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Thursday, 21 March 2013

उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ.....32313

"अमा तुम गाली दो बेशक पर सुर में तो दो....
गुस्सा आता है बस उस पर जो बेसुरी बात करता है.....
पैसा खर्च करोगे तो खत्म हो जायेगा पर सुर को खर्च करके देखिये महाराज...कभी खत्म नही होगा....
मिलिए शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान से.......

उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ
~~~~~~~~
जन्मतिथि: 21 मार्च, 1916
निधन: 21 अगस्त, 2006
संगीतज्ञ, शहनाई वादक
जन्मस्थान: डुमराँव, बिहार
उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ हिन्दुस्तान के प्रख्यात शहनाई वादक थे । उनका जन्म डुमराँव, बिहार में हुआ था। सन् 2001 में उन्हें भारत के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया। वह तीसरे भारतीय संगीतकार थे जिन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया है।

यद्यपि बिस्मिल्ला खाँ शिया मुसलमान थे फिर भी वे अन्य हिन्दुस्तानी संगीतकारों की भाँति धार्मिक रीति रिवाजों के प्रबल पक्षधर थे और हिन्दू देवी-देवता में कोई फ़र्क नहीं समझते थे। वे ज्ञान की देवी सरस्वती के सच्चे आराधक थे। वे काशी के बाबा विश्वनाथ मन्दिर में जाकर तो शहनाई बजाते ही थे इसके अलावा वे गंगा किनारे बैठकर घण्टों रियाज भी किया करते थे। उनकी अपनी मान्यता थी कि उनके ऐसा करने से गंगा मइया प्रसन्न होती हैं।

बिस्मिल्ला खाँ का जन्म बिहारी मुस्लिम परिवार में पैगम्बर खाँ और मिट्ठन बाई के यहाँ बिहार के डुमराँव की भिरंग राउत की गली नामक मोहल्ले में हुआ था। उनके बचपन का नाम क़मरुद्दीन था। वे अपने माता-पिता की दूसरी सन्तान थे।: चूँकि उनके बड़े भाई का नाम शमशुद्दीन था अत: उनके दादा रसूल बख्श ने कहा-"बिस्मिल्लाह!" जिसका मतलब था "अच्छी शुरुआत! या श्रीगणेश" अत: घर वालों ने यही नाम रख दिया। और आगे चलकर वे "बिस्मिल्ला खाँ" के नाम से मशहूर हुए। | उनके खानदान के लोग दरवारी राग बजाने में माहिर थे जो बिहार की भोजपुर रियासत में अपने संगीत का हुनर दिखाने के लिये अक्सर जाया करते थे। उनके पिता बिहार की डुमराँव रियासत के महाराजा केशव प्रसाद सिंह के दरवार में शहनाई बजाया करते थे। 6 साल की उम्र में बिस्मिल्ला खाँ अपने बाप के साथ बनारस आ गये। वहाँ उन्होंने अपने चाचा अली बख्श 'विलायती' से शहनाई बजाना सीखा। उनके उस्ताद चाचा 'विलायती' विश्वनाथ मन्दिर में स्थायी रूप से शहनाई-वादन का काम करते थे।


२१ मार्च १९१६ में जन्में उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का नाम उनके अम्मा वलीद ने कमरुद्दीन रखा था, पर जब उनके दादा ने नवजात को देखा तो दुआ में हाथ उठाकर बस यही कहा - बिस्मिल्लाह. शायद उनकी छठी इंद्री ने ये इशारा दे दिया था कि उनके घर एक कोहेनूर जन्मा है. उनके वलीद पैगम्बर खान उन दिनों भोजपुर के राजदरबार में शहनाई वादक थे. ३ साल की उम्र में जब वो बनारस अपने मामा के घर गए तो पहली बार अपने मामा और पहले गुरु अली बक्स विलायतु को वाराणसी के काशी विश्वनाथ मन्दिर में शहनाई वादन करते देख बालक हैरान रह गया. नन्हे भांजे में विलायतु साहब को जैसे उनका सबसे प्रिये शिष्य मिल गया था. १९३० से लेकर १९४० के बीच उन्होंने उस्ताद विलायतु के साथ बहुत से मंचों पर संगत की. १४ साल की उम्र में अलाहाबाद संगीत सम्मलेन में उन्होंने पहली बंदिश बजायी. उत्तर प्रदेश के बहुत से लोक संगीत परम्पराओं जैसे ठुमरी, चैती, कजरी, सावनी आदि को उन्होने एक नए रूप में श्रोताओं के सामने रखा और उनके फन के चर्चे मशहूर होने लगे.१९३७ में कलकत्ता में हुए अखिल भारतीय संगीत कांफ्रेंस में पहली बार शहनायी गूंजी इतने बड़े स्तर पर, और संगीत प्रेमी कायल हो गए उस्ताद की उस्तादगी पर.


