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Wednesday, 27 March 2013

एक बार चल कर तो आओ कन्हैयाँ यमुना के किनारे !...34313

लिख लिख
फूलों भेज रहा हूँ
सखे तुम्हें मैं
होली के पैगाम !
सोन सुबह
चन्दन की रोली
चम्पई दुपहरी
अबीरों टीका
और गुलाली
मोर्पंखिया शाम !
कानों मिशरी
घोली तुमने
ओंठों धर के
दुनियाँ भर मिष्ठान,
रंग बिरंगी
हंसी ठिठोली
कैसे भेजूं पैक पन्नियों
मावे के पकवान,
मूवर सभी
आज मौज में
रंग रंगीली होली खेलें
और उछालें
फूहर बातें
सखियों के ले नाम !

 

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नवगीत फागुनी उमंगों का गीत है आशा करता हूँ ! आपको भी तरंगायित करने में सफल होगा !
साहित्यिक अर्ध भोर रात्रि की सुन्दरतम शीतल बासंती बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर ...

घोरो ना पानी
पानी में रंगों की
रंग भरी डिबियाँ
पिचकारी भरो ना
कपोलों मलो ना
अबीरी अँजुरियाँ
तुम्हारे रंगों में रंगा है जिया !
आई है होली
अंखियों से खेलें
बनकर रंगोली
फिजाओं ने
आँचर भिंगोया
अंगिया गुलाबी आगी लगी है
बाँहों के झूले झुलाओ पिया !
शतरंगी रंगों से रंगी है
भीतर की दुनियाँ
आँखों कमल दल
पलकें पलाशी
कोरों का काजल
गुलाबी बनाओ
जूड़े में मेरे गज़रा सजाओ,
अंतर में गूंजे
प्राणों में घोले
मेहंदी की रंगत
ओंठों को नदिया
मन को मछरिया
तन को तलैया
भगोरिया वनों की कोयलिया बनाओ,
हल्दी की उबटन
फागुन का चन्दन
बांगों में फूलों के मेले
ख्वाबों की गाडी में
हम हों अकेले
अनुरागी ताड़ी
पी के मस्ती में हांको पिया !
घोरो ना पानी
पानी में रंगों की
रंग भरी डिबियाँ
पिचकारी भरो ना
कपोलों मलो ना
अबीरी अँजुरियाँ
तुम्हारे रंगों में रंगा है जिया !
आई है होली
अंखियों से खेलें
बनकर रंगोली
फिजाओं ने
आँचर भिंगोया
अंगिया गुलाबी आगी लगी है
बाँहों के झूले झुलाओ पिया !
गा गा कर बाहर
बिस्तर के किस्से
चादर की सिलवट
विज्ञापन बनाकर
दिखाओ टँगाओ न
चौराही बरगद के ऊपर
फागुन को सौंपो फागुनियाँ रागें,
परती दिलों में
बरसो न बनकर
बरसाती बादल
उगेगी थूहर भयानक
अबीरों की आभा
गुलालों की लाली
चुटकी भर सेंधुर हम तुमसे मांगे,
फूहर है भाषा
फूहर है बोली
रंगों की होली मुह भर ठिठोली
कामकेलि रागिनी
चौपाली चरचा
फरका गली में
मतवाली मोरिनी नचाओ पिया !
घोरो ना पानी
पानी में रंगों की
रंग भरी डिबियाँ
पिचकारी भरो ना
कपोलों मलो ना
अबीरी अँजुरियाँ
तुम्हारे रंगों में रंगा है जिया !
आई है होली
अंखियों से खेलें
बनकर रंगोली
फिजाओं ने
आँचर भिंगोया
अंगिया गुलाबी आगी लगी है
बाँहों के झूले झुलाओ पिया !
आगी लगी है
कोठवा की छानी
बुझती नहीं है बदरी की बानी
चलनी में चालो न
मटकी का दूध मिला पानी
चुल्लू भर सींचो
तो प्यास बुझे मन की,
नदियों नहाई
पलाशी वनों से
फगुआ की रस्में निभाती
मादल नगाड़ों की
मनचली कोरस रसीली
कंचुकी की चौकड़ी
भूल गई सीमायें तन की,
धानी चुनरिया
रंगों से लथपथ
अंगों से लपटी
होली के उत्सव
अधरों में मुक्त हंसी लहरी
भीतरी गोवर्धन
उंगली में अपने उठाओ पिया !
घोरो ना पानी
पानी में रंगों की
रंग भरी डिबियाँ
पिचकारी भरो ना
कपोलों मलो ना
अबीरी अँजुरियाँ
तुम्हारे रंगों में रंगा है जिया !
आई है होली
अंखियों से खेलें
बनकर रंगोली
फिजाओं ने
आँचर भिंगोया
अंगिया गुलाबी आगी लगी है
बाँहों के झूले झुलाओ पिया !

