Saturday, 16 February 2013

बेहतरीन शायर मिर्ज़ा असदउल्ला बेग़ ख़ान 'ग़ालिब'.............19513

बेहतरीन शायर मिर्ज़ा असदउल्ला बेग़ ख़ान 'ग़ालिब'......................

पूछते हैं वो कि ‘ग़ालिब’ कौन है
कोई बतलाओ कि हम बतलाएं क्या !

ग़ालिब अथवा मिर्ज़ा असदउल्ला बेग़ ख़ान (27 दिसम्बर, 1797 ई. आगरा - 15 फ़रवरी, 1869 ई. दिल्ली) जिन्हें सारी दुनिया 'मिर्ज़ा ग़ालिब' के नाम से जानती है, उर्दू-फ़ारसी के प्रख्यात कवि रहे हैं। इनके दादा 'मिर्ज़ा क़ौक़न बेग ख़ाँ' समरकन्द से भारत आए थे। बाद में वे लाहौर में 'मुइनउल मुल्क' के यहाँ नौकर के रूप में कार्य करने लगे। मिर्ज़ा क़ौक़न बेग ख़ाँ के बड़े बेटे 'अब्दुल्ला बेग ख़ाँ से मिर्ज़ा ग़ालिब हुए। अब्दुल्ला बेग ख़ाँ, नवाब आसफ़उद्दौला की फ़ौज में शामिल हुए और फिर हैदराबाद से होते हुए अलवर के राजा 'बख़्तावर सिंह' के यहाँ लग गए। लेकिन जब मिर्ज़ा ग़ालिब महज 5 वर्ष के थे, तब एक लड़ाई में उनके पिता शहीद हो गए। मिर्ज़ा ग़ालिब को तब उनके चचा जान 'नसरुउल्ला बेग ख़ान' ने संभाला। पर ग़ालिब के बचपन में अभी और दुःख व तकलीफें शामिल होनी बाकी थीं। जब वे 9 साल के थे, तब चचा जान भी चल बसे। मिर्ज़ा ग़ालिब का सम्पूर्ण जीवन ही दु:खों से भरा हुआ था। आर्थिक तंगी ने कभी भी इनका पीछा नहीं छोड़ा था। क़र्ज़ में हमेशा घिरे रहे, लेकिन अपनी शानो-शौक़त में कभी कमी नहीं आने देते थे। इनके सात बच्चों में से एक भी जीवित नहीं रहा। जिस पेंशन के सहारे इन्हें व इनके घर को एक सहारा प्राप्त था, वह भी बन्द कर दी गई थी।

ग़ालिब का व्यक्तित्व

ग़ालिब का व्यक्तित्व बड़ा ही आकर्षक था। ईरानी चेहरा, गोरा-लम्बा क़द, सुडौल एकहरा बदन, ऊँची नाक, कपोल की हड्डी उभरी हुई, चौड़ा माथा, घनी उठी पलकों के बीच झाँकते दीर्घ नयन, संसार की कहानी सुनने को उत्सुक लम्बे कान, अपनी सुनाने को उत्सुक, मानों बोल ही पडेंगे। ऐसे ओठ अपनी चुप्पी में भी बोल पड़ने वाले, बुढ़ापे में भी फूटती देह की कान्ती जो इशारा करती है कि जवानी के सौंदर्य में न जाने क्या नशा रहा होगा। सुन्दर गौर वर्ण, समस्त ज़िन्दादिली के साथ जीवित, इसी दुनिया के आदमी, इंसान और इंसान के गुण-दोषों से लगाये-यह थे मिर्ज़ा वा मीरज़ा ग़ालिब।

