Tuesday, 5 March 2013

महाशिवरात्रि की व्रत-कथा, पूजन विधि, कल्याणकरी उपाय.............26513

महाशिवरात्रि की व्रत-कथा
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एक बार पार्वती ने भगवान शिवशंकर से पूछा, ऐसा कौन सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत-पूजन है, जिससे मृत्यु लोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं?
उत्तर में शिवजी ने पार्वती को शिवरात्रि के व्रत का विधान बताकर यह कथा सुनाई- एक गाँव में एक शिकारी रहता था। पशुओं की हत्या करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था। वह एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधवश साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी। शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि की कथा भी सुनी। संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया। अपनी दिनचर्या की भाँति वह जंगल में शिकार के लिए निकला, लेकिन दिनभर बंदीगृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा। बेल-वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो बिल्वपत्रों से ढँका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला। पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियाँ तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरीं। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए। एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुँची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, मृगी बोली, मैं गर्भिणी हूँ। शीघ्र ही प्रसव करूँगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं अपने बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे सामने प्रस्तुत हो जाऊँगी, तब तुम मुझे मार लेना। शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी झाड़ियों में लुप्त हो गई। कुछ ही देर बाद एक और मृगी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख मृगी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, हे पारधी ! मैं थोड़ी देर पहले ही ऋतु से निवृत्त हुई हूँ। कामातुर विरहिणी हूँ। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूँ। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊँगी।
शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर न लगाई, वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, हे पारधी! मैं इन बच्चों को पिता के हवाले करके लौट आऊँगी। इस समय मुझे मत मार।
शिकारी हँसा और बोला, सामने आए शिकार को छोड़ दूँ, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूँ। मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़प रहे होंगे। उत्तर में मृगी ने फिर कहा, जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी, इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान माँग रही हूँ। हे पारधी! मेरा विश्वास कर मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूँ।
मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के आभाव में बेलवृक्ष पर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्व करेगा। शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला, हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि उनके वियोग में मुझे एक क्षण भी दु:ख न सहना पड़े। मैं उन मृगियों का पति हूँ। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण जीवनदान देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे सामने उपस्थित हो जाऊँगा। मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटना-चक्र घूम गया। उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, मेरी तीनों पत्नियाँ जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएँगी। अत: जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूँ।
उपवास, रात्रि जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था। उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था। धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गए। भगवान शिव की अनुकम्पा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा। थोड़ी ही देर बाद मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसके नेत्रों से आँसुओं की झड़ी लग गई। उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया।
देव लोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहा था। घटना की परिणति होते ही देवी-देवताओं ने पुष्प वर्षा की। तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए।
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परम कल्याणकारी महाशिवरात्रि
पूजन विधि के साथ कल्याणकरी उपाय भी 
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 महाशिवरात्रि हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। यह भगवान शिव का प्रमुख पर्व है। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को शिवरात्रि पर्व मनाया जाता है।  माना जाता है कि सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्यरात्रि भगवान् शंकर का ब्रह्मा से रुद्र के रूप में अवतरण हुआ था। प्रलय की वेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए ब्रह्मांड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से समाप्त कर देते हैं। इसीलिए इसे महाशिवरात्रि अथवा कालरात्रि कहा गया। तीनों भुवनों की अपार सुंदरी तथा शीलवती गौरां को अर्धांगिनी बनाने वाले शिव प्रेतों व पिशाचों से घिरे रहते हैं। उनका रूप बड़ा अजीब है। शरीर पर मसानों की भस्म, गले में सर्पों का हार, कंठ में विष, जटाओं में जगत-तारिणी पावन गंगा तथा माथे में प्रलयंकर ज्वाला है। बैल को वाहन के रूप में स्वीकार करने वाले शिव अमंगल रूप होने पर भी भक्तों का मंगल करते हैं और श्री-संपत्ति प्रदान करते हैं।
पूजा विधानइस दिन शिवभक्त, शिव मंदिरों में जाकर शिवलिंग पर बेल-पत्र आदि चढ़ाते, पूजन करते, उपवास करते तथा रात्रि को जागरण करते हैं। शिवलिंग पर बेल-पत्र चढ़ाना, उपवास तथा रात्रि जागरण करना एक विशेष कर्म की ओर इशारा करता है। इस दिन शिव की शादी हुई थी इसलिए रात्रि में शिवजी की बारात निकाली जाती है। वास्तव में शिवरात्रि का परम पर्व स्वयं परमपिता परमात्मा के सृष्टि पर अवतरित होने की स्मृति दिलाता है। यहां रात्रि शब्द अज्ञान अन्धकार से होने वाले नैतिक पतन का द्योतक है। परमात्मा ही ज्ञानसागर है जो मानव मात्र को सत्यज्ञान द्वारा अन्धकार से प्रकाश की ओर अथवा असत्य से सत्य की ओर ले जाते हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्त्री-पुरुष, बालक, युवा और वृद्ध सभी इस व्रत को कर सकते हैं। इस व्रत के विधान में सवेरे स्नानादि से निवृत्त होकर उपवास रखा जाता है।


