Sunday, 21 April 2013

अप्रैल के 'फ़ूल'......................42713

जली पतीली का दर्द

ये महिलाएँ भी न
पता नहीं
क्या समझती हैं खुद को,
कभी भी धैर्यपूर्वक
चुल्हे के पास खड़े होकर
दूध नहीं उबालतीं
उन्हें बड़ा नाज है
अपनी याददाश्त पर
पतीले में दूध डाला
उसे गैस पर चढ़ाया
पर वहाँ खड़े होकर
कौन बोर होने का सरदर्द ले
या तो तेज आँच पर ही
दूध को छोड़कर
गायब हो जाती हैं
यह सोचकर
‘बन्द कर दूँगी न’
इधर दूध बेचारा भी क्या करे
उसे आदत है
उबलकर बाहर निकल जाने की
और नतीजा बड़ा सुहाना
हँस-हँस कर गाइए
‘हम उस घर के वासी हैं
जहाँ दूध की नदिया बहती है’J

दूसरा विकल्प
गैस की आँच धीमी करो
फिर निकल जाओ गप्पें मारने
अब दूध बेचारा
उबलता रहा
उबलता रहा
आधा हुआ
उसका भी आधा हुआ
उफ! मालकिन अब भी गायब
पतीली ने सारा दूध पी लिया
अब क्या करे
उसने जले दूध की गंध
फ़िजाओं में घोल दिया
फिर रो-रो कर गाने लगी
‘मैं बैरन ऐसी जली
कोयला भई न राख’…J

.ऋता शेखर 'मधु'
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‘‘आ मेरे हमजोली आ
खेलें आँखमिचोली आ’’
आप सोच रहे होंगे
मैं इसे क्यों गुनगुना रही हूँ
तो सुनिए...
आँखमिचोली का गेम
खेल रहे हैं दो लोग
एक मैं और एक
मेरे इलाके की बिजली
कभी मैं जीत जाती हूँ
कभी वह जीतती है.
मैं बज़ाप्ता
कम्प्यूटर के पास बैठती हूँ.
ब्लॉगर खोलती हूँ
साइन इन होती हूँ
कभी कोई रचना
पोस्ट करने के लिए
कभी टिप्पणी डालने के लिए
सारे पेज़ खोलती हूँ
लिखना शुरु करती हूँ
अचानक बिजली रानी
ठेंगा दिखाती हुई
गुल हो जाती है
जल्दी जल्दी
खुले पेज समेटती हूँ
मतलब सारी प्रक्रिया बेकार
फिर टकटकी लगाए इन्तेजा़र
फिर महारानी जी पधारती हैं
झट सारे प्रॉसेस दोहराती हूँ
एकाध जगह टिप्पणी डालने में
सफल हो जाती हूँ विजय भाव से मुस्कुराकर
बिजली की ओर देखती हूँ
मानो मैंने गेम जीत लिया न!!
यू पी एस महोदय ने भी
दो टूक कह दिया
मैं इस आँखमिचोली में
साथ नहीं दे सकता
ठीक है भई,
मत दो साथ
मैं नहीं हारने वाली
आँखमिचोली का
यह खेल जारी है
हा हा हा...
आपने भी एनज्वाय किया न...
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सुबह सुबह
अलसाई सी आवाज़
मम्मा, आज कौन सा डे है
आज सन्डे है,अभी सो जाओ
वो वाला डे नहीं
स्पेशल वाला डे
ओ,अभी मालूम नहीं
सर्च करके बताती हूँ


डे डे डे

हर दिन मनता

कोई न कोई 'डे'

डे मनाने के पीछे

मानसिकता होती है

उसे बढ़ावा देने की

या उससे निजात पाने की

अर्थात् हर ''डे''

उनके नाम

जो आते हैं

''निरीह' की श्रेणी में



'विमेन्स डे'

महिला मतलब निरीह

'डाटर्स डे'

बेटियाँ मतलब निरीह

'मदर्स डे'

यह भी महिला

सम्माननीय

'चिल्डरेन्स डे'

बच्चों को 

संरक्षण की आवश्यकता

'एनवायरोन्मेंट डे'

पर्यावरण भी

इंसानो के कारनामों से

बन गया निरीह

आजकल हँसने की गुंजाइश नहीं

निरीह हँसी के लिए

''लाफ्टर्स डे''

प्यार जताने का समय नहीं

'वैलेन्टाइन्स डे' है ना!

बच्चों को बचाना है

खतरनाक श्रम से

'चाइल्ड लेबर डे'

एक दिन की बैठक

फिर बच्चे वहीं के वहीं चौकलेट डे स्लैप डे हग डे रोज़ डे टेड्डी डे फ्रेंडशिप डे मतलब डे ही डे



पुरुष होते बलवान

इसलिए है नहीं

कोई भी डे

उनके नाम

किन्तु जब बनते

पति और पिता

वे भी होते निरीह

अर्थात्

'हस्बेन्ड्स डे'

'फादर्स डे'

:):):)



ऋता शेखर 'मधु'
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गुलाब के फूल बागों में खिल रहे
चमेली के फूल चमन में चमक रहे कमल के फूल जल में विचर रहे बेली के फूल उपवन में बहक रहे गुल्लड़ के फूल दिख नहीं रहे गोभी के फूल उद्दान में चहक रहे  अप्रैल के 'फ़ूल' यह पोस्ट पढ़ रहेः)))
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