.
.
.
.


मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नवगीत फागुनी उमंगों का गीत तो नहीं है फिर भी आशा करता हूँ ! आपको भी तरंगायित करने में सफल होगा !
साहित्यिक अर्ध रात्रि की सुन्दरतम शीतल बासंती बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर ...

रहने दो
छोडो
अभी देखा
कहाँ है अनचीन्हा
दम ख़म
आपने हमारा !
छेड़ें
अगर लय
हम अपने
गीतों की
नाचेगी नदिया
छोड़ कर किनारा !
औंध औंध
रेत और बालू में
खोज खोज चकमक
पानी में धूनी
सुलगाई है
गीतों की हमने,
बहते पहावों की
लकड़ी जुटाई
न उपले
खैरातों में पाई
सोंसों की समिधा
हवन किये सपने,
रोकेंगे
काने
कुटिल मछुआरे
कब तब तक
जाल में
सूरज अवारा !
रहने दो
छोडो
अभी देखा
कहाँ है अनचीन्हा
दम ख़म
आपने हमारा !
छेड़ें
अगर लय
हम अपने
गीतों की
नाचेगी नदिया
छोड़ कर किनारा !
कानाफूसी
कनातों की
उलझाती नजरें
विज्ञापन ओढ़े रुपहले
हंसते रहो
बडबोली मुस्काने,
रहने दो
पर्दों के पीछे हमें
महुओं की खोखल में
सुग्गों के जैसे
सुविधायें हम
भी तो जाने,
पखनों में
अपने
क्षितिज
हम भरेंगे
फकीरी अदा के
बहरे बंजारा !
रहने दो
छोडो
अभी देखा
कहाँ है अनचीन्हा
दम ख़म
आपने हमारा !
छेड़ें
अगर लय
हम अपने
गीतों की
नाचेगी नदिया
छोड़ कर किनारा !
फूल की तरह ही
उछाले हैं आपने
अंगारे जलते
जब तब
सतरंगी धोतियों की
भाव भरी उलियाँ,
फसलें भरी हैं
कविता की आपने
तुलसी कबीरा की
ड़ीहों की माटी
से निर्मित
बखारी कुठुलियाँ,
फिर भी
नहीं दिखता
अउनों से
झिरता
जुगुनुओं का
कर्पूरी उजियारा ! 
रहने दो
छोडो
अभी देखा
कहाँ है अनचीन्हा
दम ख़म
आपने हमारा !
छेड़ें
अगर लय
हम अपने
गीतों की
नाचेगी नदिया
छोड़ कर किनारा !

  .
.
.