वस्त्र विन्यास और भोजन

रईसज़ादा थे और जन्म भर अपने को वैसा ही समझते रहे। इसीलिए वस्त्र विन्यास का बड़ा ध्यान रखते थे। जब घर पर होते, प्राय: पाजामा और अंगरखा पहिनते थे। सिर पर कामदानी की हुई मलमल की गोल टोपी लगाते थे। जाड़ों में गर्म कपड़े का कलीदार पाजामा और मिर्ज़ई। बाहर जाते तो अक्सर चूड़ीदार या तंग मोहड़ी का पाजामा, कुर्ता, सदरी या चपकन और ऊपर क़ीमती लबादा होता था। पाँव में जूती और हाथ में मूठदार, लम्बी छड़ी। ज़्यादा ठण्ड होती तो एक छोटा शाल भी कंधे और पीठ पर डाल लेते थे। सिर पर लम्बी टोपी। कभी-कभी टोपी पर मुग़लई पगड़ी या पटका। रेशमी लुंगी के शौक़ीन थे। रंगों का बड़ा ध्यान रखते थे।
खाने-खिलाने के शौक़ीन, स्वादिष्ट भोजनों के प्रेमी थे। गर्मी-सर्दी हर मौसम में उठते ही सबसे पहले ठण्डाई पीते थे, जो बादाम को पीसकर मिश्री के शर्बत में घोली जाती थी। फिर पहर दिन चढ़े नाश्ता करते थे। बुढ़ापे में एक ही बार, दोपहर को खाना खाते; रात को कभी न खाते। खाने में गोश्त ज़रूर रहता था, शायद ही कभी नागा हुआ हो। गोश्त के ताज़ा, बेरेशा, पकने पर मुलायम और स्वादिष्ट रहने की शर्त; फिर मेवे भी उसमें ज़रूर पड़े हों शोरबा आधा सेर के लगभग। बकरी एवं दुम्बे का गोश्त अधिक पसंद था, भेंड़ का अच्छा नहीं लगता था। पक्षियों में मुर्ग, कबूतर और बटेर पसंद था। गोश्त और तरकारी में अपना बस चलते चने की दाल ज़रूर डलवाते थे।
चने की दाल, बेसन की कढ़ी और फुलकियाँ बहुत खाते थे। बुढ़ापे एवं बीमारी में जब मेदा ख़राब हो गया, तो रोटी-चावल दोनों छोड़ दिए और सेर भर गोश्त की गाढ़ी यख़नी और कभी-कभी 3-4 तले शमामी कबाब लेते थे। फलों में अंगूर और आम बहुत पसंद थे। आमों को तो बहुत ही ज़्यादा चाहते थे। मित्रों से उनके लिए फ़रमाइश करते रहते थे, और इसके बारे में अनेक लतीफ़े इनकी ज़िन्दगी से सम्बद्ध हैं। हुक़्क़ा पीते थे, पेचवान को ज़्यादा पसंद करते थे। पान नहीं खाते थे। शराब जन्म भर पीते रहे। पर बुढ़ापे में तन्दुरुस्ती ख़राब होने पर नाम को चन्द तोले शाम को पीते। बिना पिये नींद न आती थी। सदा विलायती शराब पीते थे। ओल्ड टाम और कासटेलन ज़्यादा पसंद थी। शराब की तेज़ी कम करने को आधे से ज़्यादा गुलाबजल मिलाते थे। पात्र को कपड़े से लपेटते और गर्मी के दिनों में कपड़े को बर्फ़ से तर कर देते। ख़ुद ही कहा है-
आसूदा बाद ख़ातिरे ग़ालिब कि ख़ूए औस्त
आमेख़्तन ब बादए साक़ी गुलाब रा।

शराब की चुस्की लेते और साथ-साथ धीमे तले नमकीन बादाम खाते। जब दुर्बल हुए तो इन्हें ख़ुद शराब पीने पर अनुताप होता था। पर आदत छूटती न थी। फिर भी मात्रा कम करने के लिए एक समय, एकान्त में दो या एक ख़ास दोस्तों की उपस्थिति में पीते थे। कहीं ज़्यादा न पी लें, इसीलिए संदूक़ में बोतलें रखते थे उसकी चाबी इनके वफ़ादार सेवक कल्लू दारोग़ा के पास रहती थी और उसे ताक़ीद कर रखा था कि रात को कभी नशे या सुरूर में मैं ज़्यादा पीना चाहूँ और माँगूँ तो मेरा कहना न मानना और
तलब करने पर भी कुंजी (चाबी) न देना। लोगों के पूछने पर भी कि यों नाम करने से क्या फ़ायदा, छोड़ ही न दें, ‘जौंक़’ का शेर पढ़ते थे-
छूटती नहीं है मुँह से यह काफ़िर लगी हुई।

