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Tuesday, 23 April 2013

बीसवीं शताब्दी के विश्व की महानतम फ़िल्मी हस्तियों में से एक सत्यजित रे..............................43413

  बीसवीं शताब्दी के विश्व की महानतम फ़िल्मी हस्तियों में से एक सत्यजित रे


सत्यजित राय अथवा सत्यजित रे / शॉत्तोजित रॉय (जन्म- 2 मई, 1921 कलकत्ता - मृत्यु- 23 अप्रॅल, 1992 कोलकाता) बीसवीं शताब्दी के विश्व की महानतम फ़िल्मी हस्तियों में से एक थे, जिन्होंने यथार्थवादी धारा की फ़िल्मों को नई दिशा देने के अलावा साहित्य, चित्रकला जैसी अन्य विधाओं में भी अपनी प्रतिभा का परिचय दिया।
सत्यजित राय प्रमुख रूप से फ़िल्मों में निर्देशक के रूप में जाने जाते हैं, लेकिन लेखक और साहित्यकार के रूप में भी उन्होंने उल्लेखनीय में ख्याति अर्जित की है। सत्यजित राय फ़िल्म निर्माण से संबंधित कई काम ख़ुद ही करते थे। इनमें निर्देशन, छायांकन, पटकथा, पार्श्व संगीत, कला निर्देशन, संपादन आदि शामिल हैं।
फ़िल्मकार के अलावा वह कहानीकार, चित्रकार और फ़िल्म आलोचक भी थे। सत्यजित राय कथानक लिखने को निर्देशन का अभिन्न अंग मानते थे। सत्यजित राय ने अपने जीवन में 37 फ़िल्मों का निर्देशन किया, जिनमें फ़ीचर फ़िल्में, वृत्त चित्र और लघु फ़िल्में शामिल हैं। इनकी पहली फ़िल्म पाथेर पांचाली को कान फ़िल्मोत्सव में मिले “सर्वोत्तम मानवीय प्रलेख” पुरस्कार को मिलाकर कुल ग्यारह अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिले।
विश्व में भारतीय फ़िल्मों को नई पहचान दिलाने वाले सत्यजित राय भारत रत्न के अतिरिक्त पद्म श्री (1958), पद्म भूषण (1965), पद्म विभूषण (1976) और रेमन मैग्सेसे पुरस्कार (1967) से सम्मानित हैं। विश्व सिनेमा में अभूतपूर्व योगदान के लिए सत्यजित राय को मानद ऑस्कर अवॉर्ड से अलंकृत किया। इसके अलावा उन्होंने और उनके काम ने कुल 32 राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार प्राप्त किये।
विश्व सिनेमा के पितामह माने जाने वाले महान निर्देशक अकीरा कुरोसावा ने राय के लिए कहा था "सत्यजित राय के बिना सिनेमा जगत वैसा ही है जैसे सूरज-चाँद के बिना आसमान"

जीवन परिचय

अपने माता-पिता की इकलौती संतान सत्यजित राय के पिता सुकुमार राय की मृत्यु सन् 1923 में हुई जब सत्यजित राय मुश्किल से दो वर्ष के थे। उनका पालन-पोषण उनकी माँ सुप्रभा राय ने अपने भाई के घर में ममेरे भाई-बहनों, मामा-मामियों वाले एक भरे-पूरे और फैले हुए कुनबे के बीच किया। उनकी मां जो लंबे सधे व्यक्तित्व की स्वामिनी थीं, वो रवीन्द्र संगीत की मंजी हुई गायिका थीं और उनकी आवाज़ काफ़ी दमदार थी। सत्यजित राय के दादाजी उपेन्द्रकिशोर राय एक लेखक एवं चित्रकार थे और इनके पिताजी भी बांग्ला में बच्चों के लिए रोचक कविताएँ लिखते थे और वह एक चित्रकार भी थे। यह परिवार अपरिहार्य रूप से टैगोर घराने के नजदीक था। प्रेसीडेंसी कॉलेज कलकत्ता से स्नातक होने के बाद राय पेंटिंग के अध्ययन के लिए जिसमें वे प्रारंभिक अवस्था में ही अपनी योग्यता प्रदर्शित कर चुके थे, रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा स्थापित रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय, शांतिनिकेतन चले गए।