विधि
इस दिन मिट्टी के बर्तन में पानी भरकर, ऊपर से बेलपत्र, आक धतूरे के पुष्प, चावल आदि डालकर ‘शिवलिंग’ पर चढ़ाया जाता है। अगर पास में शिवालय न हो, तो शुद्ध गीली मिट्टी से ही शिवलिंग बनाकर उसे पूजने का विधान है।
रात्रि को जागरण करके शिवपुराण का पाठ सुनना हरेक व्रती का धर्म माना गया है।
अगले दिन सवेरे जौ, तिल, खीर और बेलपत्र का हवन करके व्रत समाप्त किया जाता है।
महाशिवरात्रि भगवान शंकर का सबसे पवित्र दिन है। यह अपनी आत्मा को पुनीत करने का महाव्रत है। इसके करने से सब पापों का नाश हो जाता है। हिंसक प्रवृत्ति बदल जाती है। निरीह जीवों के प्रति दया भाव उपज जाता है। ईशान संहिता में इसकी महत्ता का उल्लेख इस प्रकार किया गया है-
॥शिवरात्रि व्रतं नाम सर्वपापं प्रणाशनम्।
आचाण्डाल-मनुष्याणां भुक्ति मुक्ति प्रदायकं॥

विशेष

चतुर्दशी तिथि के स्वामी शिव हैं। अत: ज्योतिष शास्त्रों में इसे परम शुभफलदायी कहा गया है। वैसे तो शिवरात्रि हर महीने में आती है। परंतु फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को ही महाशिवरात्रि कहा गया है।ज्योतिषीय गणना के अनुसार सूर्य देव भी इस समय तक उत्तरायण में आ चुके होते हैं तथा ऋतु परिवर्तन का यह समय अत्यन्त शुभ कहा गया हैं। शिव का अर्थ है कल्याण। शिव सबका कल्याण करने वाले हैं। अत: महाशिवरात्रि पर सरल उपाय करने से ही इच्छित सुख की प्राप्ति होती है।
ज्योतिषीय गणित के अनुसार चतुर्दशी तिथि को चंद्रमा अपनी क्षीणस्थ अवस्था में पहुंच जाते हैं। जिस कारण बलहीन चंद्रमा सृष्टि को ऊर्जा देने में असमर्थ हो जाते हैं। चंद्रमा का सीधा संबंध मन से कहा गया है। मन कमजोर होने पर भौतिक संताप प्राणी को घेर लेते हैं तथा विषाद की स्थिति उत्पन्न होती है। इससे कष्टों का सामना करना पड़ता है।
चंद्रमा शिव के मस्तक पर सुशोभित है। अत: चंद्रदेव की कृपा प्राप्त करने के लिए भगवान शिव का आश्रय लिया जाता है। महाशिवरात्रि शिव की प्रिय तिथि है। अत: प्राय: ज्योतिषी शिवरात्रि को शिव आराधना कर कष्टों से मुक्ति पाने का सुझाव देते हैं। शिव आदि-अनादि है। सृष्टि के विनाश व पुन:स्थापन के बीच की कड़ी है। प्रलय यानी कष्ट, पुन:स्थापन यानी सुख। अत: ज्योतिष में शिव को सुखों का आधार मान कर महाशिवरात्रि पर अनेक प्रकार के अनुष्ठान करने की महत्ता कही गई है।
कल्याण हेतु विविध अनुष्ठान कारोबार वृद्धि के लिए
महाशिवरात्रि के सिद्ध मुहर्त में पारद शिवलिंग को प्राण प्रतिष्ठित करवाकर स्थापित करने से व्यवसाय में वृद्धि व नौकरी में तरक्की मिलती है।

