Wednesday, 13 February 2013

What is Divine Word (Ram Naam)?.......18713

What is Divine Word (Ram Naam)?

It is very difficult to define accurately the Divine Word. It cannot be explained through words. No language on this earth is able to explain it because language is having its own limitations. This is such type of truth which cannot be explained as it is beyond explanation. It is such type of language which has never been spoken by mortal tongue or written by mortal hands. It is constantly reverberating melody which cannot be sung by any earthly musical instrument. Its melodies are beyond any melodies sung by earthly musical instruments. Its inspirational music reverberates in every constituents of soul but cannot be understood by those who have not experienced it.

दिव्य धुन या राम नाम क्या है ?

राम नाम की सही व्याख्या करना आसान नहीं है | इसकी व्याख्या शब्दों में नहीं की जा सकती है, क्योंकि किसी भी भाषा में ऐसी योग्यता नहीं है और न ही यह किसी इनसान के बस की बात है | अगर हम दुनिया में बोले जाने वाली सभी भाषाओँ का ज्ञान अर्जित कर लें, तो भी कुदरत के इस रहस्य को बताना लगभग नामुमकिन है | यह ऐसा महान सत्य है जिसे कभी भी नहीं बताया गया है, क्योंकि इसे बताना लगभग असंभव है | यह ऐसी अनबोली भाषा है जो किसी इनसानी जुबान से न तो बोली गयी है और न ही कभी लिखी गयी है | यह हरसमय गूँजनेवाली मनमोहक धुन है जिसे संसार के किसी भी साज़ से निकलनेवाली धुन से परे है | इसका चुम्बकीय और मनोरम संगीत आत्मा के कण-कण से गूँजता है, परन्तु जिन लोगों ने इस संगीत को नहीं सुना, उन्हें यह बात नहीं समझाई जा सकती है |

Vedas have called this Divine Melody as ‘Anhad’ which means incessant sound or melody. Sufis called it as ‘Sarmadi’ which means ‘Divine intoxication’. Here ‘Divine Intoxication’ means advanced and elevated spiritual state, liberation (moksha), redemption of soul from worldly bondage. Those who listen to this Divine Sound and practice it become free from all worries, sorrows, fear, disease and disappointments. The soul realizes the absolute super-conscious state. This is the same Divine Sound (Anahat Naad) which Lord Shiva listened during mediation in caves of Himalayas. This is the same Divine Sound (Bange Aasmani) which Prophet Mohammed listened in the caves of ‘Gare-Heera’. This is the same Divine Sound which Hazrat Moses listened on Sinai hills. Jesus Christ listened to same Divine Sound when He had the blessed vision of Holy Father. The Divine Melody played on the ethereal flute of Lord Krishna is symbolic of same Divine Sound. The one who hears to that Divine Sound forgets all worldly differences of colour, caste, religion, nationality etc.

वेदों में इस अलौकिक धुन को 'अनहद' कहा गया है जिसका अर्थ है निरंतर होने वाली गूँज | सूफियों ने इसको 'सौते-सरमदी' कहा है जिसका अर्थ है 'मदहोशी' | यहाँ 'मदहोशी' लफ्ज़ से भाव है ऊँची और उन्नत अवस्था, मोक्ष, आत्मा की सांसारिक बंधनों से मुक्ति | जो इस 'बांगे-आसमानी या इस्मे-आज़म' को सुनते हैं और इसका अभ्यास करते हैं , उनकी सारी चिंताएँ, परेशानियां, दुःख, तकलीफें, भय और रोग दूर हो जाते हैं और उनकी रूह जिस्म और इन्द्रियों की क़ैद से आज़ाद हो जाती है | उस दिव्य धुन को सुननेवाले की आत्मा परमचेतन अवस्था को प्राप्त कर लेती है |

