Tuesday, 26 March 2013

Gabbar- Holi kab hai? Kab hai Holi?......33813

चिलमन  गिरा के मारा चिलमन उठा के मारा
दिल फेंक आशिकों  को यूँ दिल जला के मारा

नाराज आशिकों में होती रही ये चर्चा
जिस रूप के दीवाने उसने जला के मारा
 

होली की आड़ में था उसका घिनौना मकसद 
गुझिया में भांग विष की मदिरा पिला के मारा 

बच्चों से जा के उलझा वो भांग के नशे में 
इसको हँसा के मारा उसको रुला के मारा

जिस को सता रहा था वो फाग के बहाने
 उसकी सहेलियों  ने टब में डुबा के मारा 

 अनजान बन रहा था शौहर  बड़ा खिलाड़ी 
    
बीबी ने आज शापिंग का बिल दिखा के मारा 

दिन रात जिस बहन को मिस काल भेजता था
उसके ही भाइयों ने  कंबल उढ़ा के मारा

छेड़ा पड़ौसिनों  को जो रंग के बहाने 
बीबी ने जोर से फिर बेलन घुमा के मारा 

जनता ने वोट देकर जिस शख्स को जिताया
उसका उसी शहर ने पुतला जला के मारा
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चूनर पे तक चकत्ता, इत्ता बड़ा गुलाबी

कहने लगीं सहेली, वो कौन था? गुलाबी



कैसे बताए सब को, थी सोच में गुलब्बो

नज़रें चुरा के बोली, कुछ लोच में गुलब्बो



होली का पर्व है सो, पुतवा रही थी घर को

मिस्टर ने थामी कूची, मैंने गहा कलर को



दीवार पुत चुकी थी, दरवाज़ा रँग रहे थे

ठीक उस के पीछे सखियो, कुछ वस्त्र टँग रहे थे



मिस्टर तपाक बोले, इन को हटा दो खानम

मैंने कहा सुनो जी, तुम ही हटा दो जानम



कुछ और तुम न समझो, मैं ही तुम्हें बता दूँ

मैं समझी वो हटा दें, वो समझे मैं हटा दूँ



दौनों खड़े रहे थे, जिद पे अड़े रहे थे

दौनों की जिद के चलते, कपड़े पड़े रहे थे



आगे की बात भी अब, तुम सब को मैं बता दूँ

दौनों ने फिर ये सोचा, चल मैं ही अब हटा दूँ



वाँ हाथ उठाया उन ने, इत मैं भी मुड़ चुकी थी

कब जाने सरकी चुनरी, शानों पे जो रुकी थी



फिर जो बना है बानक, कैसे बताऊँ तुमको

शब्दों से सीन सारा, कैसे दिखाऊँ तुमको



हेमंत ने अचानक, बहका दिया था हमको

कुछ ग्रीष्म ने भी सखियो, दहका दिया था हमको



बरसात की घटा ने, दिखलाया रंग ऐसा

कुछ था वसंत जैसा, और कुछ शरद के जैसा



कर याद फिर शिशिर को, दौनों हुए शराबी

इस वास्ते चकत्ता - चूनर पे है गुलाबी

इस वास्ते चकत्ता - चूनर पे है गुलाबी

इस वास्ते चकत्ता - चूनर पे है गुलाबी
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नहीं फाग के स्वर आते हैं,

ढोलक ढप हैं मौन हो गए,

अब उत्साह नहीं है मन में

अब होली में रंग नहीं है.



न मिठास बाक़ी रिश्तों में,

मिलते हैं गले अज़नबी जैसे,

रंग गुलाल हैं पहले ही जैसे

प्रेम पगे पर रंग नहीं हैं.



महंगाई सुरसा सी बढ़ती,

है गरीब की थाली खाली,

कैसे ख़ुमार छाये होली का

जब गिलास में भंग नहीं है.



गुझिया का खोया मिलावटी,

मुस्कानें बनावटी लगतीं,

आगे बढ़ते हाथ हैं मिलते,

दिल में पर उमंग नहीं है.



