिया था, क्योंकि दुनिया भर के मजदूर इसे मनाते थे। उन्होंने फिर कहा कि सारे देश में इस मौके पर मीटिंगे होनी चाहिए। मद्रास में मई दिवस मनाने की अपील की गयी। इस अवसर पर वहाँ दो जनसभाएँ भी आयोजित की गईं तथा दो जुलूस निकाले गए। पहला उत्तरी मद्रास के मजदूरों का हाईकोर्ट 'बीच' पर तथा दूसरा दक्षिण मद्रास के ट्रिप्लिकेन 'बीच' पर निकाला गया।
सिंगारवेलू ने इस दिन 'मजदूर किसान पार्टी' की स्थापना की घोषणा की तथा उसके घोषणा पत्र पर प्रकाश डाला। कांग्रेस के कई नेताओं ने भी मीटिंगों में भाग लिया। सिंगारवेलू ने हाईकार्ट 'बीच' की बैठक की अध्यक्षता की। उनकी दूसरी बैठक की अध्यक्षता एस. कृष्णास्वामी शर्मा ने की तथा पार्टी का घोषणा पत्र पी.एस. वेलायुथम द्वारा पढ़ा गया। इन सभी बैठकों की रिपोर्ट कई दैनिक समाचार पत्रों में छपी। मास्को से छपने वाले वैनगार्ड ने इसे भारत में पहला मई दिवस बताया। फिर दुबारा 1927 में सिंगारवेलु की पहल पर मई दिवस मनाया गया, लेकिन इस बार यह उनके घर मद्रास में मनाया गया था। इस अवसर पर उन्होंने मजदूरों तथा अन्य लोगों को दोपहर की दावत दी। शाम को एक विशाल जूलुस निकाला गया, जिसने बाद में एक जनसभा का रूप ले लिया। इस बैठक की अध्यक्षता डा.पी. वारादराजुलू ने की। कहा जाता है कि तत्काल लाल झंडा उपलब्ध न होने के कारण सिंगारवेलु ने अपनी लड़की की लाल साड़ी का झंडा बनाकर अपने घर पर लहराया।
 सभी शादी-शुदा व्यक्तियों को मजदूर दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं !
 
 
 
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2 comments:

  1. मई दिवस की यात्रा कथा
    - योगेश चंद्र शर्मा

    अपने मानवोचित अधिकारों की प्राप्ति के लिए श्रमिकों के संघर्ष की कहानी लंबी है। यह कहानी अब भी समाप्त नहीं हुई हैं। कब तक चलेगी, कहना कठिन है। आज का श्रमिक सामान्यत: सात-आठ घंटे काम करता है लेकिन पुराने जमाने में श्रमिक को पंद्रह-बीस घंटे तक काम करना पड़ता था और उसमें भी यदि मालिक उस श्रमिक के कार्य से संतुष्ट नहीं होता तो उसका वेतन काट लिया जाता था। कार्य की अवधि को आठ घंटे तक सीमित करने के लिए भी मजदूरों को कठोर संघर्ष करना पड़ा है। संघर्ष के उसी दौर में प्रथम मई का विशिष्ट महत्व रहा है। यह तारीख आज भी श्रमिकों के लिए प्रेरणा के स्रोत के रूप में काम करती है तथा इसके साथ जुड़ी घटना की स्मृति उनमें विद्युत-जैसा उत्साह उत्पन्ना करती है। इस घटना का केन्द्र था - अमेरिका का शिकागो शहर।

    नीति की लड़ाई

    उद्योगपतियों की नीतियों से बचने के लिए अमेरिका के मजदूरों ने अपनी एक संस्था बनाई थी - 'अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर'। इस संस्था ने अगस्त, १८६६ में यह माँग की थी कि मजदूरों के काम करने का अधिकतम समय आठ घंटे तय किया जाए। अमेरिका के श्रमिकों ने बार-बार अपनी इस माँग को दुहाराया लेकिन किसी के कान पर जूँ तक नहीं रेंगी। लगातार २० वर्षों तक शांतिपूर्वक प्रतीक्षा करने के उपरांत श्रमिकों ने प्रथम मई, १८८६ को संघर्ष का बिगुल बजा दिया। संगठन ने श्रमिकों से हड़ताल का आह्वान किया और अमेरिका के श्रमिकों ने उसे सोत्साह समर्थन दिया। एक लाख नब्बे हजार मज़दूरों ने हड़ताल में सक्रिय रूप से भाग लिया तथा अमेरिका के विभिन्न भागों में मज़दूरों ने जो जुलूस निकाले, उनमें तीन लाख चालीस हजार मजदूर शामिल थे। हड़ताल का प्रमुख गढ़ था - शिकागो शहर, जहाँ ८० हज़ार मजदूरों ने हड़ताल में भाग लिया।