भगवान् शिव ने यही 'दिव्य ध्वनि' हिमालय की गुफा में समाधि के दौरान सुनी थी | इसी अलौकिक और दिव्य ध्वनि (बांगे आसमानी ) को हज़रात मुहम्मद साहिब ने 'गारे-हीरा' की गुफा में सुना था | हज़रत मूसा ने भी इस दिव्य धुन को सिनाई-पर्वत पर सुना था | हज़रत ईसा ने भी वही अलौकिक धुन सुनी थी जब उन्हें उस परमपिता के दर्शन हुए थे | श्रीकृष्ण की बाँसुरी से निकली मधुर तान उस दिव्य धुन का ही प्रतीक है | जो भी इस दिव्य धुन को सुनता है, वह संसार के भेदभाव को भूल जाता है |

The creative Divine Melody pervading the entire universe could be compared with electromagnetic waves of material world though they are much more refined and ethereal. As radio set or television receive the electromagnetic waves, in similar manner the astral body of human being receive the Divine Melody. If we want to listen to any particular station, we are required to tune to the particular frequency of that station. Human being is similar to a radio set which can be tuned to receive the notes of Divine Melody. A perfect Master (Satguru) at the time of initiation unites the disciple with the Divine Melody and disciple is now able to tune in to listen to that Divine Melody (Ram Naam) provided the disciple is able to adhere to the instructions of his Master. Mind and body has to be kept pure for receiving the Divine Grace of Master and listen to the Divine Word. Mind is filled with absolute bliss and pleasure and no pleasure of this world can compare with this Divine Music.

सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त राम नाम की रचनात्मक तरंग की तुलना रेडियो की विद्युत् चुम्बकीय तरंगों (Electromagnetic waves ) से की जा सकती है वैसे वो तरंग इस जडीय तरंग से सूक्ष्म और चैतन्य होती है | जिस तरह से रेडियो सेट या टी.वी. सेट इन तरंगों को ग्रहण करता है, उसी प्रकार इंसान का शरीर या सही मायने में सूक्ष्म शरीर राम नाम की शब्द धुन को ग्रहण करता है | अगर हम बाहरी संगीत सुनना चाहते हैं तो हम रेडियो सेट को ट्यून करते हैं | इसी प्रकार ये इंसानी देह वो हरी का मंदिर है जिसमे राम नाम की दिव्य धुन सुनी जा सकती है, ज़रुरत है बस इसको ट्यून करने की | कामिल दरवेश, संत सतगुरु अपने शागिर्द को बैत (दीक्षा ) देते वक़्त उसे राम-नाम की शब्द धुन से जोड़ देते हैं, तो वह कबीर साहिब के कथन के अनुसार 'पवित्र स्वेत संगीत' यानी राम नाम की दिव्य धुन सुनने के काबिल हो जाता है | पूरे शरीर और मन को पवित्र और निर्मल रखने की आवश्यकता है, तब इनसान का दिव्य धुन से संपर्क स्थापित हो जाता है | जब कोई व्यक्ति उसको सुनता है तो वह अपार आनंद से भर जाता है, क्योंकि इसकी तुलना संसार की किसी भी वस्तु के साथ नहीं की जा सकती है |

The sweet melodies of Indian singers like Lata Mangeshkar and Mohammad Rafi are nothing in front of this Divine Melody. The vocal melodies of Handel and tunes of Wagner are nowhere in front of this Sweet Melody. If we collect all musical works of Bach, Mozart and Beethovan, prepare a harmonious mixture of all musical instruments like violin, flute, veena etc., even then we shall be unable to prepare even a small piece of note of this Divine Melody. That Divine Melody pulls the soul of listener and gives it a new life. Then he feels that he is resident of different world. All sensual attractions and attachments of this world vanishes after listening to the Divine Melody and one attains the highest spiritual state. His heart becomes pure and complete transformation takes place in his life. He starts living a new life. He becomes immortal. Now death cannot haunt him as he has already crossed the threshold of death. He merges in the Divine Current of that Holy Word.

