Wednesday, 27 March 2013

होली का त्यौहार , मायके बैठी बीबी !!.........34413

रंगों के दोहे ,
परदेशी के प्यार का ,नया निराला रंग
रंग डूबी चिट्ठियाँ ,भिजवा दी बैरंग   !१!

देखी जब से रंग के ,चहरे पर मुस्कान,
रंग ,कबीरा,जायसी ,रंग हुए रसखान !२!

रंगों की शहनाइयां,गूंजी जिनके द्वार
   उनके घर मेहमान है,अबके सब त्यौहार !३! 

आँखों में कुछ और है,होठो पर कुछ और
अजब प्यार का रंग है,अजब उम्र का दौर !४!

रंग नदी अमराइयां, बच्चे,तितली,फूल
  टेसू ने जब चूम ली,रंग हो गई धूल !५!  


छूकर उनकी उगलियाँ छूकर उनके अंग
रंगों में खुशबू घुली,घुले हवा में रंग !६!

रचनाकार ..... महेश जोशी
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होली में 

बहकी बहकी कली खिली है होली में
महकी महकी हवा चली है होली में,


उन्मादों कि घटा घनेरी घिर आई
मलय पवन में चंवर झली है होली में,


अमरैय्या में कुहूँ कुहूँ करती कोयल
लगती मन को बड़ी भली है होली में,


रतन चुनरिया पिरियाई है सरसों की
चना चोली, गेंहू बाली है होली में,


रंग भरी पिचकारी स्नेह सौगात लिए
किसने क्या क्या चाल चली है होली में,


जीजाजी साली के गालो को छुकर
ढूढ़ रहे मिस्री कि डली है होली में,


नजर मिलाने तक से जो कतराती थी
वही पड़ोसन गले मिली है होली में,


भाभी देवर की मर्यादा को लेकर
घूंघट घूंघट बात चली है होली में,

 पत्तों का नही पता अधर पर अंगारे
या कलमुंही टेसू जली है होली में,

 
कम्पित है क्यों लौ "धीर" की देहरी पर
फागुन इठलाती चली है होली में,

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     DHEERENDRA,"dheer"
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अरुन शर्मा जी 
यादों के झूलने पे हरपल झुलाया यारों,
होली पे दूरियों ने मुझको रुलाया यारों,

कुछ काम ना मिला जो फुर्सत के इन दिनों में,
सुबहा से शाम खुद को मैंने सुलाया यारों,

लाली गुलाल की तो भाई नहीं जरा भी,
अश्कों की धार से ही तन को धुलाया यारों,

बीबी के मायके में हुडदंग मच रहा था,
सब भंग के नशे में हमने भुलाया यारों,

गुझिया जँची न मेरे पकवान मन को भाये,
गुस्से से कुप्पे जैसा था मुँह फुलाया यारों. 
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फागुन
 

देखा जब नहीं उनको और हमने गीत नहीं गाया
जमाना हमसे ये बोला की फागुन क्यों नहीं आया

फागुन गुम हुआ कैसे ,क्या   तुमको कुछ चला मालूम
कहा हमने ज़माने से की हमको कुछ नहीं मालूम

पाकर के जिसे दिल में  ,हुए हम खुद से बेगाने
उनका पास न आना ,ये हमसे तुम जरा पुछो

बसेरा जिनकी सूरत का हमेशा आँख में रहता
उनका न नजर आना, ये हमसे तुम जरा पूछो

जीवितं है तो जीने का मजा सब लोग ले सकते
जीवितं रहके, मरने का मजा हमसे जरा पूछो

रोशन है जहाँ   सारा मुहब्बत की बदौलत ही
अँधेरा दिन में दिख जाना ,ये हमसे तुम जरा पूछो

खुदा की बंदगी करके अपनी मन्नत पूरी सब करते
इबादत में सजा पाना, ये हमसे तुम जरा पूछो

तमन्ना  सबकी रहती है, की जन्नत उनको मिल जाए
जन्नत रस ना आना ये हमसे तुम जरा पूछो

सांसों के जनाजें को, तो सबने जिंदगी जाना
दो पल की जिंदगी पाना, ये हमसे तुम जरा पूछो 
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 डा.निशा महाराणा
पिया बिन होली 
सौतन बन गई नौकरी
पिया जी घर नहीं आये
कैसे खेलूँ होली सखी री
रंग न मुझको भाये ....