बाधा नाश के लिए
शिवरात्रि के प्रदोष काल में स्फटिक शिवलिंग को शुद्ध गंगा जल, दूध, दही, घी, शहद व शक्कर से स्नान करवाकर धूप-दीप जलाकर निम्न मंत्र का जाप करने से समस्त बाधाओं का शमन होता है।
॥ॐ तुत्पुरूषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रूद्र: प्रचोदयात्॥
बीमारी से छुटकारे के लिए
शिव मंदिर में लिंग पूजन कर दस हज़ार मंत्रों का जाप करने से प्राण रक्षा होती है। महामृत्युंजय मंत्र का जाप रुद्राक्ष की माला पर करें।

शत्रु नाश के लिए
शिवरात्रि को रूद्राष्टक का पाठ यथासंभव करने से शत्रुओं से मुक्ति मिलती है। मुक़दमे में जीत व समस्त सुखों की प्राप्ति होती है।

मोक्ष के लिए
शिवरात्रि को एक मुखी रूद्राक्ष को गंगाजल से स्नान करवाकर धूप-दीप दिखा कर तख्ते पर स्वच्छ कपड़ा बिछाकर स्थापित करें। शिव रूप रूद्राक्ष के सामने बैठ कर सवा लाख मंत्र जप का संकल्प लेकर जाप आरंभ करें। जप शिवरात्रि के बाद भी जारी रखें। ॐ नम: शिवाय।
रुद्राभिशेक से लाभ् यदि वर्शा चाह्ते है तो जल से रुद्राभिशेक करे व्यधि नाश के लिये कुशा से करे यदि पशुओ कि कामना चाह्ते है तो दहि से रुद्रभिशेक करे श्रि: कि कामना चाह्ते है तो गन्ना के रस से रुद्राभिषेक करें
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हम आपको बताते हैं कि इस दिन शिव की पूजा किस तरह से की जाती है। सबसे पहले मिट्टी के बर्तन में पानी भरकर, ऊपर से बेलपत्र,  धतूरे के पुष्प, चावल आदि डालकर शिवलिंग पर चढ़ायें। हां एक उपाय और बताता हूं, अगर घर के आस-पास में शिवालय न हो, तो शुद्ध गीली मिट्टी से ही शिवलिंग बनाकर भी उसे पूजा जा सकता है।