इस राम नाम की दिव्य धुन के सामने भारत ले महान पार्शवगायक जैसे लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी के तराने फीके लगते हैं | इस वाणी के सामने हंडल (Handal ) का स्वर-संगीत और वैगनर (Wagner ) के सुर फीके लगते हैं | अगर हम बाख (Bach) और बीथोवन (Beethovan) की सारी संगीत रचनाओं को इकठ्ठा करें, वीणा, वायलन और बाँसुरी अदि सभी वाद्य-यंत्रों का प्रयोग करके सभी महान संगीतज्ञो के संगीत का मिश्रण करें, तो भी इस 'राम नाम की दिव्य धुन' का एक छोटा सा सुर भी उत्पन्न नहीं कर पायेंगे | यह दिव्य धुन सुननेवालों की आत्मा को ही खींच लेती है, और यह धुन उसे नया जीवन देती है | फिर वह अनुभव करता है कि यह देश उसका नहीं है और वह किसी और देश का वासी है और वह नाहक ही इस दुनिया में परदेशियों की तरह रह कर दुःख उठा रहा है | ऐसे में इन्द्रियों के आकर्षण और मोह ख़त्म हो जाते हैं और इनसान उच्च आत्मिक अवस्था प्राप्त कर लेता है | उसका ह्रदय निर्मल हो जाता है और उसका काया-पलट हो जाता है | वह नया जीवन जीना शुरू करता है | वह अमर पद को प्राप्त हो जाता है | मौत अब उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती है | निश्चित ही वह राम नाम की अमर जीवनदायिनी धारा में समा जाता है |
This Sound Current is called as ‘Word’ in English language while in Hindi, it is referred as ‘Ram Naam’ or simply ‘Naam’. Guru Nanak calls it as ‘Hukum’, ‘Hari Katha’, ‘Ajapa Jaap’, ‘Shabad’, ‘Gur Ki Vani’ etc. Sufi saints call is as ‘Bange Aaasmani’, ‘Isme-Azam’, ‘Nidaye Sultani’ or simply ‘Hu’. Bible calls it as ‘Word’, ‘Logos’ or ‘Holy Ghost’. In Vedas, this Holy Word has been referred as ‘Naad (Dvine Music)’. In Vedas, ‘Naad’ has been described as the creative power of universe. The Sound Current emanating from ‘Naad’ is the creative power. It has also been called as ‘Naad-Brahm’, which means the Original Word of the Creator (Brahm). Whole universe has been created by this ‘Naad-Brahm’. Naad is the Divine Music from which all music forms have developed. It is the Divine Music of whole universe and all other music are mere reflection (very crude) of It.

All Sufis may not distinguish between Real Music and the reflections of this music. There is a very big difference between real music and its’ reflection. When people hear the music on this earth, they are listening to just crude reflection of that Real Divine Music. That Music cannot be heard by this mortal ears. We will have to develop the listening faculty to hear that Divine Music. This Holy Word is also the creative power and executive authority running this universe. Holy Word is the form of God beyond attributes (Nirgun). Word comes in human form as finite manifestation of God as Saints to redeem people from this world. When Saints initiates (baptize) their disciples, they connect them to the Divine Current.

अंग्रेजी भाषा में दिव्य ध्वनि को 'वर्ड' कहते हैं और हिन्दी भाषा में 'राम नाम' या सिर्फ 'नाम' कहते हैं | सूफी फकीर इसे कलमा, बांगे आसमानी, इस्मे-आज़म, निदाए-सुल्तानी या सिर्फ 'हू' कहकर बयान करते हैं | गुरु नानक साहिब ने इसको 'हुक्म', 'हरी-कथा', 'अजपा -जाप', 'शब्द' आदि नामों से पुकारा है | वेदों में शब्द को 'नाद' कहा गया है | वेदान्त में ध्वनि की चर्चा हमेशा रचनात्मक रूप में की गयी है | उसे नाद-ब्रह्म भी कहा गया है, जिसका अर्थ है ब्रह्म का आदि शब्द | इसी 'नाद-ब्रह्म' द्वारा समस्त रचना अस्तित्व में आयी | 'नाद' ही वह भव्य संगीत है जिससे बाकी सभी स्वर-संगीत प्रकट होते हैं | यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का आदि संगीत है | इस संसार के हर संगीत की धुन उस आदि-धुन से निकल कर आयी है | सभी फकीर या सूफी राम-नाम और उससे रचित सृष्टी में अंतर नहीं कर पाते यानी वास्तविक संगीत और उसकी प्रतिध्वनि मैं अंतर नहीं कर पाते | इन दोनों में बहुत अंतर है | समस्त रचना करने वाला 'नाद' ही वह ध्वनि है, जिसमे से सारी ध्वनियाँ निकली हैं और साथ ही इस धुन की अलौकिक प्रतिध्वनि मन-माया के लोकों में गूँज रही है | जब हम किसी संगीतकार की रचना सुन रहे होते हैं तो हम सिर्फ उस ध्वनि की एक बहुत ही धुंधली छाया मात्र प्रतिध्वनि को सुन रहे होते हैं | असली संगीत इन सांसारिक कानों से नहीं सुना जा सकता है | इसके लिए हमें सुनने की शक्ति को जाग्रत करना होगा | यह शब्द-धुन परमात्मा का करता रूप भी है | यह परमात्मा का निर्गुण रूप है | परमात्मा के दिव्य रूप में और उसके कर्ता रूप (संत-सतगुरु) में अंतर समझने के लिए हम उसे शब्द का देहधारी रूप कह सकते हैं | दूसरे लफ़्ज़ों में हम उन्हें निराकार परमात्मा का साकार रूप कह सकते हैं | जब संत जीवों को गुरुमंत्र देते हैं तो उनको इस दिव्य धुन से जोड़ देते हैं |