१९३८ में लखनऊ में आल इंडिया रेडियो की शुरवात हुई. जहाँ से नियमित रूप से उस्ताद का वादन श्रोताओं तक पहुँचने लगा. १५ अगस्त १९४७ को वो पहले साजिन्दे बने जिसे आजाद भारत की अवाम को अपनी शहनाई वादन से मंत्र्मुग्द किया. ये ब्रॉडकास्ट लालकिले से हुआ था, जहाँ उन्हें सुन रहे थे ख़ुद महात्मा गाँधी भी और जहाँ उनके वादन के तुंरत बाद पंडित नेहरू ने अपना मशहूर संबोधन दिया था आजाद देश की जनता के नाम. तब से अब तक जाने कितने ही एतिहासिक समारोहों और जाने कितने ही रास्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय समारोहों में इस महान फनकार ने अपने अद्भुत हुनर से सुनने वालों सम्मोहित किया. पदम् श्री, पदमा भूषण और पद्मा विभूषण के बाद सन २००१ में उन्हें भारत रत्न से नवाजा गया. पुरस्कार तो जैसे बरसते रहे उम्र भर उनपर. बहुत कम लोग जानते होंगे कि उन्होने सत्यजित राय की फ़िल्म "जलसागर" में अभिनय भी किया था. फ़िल्म "गूँज उठी शहनायी" जिसका कि एक एक गीत एक नायाब मोती है,में भी उन्होने वाध्य बजाया (याद कीजिये लता की आवाज़ में "मेरे सुर और तेरे गीत"), ऐ आर रहमान ने "ये जो देश है तेरा..." फ़िल्म स्वदेश में जब उनसे शहनाई बजवायी तो जैसे शहनायी परदेश से स्वदेश लौट रहे नायक के लिए जैसी देश की मिट्टी का प्रतीक बन गयी.

२१ अगस्त २००६ को उस्ताद एक सादा और सूफी जीवन जीने के बाद दुनिया से विदा हुए और पीछे छोड़ गए अपने संगीत का ऐसा अनमोल खज़ाना, जिस पर हिंदुस्तान का हर संगीत प्रेमी नाज़ कर सकता है. उस्ताद को आवाज़ का सलाम.
"अमा तुम गाली दो बेशक पर सुर में तो दो....
गुस्सा आता है बस उस पर जो बेसुरी बात करता है.....
पैसा खर्च करोगे तो खत्म हो जायेगा पर सुर को खर्च करके देखिये महाराज...कभी खत्म नही होगा....
मिलिए शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान से....... 

उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ
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जन्मतिथि: 21 मार्च, 1916
निधन: 21 अगस्त, 2006
संगीतज्ञ, शहनाई वादक
जन्मस्थान: डुमराँव, बिहार
उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ हिन्दुस्तान के प्रख्यात शहनाई वादक थे । उनका जन्म डुमराँव, बिहार में हुआ था। सन् 2001 में उन्हें भारत के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया। वह तीसरे भारतीय संगीतकार थे जिन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया है।

यद्यपि बिस्मिल्ला खाँ शिया मुसलमान थे फिर भी वे अन्य हिन्दुस्तानी संगीतकारों की भाँति धार्मिक रीति रिवाजों के प्रबल पक्षधर थे और हिन्दू देवी-देवता में कोई फ़र्क नहीं समझते थे। वे ज्ञान की देवी सरस्वती के सच्चे आराधक थे। वे काशी के बाबा विश्वनाथ मन्दिर में जाकर तो शहनाई बजाते ही थे इसके अलावा वे गंगा किनारे बैठकर घण्टों रियाज भी किया करते थे। उनकी अपनी मान्यता थी कि उनके ऐसा करने से गंगा मइया प्रसन्न होती हैं।

बिस्मिल्ला खाँ का जन्म बिहारी मुस्लिम परिवार में पैगम्बर खाँ और मिट्ठन बाई के यहाँ बिहार के डुमराँव की भिरंग राउत की गली नामक मोहल्ले में हुआ था। उनके बचपन का नाम क़मरुद्दीन था। वे अपने माता-पिता की दूसरी सन्तान थे।: चूँकि उनके बड़े भाई का नाम शमशुद्दीन था अत: उनके दादा रसूल बख्श ने कहा-"बिस्मिल्लाह!" जिसका मतलब था "अच्छी शुरुआत! या श्रीगणेश" अत: घर वालों ने यही नाम रख दिया। और आगे चलकर वे "बिस्मिल्ला खाँ" के नाम से मशहूर हुए। | उनके खानदान के लोग दरवारी राग बजाने में माहिर थे जो बिहार की भोजपुर रियासत में अपने संगीत का हुनर दिखाने के लिये अक्सर जाया करते थे। उनके पिता बिहार की डुमराँव रियासत के महाराजा केशव प्रसाद सिंह के दरवार में शहनाई बजाया करते थे। 6 साल की उम्र में बिस्मिल्ला खाँ अपने बाप के साथ बनारस आ गये। वहाँ उन्होंने अपने चाचा अली बख्श 'विलायती' से शहनाई बजाना सीखा। उनके उस्ताद चाचा 'विलायती' विश्वनाथ मन्दिर में स्थायी रूप से शहनाई-वादन का काम करते थे।


२१ मार्च १९१६ में जन्में उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का नाम उनके अम्मा वलीद ने कमरुद्दीन रखा था, पर जब उनके दादा ने नवजात को देखा तो दुआ में हाथ उठाकर बस यही कहा - बिस्मिल्लाह. शायद उनकी छठी इंद्री ने ये इशारा दे दिया था कि उनके घर एक कोहेनूर जन्मा है. उनके वलीद पैगम्बर खान उन दिनों भोजपुर के राजदरबार में शहनाई वादक थे. ३ साल की उम्र में जब वो बनारस अपने मामा के घर गए तो पहली बार अपने मामा और पहले गुरु अली बक्स विलायतु को वाराणसी के काशी विश्वनाथ मन्दिर में शहनाई वादन करते देख बालक हैरान रह गया. नन्हे भांजे में विलायतु साहब को जैसे उनका सबसे प्रिये शिष्य मिल गया था. १९३० से लेकर १९४० के बीच उन्होंने उस्ताद विलायतु के साथ बहुत से मंचों पर संगत की. १४ साल की उम्र में अलाहाबाद संगीत सम्मलेन में उन्होंने पहली बंदिश बजायी. उत्तर प्रदेश के बहुत से लोक संगीत परम्पराओं जैसे ठुमरी, चैती, कजरी, सावनी आदि को उन्होने एक नए रूप में श्रोताओं के सामने रखा और उनके फन के चर्चे मशहूर होने लगे.१९३७ में कलकत्ता में हुए अखिल भारतीय संगीत कांफ्रेंस में पहली बार शहनायी गूंजी इतने बड़े स्तर पर, और संगीत प्रेमी कायल हो गए उस्ताद की उस्तादगी पर.