शिष्टता एवं उदार व्यक्तित्व

मिर्ज़ा के विषय में पहली बात तो यह है कि वह अत्यन्त शिष्ट एवं मित्रपराण थे। जो कोई उनसे मिलने आता, उससे खुले दिल से मिलते थे। इसीलिए जो आदमी एक बार इनसे मिलता था, उसे सदा इनसे मिलने की इच्छा बनी रहती थी। मित्रों के प्रति अत्यन्त वफ़ादार थे। उनकी खुशी में खुशी, उनके दु:ख में दु:ख। मित्रों को देखकर बाग़-बाग़ हो जाते थे। उनके मित्रों का बहुत बड़ा दायरा था। उसमें हर जाति, धर्म और प्रान्त के लोग थे। मित्र को कष्ट में देखते तो इनका ह्रदय रो पड़ता था। उसका दु:ख दूर करने के लिए जो कुछ भी सम्भव होता था करते थे। स्वयं न कर पाते तो दूसरों से सिफ़ारिश करते। इनके पत्रों में मित्रों के प्रति सहानुभूति एवं चिन्ता के झरने बहुत हुए दिखाई देते हैं। मित्रों को कष्ट में देख ही नहीं सकते थे। उनका दिल कचोटने लगता था। ह्रदय में रस था, इसीलिए प्रेम छलक पड़ता था। मित्रों क्या शागिर्दों से भी बहुत प्रेम करते थे। इनको इस्लाह ही नहीं देते थे; संसाधनों का कारण भी लिखते थे। बच्चों पर जान देते थे। आमदनी कम थी। ख़ुद कष्ट में रहते थे, फिर भी पीड़ितों के प्रति बड़े उदार थे। कोई भिखारी इनके दरवाज़े से ख़ाली हाथ नहीं लौटता था। उनके मकान के आगे अन्धे, लंगड़े-लूले अक्सर पड़े रहते थे। मिर्ज़ा उनकी मदद करते रहते थे। एक बार ख़िलअत मिली। चपरासी इनाम लेने आए। घर में पैसे नहीं थे। चुपके से गए, ख़िलअत बेच आए और चपरासियों को उचित इनाम दिया।

आत्म-स्वाभिमान

इस उदार दृष्टि के बावजूद आत्माभिमानी थे- ‘मीर’ जैसे तो नहीं, जिन्होंने दुनिया की हर नामत अपने सम्मान के लिए ठुकराई, फिर भी अपनी इज़्ज़त-आबरू का बड़ा ख़्याल रखते थे। शहर के अनेक सम्भ्रान्त लोगों से परिचय था। लेकिन जो इनके घर पर न आता था, उसके यहाँ कभी नहीं जाते थे। कैसी ग़रीबी हो बाज़ार में बिना पालकी या हवादार के नहीं निकलते थे। कलकत्ता जाते हुए जब लखनऊ ठहरे थे, तो आग़ामीर से इसीलिए नहीं मिले कि उसने उठकर इनका स्वागत करने की शर्त मंज़ूर नहीं की थी। ग़ालिब के आत्म-सम्मान की हालत यह थी कि जब उन्हें दिल्ली कॉलेज में फ़ारसी भाषा के मुख्य अध्यापक का पद पेश किया गया तो अपनी दुरावस्था सुधारने के विचार से वे टामसन साहब (सेक्रेटरी, गवर्नमेंट ऑफ़ इण्डिया) के बुलावे पर उनके यहाँ पहुँचे, तो यह देखकर कि टामसन साहब उनके स्वागत के लिए बाहर नहीं आए, उन्होंने कहारों को पालकी वापस ले चलने को कह दिया ।