My brothers and sisters who have been brought up in Christian environment should understand that Jesus Christ laid great empahasis on the conscious stream of Divine Word. He preached that this Divine Word (Holy Spirit) gives new birth to devotee. All great spiritual masters emphasize on this fact irrespective of their religions. Though Jesus Christ told that it can be heard but modern Christianity has completely forgotten this fact. In the first chapter of ‘Gospel of Saint John’ it has been called as ‘Word’ through which whole world was created. If followers of Christianity have remembered this Divine Truth then history of Christianity would have been different instead of killing and converting people forcibly in name of ‘Holy Wars’. In the third chapter of ‘Saint John’, in the third passage, there is mention of Jesus being in touch with Divine Word and listening to It. He clearly told that man is reborn by listening to this Divine Melody. The divine experience which a man can have in his lifetime was clearly mentioned by Jesus Christ which has been forgotten by modern Christianity. This is very tragic. Christians with belief in church have never understood this concept of new birth. Though they know to some extent that this process of new birth is done through ‘Holy Spirit’ but they are unaware of the real process. Only saints and not the priests of Church can make them aware of this process.

जिन भाई, बहिनों का जन्म और पालन ईसाई धर्म में हुआ है, उनके लिए यह जानना आवश्यक है कि हज़रत ईसा ने खुद बड़े ही स्पष्ट शब्दों में इस दिव्य शब्द की धारा का वर्णन किया है | उन्होंने यह उपदेश दिया कि यह शब्द - धुन (राम नाम की चेतन धारा ) इनसान को नया जन्म देती है | सभी संत, दरवेश इस महान सत्य को मानते हैं चाहे वो किसी भी धर्म के क्यों न हो | हालाँकि हज़रत ईसा ने खुद कहा कि इसे सुना जा सकता है, फिर भी ईसाई धर्म ने इसे बिलकुल भुला दिया | 'गोस्पल ऑफ़ सेंट जोन' के पहले अध्याय में इसे शब्द कहा गया है जिसके द्वारा सम्पूर्ण सृष्टी की रचना हुई | अगर ईसाई धर्म के लोगों ने इस मूलभूत सत्य को समझा होता और अपनाया होता, तो इस धर्म का इतिहास कुछ और ही होता और 'धर्म युद्ध' के चक्कर में धर्म परिवर्तन के लिए लाखों लोगों को मारा न होता | सेंट जोन के तीसरे अध्याय के तीसरे अनुवाक्य में हज़रत ईसा द्वारा दिव्य-धारा से संपर्क करने और खुद सुनने की बात का वर्णन है |

