Friday, 8 February 2013

मौनी अमावस्या-Mouni Amavasya...........16113

माघ मास की अमावस्या जिसे मौनी अमावस्या कहते हैं।यह योग पर आधारित महाव्रत है । मान्यताओं के अनुसार इस दिन पवित्र संगममें देवताओं का निवास होता है इसलिए इस दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व है। इस मास को भी कार्तिक के समान पुण्य मास कहा गया है। गंगा तट पर इस करणभक्त जन एक मास तक कुटी बनाकर गंगा सेवन करते हैं।
 

पौराणिक संदर्भ

संगम में स्नान केसंदर्भ में एक अन्य कथा का भी उल्लेख आता है वह है सागर मंथन की कथा।कथाके अनुसार जब सागर मंथन से भगवान धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए उससमय देवताओं एवं असुरों में अमृत कलश के लिए खींचा तानी शुरू हो गयीइससेअमृत की कुछ बूंदें छलक कर इलाहाबाद हरिद्वार नासिक और उज्जैन में जागिरा। यही कारण है कि यहां कि नदियों में स्नान करने पर अमृत स्नान का पुण्य प्राप्त होता है। यह तिथि अगर सोमवार के दिन पड़ता है तब इसका महत्व कई गुणा बढ़ जाता है। अगर सोमवार हो और साथ ही महाकुम्भ लगा हो तब इसका महत्व अनन्त गुणा हो जाता है। शास्त्रों में कहा गया है सत युगमें जो पुण्य तप से मिलता है द्वापर में हरि भक्ति से त्रेता में ज्ञानसे कलियुग में दान से लेकिन माघ मास में संगम स्नान हर युग में अन्नंत पुण्यदायी होगा। इस तिथि को पवित्र नदियों में स्नान के पश्चात अपने सामर्थ के अनुसार अन्न वस्त्र धन गौ भूमि स्वर्ण जो भी आपकी इच्छा हो दान देना चाहिए। इस दिन तिल दान भी उत्तम कहा गया है। इस तिथि को मौनी अमावस्या के नाम से जाना जाता है अर्थात मौन अमवस्या। चूंकि इस व्रतमें व्रत करने वाले को पूरे दिन मौन व्रत का पालन करना होता इसलिए यह योगपर आधारित व्रत कहलाता है। शास्त्रों वर्णित भी है कि होंठों से ईश्वर का जाप करने से जितना पुण्य मिलता है उससे कई गुणा अधिक पुण्य मन का मनका फेरकर हरि का नाम लेने से मिलता है। इसी तिथि को संतों की भांति चुप रहें तो उत्तम है अगर संभव नहीं हो तो अपने मुख से कोई भी कटु शब्द न निकालें। इस तिथि को भगवान विष्णु और शिव जी दोनों की पूजा का विधान है। वास्तव में शिव और विष्णु दोनों एक ही हैं जो भक्तो के कल्याण हेतु दो स्वरूप धारण करते हैं इस बात का उल्लेख स्वयं भगवान ने किया है। इस दिन पीपल में आर्घ्य देकर परिक्रमा करें और दीप दान दें। इस दिन जिनके लिए व्रत करना संभव नहीं हो वह मीठा भोजन करें।
माघ मास की अमावस्या को मौनी अमावस्या कहते हैं। इस दिन मौन रहना चाहिए। मुनि शब्द से ही मौनी की उत्पत्ति हुई है। इसलिए इस व्रत को मौन धारण करके समापन करने वाले को मुनि पद की प्राप्ति होती है। इस दिन मौन रहकर यमुना या गंगा स्नान करना चाहिए। यदि यह अमावस्या सोमवार के दिन हो तो इसका महत्त्व और भी अधिक बढ़ जाता है। माघ मास के स्नान का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण पर्व अमावस्या ही है। माघ मास की अमावस्या और पूर्णिमा दोनों ही तिथियां पर्व हैं। इन दिनों में पृथ्वी के किसी-न-किसी भाग में सूर्य या चंद्रमा को ग्रहण हो सकता है। ऐसा विचार कर धर्मज्ञ-मनुष्य प्रत्येक अमावस्या और पूर्णिमा को स्नान दानादि पुण्य कर्म किया करते हैं।