शांतिनिकेतन में शिक्षा

उस समय पर शांतिनिकेतन साहित्य और कला की नयी भारतीय चेतना के केंद्र के रूप में न केवल देश में बल्कि विश्व भर में चर्चित था। रवीन्द्रनाथ टैगोर के प्रति आकर्षण समूचे भारत से छात्र और अध्यायकों को यहाँ खींच लाता था। अन्य देशों से भी छात्र यहाँ आते थे और इस तरह एक ऐसी नयी भारतीय संस्कृति के विकास की परिस्थितियां निर्मित हो रही थीं जो अपनी स्वयं की परंपराओं पर आधारित थीं। शांतिनिकेतन में सत्यजित राय ने नंदलाल बोस और विनोद बिहारी मुखोपाध्याय जैसे सिद्धहस्त कलाकारों से शिक्षा प्राप्त की, जिन पर बाद में उन्होंने ‘इनर आई’ फ़िल्म भी बनाई।

प्रेस और प्रकाशन संस्थान

सन 1942 में मध्य भारत के कला स्मारकों के भ्रमण के बाद राय ने शांतिनिकेतन छोड़ दिया। शीघ्र ही उन्हें एक ब्रिटिश विज्ञापन एजेंसी 'डी .जे. केमर एंड कंपनी' में वाणिज्यिक कलाकार (कमर्शियल आर्टिस्ट) के रूप में रोज़गार मिल गया जहाँ काम करते हुए उन्होंने पुस्तकों के आवरण पृष्ठों की साज सज्जा (डिजाइनिंग) और रेखांकन कार्य पर्याप्त मात्रा में किया। यह काम उन्होंने भारतीय पुस्तक प्रकाशन के क्षेत्र में नए मानक स्थापित करने वाले अग्रणी प्रकाशन संस्थान 'साइनेट प्रेस' के लिए किया। जिन पुस्तकों का उन्होंने रेखांकन किया उनमें से एक 'विभूति भूषण बंद्योपाध्याय' की पाथेर पांचाली का संक्षिप्त संस्करण भी था।

सिनेमा में रुचि और प्रशिक्षण

इस समय तक, फ़िल्मों में उनकी रुचि पर्याप्त रूप से उजागर हो चुकी थी। सन् 1947 में उन्होंने अन्य लोगों के साथ 'कलकत्ता फ़िल्म सोसायटी' की स्थापना की और भारतीय सिनेमा की समस्याओं तथा सिनेमा किस तरह का चाहिए, विषय पर लेख लिखे। कलकत्ता फ़िल्म सोसायटी ने बड़ी संख्या में सिने प्रेमियों को जुटाया जिनमें से कुछ प्रमुख फ़िल्म निर्माता बने। राय की पहल ने न केवल उन्हें फ़िल्म शिक्षण प्रदान किया बल्कि अन्य को भी फ़िल्मी शिक्षा प्रदान की, क्योंकि कलकत्ता फ़िल्म सोसायटी ने विश्व सिनेमा की बहुत सी ऐसी प्रमुख कृतियों का प्रदर्शन किया जो इससे पूर्व भारत में कभी नहीं दिखाई गई थीं।

विदेश में प्रशिक्षण

सन 1950 में उनके नियोक्ताओं ने उन्हें अग्रिम प्रशिक्षण के लिए लंदन भेजा। यह उनकी लिंड्से एंडर्सन और गाविन लम्बर्ट से मित्रता हुई और उन्होंने अपने साढ़े चार माह के प्रवास के दौरान लगभग सौ फ़िल्में देखीं जिनमें बाइसिकिल थीवस तथा अन्य इतालवी नव-यथार्थवादी फ़िल्में शामिल थीं, जिन्होंने सत्यजित राय के ऊपर गहरा प्रभाव छोड़ा। जलयान द्वारा भारत वापस लौटते समय ही उन्होंने पाथेर पांचाली की पटकथा लिखना शुरू किया। सन् 1952 में भारत के पहले अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव का आयोजन हुआ जिसमें उन्होंने एक बार फिर इतालवी नव-यथार्थवादी फ़िल्मों से साक्षात्कार किया। साथ ही जापान सहित अन्य देशों की फ़िल्मों भी उन्होंने देखीं।

