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Friday, 5 April 2013

फिल्म रिव्यू :: चश्मे बद्दूर - हंसी बेरोकटोक !!!...................3741

फिल्म रिव्यू :: चश्मे बद्दूर - हंसी बेरोकटोक !!!

अवधि - 132 मिनट
*** तीन स्टार

मुंबई। 'हिम्मतवाला' के रीमेक की साजिद खान की लस्त-पस्त कोशिश के बाद डेविड धवन की रीमेक 'चश्मेबद्दूर' से अधिक उम्मीद नहीं थी। डेविड धवन की शैली और सिनेमा से हम परिचित हैं। उनकी हंसी की धार सूख और मुरझा चुकी है। पिछली फिल्मों में वे पहले जैसी चमक भी नहीं दिखा सके। गोविंदा का करियरग्राफ गिरने के साथ डेविड धवन का जादू बिखर गया। 'चश्मे बद्दूर' के शो में घुसने के समय तक आशंका बरकरार रही, लेकिन यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं है कि डेविड धवन की 'चश्मेबद्दूर' एक अलग धरातल पर चलती है और हंसाती है।
पुरानी फिल्म के प्रति नॉस्टेलजिक होना ठीक है। सई परांजपे की 'चश्मे बद्दूर' अच्छी और मनोरंजक फिल्म थी। रीमेक में मूल के भाव और अभिनय की परछाइयों को खोजना भूल होगी। यह मूल से बिल्कुल अलग फिल्म है। डेविड धवन ने मूल फिल्म से तीन दोस्त और एक लड़की का सूत्र लिया है और उसे नए ढंग से अलहदा परिवेश में चित्रित कर दिया है। 'चश्मे बद्दूर' की अविराम हंसी के लिए सबसे पहले साजिद-फरहाद को बधाई देनी होगी। उनकी पंक्तियां कमाल करती हैं। उन पंक्तियों को अली जफर, सिद्धार्थ और दिव्येन्दु शर्मा ने सही टाइमिंग के साथ बोल कर ज्यादा हास्यप्रद बना दिया है।
अली जफर, सिद्धार्थ और दिव्येन्दु शर्मा की तिगड़ी फिल्म को बगैर ब्रेक के इंटरवल तक ले जाती है। फिल्म इतनी तेजी के साथ आगे बढ़ती है कि कुछ सोचने-समझने की फुर्सत नहीं मिलती है। इस फिल्म की कहानी मूल फिल्म के केंद्रीय भाव पर ही आधारित है। चरित्र और परिवेश बदल गए हैं। कुछ किरदारों को बिल्कुल नए रंग-ढंग में पेश किया गया है। ऋषि कपूर और लिलेट दूबे का रोमांटिक ट्रैक सुंदर बन पड़ा है। अनुपम खेर अपने डबल रोल में जमते हैं। अनुपम खेर के एक्सप्रेशन और बॉडी लैंग्वेज के ठहराव, विराम और अंतर का अध्ययन किया जा सकता है। इस शैली और कोटि का दूसरा अभिनेता हिंदी फिल्मों को नहीं मिला है। दरअसल,अनुपम खेर ने इतनी ज्यादा और साधारण फिल्में की हैं कि हम उनकी विशेषताओं को तूल नहीं दे सके। ऋषि कपूर के बोले अंकों से संबंधित मुहावरों के अंक कम-ज्यादा कर लेखक ने उन्हें नया आयाम और हास्यपूर्ण अर्थ दे दिया है।
'चश्मे बद्दूर' आज की फिल्म है। आज के युवा दर्शकों को यह फिल्म पसंद आएगी। इंटरवल तक बेरोकटोक आगे बढ़ रही फिल्म द्वंद्व जाहिर होने के बाद थोड़ी धीमी हो जाती है। कभी-कभी ठहर भी जाती है। लेखक-निर्देशक उसे खींच-खींच कर आगे बढ़ाते हैं। नायक की दशा से पिघलकर मदद के लिए दोनों दोस्तों के तैयार होने का प्रसंग कमजोर और जल्दबाजी में है। और अच्छी बात यही है कि डेविड धवन की 'चश्मे बद्दूर' मूल से अलग होने के बावजूद निराश नहीं करती। एक नई मनोरंजक फिल्म का एहसास देती है।

~ अजय ब्रह्मात्मज
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