मौनी अमावस्या की कथा

कांचीपुरी में देवस्वामी नामक एक ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी का नाम धनवती था। उनके सात पुत्र तथा एक पुत्री थी। पुत्री का नाम गुणवती था। ब्राह्मण ने सातों पुत्रों को विवाह करके बेटी के लिए वर खोजने अपने सबसे बड़े पुत्र को भेजा। उसी दौरान किसी पण्डित ने पुत्री की जन्मकुण्डली देखी और बताया-'सप्तपदी होते-होते यह कन्या विधवा हो जाएगी।' तब उस ब्राह्मण ने पण्डित से पूछा- 'पुत्री के इस वैधव्य दोष का निवारण कैसे होगा?' पंडित ने बताया-' सोमा का पूजन करने से वैधव्य दोष दूर होगा।' फिर सोमा का परिचय देते हुए उसने बताया-' वह एक धोबिन है। उसका निवास स्थान सिंहल द्वीप है। उसे जैसे-तैसे प्रसन्न करो और गुणवती के विवाह से पूर्व उसे यहाँ बुला लो।' तब देवस्वामी का सबसे छोटा लड़का बहन को अपने साथ लेकर सिहंल द्वीप जाने के लिए सागर तट पर चला गया। सागर पार करने की चिंता में दोनों एक वृक्ष की छाया में बैठ गए। उस पेड़ पर एक घोंसले में गिद्ध का परिवार रहता था। उस समय घोंसले में सिर्फ़ गिद्ध के बच्चे थे। गिद्ध के बच्चे भाई-बहन के क्रिया-कलापों को देख रहे थे। सायंकाल के समय उन बच्चों (गिद्ध के बच्चों) की मां आई तो उन्होंने भोजन नहीं किया। वे मां से बोले- 'नीचे दो प्राणी सुबह से भूखे-प्यासे बैठे हैं। जब तक वे कुछ नहीं खा लेते, तब तक हम भी कुछ नहीं खाएंगे।' तब दया और ममता के वशीभूत गिद्ध माता उनके पास आई और बोली- 'मैंने आपकी इच्छाओं को जान लिया है। इस वन में जो भी फल-फूल कंद-मूल मिलेगा, मैं ले आती हूं। आप भोजन कर लीजिए। मैं प्रात:काल आपको सागर पार कराकर सिंहल द्वीप की सीमा के पास पहुंचा दूंगी।' और वे दोनों भाई-बहन माता की सहायता से सोमा के यहाँ जा पहुंचे। वे नित्य प्रात: उठकर सोमा का घर झाड़कर लीप देते थे।
एक दिन सोमा ने अपनी बहुओं से पूछा-'हमारे घर कौन बुहारता है, कौन लीपता-पोतता है?' सबने कहा-'हमारे सिवाय और कौन बाहर से इस काम को करने आएगा?' किंतु सोमा को उनकी बातों पर विश्वास नहीं हुआ। एक दिन उसने रहस्य जानना चाहा। वह सारी रात जागी और सबकुछ प्रत्यक्ष देखकर जान गई। सोमा का उन बहन-भाई से वार्तालाप हुआ। भाई ने सोमा को बहन संबंधी सारी बात बता दी। सोमा ने उनकी श्रम-साधना तथा सेवा से प्रसन्न होकर उचित समय पर उनके घर पहुंचने का वचन देकर कन्या के वैधव्य दोष निवारण का आश्वासन दे दिया। मगर भाई ने उससे अपने साथ चलने का आग्रह किया। आग्रह करने पर सोमा उनके साथ चल दी। चलते समय सोमा ने बहुओं से कहा-'मेरी अनुपस्थिति में यदि किसी का देहान्त हो जाए तो उसके शरीर को नष्ट मत करना। मेरा इन्तजार करना।' और फिर सोमा बहन-भाई के साथ कांचीपुरी पहुंच गई। दूसरे दिन गुणवती के विवाह का कार्यक्रम तय हो गया। सप्तपदी होते ही उसका पति मर गया। सोमा ने तुरन्त अपने संचित पुण्यों का फल गुणवती को प्रदान कर दिया। तुरन्त ही उसका पति जीवित हो उठा। सोमा उन्हें आशीर्वाद देकर अपने घर चली गई। उधर गुणवती को पुण्य-फल देने से सोमा के पुत्र, जामाता तथा पति की मृत्यु हो गई। सोमा ने पुण्य फल संचित करने के लिए मार्ग मं अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष की छाया में विष्णुजी का पूजन करके 108 परिक्रमाएं कीं। इसके पूर्ण होने पर उसके परिवार के मृतक जन जीवित हो उठे। निष्काम भाव से सेवा का फल मधुर होता है, इस व्रत का यही लक्ष्य है। 
http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%8C%E0%A4%A8%E0%A5%80_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE 