शहरों की सडकों पर टेसू

पैरों तले हैं कुचले जाते,

काले पीले चेहरे के रंग में

भौजी का वह रंग नहीं है.



एक बार लौट सकें पीछे

एक बार वह होली पायें,

ख़्वाब कहाँ हो सकते पूरे

अब वे साथी संग नहीं हैं.



*****होली की हार्दिक शुभकामनायें*****



कैलाश शर्मा
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पुडि़या में रखे रंग
माँ की धरोहर हुआ करते थे,
कितने भी नये रंग  खरीदे जाते
पर माँ का सारा स्‍नेह
उस पुडि़या पर ही टिका रहता
हम हँसते क्‍या माँssss
तो माँ भी हँस देती साथ ही पर !!!!
पुडि़या का रंग सारा हम पर उड़ेल दिया जाता
हम भी भावनाओं के आँगन में
जमकर मस्‍ती करते !!!!
...
वहीं हरा रंग जरा शरारती हो जाता,
उसे देख मन मचलता
और पिचकारी जो भरी जाती
तो सब उस हरे रंग में रंग ही जाते
....
रंगों की टोली जब अपने रंग में रंगी हो
जो इनका उधम देखना हो तो,
नारंगी रंग मत भूलना
माँ कहती है यह वचनबद्धता का प्रतीक होता है 
औ' लाल रंग स्‍नेह का
तो कहिये इस होली किस रंग !!!
रंगना चाहते हैं आप ??
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अब यहां पीयूष पांडे के व्यंग्य को रिपीट कर रहा हूं...