फिर उन्होंने साफ़-साफ़ शब्दों में कहा है कि इसके द्वारा मनुष्य को नया जन्म प्राप्त होता है | मनुष्य जन्म में प्राप्त होने वाले इस महत्वपूर्ण अनुभव का वर्णन हज़रत ईसा ने किया है पर ईसाईयों ने इसे कभी नहीं समझा | यह बहुत दुःख की बात है | चर्च में आस्था रखने इस नए जन्म के रहस्य को को बिलकुल नहीं समझ पाये हैं | उन्हें कुछ हद तक अंदाजा है कि ऐसा होली स्पिरिट द्वारा होता है, पान्तु इसकी सही प्रक्रिया की जानकारी बिलकुल नहीं है | केवल संत ही इस कथन की अच्छी जानकारी दे सकते हैं |

We should keep in mind that meaning of ‘new birth is to bring a person towards illumination of knowledge. Jesus Christ says:

‘That which is born of the flesh is flesh; and that which is born of the Spirit is spirit.’ (John, 3:6)

The meaning of Holy Spirit, Spirit and Word refers to one and the same thing.

Then in eight passage, Jesus explains that new birth takes place after listening to Divine Word.

‘The wind bloweth where it will, and thou hearest the sound thereof, but canst not tell whence it cometh and whither it goeth: so is every one that is born of the Spirit.’

Thus Jesus Christ clearly explains that as a person is born of the mother’s womb; in similar manner human soul also gets birth through contact with the Holy Word of God in which soul is taken from the darkness of mind and illusion, passions and abnormalities to the Divine Light. We know that Jesus indicated towards the Life Stream because he has told that it can be listened. When soul awakens or gets new birth, it hears the Divine Melody of Audible Life Stream similar as the rustlings of leaves on a tree after wind passes through it. As it is difficult to tell about the origin and final destination of wind, in same way it is difficult to tell from where the Divine Audible Stream is coming till one reaches the final destination.

'नये जन्म' का अर्थ है जीव को प्रकाश में लाना | हज़रत ईसा ने कहा है :

'जो शरीर से जन्मा है, वह शरीर है; जो आत्मा से जन्मा है, वह आत्मा है |' (जोन, ३:६)

होली स्पिरिट, स्पिरिट और शब्द, सबका एक अर्थ ही है |

फिर आठवें अनुवाक्य में हज़रत ईसा ने यह स्पष्ट किया कि नया जन्म शब्द (राम नाम ) की आवाज़ सुनने से ही होता है |

'हवा जिधर जाती है उधर चलती है और तुम्हें इसकी आवाज़ सुनाई देती है, परन्तु कोई नहीं जानता कि वह कहाँ से आती है और किधर को जाती है | जो कोई शब्द से जन्मा है, वह भी ऐसा ही है |' (जोन, ३:८)

इस तरह से हज़रत ईसा ने यह पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया कि जिस प्रकार मनुष्य का जन्म स्त्री के गर्भ से होता है, उसी प्रकार मनुष्य की आत्मा का भी जन्म होता है यानी शब्द की धारा के रूप में प्रकट परमात्मा द्वारा मनुष्य की आत्मा का भी जन्म होता है यानी शब्द (राम नाम) की धारा के रूप में प्रकट परमात्मा द्वारा मनुष्य की आत्मा को मन-माया और अन्य विकारों की अंधी कोख से प्रकाश की तरफ ले जाया जाता है | हम जानते हैं कि उन्होनें इस जीवनदायिनी धारा की ओर संकेत किया है, क्योंकि उन्होनें कहा है कि निसंदेह इसको सुना जा सकता है | जब एक आत्मा का वह नया जन्म होता है, तो उसे शब्द-धुन बड़े सहज रूप से सुनाई देती है, जैसे हवा चलने पर चीड के ऊँचे-ऊँचे पेड़ों की सरसराहट | परन्तु जिस प्रकार कोई यह नहीं बता सकता कि यह हवा कहाँ से आ रही है और जा कहाँ रही है, उसी प्रकार कोई नहीं बता सकता कि अंतर की आवाज़ किधर से आ रही है और किधर जा रही है | सिर्फ वो ही बता सकते हैं, जिन्होनें आखिरी मुकाम तय कर लिया हो |

The concept of most often discussed term ‘Holy Trinity’ is same as ‘Divine Trinity’ explained by various saints of all religions i.e. Almighty Lord, Perfect Master (Satuguru) and Divine Word (Ram Naam). This is same as Holy Father, His son (Saint) and Holy Spirit (Ram Naam). It is very ironic that Christians have not understood this concept right from the time of Athanasius and there had been lot of discussions and many books have been written on that. It is advisable for Christians to read Guru Granth Sahib where Guru Sahibs has clearly explained the concept of Trinity without any confusion.