एक बार चल कर
तो आओ कन्हैयाँ
यमुना के किनारे !
देखेंगे हम भी
सजती मुरलिया
ओंठ में तुम्हारे !
प्राण भेदी चितवन
एक नज़र
हम पर भी डारो,
लहरों में
बनाये
रेत के घरौंदे उबारो,
मीरा संग राधा
आज रास तुम नाचो
साथ में हमारे !
एक बार चल कर
तो आओ कन्हैयाँ
यमुना के किनारे !
देखेंगे हम भी
सजती मुरलिया
ओंठ में तुम्हारे !
यमुना की
लहरी में झांके
पूनम की चंदा,
तुम भी निहारो
कमल मुख कलियाँ
डारो न फंदा,
आँचल का फागुन
पलाशों का फींचा
गलियाँ निहारे !
एक बार चल कर
तो आओ कन्हैयाँ
यमुना के किनारे !
देखेंगे हम भी
सजती मुरलिया
ओंठ में तुम्हारे !
डारे कदम की
डारी हमने
बाहों के झूले,
प्राणों में मेहदी
अमलतास
साँस फूले,
खेलेंगे हम भी
गोकुल की होली
प्रीत के सहारे !
एक बार चल कर
तो आओ कन्हैयाँ
यमुना के किनारे !
देखेंगे हम भी
सजती मुरलिया
ओंठ में तुम्हारे !

भोलानाथ
  

चकमक सी प्रहरी
पुन्य हुये
पत्थर की नगरी
राग नहीं बिसरी
नदिया के घाटों
गूँजते ठहाकों
चौकड़ियाँ भरती
गहनों से लदी फंदी परियाँ !
छनकाती पायल
मधुमय रंगीली
गूलर छबीली
कहुओं की
जल छूती डारी
लहरें कुवांरी
चारा चुगातीं फँसाती
मछेरिन जाल में मछरियाँ !
सिंदूरी संध्या
पलकों में उतरी
मधुमास परचित
कपोलों में
फूला गुलाबी,
कमल मुख रंगीली
आँचल महकती
छुअन आँख
आँखों की चितवन
चितौनी शराबी,
अहसासी सांसें
खिली हैं सिराने
बिम्ब हैं बिराने
दर्पण में मेरे
इन्द्रधनुष हेरे
आखेटी
गंध की कुलांचें
फूली हैं भीतर भर जरियाँ !
चकमक सी प्रहरी
पुन्य हुये
पत्थर की नगरी
राग नहीं बिसरी
नदिया के घाटों
गूँजते ठहाकों
चौकड़ियाँ भरती
गहनों से लदी फंदी परियाँ !
छनकाती पायल
मधुमय रंगीली
गूलर छबीली
कहुओं की
जल छूती डारी
लहरें कुवांरी
चारा चुगातीं फँसाती
मछेरिन जाल में मछरियाँ !
झरती है झर झर
पियूष पिये
प्रीत की
मकरंदी ओंठों से
निर्झर निर्झरणी धारा,
अर्झी है आँखों में
मछली की आँख सी
हस्ताक्षर
हीन उड़ा
सतिया गुब्बारा,
बहते सैलाब में
थमे नहीं पाँव
पनघट की छाँव
कोयल की बोली
देह भर ठिठोली
रस बोरी लुकाछिपी
अंतर की आगी
यौवन की सींची अँतरियाँ !
चकमक सी प्रहरी
पुन्य हुये
पत्थर की नगरी
राग नहीं बिसरी
नदिया के घाटों
गूँजते ठहाकों
चौकड़ियाँ भरती
गहनों से लदी फंदी परियाँ !
छनकाती पायल
मधुमय रंगीली
गूलर छबीली
कहुओं की
जल छूती डारी
लहरें कुवांरी
चारा चुगातीं फँसाती
मछेरिन जाल में मछरियाँ !
भगोरिया वनों सी
सतरंगी
चुनरी तुम्हारी
पुरवा की
बांहों में रह रह झूले,
भौरों के रेवड़
संशय में
अटके
मचलती निगाहें
जूही बेले चंपा को भूले,
फागुनी उमंगों में
गीतों के रसिया
मचली बतसिया
रंग भींजे आवरण
देह ढके आचरण
ओंठों की चुप्पी
प्राणों में उतरी
बंद कर किमरियाँ !
चकमक सी प्रहरी
पुन्य हुये
पत्थर की नगरी
राग नहीं बिसरी
नदिया के घाटों
गूँजते ठहाकों
चौकड़ियाँ भरती
गहनों से लदी फंदी परियाँ !
छनकाती पायल
मधुमय रंगीली
गूलर छबीली
कहुओं की
जल छूती डारी
लहरें कुवांरी
चारा चुगातीं फँसाती
मछेरिन जाल में मछरियाँ !