माना जाता है कि इस दिन शिवपुराण का पाठ सुनना चाहिए। रात्रि को जागरण कर शिवपुराण का पाठ सुनना हरेक व्रती का धर्म माना गया है। इसके बाद अगले दिन सवेरे जौ, तिल, खीर और बेलपत्र का हवन करके व्रत समाप्त किया जाता है। माना जाता है कि यह दिन भगवान शंकर का सबसे पवित्र दिन है। यह अपनी आत्मा को पुनीत करने का महाव्रत है। इस व्रत को करने से सब पापों का नाश हो जाता है। हिंसक प्रवृत्ति बदल जाती है। निरीह जीवों के प्रति आपके मन में दया भाव उपजता है।
महाशिवरात्रि को दिन-रात पूजा का विधान है। चार पहर दिन में शिवालयों में जाकर शिवलिंग पर जलाभिषेक कर बेलपत्र चढ़ाने से शिव की अनंत कृपा प्राप्त होती है। साथ ही चार पहर रात्रि में वेदमंत्र संहिता, रुद्राष्टा ध्यायी पाठ ब्राह्मणों के मुख से सुनना चाहिए।
प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में सूर्योदय से पहले ही उत्तर-पूर्व में पूजन-आरती की तैयारी कर लेनी चाहिए। सूर्योदय के समय पुष्पांजलि और स्तुति कीर्तन के साथ महाशिव रात्रि का पूजन संपन्न होता है। उसके बाद दिन में ब्रह्मभोज भंडारा के द्वारा प्रसाद वितरण कर व्रत संपन्न होता है।
शास्त्रों के अनुसार शिव को देवाधिदेव महादेव इसलिए कहा गया है कि वे देवता, दैत्य, मनुष्य, नाग, किन्नर, गंधर्व पशु-पक्षी एवं समस्त वनस्पति जगत के भी स्वामी हैं। शिव का एक अर्थ कल्याणकारी भी है। शिव की अराधना से संपूर्ण सृष्टि में अनुशासन, समन्वय और प्रेम भक्ति का संचार होने लगता है। इसीलिए, स्तुति गान कहता है- मैं आपकी अनंत शक्ति को भला क्या समझ सकता हूँ। अतः हे शिव, आप जिस रूप में भी हों उसी रूप को मेरा आपको प्रणाम।
शिव और शक्ति का सम्मिलित स्वरूप हमारी संस्कृति के विभिन्न आयामों का प्रदर्शक है। हमारे अधिकांश पर्व शिव-पार्वती को समर्पित हैं। शिव औघड़दानी हैं और दूसरों पर सहज कृपा करना उनका सहज स्वभाव है।
"शिव' शब्द का अर्थ है कल्याण करने वाला। शिव ही शंकर हैं। शिव के "श' का अर्थ है कल्याण और "कर' का अर्थ है करने वाला। शिव, अद्वैत, कल्याण- ये सारे शब्द एक ही अर्थ के बोधक हैं। शिव ही ब्रह्मा हैं, ब्रह्मा ही शिव हैं। ब्रह्मा जगत के जन्मादि के कारण हैं।
गरूड़, स्कंद, अग्नि, शिव तथा पद्म पुराणों में महाशिवरात्रि का वर्णन मिलता है। यद्यपि सर्वत्र एक ही प्रकार की कथा नहीं है, परंतु सभी कथाओं की रूपरेखा लगभग एक समान है। सभी जगह इस पर्व के महत्व को रेखांकित किया गया है और यह बताया गया है कि इस दिन व्रत-उपवास रखकर बेलपत्र से शिव की पूजा-अर्चना की जानी चाहिए।
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हर कोई चाहता है कि वह भगवान की आराधना करे, उपवास रखे। साथ ही वह भगवान से अपनों के दुखों को दूर करने का भी वरदान मांगता है और जीवन में तरक्की की कामना करता है। हम आपको बताते हैं कि शिव की उपासना और व्रत रखने से क्या-क्या फल मिलते हैं। माना जाता है कि महाशिवरात्रि के सिद्ध मुहूर्त में शिवलिंग को प्राण प्रतिष्ठित करवाकर स्थापित करने से व्यवसाय में वृद्धि और नौकरी में तरक्की मिलती है।