सर्व धर्मप्रिय व्यक्ति

वैसे वह शिया मुसलमान थे, पर मज़हब की भावनाओं में बहुत उदार और स्वतंत्र चेता थे। इनकी मृत्यु के बाद ही आगरा से प्रकाशित होने वाले पत्र ‘ज़ख़ीरा बालगोविन्द’ के मार्च, 1869 के अंक में इनकी मृत्यु पर जो सम्पादकीय लेख छपा था और जो शायद इनके सम्बन्ध में लिखा सबसे पुराना और पहला लेख है, उससे तो एक नई बात मालूम होती है कि यह बहुत पहले चुपचाप ‘फ़्रीमैसन’ हो गए थे और लोगों के बहुत पूछने पर भी उसकी गोपनीयता की अन्त तक रक्षा करते रहे। बहरहाल वह जो भी रहे हों, इतना तो तय है कि मज़हब की दासता उन्होंने कभी स्वीकार नहीं की। इनके मित्रों में हर जाति, धर्म और श्रेणी के लोग थे।

विनोदप्रिय व मदिरा प्रेमी

मिर्ज़ा ग़ालिब जीवन संघर्ष से भागते नहीं और न इनकी कविता में कहीं निराशा का नाम है। वह इस संघर्ष को जीवन का एक अंश तथा आवश्यक अंग समझते थे। मानव की उच्चता तथा मनुष्यत्व को सब कुछ मानकर उसके भावों तथा विचारों का वर्णन करने में वह अत्यन्त निपुण थे और यह वर्णनशैली ऐसे नए ढंग की है कि, इसे पढ़कर पाठक मुग्ध हो जाता है। ग़ालिब में जिस प्रकार शारीरिक सौंदर्य था, उसी प्रकार उनकी प्रकृति में विनोदप्रियता तथा वक्रता भी थी और ये सब विशेषताएँ उनकी कविता में यत्र-तत्र झलकती रहती हैं। वह मदिरा प्रेमी भी थे, इसलिये मदिरा के संबंध में इन्होंने जहाँ भाव प्रकट किए हैं, वे शेर ऐसे चुटीले तथा विनोदपूर्ण हैं कि, उनका जोड़ उर्दू कविता में अन्यत्र नहीं मिलता।

ख़ुद का घर न होना

ग़ालिब सदा किराये के मकानों में रहे, अपना मकान न बनवा सके। ऐसा मकान ज़्यादा पसंद करते थे, जिसमें बैठकख़ाना और अन्त:पुर अलग-अलग हों और उनके दरवाज़े भी अलग हों, जिससे यार-दोस्त बेझिझक आ-जा सकें। नौकर 4-4, 5-5 रखते थे। बुरे से बुरे दिनों में भी तीन से कम न रहे। यात्रा में भी 2-3 नौकर साथ रहते थे। इनके पुराने नौकरों में मदारी या मदार ख़ाँ, कल्लु और कल्यान बड़े वफ़ादार रहे। कल्लु तो अन्त तक साथ ही रहा। वह चौदह वर्ष की आयु में मिर्ज़ा के पास आया था और उनके परिवार का ही हो गया था। वह पाँव की आहट से पहिचान लेता था कि लड़कियाँ हैं, बहुएँ हैं या बुढ़िया हैं।