भोलानाथ
 

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नवगीत फागुनी उमंगों का गीत है आशा करता हूँ ! आपको भी तरंगायित करने में सफल होगा !
साहित्यिक अर्ध रात्रि की सुन्दरतम शीतल बासंती बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर ...

अभी क्या हुआ है
कैसी है दूरी
कैसी मजबूरी
ओंठों में आहें
झलकती है पीड़ा
आँख में तुम्हारे !
गुलाबी है फागुन
मौसम सुहाना
कैसा बहाना
गोदावरी बन भीतर बहो
रहो हरदम
सांस में इतर सी हमारे !
देखो तो मुड़कर
आंगन में मेरे
गुलाबों की बगिया
फूली नहीं
रुकी है तुम्हारी
उँगलियों की पावन
छुअन के लिये,
जन्मों की सूखी
पोखर तलैया
सजल हुई
चाहत की बूँदे
आँखों से छलकी हैं
जब से तुम्हारे
हमारे मिलन के लिये,
वन भर फूले
फुलचुहियों के बिरवे
गुलमोहर उत्सव
पलाशी परव के
भावों की भूमि
राधा छवि की आरती उतारे !
अभी क्या हुआ है
कैसी है दूरी
कैसी मजबूरी
ओंठों में आहें
झलकती है पीड़ा
आँख में तुम्हारे !
गुलाबी है फागुन
मौसम सुहाना
कैसा बहाना
गोदावरी बन भीतर बहो
रहो हरदम
सांस में इतर सी हमारे !
तुलसी सी सुधियों
रंगों की नदियों
डूबी कोयलिया
तोतों की बोली
प्रणय प्रीत घोली
जिया में
कटारी सी उतरी,
भौंरा ना हांको
अंतस में झांको
टेशुओं की लाली
फागुन की पाली
सोनजुही
सूरत तुम्हारी
आँखों की पुतरी,
नीलकंठ मैना
बसंत ऋतु रैना
महुये की
बांहों में मचली
बिना फूले गूलर
गुलाबी हुई है नदिया किनारे !
अभी क्या हुआ है
कैसी है दूरी
कैसी मजबूरी
ओंठों में आहें
झलकती है पीड़ा
आँख में तुम्हारे !
गुलाबी है फागुन
मौसम सुहाना
कैसा बहाना
गोदावरी बन भीतर बहो
रहो हरदम
सांस में इतर सी हमारे !
सेमल सी फूली
पपीहे की बोली
अमलतास पाती
समय सगुन थाती
और झुकी हैं
अमुआं की
बौर से डरईयाँ,
महक रही
चेहरे भर चांदनी
पी पी के मादनी
झूम झूम चूम रही
बरगद की फुनगी
भींगी हैं
देह भर चिरईयाँ,
सांसें उसांसें
संसय से अरझीं
पनघट में डारे
बांहों ने
हंस हंस
फूलों के झूले रेशम के नारे !
अभी क्या हुआ है
कैसी है दूरी
कैसी मजबूरी
ओंठों में आहें
झलकती है पीड़ा
आँख में तुम्हारे !
गुलाबी है फागुन
मौसम सुहाना
कैसा बहाना
गोदावरी बन भीतर बहो
रहो हरदम
सांस में इतर सी हमारे !

भोलानाथ
 

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नवगीत फागुनी उमंगों का गीत है आशा करता हूँ ! आपको भी तरंगायित करने में सफल होगा !
साहित्यिक रात्रि की सुन्दरतम शीतल बासंती बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर ...