प्रारंभिक प्रशिक्षण हॉलीवुड फ़िल्मों से

सत्यजित राय का सिनेमा का प्रारंभिक प्रशिक्षण हॉलीवुड फ़िल्मों के अध्ययन के रूप में हुआ- वास्तव में आज़ादी से पूर्व वे ये ही फ़िल्में देख सकते थे। जैसा कि उन्होंने बार-बार कहा- उन्होंने फ़िल्म निर्माण मुख्यत: अमरीकी फ़िल्मों को बार-बार देखकर सीखा। तार्किक और (कम से कम सतह पर) यथार्थवादी वर्णन की हॉलीवुड शैली ने उनके ऊपर गहरा प्रभाव छोड़ा।

पाथेर पांचाली की सफलता

पाथेर पांचाली की निर्विवाद सफलता के बाद ही हुआ कि सत्यजित राय ने, जिन्हें फ़िल्म निर्माण के दौरान कुछ महीनों की छुट्टी सवेतन प्रदान की गई थी, अंतत: डी.जे. केमर एंड कंपनी की अपनी नौकरी छोड़ दी। विज्ञापन में उनकी रुचि पूरी तरह कभी भी समाप्त नहीं हुई, अपनी प्राथमिक फ़िल्मों के लिए प्रचार सामग्री खुद ही तैयार करने के अलावा वे कई वर्षों तक क्लेरियन एडवरटाइजिंग सर्विसेज (डी.जे. केमर के उत्तराधिकारी, और कर्मचारियों के स्वामित्व वाली) के एक निदेशक के रूप में कार्य करते रहे। यहाँ उनके कई पुराने साथी अभी कार्य करते हैं।
पाथेर पांचाली के बाद राय अक्सर कहा करते थे कि उन्होंने फ़िल्म निर्माण फ़िल्में देखकर सीखा। जो बातें फ़िल्में नहीं सिखा पाईं वे उन्होंने काम के दौरान सीखीं। यद्यपि 'पाथेर पांचाली' को सन् 1956 में केन्स में एक पुरस्कार दिया गया था, पर वास्तव में सन् 1957 में 'वेनिस महोत्सव' में 'अपराजितो' को मिला ग्रांड प्राइस पुरस्कार ही था जो पाथेर पांचाली को अंतर्राष्ट्रीय आलोक में लाया। न्यूयार्क में पाथेर पांचाली सितंबर सन् 1958 से पहले प्रदर्शित (रिलीज़) नहीं हो पाई।

फ़िल्म कृतियों का सजीव वर्णन

अपनी कार्य यात्रा के अधोबिंदु तक पहुंचने से पूर्व सत्यजित राय ने नायक (1966) का निर्माण किया, इसकी कहानी स्वयं उन्होंने लिखी थी और इसमें नायक के रूप में बंगाल के प्रतिभाशाली सिने अभिनेता उत्तम कुमार को लिया गया था। कंचनजंघा की तरह वे एक बार फिर श्रेष्ठ सम्मिति पूर्ण कसे हुए और वर्गाकार ढांचे का निर्माण करते हैं। फ़िल्म का समूचा अभिनय नायक का अपनी एक भूमिका के लिए पुरस्कार लेने जाने की दिल्ली की एक रात की रेल यात्रा के दौराना घटित होता है। उत्तम कुमार जो समुचित बौद्धिकता, विनम्रता और लोकप्रियता वाले अभिनेता हैं, एक तरह से स्वयं अपने आपको ही अभिनीत कर रहे हैं। शर्मिला टैगोर जो बाद में अखिल भारतीय हिन्दी फ़िल्मों की एक बड़ी स्टार बनी, यहाँ एक पत्रकार की भूमिका में है जो उसी रेलगाड़ी में यात्रा कर रही है और फ़िल्म अभिनेता का साक्षात्कार लेती है।