काव्यशैली में परिवर्तन

मिर्ज़ा ग़ालिब ने फ़ारसी भाषा में कविता करना प्रारंभ किया था और इसी फ़ारसी कविता पर ही इन्हें सदा अभिमान रहा। परंतु यह देव की कृपा है कि, इनकी प्रसिद्धि, सम्मान तथा सर्वप्रियता का आधार इनका छोटा-सा उर्दू का ‘दीवान-ए- ग़ालिब’ ही है। इन्होंने जब उर्दू में कविता करना आरंभ किया, उसमें फ़ारसी शब्दावली तथा योजनाएँ इतनी भरी रहती थीं कि, वह अत्यंत क्लिष्ट हो जाती थी। इनके भावों के विशेष उलझे होने से इनके शेर पहेली बन जाते थे। अपने पूर्ववर्तियों से भिन्न एक नया मार्ग निकालने की धुन में यह नित्य नए प्रयोग कर रहे थे। किंतु इन्होंने शीघ्र ही समय की आवश्यकता को समझा और स्वयं ही अपनी काव्यशैली में परिवर्तन कर डाला तथा पहले की बहुत-सी कविताएँ नष्ट कर क्रमश: नई कविता में ऐसी सरलता ला दी कि, वह सबके समझने योग्य हो गई।

नए गद्य के प्रवर्तक

मिर्ज़ा ग़ालिब ने केवल कविता में ही नही, गद्यलेखन के लिये भी एक नया मार्ग निकाला था, जिस पर वर्तमान उर्दू गद्य की नींव रखी गई। सच तो यह है कि, ग़ालिब को नए गद्य का प्रवर्तक कहना चाहिए। इनके दो पत्र-संग्रह, ‘उर्दु-ए-हिन्दी’ तथा ‘उर्दु-ए-मुअल्ला’ ऐसे ग्रंथ हैं कि, इनका उपयोग किए बिना आज कोई उर्दू गद्य लिखने का साहस नहीं कर सकता। इन पत्रों के द्वारा इन्होंने सरल उर्दू लिखने का ढंग निकाला और उसे फ़ारसी अरबी की क्लिष्ट शब्दावली तथा शैली से स्वतंत्र किया। इन पत्रों में तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक विवरणों का अच्छा चित्र हैं। ग़ालिब की विनोदप्रियता भी इनमें दिखलाई पड़ती है। इनकी भाषा इतनी सरल, सुंदर तथा आकर्षक है कि, वैसी भाषा कोई उर्दू लेखक अब तक नहीं लिख सका। ग़ालिब की शैली इसलिये भी विशेष प्रिय है कि, उसमें अच्छाइयाँ भी हैं और कच्चाइयाँ भी, तथा पूर्णता और त्रुटियाँ भी हैं। यह पूर्णरूप से मनुष्य हैं और इसकी छाप इनके गद्य पद्य दोनों पर है।

बेहतरीन शायर

मिर्ज़ा असदउल्ला बेग़ ख़ान 'ग़ालिब' का स्थान उर्दू के चोटी के शायर के रूप में सदैव अक्षुण्ण रहेगा। उन्होंने उर्दू साहित्य को एक सुदृढ़ आधार प्रदान किया है। उर्दू और फ़ारसी के बेहतरीन शायर के रूप में उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली तथा अरब एवं अन्य राष्ट्रों में भी वे अत्यन्त लोकप्रिय हुए। ग़ालिब की शायरी में एक तड़प, एक चाहत और एक आशिक़ाना अंदाज़ पाया जाता है। जो सहज ही पाठक के मन को छू लेता है।
ग़ालिब ने अपनी रचनाओं में सरल शब्दों का प्रयोग किया है। उर्दू गद्य-लेखन की नींव रखने के कारण इन्हें वर्तमान उर्दू गद्य का जन्मदाता भी कहा जाता है। इनकी अन्य रचनाएँ 'लतायफे गैबी', 'दुरपशे कावेयानी', 'नामाए ग़ालिब', 'मेह्नीम' आदि गद्य में हैं। फ़ारसी के कुलियात में फ़ारसी कविताओं का संग्रह हैं। दस्तंब में इन्होंने 1857 ई. के बलवे का आँखों देखा विवरण फ़ारसी गद्य में लिखा हैं। ग़ालिब ने निम्न रचनाएँ भी की हैं-
'उर्दू-ए-हिन्दी'
'उर्दू-ए-मुअल्ला'
'नाम-ए-ग़ालिब'
'लतायफे गैबी'
'दुवपशे कावेयानी' आदि।
इनकी रचनाओं में देश की तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक स्थिति का वर्णन हुआ है।