शिवरात्रि के प्रदोष काल में स्फटिक शिवलिंग को शुद्ध गंगा जल, दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से स्नान करवाकर धूप-दीप जलाकर मंत्र का जाप करने से समस्त बाधाओं का शमन होता है। हम आपको एक मंत्र बताते हैं। ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रूद्र: प्रचोदयात्।
बीमारी से परेशान होने पर और प्राणों की रक्षा के लिए महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें। याद रहे, महामृत्युंजय मंत्र का जाप रुद्राक्ष की माला से ही करें। मंत्र है- ॐ त्रयम्बकं यजामहे सुगंधिम पुष्टीवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बंधनान मृत्योर मुक्षीय मामृतात्‌।। यह मंत्र दिखने में जरूर छोटा दिखाई देता है, किन्तु प्रभाव में अत्यंत चमत्कारी है।
शिवरात्रि के दिन एक मुखी रूद्राक्ष को गंगाजल से स्नान करवाकर धूप-दीप दिखा कर तख्ते पर स्वच्छ कपड़ा बिछाकर स्थापित करें। शिव रूप रूद्राक्ष के सामने बैठ कर सवा लाख मंत्र जप का संकल्प लेकर जाप आरंभ करें। जप शिवरात्रि के बाद भी जारी रख सकते हैं। मंत्र इस प्रकार है- ॐ नम: शिवाय।
सृष्टि से तमोगुण तक के संहारक सदाशिव की आराधना से लौकिक और परलौकिक दोनों फलों की उपलब्धता संभव है। तमोगुण की अधिकता दिन की तुलना में रात्रि में अधिक होने से भगवान शिव ने अपने लिंग के प्रादुर्भाव के लिए मध्यरात्रि को स्वीकार किया। यह रात्रि फाल्गुन कृष्ण में उनकी प्रिय तिथि चतुर्दशी में निहित है। वर्ष की तीन प्रमुख रात्रि में शिवरात्रि एक है। इस दिन व्रत करके रात्रि में पांच बार शिवजी के दर्शन-पूजन-वंदन से व्यक्ति अपने समस्त फल को सुगमता से पा सकता है।
इस पर्व का महत्व सभी पुराणों में वर्णित है। इस दिन शिवलिंग पर जल अथवा दूध की धारा लगाने से भगवान की असीम कृपा सहज ही मिलती है। इनकी कृपा से कुछ भी असंभव नहीं है। इस दिन त्रिपुण्ड लगाकर, रुद्राक्ष धारण करके, शिवजी को बिल्व पत्र, ऋतु फल एवं पुष्प के साथ रुद्र मंत्र अथवा "ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जप करना चाहिए।
"जय-जय शंकर, हर-हर शंकर' का कीर्तन करना चाहिए। इस दिन सामर्थ्य के अनुसार रात्रि जागरण अवश्य करना चाहिए। शिवालय में दर्शन करना चाहिए। कोई विशेष कामना हो तो शिवजी को रात्रि में समान अंतर काल से पांच बार शिवार्चन और अभिषेक करना चाहिए। किसी भी प्रकार की धारा लगाते समय शिवपंचाक्षर मंत्र  नमः शिवाय का जप करना चाहिए।
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भक्त इस बात का ख्याल रखें कि भगवान शंकर पर चढ़ाया गया नैवेद्य खाना निषिद्ध है। ऐसी मान्यता है कि जो इस नै नैवेद्य को खाता है वह नरक के दुखों का भोग करता है। इस कष्ट के निवारण के लिए शिव की मूर्ती के पास शालीग्राम की मूर्ती का रहना अनिवार्य है। यदि शिव की मूर्ती के पास शालीग्राम हो तो नैवेद्य खाने का कोई दोष नहीं है। व्रत के व्यंजनों में सामान्य नमक के स्थान पर सेंधा नमक का प्रयोग करते हैं और लाल मिर्च की जगह काली मिर्च का प्रयोग करते हैं। कुछ लोग व्रत में मूंगफली का उपयोग भी नहीं करते हैं। ऐसी स्थिति में आप मूंगफली को सामग्री में से हटा सकते हैं। व्रत में यदि कुछ नमकीन खाने की इच्छा हो तो आप सिंघाड़े या कूटू के आटे के पकौड़े बना सकते हैं। इस व्रत में आप आलू सिंघाड़ा, दही बड़ा भी खा सकते हैं। सूखे दही बड़े भी खाने में स्वादिष्ट लगते हैं। तो, जितने आपको सूखे दही बड़े खाने हों उतने दही बड़े सूखे रख लीजिये और जितने दही में डुबाने हों दही में डुबो लीजिये।