 इस दिन प्रातः काल ब्राह्म मुहूर्त में जागकर दैनिक संध्या वंदनादि कृत्यों को पूर्ण कर मौनव्रत का संकल्प लेते हुए ईश्वर से प्रार्थना करें कि आज मैं मौनी अमावस्या के पवित्र पर्व पर मौन व्रत धारण करूंगा, अतः हे दया के सागर, करुणा निधान, दीनबंधु दीनानाथ, परमप्रभु आप मुझे सामथ्र्य प्रदान करें ताकि मैं मौनव्रत को धारण करने में समर्थ हो सकूं। मुनि शब्द से ही मौनी की उत्पत्ति हुई है। इसलिए इस व्रत को मौन धारण करके समापन करने वाले को मुनि पद की प्राप्ति होती है और वह भगवान का प्रिय बन जाता है। मौनी अमावस्या के दिन सोमवार का योग हो, तो उसका महत्व और अधिक बढ़ जाता है। इस दिन त्रिवेणी अथवा गंगा के किनारे स्नान-दान की विशेष महिमा है। मौनी अमावस्या के दिन यदि रविवार, व्यतिपात योग और श्रवण नक्षत्र हो तो ‘अर्धोदय योग’ होता है। इस योग में सभी स्थानों का जल गंगा तुल्य हो जाता है। सभी ब्राह्मण भी ब्रह्मसन्निभ शुद्ध ात्मा हो जाते हैं। अतः इस योग में यत्किंचित् किए हुए पुण्य, धर्म, स्नान, दानादि का फल भी अनंत गुना अर्थात मेरु पर्वत के समान होता है। अर्धोंदय योग के अवसर पर सत्य युग में वशिष्ठ जी ने, त्रेता में भगवान रामचंद्र जी ने, द्वापर में धर्मराज ने और कलियुग में पूर्णोदार (देव विशेष) ने अनेक प्रकार के दान, धर्म किए थे। अतः धर्मज्ञ सत्पुरुषों को दान, धर्म आदि अवश्य करने चाहिए। यह पावन दिन सृष्टि संचालक मनु महाराज का जन्म दिवस भी है, अतः इस दिन विभिन्न प्रकार के दान गौदान, स्वर्ण दान, तिल, तिल के लड्डू, तिल के तेल, आंवले, वस्त्रादि का दान करना चाहिए। इस दिन साधु, महात्मा तथा ब्राह्मण् ाों के सेवन के लिए अग्नि प्रज्वलित करनी चाहिए तथा उन्ह ंे रजाइर्, कबं ल आदि जाड़े के वस्त्र देने चाहिए। तैलमामलकाश्चैव तीर्थे देयास्तु नित्यशः। ततः प्रज्वालयेद्र्वा ह्नै सेवनार्थे द्वि जन्मनाम्।। कम्बलाजिन रत्नानि वासांसि विविधानि च। चोलकानि च देयानि प्रच्छादन पटास्त. था।। इस दिन गुड़ में काले तिल मिलाकर मोदक बनाने चाहिए तथा उन्हें लाल वस्त्र में बांधकर ब्राह्मणों को देना श्रेयस्कर है। इसी पुण्य पर्व पर विभिन्न प्रकार के नैवेद्य मिष्टान्नादि षट्रस व्यंजनों से ब्राह्मणों को भोजन कराकर उन्हें द्रव्य दक्षिणादि से संतुष्ट कर प्रणामादि कर सादर विदा करना चाहिए। इस दिन पितृ श्रद्धादि करने का भी विधान है, अतः पितरों के निमित्त तर्पण, पिंड दानादि कृत्यों को भी अवश्य ही करना चाहिए। गौशाला में गायों के निमित्त हरे चारे, खल, चोकर, भूसी, गुड़ आदि पदार्थों का दान देना चाहिए तथा गौ की चरण रज को मस्तक पर धारण कर उसे साष्टांग प्रणाम करना चाहिए। कम्बलाजिन रत्नानि वासांसि विविधानि च। चोलकानि च देयानि प्रच्छादन पटास्त. था।। इस दिन गुड़ में काले तिल मिलाकर मोदक बनाने चाहिए तथा उन्हें लाल वस्त्र में बांधकर ब्राह्मणों को देना श्रेयस्कर है। इसी पुण्य पर्व पर विभिन्न प्रकार के नैवेद्य मिष्टान्नादि षट्रस व्यंजनों से ब्राह्मणों को भोजन कराकर उन्हें द्रव्य दक्षिणादि से संतुष्ट कर प्रणामादि कर सादर विदा करना चाहिए। इस दिन पितृ श्रद्धादि करने का भी विधान है, अतः पितरों के निमित्त तर्पण, पिंड दानादि कृत्यों को भी अवश्य ही करना चाहिए। गौशाला में गायों के निमित्त हरे चारे, खल, चोकर, भूसी, गुड़ आदि पदार्थों का दान देना चाहिए तथा गौ की चरण रज को मस्तक पर धारण कर उसे साष्टांग प्रणाम करना चाहिए। मौन व्रत जीवन का अद्वितीय व श्रेष्ठतम व्रत है। इस व्रत में भगवत् नामों का प्रतिक्षण स्मरण करते रहना चाहिए। भागवत जी के श्लोको,ं विष्ण् ाुसहस्रनाम, गीता आदि का पाठ भी मौन रहकर ही करना चाहिए। मौन से आत्मबल मिलता है। कबीरदास जी कहते हैं- ‘‘वाद विवाद विष घना, बोले बहुत उपाध। मौन रहे सबकी सहे, सुमिरै नाम अगाध।।’’ ग्रामीण भाषा में भी तो कहा गया है - एक चुप्प सौ को हरावै।। श्रीमद् भागवत के माहात्म्य में भी वर्णित है कि देवर्षि नारद जी आकाशवाणी के द्वारा यह सुनकर कि ‘तुम भक्ति महारानी के दुखों को ‘सत्कर्म’ के द्वारा दूर कर सकते हो और यह कर्म संत शिरोमणि महानुभाव बताएंगे’ संतों मुनियों के आश्रम पर जा जाकर पूछने लगे कि ‘सत्कर्म’ क्या है? तब कोई मुनि तो सुनकर चुप ही रह गए, मौनी अमावस्या व्रत धारण कर लिया। यथा- ‘‘मूकीभूतास्तथान्ये तु’’ मौन व्रत रहते हुए ही देवताओं का षोडशोपचार पूजन भी करें। निराहार या फलाहार जैसे भी इस व्रत का पालन कर सकें करें। दूसरे दिन प्रातः काल संध्योपासनादि कर्मों को पूर्णI
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1 comment:

  1. Mauni Amavasya occurs on the 15th day of the dark fortnight of Magh (January-February). It is derived from the word Muni, literally means an ascetic who practices silence. Mauni Amavasya is believed to be the day of conjunction of the sun and the moon. Fasting is observed on this day. The devotees do not talk to each other during the observance. It is considered highly meritorious to bath in Triveni Sangam on this day.

    Mauni Amavasya is a day of spiritual sadhana, to help us calm our restless minds. Mauni Amavasya also has a symbiotic relationship with the Kumbh Mela at Allahabad, being one of its major bathing days. This is reinforced in the annual Magha Mela of the Kalpavasis which views bathing on this day as extremely rewarding.

    On this day, large number of Hindu devotees join Kalpavasis at Sangam in Prayag (Allahabad) and meditate the whole day. Thousands of Hindus from all around the world converge at Sangam to take bath on the day.

    According to Hindu mythology, ‘Mauna’ (silence) is one of the most important aspects of spiritual discipline. Derived from the word Muni, a Sanyasi or Saint, who practices silence, mauna ideally symbolizes a state of oneness with the self.

    Apart from its festive and religious import, Mauni Amavasya is a call of the inner self, of the need for initiating an inner ‘dialogue’ with oneself, of the need to start the spiritual journey. Swami Sivananda sees the vow of silence as one of the basic spiritual disciplines for the evolution of the ‘divine life’ of man, starting with the mauna of speech which will lead to mauna of mind. Mauni Amavasya is an opportune time to learn to control the vikshepa, freeing ourselves of distractions so that we can focus within.

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