१९३८ में लखनऊ में आल इंडिया रेडियो की शुरवात हुई. जहाँ से नियमित रूप से उस्ताद का वादन श्रोताओं तक पहुँचने लगा. १५ अगस्त १९४७ को वो पहले साजिन्दे बने जिसे आजाद भारत की अवाम को अपनी शहनाई वादन से मंत्र्मुग्द किया. ये ब्रॉडकास्ट लालकिले से हुआ था, जहाँ उन्हें सुन रहे थे ख़ुद महात्मा गाँधी भी और जहाँ उनके वादन के तुंरत बाद पंडित नेहरू ने अपना मशहूर संबोधन दिया था आजाद देश की जनता के नाम. तब से अब तक जाने कितने ही एतिहासिक समारोहों और जाने कितने ही रास्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय समारोहों में इस महान फनकार ने अपने अद्भुत हुनर से सुनने वालों सम्मोहित किया. पदम् श्री, पदमा भूषण और पद्मा विभूषण के बाद सन २००१ में उन्हें भारत रत्न से नवाजा गया. पुरस्कार तो जैसे बरसते रहे उम्र भर उनपर. बहुत कम लोग जानते होंगे कि उन्होने सत्यजित राय की फ़िल्म "जलसागर" में अभिनय भी किया था. फ़िल्म "गूँज उठी शहनायी" जिसका कि एक एक गीत एक नायाब मोती है,में भी उन्होने वाध्य बजाया (याद कीजिये लता की आवाज़ में "मेरे सुर और तेरे गीत"), ऐ आर रहमान ने "ये जो देश है तेरा..." फ़िल्म स्वदेश में जब उनसे शहनाई बजवायी तो जैसे शहनायी परदेश से स्वदेश लौट रहे नायक के लिए जैसी देश की मिट्टी का प्रतीक बन गयी. 

२१ अगस्त २००६ को उस्ताद एक सादा और सूफी जीवन जीने के बाद दुनिया से विदा हुए और पीछे छोड़ गए अपने संगीत का ऐसा अनमोल खज़ाना, जिस पर हिंदुस्तान का हर संगीत प्रेमी नाज़ कर सकता है. उस्ताद को आवाज़ का सलाम.
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1 comment:

  1. वो जब याद आए, बहुत याद आए..
    शहनाई शहंशाह भारत रत्न बिस्मिल्लाह खां की बरसी आज
    - कुरआन के पारे व गीता के श्लोकों से गूंजेगा फातमान
    - बरबस ही नमी आंखों की कोरों पर आ गई

    नूरुल हसन खां/वाराणसी : अजीब इत्तेफाक है कि बिस्मिल्लाह खां साहब की पैदाइश की तारीख भी 21 है और उन्होंने आंखें भी मूंदीं इसी तारीख को। अलबत्ता महीने मार्च व अगस्त के थे। डुमरांव (बिहार) में जन्म लेने वाले बिस्मिलाह खां चार वर्ष की उम्र में अभिभावकों के साथ काशी आए तो यहीं के होकर रह गए। जहां शहनाई का नाम आए वहां उस्ताद जी के जिक्र बिना बात पूरी होती नहीं। वे आए बिहार से थे मगर ता- जिंदगी उन्होंने शहर बनारस के फकीराना अंदाज को ही ओढ़ा-बिछाया। शोहरत और कामयाबी के कई ‘हिमाला’ सर करने के बाद भी उनकी जिंदगी हड़हा वाले मकान की छत पर बनी छोटी सी कोठरी में ही गुजरी। शहनाई के बाद इस कमरे में पड़ी एक साधारण सी खटिया और कुछ गिलास और रकाबियां ही आखिरी सफर तक उनकी हमसफर रहीं। बेटों में हाजी महताब हुसैन, जामिन हुसैन, काजिम हुसैन, नाजिम हुसैन के अलावा बेटियों में जरीना बेगम, अजरा बेगम, व कनीजा बेगम हैं। भतीजे अली अब्बास व पौत्र आफाक हैदर शहनाई की उनकी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।