अबकी फगुआ
भी गाऊंगा
रंग बिरंगे
गीत मैं होली के !
भरे अबीरी
हाथ मलूँगा
गाल
रँगूँगा बँधन चोली के !
हवा में मह मह महकी
साँस तुम्हारी
बहकी गलियाँ गलियाँ,
मेरे प्राणों
छुअन कुवाँरी
जूड़े बँधीं जुही की कलियाँ,
भौजी मिली
मिली न सखियाँ
लिखूँ कुतुहल कच्चे
किस हमजोली के !
अबकी फगुआ
भी गाऊंगा
रंग बिरंगे
गीत मैं होली के !
भरे अबीरी
हाथ मलूँगा
गाल
रँगूँगा बँधन चोली के !
अँग अँग के रँग रँग से
नाम तुम्हारे
भरी है हमने पिचकारी,
झरे अबीरी बादल बरखा
मेरे रंग में
भींजो प्राण पियारी,
ढोल नगाड़े
मादन बरसे
रंग रंगीली
अलख जगी मुह टोली के !
अबकी फगुआ
भी गाऊंगा
रंग बिरंगे
गीत मैं होली के !
भरे अबीरी
हाथ मलूँगा
गाल
रँगूँगा बँधन चोली के !
अंतर यौवन की
अमृत सिसकारी
भाँग पिये घुंघरू पग नाचें,
आदिम पर्व के
उत्सव की
खुली किताबें द्वारे द्वारे बाचें,
मधुरस ओंठ
गगरिया छलकें
घूँघट खिले
पलाश ठिठोली के !
अबकी फगुआ
भी गाऊंगा
रंग बिरंगे
गीत मैं होली के !
भरे अबीरी
हाथ मलूँगा
गाल
रँगूँगा बँधन चोली के !

भोलानाथ
डॉ,राधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
,जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
-->

2 comments:

  1. मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया गीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
    साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम शीतल बासंती बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

    और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर है!.....

    समय आज
    सहमत नहीं दिखता
    बिन मालिक की फ़ौज
    खाली तर्कस
    धरे पिठाहीं
    धनुष हाथ के टूटे !
    युद्ध विरत
    योद्धाओं के
    मनसूबे पढ़ पढ़
    बेखौप चील
    आजादी के
    रह रह अस्थी पंजर लूटे !
    ढोल नगाड़े
    हाँथ तोड़ते
    मुंह का अखरा
    कंठ में अरझा
    बेबस आँख
    उदास हुई हैं,
    गूंगी बहरी
    रातें
    पलकों ठहरी
    खिड़की कान धरे
    दिन की दहशत
    हिचकी प्यास हुई हैं,
    दुध दोहनियाँ
    तक्षक मालिक
    खामोश सिसकियाँ
    शैशव जी भर जीते
    गाय बंधी
    लाचार के खूंटे !
    समय आज
    सहमत नहीं दिखता
    बिन मालिक की फ़ौज
    खाली तर्कस
    धरे पिठाहीं
    धनुष हाथ के टूटे !
    युद्ध विरत
    योद्धाओं के
    मनसूबे पढ़ पढ़
    बेखौप चील
    आजादी के
    रह रह अस्थी पंजर लूटे !
    सूखा कर्ज
    बाढ़ की विपदा
    गूलर छालें
    पेट उतारी
    जैसे खेतों
    खलिहानों की ज्याबर,
    अब राज
    पथों पर
    पाँव कांपते
    तरह तरह
    सिर बोझ लगानें
    नाहर कुत्ते हैं कद्दावर,
    हवन कुंड का
    धुंआँ देखकर
    बुझते
    चूल्हों के घर
    रट रट के महाभारत
    फुग्गों जैसे फूटे !
    समय आज
    सहमत नहीं दिखता
    बिन मालिक की फ़ौज
    खाली तर्कस
    धरे पिठाहीं
    धनुष हाथ के टूटे !
    युद्ध विरत
    योद्धाओं के
    मनसूबे पढ़ पढ़
    बेखौप चील
    आजादी के
    रह रह अस्थी पंजर लूटे !
    डुगडुगी बजाकर
    आज लुटेरा
    लूट रहा है
    इंद्रजाल के
    वसीभूत
    हंस हंस कर हम लुटते,
    अंजुरी भरी
    भभूत
    अफ़सोस करें
    किस बाजू से
    पंजीरी सा
    धर्म ध्वजाओं में बंटते,
    पँडाओं की
    चाँडाल चौकड़ी
    खुशगवार
    ताबीज दिखाकर
    महुआ जैसे
    आँगन आँगन कूटे !
    समय आज
    सहमत नहीं दिखता
    बिन मालिक की फ़ौज
    खाली तर्कस
    धरे पिठाहीं
    धनुष हाथ के टूटे !
    युद्ध विरत
    योद्धाओं के
    मनसूबे पढ़ पढ़
    बेखौप चील
    आजादी के
    रह रह अस्थी पंजर लूटे !
    भोलानाथ
    डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
    अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
    जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
    संपर्क – 8989139763