इस दिन साबूदाना भी खाया जाता है। साबूदाना में कार्बोहाइड्रेट की प्रमुखता होती है और इसमें कुछ मात्रा में कैल्शियम व विटामिन सी भी होता है। इसका उपयोग अधिकतर पापड़, खीर और खिचड़ी बनाने में होता है। व्रतधारी इसका खीर अथवा खिचड़ी बना कर उपयोग कर सकते हैं। साबूदाना दो तरह के होते हैं एक बड़े और एक सामान्य आकार के।


यदि आप बड़ा साबूदाना प्रयोग कर रहे हैं तो इसे एक घंटा भिगोने की बजाय लगभग आठ घंटे भिगोये रखें। छोटे आकार के साबूदाने आपस में हल्के से चिपके चिपके रहते हैं लेकिन बड़े साबूदाने का पकवान ज्यादा स्वादिष्ट होता है। यदि आप उपवास के लिए साबूदाने की खिचड़ी बनाते हुए उसमें नमक सा स्वाद पाना चाहते हैं तो उसमें सामान्य नमक की जगह सेंधा नमक का प्रयोग करें।
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महाशिवरात्रि के दिन किए जाने वाले उपाय 
महत्वपूर्ण व शीघ्र फलदायी होते हैं। इस दिन
 भोलेनाथ प्रसन्न हो वरदान अवश्य देते हैं।
 इसके 
महत्व को समझते हुए भोलेनाथ की कृपा से
 समस्याओं से निजात हासिल की जा सकती है।
कोई भी प्रयोग महाशिवरात्रि के दिन, किसी भी
 समय कर सकते हैं। मुंह उत्तर/पूर्व की ओर
 करके पूजा स्थान पर बैठें। ऊन का आसन होना
 चाहिए। लकड़ी की चौकी पर लाल सूती वस्त्र
 बिछाना चाहिए। दूसरी चौकी पर शिव परिवार का
 चित्र/ शिव यंत्र व थाली में चंदन से बड़ा Ú
 बनाकर अवश्य रखें। Ú के मध्य में यंत्र या
 प्रतिमा रखें। पुष्प, माला, मौली, बेलपत्र, धतूरा
 अवश्य रखें। चंदन केसर मिश्रित जल से
 यंत्र/प्रतिमा का अभिषेक कर स्वच्छ जल से
 धोकर स्वच्छ कपड़े से पोंछ कर स्थापित करना
 चाहिए।
भाग्यवृद्धि के लिए

* किसी गहरे पात्र में पारद शिवलिंग स्थापित
 करें। पात्र को सफेद वस्त्र पर स्थापित करें। ॐ
 ह्रिं नम: शिवाय ह्रिं मंत्र का ठीक आधे घंटे तक
 जाप करते हुए जलधारा पारद शिवलिंग पर
 अर्पित करें। अर्पित जल को बाद में किसी पवित्र 
वृक्ष की जड़ में डाल दें। शिवलिंग पूजा स्थान में
 स्थापित करें और नित्य नियम से मंत्र का जाप
 करें।

* यदि ग्यारह सफेद एवं सुगंधित पुष्प लेकर
 चौराहे के मध्य प्रात: काल सूर्योदय से पूर्व रख
 दिए जाएं, तो ऐसे व्यक्ति को अचानक धन लाभ
 की प्राप्ति की संभावना बनती है। यदि यह
 उपाय 
करते वक्त या उपाय करने के लिए घर से
 निकलने समय कोई सुहागिन स्त्री दिखाई दे, तो
 निश्चय ही धन-समृद्धि में वृद्धि होती है। चौराहे के
 मध्य में गुलाब के इत्र की शीशी खोलकर इत्र
 डालकर वहीं छोड़ आएं, तो ऐसे भी समृद्धि बढ़ती
 जाती है। जो महाशिवरात्रि पर न कर पाएं, वह
 शुक्ल पक्ष के दूसरे शुक्रवार को यह उपाय कर
 समृद्ध बन सकता है।