दीवान-ए-ग़ालिब
उनकी ख़ूबसूरत शायरी का संग्रह 'दीवान-ए-ग़ालिब' के रूप में 10 भागों में प्रकाशित हुआ है। जिसका अनेक स्वदेशी तथा विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है।

अंतिम समय ::

स्वास्थ्य का निरन्तर गिरना

मिर्ज़ा 'ग़ालिब' का ज़िन्दगी भर कर्ज़दारों से पिण्ड नहीं छूट सका। इनके सात बच्चे भी हुए थे, लेकिन जितने भी हुए सब मर गए। 'आरिफ़' (गोद लिया हुआ बेटा) को बेटे की तरह की पाला, वह भी मर गया। पारिवारिक जीवन कभी सुखी एवं प्रेममय नहीं रहा। मानसिक संतुलन की कमी से ज़माने की शिकायत हमेशा रही। इसका दु:ख ही बना रहा कि समाज ने कभी हमारी योग्यता और प्रतिभा की सच्ची क़द्रदानी न की। फिर शराब जो किशोरावस्था में मुँह लगी थी, वह कभी नहीं छूटी। ग़दर के ज़माने में अर्थ-कष्ट, उसके बाद पेंशन की बन्दी। जब इनसे कुछ फुर्सत मिली तो ‘क़ातअ बुरहान’ के हंगामे ने इनके दिल में ऐसी उत्तेजना पैदा की कि बेचैन रखा। इन लगातार मुसीबतों से इनका स्वास्थ्य गिरता ही गया। खाना-पीना बहुत कम हो गया। बहरे हो गए। दृष्टि-शक्ति भी बहुत कम हो गई। क़ब्ज़ की शिकायत पहले से ही थी। मई 1848 में क़ोलज का आक्रमण पहली बार हुआ और बीच-बीच में बराबर आता रहा। 1861 में इतने दर्बल थे कि नवाब रामपुर मुहम्मद यूसुफ़ ख़ाँ ने अपने मझले पुत्र हैदरअली ख़ाँ का निकाह किया और उसमें इन्हें निमंत्रित किया। पर बीमारी एवं दुर्बलता के कारण वहाँ न जा सके।

चर्मरोग से कष्ट

दिन पर दिन स्वास्थ्य ख़राब होता जा रहा था। एक न एक रोग लगे रहते थे। जीवन के उत्तर काल में ख़ून भी ख़राब हो गया। इसके कारण प्राय: चर्मरोग होते रहते थे। इस चर्मरोग से उन्हें बड़ी तकलीफ़ उठानी पड़ी। एक फोड़ा बैठता या पकता कि दूसरा तैयार हो जाता। वर्षों तक यह सिलसिला चलता रहा। इनके पत्रों को पढ़ने से समय की इनकी तकलीफ़ों का कुछ अंदाज़ किया जा सकता है। 3 मई, 1863 को एक पत्र में लिखते हैं कि-
"छठा महीना है कि सीधे हाथ में एक फुंसी ने फोड़े की सूरत पैदा की। फोड़ा पककर फूटा और फूटकर एक ज़ख़्म और ज़ख़्म एक 'ग़ार' (गड्डा, गर्त) बन गया। हिन्दुस्तानी 'जर्राहों' (शल्य चिकित्सक) का इलाज रहा। बिगड़ता गया। दो महीने से काले डाक्टर का इलाज है। सलाइयाँ दौड़ रही हैं; उस्तरे से गोश्त कट रहा है। बीस दिन से इफ़ाक़ा (लाभ) की सूरत नज़र आती है।"
नवम्बर, 1863 में क़ाज़ी अब्दुलजमील को एक ख़त में लिखते हैं कि-
"जितना ख़ून बदन में था, बेमुवालग़ा आधा उसमें से पीप होकर निकल गया।"
फोड़ों से मुक्ति मिली तो 1863 में फ़त्क़ की शिकायत हुई। इन शारीरिक व्याधियों में पारिवारिक सौख्य एवं दाम्पत्य स्नेह के अभाव ने ज़िन्दगी को स्वादहीन कर दिया था। जीने की इच्छा नहीं रह गई थी। मृत्यु की आकांक्षा करने लगे थे। जून, 1863 के एक पत्र में लिखते हैं कि-
"सन 1277 हिजरी में मेरा न मरना सिर्फ़ तकज़ीब के वास्ते था। हर रोज़ मर्गे नौ[87] का मज़ा चखता हूँ। रूह मेरी अब जिस्म में इस तरह घबराती है, जिस तरह तायर[88] क़फ़स[89] में। कोई शग़ल, कोई इख़्तिलात, कोई जल्सा, कोई मजमा पसंद नहीं। किताब से नफ़रत, शेर से नफ़रत, जिस्म से नफ़रत, रूह से नफ़रत। जो कुछ लिखा है बेमुबालग़ा और बयाने वाक़अ है।"