Jesus again says in John 3:3:

Jesus answered and said unto him, “Verily, verily I say unto thee, unless a man be born again, he cannot see the Kingdom of God.”

In order to enter into the inner spiritual regions, it is essential that man is born again and he should come in contact with the Divine Word (Ram Naam) which will carry him to Divine Kingdom of God. That Divine Word is inside human being and one has to go inside himself. That is why Jesus told:

Neither shall they say, ‘Lo, it is here!’ or ‘Lo, it is there!’ For behold, the Kingdom of God is within you.” (Luke 17:21).

He again says in John 3:7:

Marvel not that I said unto thee, ‘Ye must be born again.’

Hindus call this process of born again as Dwija (Second birth). But here also, ritualism became the order of the day. Now a priest will speak Gayatri Mantra in one’s ear and there will be thread ceremony and person is called as Dwija. A blind person initiating another blind person about the mystry of Divine Word (Ram Naam) while he himself being unaware of it.

ईसाई धर्म में बहुचर्चित पवित्र त्रिमूर्ति (Trinity) वही है जिसे सभी सतगुरुओं ने दिव्य त्रिमूर्ती कहा है यानी -परमपिता, संत सतगुरु और रामनाम (शब्द) | इसमें कोई शक नहीं कि यह त्रिमूर्ति पिता, बेटा और होली स्पिरिट ही है | यह बहुत खेदजनक है कि ईसाई कभी इस त्रिमूर्ति के सही अर्थ नहीं समझ पाये, जिसके ऊपर एथ्नेशियस के समय से लेकर आज तक कितने वाद-विवाद हो गए हैं और कई किताबे लिखी जा चुकी है और ट्रिनिटी चर्च भी अलग से स्थापित हो गया है | इससे को चाहिए कि इस सिद्धांत को समझने के लिए उन्हें गुरु ग्रथ साहिब का अध्धयन करना चाहिए जिसमे इसे बहुत ही स्पष्ट तरीके से समझाया है | शायद इसका यह कारण रहा होगा कि ईसा मसीह के समय आध्यात्मिक विचारों को खुला रखने की स्वतन्त्रता नहीं थी क्योंकि उन्होनें सत्य को कहानियों के ज़रिये समझाया है और कई भाषा अनुवादों में सही अर्थ खो जाते हैं |

हज़रत ईसा एक और जगह कहते हैं:

मैं तुम्हे सच-सच कहता हूँ, यदि कोई नये सिरे से न जन्मे तो परमेश्वर का राज्य नहीं देख सकता | (जोन, ३:३)

प्रकाश के आंतरिक मंजिलों में पहुँचने के लिए आवश्यक है कि जीव का फिर से जन्म हो, फिर वह राम-नाम की दिव्य धुन के संपर्क में आये यानी वह शब्द धुन उसे प्रकाश की तरफ ले जाए - वही राम नाम जो समस्त शक्ति का श्रोत है | यह शब्द-धुन मनीषय के अन्दर है, क्योंकि प्रकाश का साम्राज्य मनुष्य के अंतर में है | इसलिए हज़रत ईसा फरमाते हैं:

ईश्वर का साम्राज्य तुम्हारे अन्दर है | (ल्युक, १७:२१)

वे फिर से दूसरी जगह कहते हैं:

इस बात पर हैरान मत हो जब मैं तुम्हें कहता हूँ कि तुम्हें फिर से जन्म लेना होगा | (जोन, ३:७)