समकालीन वास्तविकता से साक्षात्कार

सत्यजित राय की पेशेवर ज़िंदगी में प्रतिद्वंद्वी कई मायनों में प्रथम मुक़ाम है। पहली दफ़ा इस फ़िल्म में वे उस तकनीक का प्रयोग करते हैं जिसे वे कभी मृणाल सेन के साथ हुए एक तीखे सार्वजनिक विवाद में चालू लटका कहकर ख़ारिज कर चुके थे। कहानी एक नकार से शुरू होती है, नकार से ही अनेक बिंदुओं को पकड़ती हैं, ख़ासकर उस दृश्य में यह नकार अपनी पराकाष्ठा पर है जहां नर्स वेश्या अपनी कंचुकी खोलने को उद्यत दिखाई पड़ती है। बीच बीच में सिद्धार्थ की मेडिकल शिक्षा की छवियां अचानक और संक्षिप्त रूप में दिखती हैं उदाहरण के लिए जब सुगठित काया वाली एक लडकी गली से गुजरती है तो पर्दे पर ‘स्त्री वक्षस्थल’ का डायग्राम उभरता है जिसकी तकनीकी व्याख्या एक शिक्षक कर रहा होता है। फिर काल्पनिक कामनापूर्ति के दृश्यों की झांकियां भी हैं, जैसे एक दृश्य में सिद्धार्थ द्वारा अपनी बहन के बॉस को पीटते हुए दिखाया जाता है। यहाँ ऐसा लगता है मानो राय यह सिद्ध करने के लिए कृतसंकल्प हों कि अगर लटकों-झटकों की बात है, तो उनके प्रयोग में भी वे उतने ही सिद्धहस्त हैं जितने की दूसरे या संभवत: उनसे बेहतर।
सत्यजित राय की दूसरी महत्त्वपूर्ण कृति शांतिनिकेतन के अपने पूर्व शिक्षक-चित्रकार विनोद बिहारी मुखोपाध्याय पर बना वृत्तपूर्ण है। दृष्टि खो देने के बाद भी श्री मुखोपाध्याय सक्रिय चित्रकारी में लगे रहे थे। बीस मिनट के इस वृत्तचित्र दि इनर आइ (1972) में राय ने चित्रकार के जीवन और कृतियों के बारे में तथ्यपरक जानकारी अपनी विशिष्ट शैली में दी है। यहां चित्रकार के नेत्रहीन होने के साथ व्यर्थ की भावुकता कहीं भी नहीं दिखती। नतीजतन, तथ्यों की बारीक़ प्रस्तुति तब अत्यंत मार्मिक हो उठती है जब चित्रकार को हम उसके अंधेपन के दौर में पाते हैं और देखते हैं कि कैसे यह नेत्रहीन चित्रकार घर के इर्द-गिर्द घूम लेता है, कैसे बिना किसी की सहायता के अपने लिए चाय बना लेता है आदि आदि।

शास्त्रीयतावाद

सत्यजित राय की उन फ़िल्मों को छोड़कर जो उनकी अपनी कहानियों पर थीं, सत्यजित राय की फ़िल्में ख्याति प्राप्त साहित्यिक मूल कथाओं, अधिकांशत: प्रतिष्ठित कृतियों पर आधारित थीं। श्रीलंका के निर्देशक लेस्टर पेरीज को लिखे एक पत्र में (मैरी सेटन के पोट्रेट आफ़ एक डायरेक्टर, सत्यजित राय में उद्धृत) सत्यजित राय ने खेद व्यक्त किया है कि-
फ़िल्म के बाह्य का महत्त्व पहले की तुलना में अधिक बढ़ना शुरू हो रहा है। लोग इस बारे में चिंतित होते हुए नहीं दिखते कि आप क्या कहते हैं, यदि आप जो कह रहे हैं उसे पर्याप्त अस्पष्ट या अप्रत्यक्ष और ग़ैरपारंपरिक तरीके से कह रहे हैं तो- और एक सामान्य दिखने वाली फ़िल्म कमतर आंक ली जाती है- मेरा आशय यह नहीं है कि सभी नए यूरोपीय फ़िल्म निर्माता प्रतिभाविहीन हैं लेकिन यह मेरी गंभीर आशंका अवश्य है कि क्या वे सेक्स के अत्यधिक उदार दोहन के बिना, जिसकी अनुमति उनकी सामाजिक संहिता उन्हें देती हुई प्रतीत होती है, आजीविका कमाना जारी रख सकते थे।

रचनात्मक दृष्टियाँ

सत्यजित राय की फ़िल्म की पांडुलिपि की न कभी प्रतिलिपि तैयार की गई, न उसे जिल्दबद्ध किया गया और न वितरित। सत्यजित राय जब इसे अपनी अवधारणा समझाने के लिए अभिनेताओं के सामने पढ़ते थे तो उसे अपनी छाती के निकट रखते थे। इसमें संवाद, अभिनय की टिप्पणियां और अवस्थान (लोकेशन) के अलावा भी बहुत कुछ होता था, इसमें रेखांकन, आख्यायन, संगीतात्मक परिकल्पनाएं, विस्तृत विवरण जो उनकी मूल धारणा को स्मृत कराएं, और संबंध, चेहरे, स्थान आदि होते थे जो फ़िल्मांकन और संपादन के समय तक के लिए तय रहते थे। वर्षों के अनुभव के साथ सत्यजित राय ने फ़िल्म निर्माण के कई विभागों में अपना प्रवेश करा लिया था।