मृत्यु की आकांक्षा और करुणाजनक पत्र

मानसिक उलझनों, शारीरिक कष्टों और आर्थिक चिन्ताओं के कारण जीवन के अन्तिम वर्षों में यह प्राय: मृत्यु की आकांक्षा किया करते थे। हर साल अपनी मृत्यु तिथि निकालते। पर विनोद वृत्ति अन्त तक बनी रही। एक बार जब मृत्यु तिथि का ज़िक्र अपने शिष्य से किया तो उसने कहा, ‘इंशा अल्ला, यह तिथि भी ग़लत साबित होगी।’ इस पर मिर्ज़ा बोले, ‘देखो साहब! तुम ऐसी काल फ़ाल मुँह से न निकालो। अगर यह तिथि ग़लत साबित हुई तो मैं सिर फोड़कर मर जाऊँगा।’
कभी-कभी यह सोचकर और दुखी हो जाते थे कि उनके बाद उनके आश्रितों का क्या होगा। ऐसे समय दिल को समझाते थे कि बीवी के सम्बन्धी उसे भूखों मरने न देंगे। नवाब अमीनउद्दीन ख़ाँ, लोहारू नरेश को एक पत्र में लिखा कि-
"मेरी ज़ौजा तुम्हारी बहन, मेरे बच्चे तुम्हारे बच्चे हैं। ख़ुद जो मेरी हक़ीकी भतीजी है, उसकी औलाद भी तुम्हारी औलाद है। न तुम्हारे वास्ते बल्कि इन बेकसों के वास्ते तुम्हारा दुआगो हूँ और तुम्हारी सलामती चाहता हूँ। तमन्ना यह है और इंशा अल्ला ऐसा ही होगा कि तुम जीते रहो और मैं तुम दोनों (अमीनउद्दीन व ज़ियाउद्दीन) के सामने मर जाऊँ, ताकि अगर इस क़ाफ़ले को रोटी न दोगे तो चने दोगे। अगर चने भी न दोगे और बात न पूछोगे तो मेरी बला से। मैं तो मुआफ़िक़ अपने तसव्वुर के इन ग़मज़दों के ग़म में न उलझूँगा।"

