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Tuesday, 12 March 2013

जब एक वेश्या ने स्वामी विवेकानंद को कराया संन्यासी होने का एहसास!.......29113

जब एक वेश्या ने स्वामी विवेकानंद को कराया संन्यासी होने का एहसास!
स्वामी विवेकानंद जो आजीवन ए
क संन्यासी के रूप में रहे और देश-समाज की भलाई का काम करते रहे। अपने ज्ञान के बल पर स्वामी विवेकानंद विश्व विजेता बने।वे हिन्दुस्तान के एक ऐसे संन्यासी रहे हैं जिनके संदेश आज भी लोगों को उनका अनुसरण करने को मजबूर कर देते हैं।
एक ऐसा संन्यासी जिसकें अनुयायी देश ही नहीं बल्कि दुनिया के हर कोने में नजर आते हैं और एक ऐसा संन्यासी जिनका एक वक्तव्य पूरी दुनिया को अपना कायल बनाने के लिए काफी होता था।लेकिन क्या आप जानते हैं कि अपने ज्ञान के बल पर दुनिया का दिल जीतने वाले वही स्वामी विवेकानंद को एक बार एक वेश्या के आगे हार गए थे।
बात उस समय की है जब स्वामी विवेकानंद जयपुर के पास एक छोटी सी रियासत के मेहमान बने।कुछ दिन वहां रहने के बाद जब स्वामी जी के विदा लेने का समय आया तो रियासत के राजा ने उनके लिए एक स्वागत समारोह रखा और उस समारोह में रंग जमाने के लिए उसने बनारस से एक प्रसिद्द वेश्या को बुलाया। जैसे ही स्वामी विवेकाकंद को इस बात की जानकारी मिली कि राजा ने स्वागत समारोह में एक वेश्या को बुलाया है तो संशय में पड़ गए।आखिर एक संन्यासी का वेश्या के समारोह में क्या काम, यही सोच उन्होंने समारोह में जाने से इनकार कर दिया और अपने कक्ष में ही बैठ गए। जब यह खबर वेश्या तक पहुंची कि राजा ने जिस महान विभूति के स्वागत समारोह के लिए उसे बुलाया है, उसकी वजह से वह इस कार्यक्रम का हिस्सा ही नहीं बनना चाहता।वह वेश्या इस बात से काफी आहत हुई और उसने सूरदास का एक भजन, 'प्रभु जी मेरे अवगुण चित न धरो...' गाना शुरू किया। वेश्या ने जो भजन गाया उसके भाव थे कि एक पारस पत्थर तो लोहे के हर टुकड़े को छूकर सोना बनाता है फिर चाहे वह लोहे का टुकड़ा पूजा घर में रखा हो या फिर कसाई के दरवाजे पर पड़ा हो। और अगर वह पारस ऐसा नहीं करता अर्थात पूजा घर वाले लोहे के टुकड़े और कसाई के दरवाजे पर पड़े लोहे के टुकड़े में फर्क कर सिर्फ पूजा घर वाले लोहे के टुकड़े को छूकर सोना बना दे और कसाई के दरवाजे पर पड़े लोहे के टुकड़े को नहीं तो वह पारस पत्थर असली नहीं है। स्वामी विवेकानंद ने वह भजन सुना और उस जगह पहुंच गए जहां वेश्या भजन गा रही थी।उन्हीने देखा कि वेश्या कि आंखों से झरझर आंसू गिर रहे हैं।स्वामी विवेकाकंद ने अपने एक संस्मरण में इस बात का उल्लेख किया है कि उस दिन उन्होंने पहली बार वेश्या को देखा था लेकिन उनके मन में उसके लिए न कोई आकर्षण था और न ही विकर्षण। वास्तव में उन्हें तब पहली बार यह अनुभव हुआ था कि वे पूर्ण रूप से संन्यासी बन चुके हैं।
अपने संस्मरण में उन्हीने यह भी लिखा है इसके पहले जब वे अपने घर से निकलते थे या कहीं से वापस अपने घर जाना होता था तो वे दो मील का चक्कर लगाकर अपने घर जाते थे क्योंकि उनके घर के रास्ते में वेश्याओं का एक मोहल्ला पड़ता था और संन्यासी होने के कारण वहां से गुजरना वे अपने संन्यास धर्म के विरुद्ध समझते थे। लेकिन उस रोज राजा के स्वागत समारोह में उन्हें एहसास हुआ कि एक असली संन्यासी वही है जो वेश्याओं के मोहल्ले से भी गुजर जाए तो उसे कोई फर्क न पड़े।
 
जब एक वेश्या ने स्वामी विवेकानंद को कराया संन्यासी होने का एहसास!
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