    खरी-खरी बोला बनारसी :
    उस्ताद बिस्मिल्लाह खां को काशी से अथाह प्रेम था। खां साहब के बेहद अजीज मुतुर्जा अब्बास शम्सी बताते हैं सन् 1982 की बात। वाकया उस वक्त का है जब उस्ताद जी न्यूयार्क में थे। कुछ लोगों ने उस्ताद से अमेरिका में ही बसने का आग्रह किया। खां साहब ने कहा-‘गंगा व बालाजी का मंदिर यहां मंगवा दो हम यहीं बसे जाते हैं।’ अमेरिकी धन कुबेरों को करारा बनारसी जवाब मिल चुका था।

    वे हनुमान चालीसा पढ़ने आए :
    शहनाई को बुलंदी पर ले जाने वाले भारतरत्न की फनकारी के प्रशंसक नरेंद्र कुमार गुप्ता दिल्ली से काशी पहुंच चुके हैं। बरसी पर वह उस्ताद की कब्र पर हनुमान चालीसा का पाठ करेंगे।
    भारत रत्न से सम्मानित मरहूम उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की सातवीं बरसी बुधवार को दरगाह फातमान में मनाई जाएगी। 21 अगस्त 2006 को इसी दिन उस्ताद जी ने इस दुनिया से पर्दा कर लिया था। हालांकि इतने वर्षो के बाद भी जब हर साल यह तारीख आती है तो उनके मुरीदों की आंखों को बरबस ही नम कर जाती है। बनारस के लोगों को यकीन ही नहीं होता कि अक्सर ही नई सड़क से दालमंडी, हड़हा से चाहमहमा तक पैदल ही लोगों की खैर-खबर लेते बिल्कुल अपने से लगने वाले उस्ताद जी अब उनके बीच नहीं रहे। उनके जाने के बाद उदास अब तक बनारस की वह शहनाई भी है, जो तमाम कोशिशों के बाद भी आज तक उस ‘लरजिश’ के लिए तरस रही है जो खां साहब के लबों की जुंबिश का कमाल हुआ करती थी।
    पुण्यतिथि के कार्यक्रम के बारे में बिस्मिल्लाह खां फाउंडेशन के मैनेजिंग ट्रस्टी मुतरुजा अब्बास शम्सी ने बताया कि 21 अगस्त की सुबह दरगाह फातमान में खां साहब की कब्र पर गुलाब के फूल चढ़ाकर कुरआन के पारे पढ़े जाएंगे। बताया कि उस्ताद के चाहने वाले वहीं पर गीता का पाठ भी करेंगे। उस्ताद के साहबजादे शहनाई नवाज जामिन हुसैन शहनाई पर उस्ताद के पसंदीदा नौहे पेश करेंगे। जाहिर है ऐसे में जतन कोई लाख करे आंखों में उतर आई नमी को भला कैसे छिपा पाएंगे।

    मुस्कान नहीं बदली :
    भारतरत्न के सरायहड़हा स्थित आवास में दाखिल होते ही उस्ताद के साथ अंतर्राष्ट्रीय ख्तातिप्राप्त दर्जनों लोगों की तस्वीरें उस्ताद के कद-बुत की गवाही देते हैं। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ.राजेंद्र प्रसाद, फखरूद्दीन अली अहमद हों या जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी अथवा अटल बिहारी वाजपेयी, इन सभी के साथ लिए गए इन चित्रों में खां साहब की भाव-भंगिमा भले ही अलग हो, किसी भी तस्वीर में होठों पर खिली मुस्कान पर बदलाव की एक रेफ तक नहीं।

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