“अरे ओ सांभा, होली कब है?कब है होली?”  जेल से छूटकर लौटे गब्बर ने बौखला कर सांभा से पूछा... 
“सरदार, होली 27 तारीख को है... लेकिन, अचानक होली का ख्याल कैसे आया? बसंती तो गांव छोड़कर जा चुकी है, और ठाकुर भी अब ज़िंदा नहीं है... फिर, होली किसके साथ खेलोगे?
“धत तेरे की...लेकिन, वीरु-जय उनका क्या हुआ?”
“सरदार, तंबाकू चबाते चबाते तुम्हारी याददाश्त भी चली गई है...जय को तुमने ही ठिकाने लगा दिया था, और वीरु बसंती को लेकर मुंबई चला गया था...”
“जे बात... जेल में बहुत साल गुजारने के बाद फ्लैशबैक में जाने में दिक्कत हो रही है...खैर, ये बताओ बाकी सब कहां हैं...”
“ कौन बाकी...तुम और हम बचे हैं...कालिया को जैसे तुमने मारा था, उसके बाद सारे साथी भाग लिए थे...बचे खुचे जय-वीरु ने टपका दिए थे...”
“तो रामगढ़ में हमारी कोई औकात नहीं अब ? कोई डरता नहीं हमसे? एक ज़माना था कि यहां से पचास पचास मील दूर कोई बच्चा रोता था तो मां कहती थी कि.....”
“अरे, कित्ती बार मारोगे ये डायलॉग...इन दिनों बच्चे रोते नहीं, मां-बाप रोते हैं...बच्चे हर दूसरे दिन मैक्डोनाल्ड जाने की जिद करते हैं... मल्टीप्लेक्स में फिल्म देखने की मांग करते हैं....बंगी जंपिग के लिए प्रेशर डालते हैं...एक बार बच्चों को घुमाने गए मां-बाप शाम तक दो-तीन हजार का फटका खाकर लौटते हैं....।“ 
“सांभा,छोड़ो बच्चों को...बसंती की बहुत याद आ रही है... बसंती नहीं है धन्नो के पास ही ले चलो...”
“अरे सरदार...कौन जमाने में जी रहे हो तुम...धन्नो बसंती की याद में टहल गई थी...अब, धन्नो नहीं सेट्रो, स्विफ्ट, नैनो, एसएक्स-4,सफारी वगैरह से सड़कें पटी पड़ी हैं”
“अरे, ये कौन से हथियार  हैं?”
“ये हथियार नहीं...मोटर कार हैं... तुम्हारे जमाने में तो एम्बेसेडर भी बमुश्किल दिखती थी...अब नये नये ब्रांड की कारें आ गई हैं...”
“सांभा. होली आ रही है...रामगढ़ की होली देखे जमाना हो गया... होली कार में बैठकर देखेंगे...आओ कार खरीदकर लाते हैं...“
“अरे तुम्हारी औकात नहीं है कार खरीदने की...”
“जुबान संभाल सांभा...पता नहीं है सरकार कित्ते का इनाम रखे है हम पर... ”
“घंटा इनाम...कोई इनाम नहीं है तुम पर अब...और जो था न पचास हजार का !उसमें गाड़ी का एक पहिया नहीं आए...सबसे छोटी गाड़ी भी तीन-चार लाख की है...तुम तो साइकिल पर होली देख लो-यही गनीमत है...”
“सांभा,बहुत बदल गया रे रामगढ़...अब कौन सी चक्की का आटा खाते हैं ये रामगढ़ वाले?” 
“अरे, काहे की चक्की...चक्की बंद हो लीं सारी सालों पहले...अब तो पिज्जा-बर्गर खाते हैं...गरीब टाइप के रामगढ़ वाले कोक के साथ सैंडविच वगैरह खा लेते हैं...इन दिनों गरीबों के लिए कंपनी ने कोक के साथ सैंडविच फ्री की स्कीम निकाली है...
“सांभा, खाने की बात से भूख लग गई... होली पर गुझिया वगैरह तो अब भी बनाते होंगे ये लोग?”
“गब्बर बुढ़ा गए हो तुम...आज के बच्चों को गुझिया का नाम भी पता नहीं...बीकानेरवाला, हल्दीरामवाला,गुप्तावाला वगैरह वगैरह मिठाईवाले धांसू डिब्बों में मिठाई बेचते हैं...बस, वो ही खरीदी जाती हैं। एक-एक डिब्बा सात सौ-आठ सौ का आता है...तुम्हारी औकात मिठाई खाने की भी नहीं है...
“सांभा, तूने बोहत बरसों तक हमारा नमक खाया है न..? ”
“जी सरदार”
“तो अब गोली खा...गोली खाकर फिर जेल जाऊंगा... वहां अब भी होली पर रंग-गुलाल उड़ता है, दाढ़ी वाले गाल पर ही सही पर बाकी कैदी प्यार से रंग मलते हैं तो दिल खुश हो जाता है...जेल में दुश्मन पुलिसवाले भी गले लगा लेते हैं होली पर...ठंडाई छनती है खूब...और मिठाई मिलती है अलग से... सांभा, रामगढ़ हमारा नहीं रहा...तू जीकर क्या करेगा... ”
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गुल्ली : 'होली' के त्योहार को "शेर का बच्चा " भी कहते हैं!

मक्खन : क्या बकवास कर रहे हो!

गुल्ली : क्यूँ? आपको  याद नहीं जब 'शोले' (Sholay ) पिक्चर में गब्बर सिंह ने कहा था, "होली 'कब'(Cub) है!"
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Holi Special - Gabbar trolled
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Gabbar- Holi kab hai? Kab hai
Holi? .
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Frustrated Sambha- Le saale,
aa gayi Holi. Dekhta hoon kya
ukhaad leta hai.
Chilla-chilla ke naak me dum
kar
rakkha hai jaise
tere baap ne koi rang-gulal ki
factory
laga
rakhi ho aur maal bechna ho.
Ya fir pura gaon teri bhaujai
lagta hai,
jo tu bechain hai Holi khelne ke
liye.
Karega
kya tu jaan ke ki Holi kab hai?
Pure Ramgarh ko dawat dega
kya?
Ya fir tu Farha Khan ke sath
nachega-
jumping-
jupang, thumping-thupan ­ g....
.
. sale karna kya hai tujhe ....
akhiri baar bataye deta hoon 27
March
ko hai
Holi... jo karna hai kar le...
aaj ke baad poochha to sale teri
Thakur
ke yahan teri
naukri laga dunga aur Thakur
ko
jamalgota khila dunga...
bada aya Holi kab hai.. Holi kab
haI !! :@

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