* एक बांसुरी को लाल साटन में लपेटकर व
 पूजनकर तिजोरी में स्थापित किया जाए, तो
 व्यवसाय में बढ़ोतरी होती है।
नजर से बचने के लिए

जिस व्यक्ति को नजर लगी हो या बार-बार नजर
 लग जाती हो तो उस व्यक्ति के ऊपर से मीठी
 रोटी उसारकर ढाक के पत्ते पर रखकर चौराहे के
 मध्य में प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व रखना
 चाहिए। मीठी रोटी को रखने के बाद उसके चारों
 ओर सुगंधित फूल की माला रख देनी चाहिए। यह
 याद रखें कि जिस व्यक्ति को जल्दी-जल्दी नजर
 लगती हो उन्हें चौराहे के ठीक मध्य भाग से नहीं
 गुजरना चाहिए।

ग्रह दोष निवारण के लिए

पहले जान लें कि किस ग्रह के कारण बाधाएं
 जीवन में आ रही हैं। उस ग्रह से संबंधित अनाज
 लेकर ढाक के पत्ते पर रखकर चौराहे के मध्य में
 रखना चाहिए तथा उसके चारों ओर सुगंधित
 पुष्पमाला चढ़ानी चाहिए। विभिन्न ग्रहों से
 संबंधित अनाज इस प्रकार हैं। महाशिवरात्रि पर
 सूर्योदय से पूर्व ग्रह से संबंधित अनाज रख कर 
आएं। ध्यान रखें कि अनाज की मात्रा 250 ग्राम
 से कम न हो। जिस चौराहे पर वर्षा ऋतु में जल
 का भराव हो जाता हो, उस चौराहे पर उपाय नहीं
 करने चाहिए। वहां अभीष्ट फल की प्राप्ति नहीं
 होती।

पुत्र प्राप्ति के लिए

पश्चिम दिशा में मुंह करके पीले आसन पर बैठें। 
जहां तक हो सके पीले वस्त्र पहनें। लकड़ी की
 चौकी पर पीला वस्त्र बिछा कर एक ताम्रपत्र में
 ‘संतान गोपाल यंत्र’ तीन कौड़ियां, एक लग्न
 मंडप सुपारी स्थापित करें, केसर का तिलक
 लगाएं। पीले फूल चढ़ाएं व भगवान कृष्ण के बाल
 स्वरूप का ध्यान करें व स्फटिक माला से
 प्रतिदिन 5 माला जप निम्न मंत्र का करें।

देवकी सुत गोविंद वासुदेव जगत्पये
देहि में तनयं कृष्णत्वा महं शरणागते।
अब सब सामग्री की पोटली में बांधकर पूजा स्थान
 में रख दें। रोज श्रद्धा से दर्शन करें। जब आपकी
 मनोकामना पूर्ण हो जाए, तब पोटली को जल में
 प्रवाहित कर दें। भगवान शिव कू कृपा से सुंदर,
 दीर्घायु, ऐश्वर्यवान पुत्र की प्राप्ति होगी। इस शुभ
 अवसर का लाभ अवश्य उठाना चाहिए।
कॅरियर और रुद्राक्ष

जीवन में सफलता के लिए नवग्रह रुद्राक्ष माला
 सवरेतम है। किसी कारणवश जो इस अवसर पर
 रुद्राक्ष न पहन सकें, तो वे श्रावण माह में अवश्य
 धारण कर लाभ प्राप्त कर सकते हैं। रुद्राक्ष
 बिल्कुल शुद्ध होना चाहिए।