हिन्दुओं में द्विज (दूसरा जन्म) संस्कार उसी महान सत्य का प्रतीक है लेकिन आज कल तो यह सिर्फ रस्म मात्र ही रह गया है | पंडित जी यजमान के कान में गायत्री मन्त्र फूँक देंगें और पवित्र धागे को धारण करवायेंगें | पर मन्त्र की ताकत उसके शब्दों में नहीं उसे सिद्ध करने वाले गुरु द्वारा होती है | अगर एक अंधा दुसरे अंधे को प्रकाश दिखलाने की बात करे तो यह मात्र धोखा है और कुछ नहीं |

There has been a very famous Sufi saint in Iran who also expressed the beauty and glory of Divine Word – Shams-e-Tabriz. There is one poem written by Him:

I heard a wonderful sound
Which comes neither from inside, nor outside.
Neither from left, nor from right,
Neither from front, nor from back.

Then you will ask from where it comes?
It comes from that way where you want to go.
Then you will ask where I should go?
There from where the Emperor comes.

There from where the art of ripening of fruit comes;
There from where the stone turns into diamond.
Be still and hear the five sounds of Lord,
That Lord which is beyond all feelings and directions.

That wonderful sound from the mansions of Lord
Is always ringing down below.
Most fortunate among all is that one
Who listens to that Divine Melody.

ईरान में एक पहुंचे हुए सूफी फकीर शम्स तबरेज़ हें हैं जिन्होनें ने फ़ारसी ज़ुबान में दिव्य-शब्द (बांगे-आसमानी) के बारे में बहुत कुछ लिखा है जैसे कबीर साहिब ने भारत में लिखा है | उनकी एक कविता इस तरह से है:

मुझे एक अद्भुत आवाज़ सुनाई दी जो
न भीतर से आती है, न बाहर से |
न दायें से आती है, न बायें से,
न सामने से आती है, न पीछे से |

तो फिर आप पूछेंगे यह आती कहाँ से है ?
यह उस दिशा से आती है जहाँ आप जाना चाहते हो |
तो फिर आप पूछेंगे कि मैं किधर का रूख करूँ ?
उसी ओर जिधर से शहंशाह आ रहा है |

उसी ओर जिधर से फल पकने का गुण आता है;
उसी ओर जिधर से पत्थर हीरे में बदल जाता है |
मौन हो जाओ और परमात्मा की पाँच आवाजें सुनों,
वह परमात्मा जो सभी अनुभूतियों और दिशाओं से परे है |

परमात्मा के महलों से वह अद्भुत आवाज़
हर पल यहाँ नीचे सुनाई दे रही है |
हम सबमें से सबसे अधिक भाग्यशाली है वह
जो सुनता है इसके मनमोहन स्वर |

Guru Arjan Dev says the same fact in Gurbani. He says that the God who sent you here is calling you again to His Divine Kingdom. You should still your mind and attach your soul to the sound current of Divine Word. In this way your real goal of reaching to Lord’s place will be completed and everyone will praise and sing your glory.

जिनि तुम भेजे तिनहि बुलाए सुख सहज सेती घरि आउ ॥
अनद मंगल गुन गाउ सहज धुनि निहचल राजु कमाउ ॥१॥
असथिर रहहु डोलहु मत कबहू गुर कै बचनि अधारि ॥
जै जै कारु सगल भू मंडल मुख ऊजल दरबार ॥३॥ (SGGS 678)


The One who sent you, has now recalled you; return to your home now in peace and pleasure. In bliss and ecstasy, sing His Glorious Praises; by this celestial tune, you shall acquire your everlasting kingdom. Remain firm and steady, and do not ever waver; take the Guru's Word as your Support. You shall be applauded and congratulated all over the world, and your face shall be radiant in the Court of the Lord.


मेरे प्यारे ! जिस प्रभु ने तुझे इस संसार में भेजा है, वह तुझे निज घर वापस बुला रहा है | तुम सतगुरु के उपदेशानुसार मन को निश्चल करके आत्मा को अन्दर अनहद शब्द की ध्वनि के साथ जोड़ो | इस प्रकार तुम्हें प्रभु के निश्चल घर में पहुँचने का सौभाग्य प्राप्त हो जाएगा और लोक-परलोक दोनों में तुम्हारी बडाई का डंका गूंज उठेगा |
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