अन्तकाल

मिर्ज़ा 'ग़ालिब' को मृत्यु के कई दिन पहले से बेहोशी के दोरे आने लगे थे। कई-कई घंटों बाद कुछ देर के लिए होश आता; फिर बेहोश हो जाते। देहावसान से एक रोज़ पहले की दो घटनाएँ स्मरणीय हैं। लम्बी बेहोशी के बाद कुछ होश आया था। ‘हाली’ गए तो पहचाना। नवाब अलाउद्दीन ख़ाँ ने लोहारू से हाल पुछवाया था। उनको जवाब लिखवाया, ‘मेरा हाल मुझसे क्या पूछते हो। एकाध रोज़ में हमसायों से पूछना।’ इसी रोज़ कुछ खाने को माँगा। खाना आया तो नौकर से कहा कि मीरज़ा जीवन-बेग (मिर्ज़ा बाक़रअली ख़ाँ की सबसे बड़ी लड़की) को बुलाओ। यह प्राय: उन्हीं के पास खेला करती थी, पर उस समय अन्दर चली गई थी। कल्लु मुलाज़िम बुलाने अन्त:पुर में गया तो वह सो रही थी। उसकी माँ बुग्गा बेगम ने कहा, ‘सो रही है, यूँ ही जगती है, भेजती हूँ।’ कल्लू ने जाकर यही बात कह दी। इस पर बोले, ‘बहुत अच्छा।’ जब वह आयेगी, तब हम खाना खायेंगे। पर उसके बाद ही तकिये पर सिर रखकर बेहोश हो गए। हकीम महमूद ख़ाँ और हकीम अहसन उल्ला ख़ाँ को ख़बर दी गई। उन्होंने आकर जाँच की और बतलाया, ‘दिमाग़ पर फ़ालिज गिरा है।’ बहुत यत्न किया पर सब बेकार हुआ। फिर उन्हें होश न आया और उसी हालत में अगले दिन, 15 फ़रवरी, 1869 ई., दोपहर ढले उनका दम टूट गया। एक ऐसी प्रतिभा का अन्त हो गया, जिसने इस देश में फ़ारसी काव्य को उच्चता प्रदान की और उर्दू गद्य-पद्य को परम्परा की श्रृंखलाओं से मुक्त कर एक नये साँचे में ढाला।

अन्तिम क्रिया

मृत्यु के बाद इनके मित्रों में इस बात को लेकर मतभेद हुआ कि शिया या सुन्नी, किस विधि से इनका मृतक संस्कार हो। ग़ालिब शिया थे, इसमें किसी को सन्देह की गुंजाइश न थी, पर नवाब ज़ियाउद्दीन और महमूद ख़ाँ ने सुन्नी विधि से ही सब क्रिया-कर्म कराया और जिस लोहारू ख़ानदान ने 1847 ई. में समाचार पत्रों में छपवाया था कि ग़ालिब से हमारा दूर का सम्बन्ध है, उसी ख़ानदान के नवाब ज़ियाउद्दीन ने सम्पूर्ण मृतक संस्कार करवाया और उनके शव को गौरव के साथ अपने वंश के क़ब्रिस्तान (जो चौसठ खम्भा के पास है) में अपने चचा के पास जगह दी।
इनकी मृत्यु पर बहुतों ने मर्सिये लिखे, जिनमें हाली, मजरूह और सालिक के मर्सिये मशहूर हैं। उनके समाधि स्तम्भ पर मजरूह का निम्नलिखित क़िता खुदा हुआ है-

या हय्यि या क़य्यूम
रश्के उर्फ़ी व फ़ख्रे तालिब मर्द
असदउल्ला ख़ाने ग़ालिब मर्द
कल में ग़मों अन्दोह में बाख़ातिरे महजूँ
था तुर्बते उस्ताद पै बैठा हुआ ग़मनाक
देखा तो मुझे फ़िक्र में तारीख़ की ‘मजरूह’
हातिफ़ ने कहा-‘गंजे मआनी है तहेख़ाक’।

मिर्ज़ा की मृत्यु का उनकी पत्नी तथा अन्य आश्रितों पर क्या प्रभाव पड़ा होगा, इसकी कल्पना मात्र की जा सकती है। मिर्ज़ा की ज़िन्दगी ज़्यादातर दु:खों में बीती। पारिवारिक सुख के लिए ये सदा ही तरसते रहे। सात बच्चे हुए-पुत्र और पुत्रियाँ। पर कोई भी पन्द्रह महीने से ज़्यादा नहीं जी पाया। पत्नी से भी वह हार्दिक सौख्य न मिला, जो जीवन की दम घोटने वाली घाटियों के बीच चलते हुए मनुष्यों को बल प्रदान करता है।
-->

No comments:

Post a Comment