* राजनेताओं को पूर्ण सफलता के लिए तेरह मुखी
 रुद्राक्ष धारण करना चाहिए।
* न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े लोग एक व तेरह मुखी
 रुद्राक्ष दोनों ओर चांदी के मोती डलवा कर पहनें
* वकील चार व तेरह मुखी रुद्राक्ष धारण कर
 लाभ 
प्राप्त कर सकते हैं।
* बैंक मैनेजर ग्यारह व तेरह मुखी रुद्राक्ष पहनें।
* सीए आठ व बारह मुखी रुद्राक्ष पहनें।
* पुलिस अधिकारी नौ व तेरह मुखी रुद्राक्ष पहनें।
* डॉक्टर, वैद्य नौ व ग्यारह मुखी रुद्राक्ष पहनें।
* सर्जन दस, बारह व चौदह मुखी रुद्राक्ष पहनें।
* चिकित्सा जगत के लोग ३ व चार मुखी रुद्राक्ष
 पहनें।
* मैकेनिकल इंजीनियर दस व ग्यारह मुखी
 रुद्राक्ष पहनें।
* सिविल इंजीनियर आठ व चौदह मुखी रुद्राक्ष
 पहनें।
* इलेक्ट्रिकल इंजीनियर सात व ग्यारह मुखी
 रुद्राक्ष पहनें।
* कंप्यूटर सॉफ्टवेयर इंजीनियर चौदह व गौरी
 शंकर रुद्राक्ष पहनें।
* कंप्यूटर हार्डवेयर इंजीनियर नौ व बारह मुखी
 रुद्राक्ष पहनें।
* पायलट, वायुसेना अधिकारी दस व ग्यारह
 मुखी रुद्राक्ष पहनें।
* अध्यापक छह व चौदह मुखी रुद्राक्ष पहनें।
* ठेकेदार ग्यारह, तेरह व चौदह मुखी रुद्राक्ष
 पहनें।
* प्रॉपर्टी डीलर एक, दस व चौदह मुखी रुद्राक्ष
 पहनें।
* दुकानदार दस, तेरह व चौदह मुखी रुद्राक्ष
 पहनें।
* उद्योगपति बारह व चौदह मुखी रुद्राक्ष पहनें।
* होटल मालिक एक, तेरह व चौदह मुखी रुद्राक्ष
 पहनें।
विद्यार्थियों व बच्चों की शिक्षा के लिए ‘गणोश
 रुद्राक्ष’ धारण करवाएं। बच्चा स्वयं अच्छी शिक्षा
 में नाम कमाएगा। इसे शुभ मुहूर्त में धारण करें।
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Also read in my blog--

भगवान शिव 108 नामों का अर्थ सहित वर्णन....

http://drpuneetagrawal.blogspot.in/2012/12/108-150912.html 

 

 

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Twelve shiv temples.....

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http://drpuneetagrawal.blogspot.in/2012/09/twelve-shiv-temples100112.html 

 

 
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1 comment:

  1. क्यों करें शिवलिंग की आधी परिक्रमा?

    हमेशा शिवलिंग की परिक्रमा बांयी ओर से प्रारम्भ कर जलधारी के निकले हुए भाग यानि स्रोत तक फिर विपरीत दिशा में लौट दूसरे सिरे तक आकर परिक्रमा पूरी करें। जलधारी या अरघा को पैरों से लाघना नहीं चाहिए क्योंकि माना जाता है कि उस स्थान पर उर्जा और शक्ति का भण्डार होता है।

    जलधारी को लांघते समय पैरों के फैलने से वार्य या रज इनसे जुड़ी विभिन्न प्रकार की शारीरिक क्रियाओं पर शक्तिशाली उर्जा का दुष्प्रभाव पड़ता है। अतः इस देव-दोष से बचना चाहिए। शिवलिंग का विधिवत पूजन व अर्चन करना चाहिए क्योंकि इसमें दैवीय शक्ति होती है, जो हमारी सभी प्रकार से रक्षाकरके मनोकामनाओं को पूर्ण करती है

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