पटकथा लेखन

सत्यजित राय अपनी पटकथा (स्क्रिप्ट) हमेशा स्वयं लिखते थे, कभी-कभी अपनी कहानियाँ भी वे तैयार करते थे, वे किसी और की स्क्रिप्ट पर फ़िल्म बनाने की स्वप्न में भी नहीं सोच सकते थे। पाथेर पांचाली के दिनों में भी उन्हें मशीन पर काम करते हुए संपादक के पीछे खड़ा हुआ देखा जा सकता था। जब वे फ़िल्म देख रहे होते थे तो अपने रूमाल को चबा डालते थे और फ़िल्म संपादक कभी कभी रचनात्मक सुझाव दे दिया करता था, जिनमें से कुछ को वे बाल सुलभ रोमांच के साथ स्वीकार कर लिया करते थे और अन्य को अपने निर्भाव चेहरे से अस्वीकार कर दिया करते थे। अभिनय का निर्देशन ऐसी चीज़ है जहाँ अधिकांश फ़िल्म निर्माता पूरे विस्तार में जाते हैं। सत्यजित राय शूटिंग से पहले संवादों की रिहर्सल नहीं करवाते थे जैसे कि अन्य निर्देशक करवाते हैं। संवाद उनकी फ़िल्मों में नाटक से बहुत भिन्न भूमिका निभाते हैं, और ये वातावरण का इतना अविभाज्य हिस्सा होते हैं कि एक कमरे के भीतर इनकी रिहर्सल करना इन्हें अर्थहीन बना सकता है। दूसरी ओर, प्रमुख रूप से ग़ैर व्यावसायिकों के साथ, वे सिर के प्रत्येक कोण, हर छोटी से छोटी भाव भंगिमा का निर्देश देते थे। अपने पात्र को सही सही ढाल चुकने के बाद वे अभिनेता की प्राकृतिक क्षमता और अभिव्यक्ति पर भरोसा करते थे कि इन्होंने जो कुछ भी मानवीय महत्त्व के साथ बताया है उसे वह अपने हाव-भाव से अभिव्यक्त करे। बच्चों के साथ वे घुटनों के बल झुक जाया करते थे और एक षड्यंत्रकारी के जैसे ढंग से फुसफुसाया करते थे, लेकिन उनसे हर संभव समान रूपता प्राप्त करने की कोशिश करते थे। केवल शेष (जो काफ़ी कुछ रह जाता था) को ही बच्चे के अपने सहज व्यवहार पर छोड़ते थे।

सत्यजित राय का लेंस

सत्यजित राय का प्रिय लेंस 40 एम.एम. था जो सामान्य मानवीय दृष्टि के सर्वाधिक अनुकूल होता है। वे अत्यधिक निकटवर्ती शाट और अत्यधिक दीर्घकोण (वाइड ऐंगिल) से बचने की प्रवृत्ति रखते थे, उनके विचार से ये दोनों ही एक प्रकार के उद्दीपक थे, एक एकांत का अतिक्रमण करता हुआ और दूसरा परिप्रेक्ष्य को बनावटी बनाता हुआ। संगीत के प्रति अपने जीवनपर्यंत लगाव के रहते (प्रारंभिक दिनों में प्रमुखत: पश्चिमी संगीत), वे सुप्रसिद्ध संगीतज्ञों- रवि शंकर, अली अकबर ख़ान, विलायत ख़ान द्वारा अपनी फ़िल्मों में किए गए योगदान को स्वीकार करने में कठिनाई महसूस करने लगे थे। इन संगीतज्ञों के साथ विस्तृत विचार-विमर्श होने तथा उनकी इच्छा पर अपनी इच्छा थोपने के थकाऊ प्रयासों के बावजूद उनकी यह कठिनाई बढ़ती गई थी।

सम्मान एवं पुरस्कार

विश्व विख्यात निर्देशक सत्यजित राय ने सबसे ज़्यादा राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार जीते हैं। उन्होंने और उनके काम ने कुल 32 राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार प्राप्त किये। निम्नांकित सूची सत्यजित राय को मिले सम्मानों को प्रदर्शित करती है। इससे उनके विश्वव्यापी ख्याति, उनकी दृष्टि एवं उनके कार्यों का परिचय मिलता है।