    पुलिस और मजदूरों का संघर्ष

    प्रथम मई से प्रारंभ होनेवाली यह हड़ताल बहुत प्रभावशाली ढंग से और शांतिपूर्वक चल रही थी। पुलिस चाहते हुए भी उसमें कुछ नहीं कर पा रही थीं। तीन मई को पुलिस अकारण ही मैकर्मिक हार्वेस्टर कारखाने में घुस गई और वहाँ शांति से प्रदर्शन कर रहे मज़दूरों पर लाठी बरसाना शुरू कर दिया। छह मजदूर तत्काल शहीद हो गए तथा अन्य सैकड़ों मजदूर घायल हो गए। अगले दिन चार मई को जब मजदूर अपनी एक सभा कर रहे थे तो वहाँ किसी अज्ञात व्यक्ति के द्वारा एक बम विस्फोट किया गया, जिसमें पुलिस का एक सिपाही मारा गया। इसके तत्काल बाद पुलिस और मज़दूरों में झड़पें हो गईं, जिनमें चार मज़दूर तथा पुलिस के सात सिपाही मारे गए।

    मजदूरों को मृत्युदंड

    पुलिस ने अनेक मज़दूर नेताओं को गिरफ्तार किया तथा उनपर मुकदमे चलाए। इन मुकदमों के फलस्वरूप चार प्रमुख नेताओं को ११ नवम्बर, १८८७ को मृत्युदंड दिया गया। ये थे - स्पाइडर, फिशर, एंजेल तथा पारसन्स। अन्य अनेक नेताओं को लंबी अवधि के कारावास की सजा मिली। मृत्युदंड की सजा सुनाते समय न्यायाधीश श्री गैरी भी संभवत: अपने निर्णय पर क्षुब्ध अनुभव कर रहे थे। उस समय उनकी स्थिति के बारे में 'न्यूयार्क टाइम्स' के संवाददाता ने लिखा था - ''मृत्युदंड का निर्णय सुनाते समय न्यायाधीश गैरी का चेहरा काँप रहा था और जुबान लड़खड़ा रही थी।''

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  2. संघर्ष विश्वव्यापी हुआ

    अमेरिकी मजदूरों के इस संघर्ष ने विश्वभर के मजदूरों को संघर्ष के लिए प्रेरित किया। इस घटना की स्मृति को स्थायी बनाने के लिए १८८८ में 'अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर' ने यह निर्णय लिया कि अमेरिका के सभी मजदूर प्रथम मई, १८९० को मजदूर दिवस के रूप में मनाएँगे तथा इसके उपरांत प्रतिवर्ष प्रथम मई को इसी प्रकार आयोजन किया जाता रहेगा। कार्ल मार्क्स की विचारधारा को व्यावहारिक स्वरूप देने की दृष्टि से जब १४ जुलाई, १८८९ को विश्वभर के समाजवादी, फ्रांस की राजधानी पेरिस में एकत्रित हुए तथा अंतराष्ट्रीय समाजवादी संगठन (सेकंड इंटरनेशनल) की स्थापना की, तब इस संस्था ने अपने एक प्रस्ताव में विश्वभर के मजदूरों के लिए कार्य की अधिकतम अवधि को आठ घंटे तक सीमित करने की माँग की। इसके अतिरिक्त इसमें यह भी प्रस्ताव पारित किया कि संपूर्ण विश्व में प्रथम मई को मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाए।

    प्रस्ताव-दिवस

    इन प्रस्तावों के अनुसार प्रथम मई, १८९० को, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजदूर दिवस के रूप में मनाया गया। इस प्रथम मजदूर दिवस की चर्चा करते हुए एंजिल्स ने कार्ल मार्क्स की प्रसिद्ध पुस्तक 'साम्यवादी घोषणा-पत्र' की भूमिका में लिखा - ''आज जब मैं यह पंक्तियां लिख रहा हंू, उस समय यूरोप और अमेरिका के सर्वहारा एक झंडे के नीचे और एक सेना की शक्ल में अपनी ताकत तौल रहे हैं। आज के दिन का घटनाचक्र सभी पूंजीपतियों और भूस्वामियों की आंखें खोल देगा।''

