Monday, 22 April 2013

आम आदमी की पहचान ........................."स्व.श्री शरद जोशी की एक सशक्त व्यंग रचना"......43313

मैं उसके सामने खड़ा था. जिन्दा खड़ा था.मगर उसने मेरे अस्तित्व से साफ़ इनकार कर दिया.वो यह मानने को तैयार नहीं था की मैं "मैं" हूँ.और जब तक वो मानता नहीं, मुझे गवर्नमेंट डिपार्टमेंट से रुपये नहीं मिल सकते हैं .
"मैं, आपके सामने साक्षात् खड़ा हूँ , मैं "
"प्रमाण क्या है " --- उसने पूछा
"मेरे खड़े होने का ".
"अजी आप आप हैं, ये मैं कैसे जानू ? मुझे सबूत चाहिए"
"यार मैं जिन्दा हूँ ,ये बात कोई अफवाह तो नहीं है."
"ये मैं कुछ नहीं जानता,मुझे सबूत चाहिए."
"आप भारतीय संस्कृति पर भरोसा करते हैं ?" मैने पूछा.
"कर सकता हूँ,बशर्ते उससे दफ्तर के काम में बाधा न आये."
"तो ठीक है, मैं घर जाकर अपनी पत्नी को ले आता हूँ "
"क्यों?"
"आप उसके माथे की बिंदी देखिये,मांग में सिंदूर लगा है.मेरे पास मेरे जिन्दा होने का इससे बढ़कर कोई प्रमाण नहीं है"
"कमाल है."
"किस बात का ?"
"आप भी पढ़े लिखे होकर ऐसी बात कर रहे हैं"
"भैया,भारतीय संस्कृति में यही प्रमाण होता है "
वह कुछ देर चुप रहा.फिर बोला ---
"आप पति है?'
"जी हाँ "
"वो आपकी पत्नी हैं?"
"और क्या "
"क्या सबूत इस बात का?"
"वो मेरी एकमात्र पत्नी है और मैं उसका एकमात्र पति हूँ,हम शरीफ लोग हैं यार!"
"ऐसा......तो जाओ अपने एरिया के सब इंस्पेक्टर पुलिस से लिखवा लाओ कि हम शरीफ हैं ."
"आप मेरी कालोनी में किसी से पूछ लीजिये"
"क्यों ,आप क्या बड़े दादा हैं कालोनी के?"
"नहीं."
"फिर कालोनी का रोब किसे दे रहे हैं?अरे मैं सरकारी काम करूँगा कि मोहल्ले में पूछने जायूँगा!मुझे हर सबूत टेबल पर होना,इस टेबल पे"
"देखो भाई, रूपये कि मंजूरी मेरे नाम हुई है.जो रुपया दिया जाना है मुझे दिया जाना है, अब आपकी इंसानियत इसमें है कि आप .......!"
"यार आप इंसानियत कि बात करते हैं,ये सरकारी दफ्तर है."
मैं चुप हो गया.फिर मैं उसे नए सिरे से समझाने लगा-----
"देखो दोस्त, तुम मुझे अच्छी तरह जानते हो,तुम बीसियों बार मेरे घर आ चुके हो चाय पि चुके हो."
"पी होगी यार,हमारी तो जिन्दगी ही दूसरों कि चाय पीते बीती है.मगर मैं आपको नहीं पहचानता."
"क्योँ "
"मेरा फर्ज है भई,मैं गवर्नमेंट सर्वेंट हूँ, इस कुर्सी पे बैठने के बाद मैं अपने बाप को भी नहीं पहचानता."
मैं पराजित हो गया.यह बहस अनंत काल तक चल सकती थी और इसका समापन होना कठिन था.सरकारी दफ्तर में मैंने जब-जब कोशिश की है,मैं इसी तरह हारा हूँ.खैर कोशिश करना मेरा फर्ज़ था.मैंने धीमे से पूछा-"आप मुझे पहचाने का क्या लेंगे?"
"पचीस रुपया.हमारा यही रेट है."
"ज्यादा है."
"इससे कम में हम किसी को नहीं पहचानते."
"एक जमाना था आप दो रुपये में पहचानते थे'"
"आह वो भी क्या दिन थे,"वो एकाएक भावुक हो गया."सस्ती का जमाना था.सरकारी दफ्तरों में इंसान की पहचान एक दो रूपये में हो जाती थी,उस ज़माने में आप भी इस विभाग से सौ पांच सौ से ज्यादा नहीं ले पाते थे,आजकल आप हज़ार दो हज़ार ड्रा कर लेते है,इसलिए मैं भी पच्चीस से कम में नहीं पहचानता.भगवान करे आप ऐसे प्रगति करें.आप लाखों में ड्रा करें मैं आपको हजारों में पहचानू."
मैं सुन रहा था.इस देश में जो व्यक्ति एक दर्शन अख्तियार कर लेता है,एक जीवन द्रष्टि अपना लेता है वह सहज में नहीं डिगता.मैंने जेब में हाथ डाला पच्चीस रूपये निकाले और उसकी तरफ बढ़ाये.
उसने रूपये जेब में रखे.कैश बॉक्स खोला और हज़ार रूपये निकाल कर गिनने लगा,"और बाल बच्चे सब मजे में?बहुत दिनों से आना नहीं हुआ तुम्हारे यहाँ,भाभी जी कैसी हैं?"

"स्व.श्री शरद जोशी की एक सशक्त व्यंग रचना"
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