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  2. मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों के स्नेहस्वरूप आज से
    नवरात्रि की पवन बेला माँ शारदा का अभीषेक अपने नवगीतों से माँ के श्री चरणों का वंदन करते हुए इस यज्ञ का श्री गणेश कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं और लाड ,प्यार, दुलार के साथ मुझे आप सभी मित्रों के स्नेहाशीष की विशेष आवश्यकता होगी आशा करता हूँ सभी मित्र मेरे इस अनुष्ठान को संपन्न होने तक मुझे अपने संबल से ओत प्रोत करते रहेगे !.........भोलानाथ

    माँ आँचल में अपने छुपा लो
    माँ आँचल में अपने छुपा लो,अंचल में अपने छुपा लो !
    डरते हैं हम हो ना जायें, दूर तुमसे हो ना जायें !
    भेंट मेरी चरण से लगा लो,
    माँ पास हमको बुलालो,अंचल में अपने छुपा लो !
    डरते हैं हम हो ना जायें, दूर तुमसे हो ना जायें !
    भेंट मेरी चरण से लगा लो,
    माँ पास हमको बुलालो,अंचल में अपने छुपा लो !
    आआआआआ ल्लल्लल आआआ..ल्लल्लल आआआआ
    चुनरी लहरा दो, आँचल फहरा दो,
    ममता का सागर घरमें लहरा दो,
    माँ आँचल तो फहरा दे,हवा न आंधी हो जाये !
    माँ ममता तो लहरा दे, बूँद न सागर हो जाये !
    होने दो उनको सागर,भरनी है हमको गागर,
    भेंट मेरी चरण से लगा लो,
    माँ पास हमको बुलालो,अंचल में अपने छुपा लो !
    डरते हैं हम हो ना जायें, दूर तुमसे हो ना जायें !
    भेंट मेरी चरण से लगा लो,
    माँ पास हमको बुलालो,अंचल में अपने छुपा लो !
    आआआआआ ...ल्लल्लल आआआ ल्लल्लल आआआआ
    वंदन करते हैं,फूल चढ़ायेंगे !
    दर पर आये हैं,दर्शन पायेंगे !
    लेकर तिलक तर्जनी से,तुम इस मांग जरा धर दो,
    कौन पढ़े किस्मत की रेखा,मंशा पूर्ण आज कर दो,
    होना हो माँ राजी हम राजी
    भेंट मेरी चरण से लगा लो,
    माँ पास हमको बुलालो,अंचल में अपने छुपा लो !
    डरते हैं हम हो ना जायें, दूर तुमसे हो ना जायें !
    भेंट मेरी चरण से लगा लो,
    माँ पास हमको बुलालो,अंचल में अपने छुपा लो !
    डरते हैं हम हो ना जायें, दूर तुमसे हो ना जायें !
    भेंट मेरी चरण से लगा लो,
    माँ पास हमको बुलालो,अंचल में अपने छुपा लो !
    डरते हैं हम हो ना जायें, दूर तुमसे हो ना जायें !
    भेंट मेरी चरण से लगा लो,
    माँ पास हमको बुलालो,अंचल में अपने छुपा लो !
    आआआआआ ...ल्लल्लल आआआ ल्लल्लल आआआआ

    भोलानाथ

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