    रूस में पहला इतिहास

    मई दिवस का आयोजन सभी देशों में एक साथ प्रथम मई, १८९० को प्रारंभ नहीं किया जा सका। कुछ देशों में इसका आयोजन बाद में प्रारंभ किया गया। इंग्लैंड में इसका प्रथम आयोजन ४ मई, १८९० को हुआ। इस आयोजन में कार्ल मार्क्स की पुत्री एलीनोर भी अपने पति के साथ उपस्थित हुई। रूस में १८९६ में मई दिवस का पहला इश्तहार लिखा गया। लिखनेवाले थे - ब्लाडीमीर इलियच उलियानोव लेनिन। उन्होंने इस इश्तहार को जेल में लिखा था।

    चीन में मई दिवस का प्रथम आयोजन १९२४ में हुआ तथा स्वतंत्र वीएतनाम में मई दिवस पहली बार १९७५ में आयोजित किया गया।

    भारत में मई दिवस

    मजदूरों के इस विश्वव्यापी आंदोलन से भारत भी अछूता नहीं रह सका। देश के स्वाधीनता आंदोलन में मजदूरों की उल्लेखनीय भूमिका रही। हमारे यहाँ मई दिवस का प्रथम आयोजन १९२३ में हुआ। प्रथम मई को मद्रास के समुद्र तट पर आयोजित इस प्रथम मई दिवस के समारोह के अध्यक्ष मजदूर नेता श्री चेट्टीयार थे। इसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर और संगठित रूप में इसका आयोजन १९२८ में हुआ। उस समय से लेकर अब तक हमारे यहाँ मई दिवस का आयोजन प्रतिवर्ष बहुत उत्साह के साथ होता रहा है।

    काम के घंटे

    १९१९ में 'अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन' (आई.एल.ओ.) का प्रथम अधिवेशन हुआ। उसमें यह प्रस्ताव पारित किया गया कि सभी औद्योगिक संगठनों में कार्यावधि अधिक-से-अधिक आठ घंटे निर्धारित हो। श्रम संबंधी अन्य अनेक शर्तों को भी शब्दबद्ध किया गया। विश्व के अधिसंख्य देशों ने इन शर्तों को स्वीकार करके अपने यहाँ लागू भी कर दिया। १९३५ में इसी संगठन ने आठ घंटे की अवधि को घटाकर सात घंटे की अवधि का प्रस्ताव पारित किया। यह भी कहा गया कि एक सप्ताह में किसी भी मजदूर से ४० घंटे से अधिक काम नहीं लिया जाना चाहिए। विश्व के अनेक समाजवादी तथा अन्य विकसित देशों ने इस अवधि को और घटाकर सप्ताह में ३५ घंटे की अवधि को भी अपने यहाँ लागू किया है।

    मजदूरों की सुख-सुविधा पर विचार-विमर्श के अतिरिक्त मई दिवस पर विभिन्न देशों में कुछ रोचक कार्यक्रम भी प्रस्तुत किए जाते हैं। तरह-तरह के गीत और नृत्य प्रस्तुत किए जाते हैं तथा मजदूरों की समस्या पर आधारित नाटक भी खेले जाते हैं। इंग्लैंड, चीन तथा जर्मनी आदि देशों में इस अवसर पर बच्चों के भी रंग-बिरंगे कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते हैं।

    लगभग एक सौ वर्षों के कठोर संघर्ष के बावजूद मजदूरों की स्थिति में सुधार के लिए अब भी बहुत कुछ किया जाना शेष है। अनेक देशों में मजदूरों की आठ घंटे की कार्यावधि भी अब तक लागू नहीं हो पाई है। सप्ताह में ३५ घंटे की कार्यावधि तथा अन्य अनेक प्रकार की सुविधाएँ तो उनकी कल्पना से भी दूर हैं। उन्हें प्रतिदिन १२-१३ घंटे तक काम करना पड़ता है। अवकाश के दिनों का वेतन भी उन्हें नहीं मिलता है। जिन देशों में मजदूरों को कुछ सुख-सुविधाएँ दी गई हैं, वे भी केवल संगठित क्षेत्रों में कार्यरत मजदूरों के लिए हैं। असंगठित मजदूरों के लिए अब तक कोई विशेष उल्लेखनीय कार्य नहीं हो पाया है।

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