कोयलिया तेरी कूक ने
हर लिया दिल का चैन
होली में पिया साथ नहीं हैं
बरसत  हैं दोनों नैन ....

टेसू के फूलों जैसे
दहके अंग -प्रत्यंग
अबकी सजन तेरे बिना
होली है बेरंग .....

होली के हुडदंग में
स्वप्न हुए सिन्दूरी
सिसका मन, भटके नयन
कैसी ये मजबूरी .....?

फाल्गुनी बहार है
रंगों का उफान
पिया  तुम्हारे साथ  बिना
सभी हुए गुमनाम ......

रंगों की बौछार में
जले जियरा हमार
तुम बिन फीका हो गया
रंगों का त्यौहार ......
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कालीपद "प्रसाद" जी

फागुन में होली का त्यौहार
लेकर आया रंगों  का बहार
लड्डू ,बर्फी,हलुआ-पुड़ी का भरमार
तैयार भंग की ठंडाई घर घर।
पीकर भंग की ठंडाई
रंग खेलने चले दो भाई
साथ में है भाभी  और घरवाली
और है साली ,आधी घरवाली।
भैया भाभी को प्रणाम कर
पहले भैया को रंगा फिर भाभी संग
पिचकारी मारना ,  गुलाल मलना
शुरू   हुआ   खूब  हुडदंग।
घरवाली तो पीछे रही
पर आधी घरवाली बोली
"जीजा प्यारे ,साली मैं दूर से आई
छोडो आज घरवाली और भौजाई।
इस साल की रंगीन होली तो
केवल हम दोनों के लिए आई।
आज तुमपर मै रंग लगाउंगी
मौका है आज ,दो दो हाथ करुँगी
न रोकना ,न टोकना, मैं नहीं मानूँगी
आज तो केवल मैं अपना  दिल की सुनूँगी।
तुम  तो मेरा साथ देते रहना
कदम से कदम मिलाते रहना ,
मैं नाचूँगी , तुम नाचना .
हम नाचेंगे देखेगा ज़माना।"
रंग की बाल्टी साली पर कर खाली
जीजा बोले "सब करूँगा जो तूम  कहोगी
आर तुम तो अभी कच्ची कली  हो
शबाबे हुश्न को जरा खिलने दो
खिलकर फुल पहले  महकने  दो
महक तुम्हारे नव  यौवन का
मेरे तन मन में समा जाने दो
तब तक तुम थोडा इन्तेजार करो।
वादा है ,अगली  होली  जमकर
केवल तुम से ही खेलूँगा।
यौवन का मय जितना पिलाओगी
जी भरकर सब पी  जाऊँगा .
नाबालिग़ हो ,धैर्य धरो ,जिद छोड़ दो
खिले फूलों पर आज मुझको जी भर के मंडराने दो।"
साली बोली "तुम बड़े कूप मंडुप हो
भारत सरकार के नियम कानून से अनभिज्ञ हो
दो साल का छुट मिला है सहमति रसपान का
हिम्मत करो आगे बढ़ो , अब डर  किस बात का ?
भौंरें तो कलियों पर मंडराते हैं ,मुरझाये फूलों पर नहीं
मधुरस तो कलियों में है ,मुरझाये फुलों में नहीं। "
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(1)
 बीबी के बिन आज तो,नहीं सुहाये फाग !
होली के बदले मुझे,आज लगा दो आग !!

आज लगा दो आग, मायके में जा बैठी !
कुछ दिन से नाराज,थी रहती ऐंठी ऐंठी !!

कब  होवेगी दूर , प्रेम की हाय गरीबी !
होली का त्यौहार , मायके  बैठी  बीबी !!

(2)
होली का त्यौहार है , सैंया  मोसे   दूर !
करके दारू का नशा , रहते  हरदम चूर !!

रहते  हरदम चूर , छोड़ घर  मैके आई !
मगर समझते यहाँ ,मुझे तो सभी पराई !!

सुधरें साजन और ,सजा कर लायें डोली !
साथ मनायें हँसी,खुशी हम मिलके होली !!
  अरुण कुमार निगम

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1 comment:

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