फ़िल्म समीक्षकों की नज़रों से

सत्यजित राय की फ़िल्मों के आलोचकों की शिकायत रही कि वह मौजूदा समस्याओं से बचते हैं लेकिन जन अरण्य इस लिहाज़ से महत्त्वपूर्ण फ़िल्म है जिसमें परीक्षा प्रणाली, मध्यम वर्ग की आकांक्षा, रोज़गार की समस्या का बेहतरीन चित्रण किया गया है। जन अरण्य की परंपरा में ही प्रतिद्वंद्वी या सीमाबद्ध को भी शामिल किया जा सकता है। राय की फ़िल्मों में स्त्री पात्रों की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही है। उनकी कई महिला पात्र पढ़ी लिखी नहीं हैं लेकिन उनकी प्रतिक्रियाएं सच्ची हैं और उनमें प्रेम, घृणा आदि को लेकर स्पष्ट संवेदनशीलता हैं। समीक्षकों के अनुसार सत्यजित राय ने न केवल फ़िल्मों बल्कि रेखांकन के जरिए भी अपनी रचनात्मक ऊर्जा को बखूबी अभिव्यक्त किया। बच्चों की पत्रिकाओं और पुस्तकों के लिए बनाए गए सत्यजित राय के रेखाचित्रों को कला समीक्षक उत्कृष्ट कला की श्रेणी में रखते हैं। साहित्यकार सत्यजित राय की बाल मनोविज्ञान पर जबरदस्त पकड़ थी और इसका परिचय उनकी फेलूदा कहानियों की श्रृंखला में मिलता है। इस श्रृंखला की कहानियों में सरसता, रोचकता और पाठकों को बांधकर रखने के सारे तत्व मौजूद हैं।

सत्यजित राय और ऑस्कर

विश्व के दस फ़िल्मकारों में शामिल बांग्ला फ़िल्मकार सत्यजित राय ने अपनी किसी भी फ़िल्म को ऑस्कर की दौड़ में शामिल होने नहीं भेजा। उनकी फ़िल्म ‘पाथेर पांचाली’ (1955) और अपू त्रयी को दुनिया भर के फ़िल्म फेस्टिवल्स में सैकड़ों अवॉर्ड मिले हैं। इसके बावजूद 'राय मोशाय' ने ऑस्कर के फेरे नहीं लगाए। स्वयं ऑस्कर अवॉर्ड 1992 में चल कर कोलकाता आया और विश्व सिनेमा में अभूतपूर्व योगदान के लिए सत्यजित राय को मानद ऑस्कर अवॉर्ड से अलंकृत किया। सत्यजित राय बीमार थे। उनके घर आकर ऑस्कर अवॉर्ड के पदाधिकारियों ने उनका सम्मान किया। इस आयोजन की फ़िल्म बनाई गई और उसे ऑस्कर सेरेमनी में प्रदर्शित कर पूरी दुनिया को दिखाया गया।

अंतिम चरण

घरे बाहरे (1984) के निर्माण के साथ सत्यजित राय की जो बीमारी शुरू हुई उससे वे पूर्ण रूप से कभी भी निजात नहीं पा सके और उनका स्वास्थ्य लगातार गिरता रहा। अपने पिता पर बनाए गए आधे घंटे की लघु फ़िल्म को छोड़ दें तो वे पूरे पांच साल तक फ़िल्म निर्माण से अलग रहे। गणशत्रु और उसके बाद की फ़िल्मों का निर्देशक डाक्टरों और नर्सों से घिरा रहता था, दरवाज़े पर एम्बुलेंस गहन चिकित्सा कक्ष के बतौर खड़ी रहती थी। ‘अब मेरा डाक्टर- मुझे फ़िल्म निर्माण की विधि बता रहा है और मुझे आदेश है कि मैं स्टूडियों के अंदर ही कार्य करूं।’ किंतु साथ में उनका यह भी कहना था कि कैमरे के पीछे आकर काम करना उन्हें प्रफुल्लित कर देता था। और दवाइयों से जितनी राहत मिली उससे कहीं अधिक राहत उन्हें कैमरे से मिली। वह हमारे बीच भले ही मौजूद नहीं हैं लेकिन उनकी दर्जनों फीचर फ़िल्मों, कई वृत चित्र और लघु फ़िल्में मौजूद हैं जिनसे उनकी उपस्थिति महसूस की जा सकती है।
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