Thursday, 31 January 2013

The Last Day of Mahatma Gandhi....13013

गांधीजी के जीवन का अंतिम दिन......


30 जनवरी 1948, शुक्रवाररात के साढे तीन बजे थे। सुबह होने में वक्त था अभी रात की कालिमा गहराई हुई ही थी पर समयनिष्ठ गांधी जी नींद से जाग उठे। कौन जानता था कि यह उनकी अंतिम सुबह होगी। 
देश का माहौल काफी तनावपूर्ण था। भयंकर दंगों से सारा देश सहमा हुआ था। लोगों को शांत कराने में व्यस्त बापू ने 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के समारोह में भी शिरकत नहीं की थी। उस समय वह कलकत्ता में थे। वह देश की राजधानी में 9 सितम्बर 1947 पर ही आ पाए थे और अब बिरला हाउस के निचले तल में रह कर लोगों के दिलों से आपसी नफरत दूर करने में जी-जान से जुटे थे। अभी दस दिन पहले ही शाम की प्रार्थना में उन पर जान लेवा हमला हो चुका था। फिर भी वह देश की एकता और अखंडता के लिए जूझ रहे थे।
नित्य क्रम से निवृत हो सब उतनी ठंड में भी रोज की तरह 3.45 पर बरामदे में सुबह की प्रार्थना के लिए इकट्ठा हो गये। प्रार्थना के बाद "मनु" और "आभा" उन्हें कमरे में ले गयीं। बाहर अभी भी अंधेरा छाया हुआ था।  पिछले उपवास की कमजोरी के बावजूद गांधीजी अपने काम में जुट गये।  पत्रों को पढने और उनका जवाब  देने के बाद उन्होंने कांग्रेस के  नये संविधान में संशोधन करे,   जिसे आज उनकी अंतिम वसीयत माना जाता है।  काम करते-करते उन्होंने 4.45 पर संतरे का  रस लिया  और अत्यधिक थकान के कारण थोडी देर के लिए नींद के आगोश में चले गये।  पर सिर्फ आधे घंटे बाद उठ कर फिर काम में जुट गये।
सुबह सात बजे से उनसे मिलने लोगों का आना शुरु हो गया। बीच-बीच में वे अपने सचिव प्यारेलाल को भी निर्देश देते जाते थे तथा समाचार पत्र पर भी नजर दौडा लेते थे। उन्हें नोआखाली के दंगों के साथ-साथ मद्रास की भी चिंता थी जहां खाने की भयंकर किल्लत हो रही थी। मनु के बार-बार टोकने पर वे बोले पता नहीं मैं कल रहूं ना रहूं पर काम अधुरा नहीं रहना चाहिए।  
नहाने के बाद वे कुछ अच्छा महसूस करने लगे, उपवास के बाद वजन भी कुछ बढा था। 9.30 बज रहे थे यह उनका नाश्ते का समय था। खाने के दौरान ही प्यारेलाल से सलाह मशविरा भी चल रहा था। करीब 10.30 बजे वे फिर सो गये।

तनाव का साथी चरखा 
12.30 बजे फिर लोगों से मिलना जुलना शुरु हुआ, जिसमें मुस्लिम लीग के भी लोग थे जो देश की हालत पर बात करने आए थे। समय बीत रहा था, तरह-तरह के लोगों का आना लगा हुआ था। देश से विदेश से, राज्यों से, कोई इंटरव्यू के लिए आ रहा था तो कोई अपना दुखडा लेकर, नेता अपने भविष्य की चिंता लिए आ रहे थे,  कोई मार्गदर्शन के लिए तो कोई सिर्फ दर्शन कर निहाल होने। सबसे बात करते-करते 4 बज चुके थे। बहुत दिनों बाद गांधीजी खुद बिना सहारे के स्नानागार तक गये। ये देख सब को थोडी तसल्ली हुई। इसी बीच सरदार पटेल भी आ पहुंचे। पटेल और नेहरु के कुछ आपसी तनावों पर उन्होंने अपनी राय दी। वे थोडे उदग्विन थे। तभी काठियावाड से आए दो व्यक्तियों ने मिलने का समय मांगा तो पटेल के सामने ही उन्होंने कहा कि जिंदा रहा तो प्रार्थना के बाद उनसे मिलूंगा। ये दूसरी या तीसरी बार आज उन्होंने अपनी मौत की बात की थी। फिर उन्होंने कुछ संतरे, गाजर का जूस तहा थोड़ा बकरी का दूध खाने में लिया। यही उनका अंतिम भोजन था।  फिर वे चर्खा कातने बैठ गये।

आज अलसुबह पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के 6 नम्बर के रिटायरिंग रूम मे गोडसे और उसके दो साथी नारायन आप्टे और विष्णु करकरे ने मिल कर योजना पर अंतिम दृष्टि डाली थी।
दोपहर बाद वे लोग कमरे से बाहर निकल कर बिरला मंदिर गये वहां गोडसे को छोड दोनों ने भगवान से प्रार्थना की। 4.30 चार बजे गोडसे ने नयी खरीदी हुई खाकी जैकेट पहनी और तांगे पे सवार हो बिरला हाउस पहुंचा। करकरे और आप्टे दूसरा तांगा कर वहां गये।  
 पांच बजने के पहले तीनों बिरला हाउस पहुंच चुके थे। 20 जनवरी को हुए हमले के बाद नेहरु और पटेल के जोर देने पर सिर्फ उनकी खुशी के लिए गांधी जी ने अपनी सुरक्षा के लिए 30 पुलिस वालों को वहां तैनात होने की अनुमति अनमने मन से दे दी थी। पर इस शर्त के साथ कि वहां आने वालों की किसी तरह की जामा-तलाशी नहीं ली जाएगी। इसी कारण गोडसे की पार्टी को अंदर आने में कोई दिक्कत नहीं हुई।
गांधीजी और सरदार पटेल 
पांच बज चुके थे। गांधी जी अपना हर काम समयानुसार ही करते थे,  देर उन्हें जरा भी पसंद नहीं थी खास कर प्रार्थना के समय। आभा और मनु परेशान थीं, गांधी जी पटेल के साथ जरूरी मसले पर मंत्रणा कर रहे थे। उस दिन उनकी जेब-घड़ी उनके पास नहीं थी। जब 5.10 हो गये तो मनु ने घडी की ओर इशारा किया। गांधी जी ने उसी समय वार्ता खत्म की,  उठे,  चप्पल पहनी,  मनु और आभा का सहारा लिया और बाहर आ गये। रोज की तरह सहायक बृजकृष्ण कुछ और लोगों के साथ उनके पीछे थे। पर सदा उनके आगे चलने वाली सुशीला नायर और सहायक गुरुबचन सिंह आज साथ नहीं थे। सादे कपडों में उनके साथ चलने वाले पुलिस कर्मचारी ए. एन. भाटिया की ड्युटी आज कहीं और लगी हुई थी।     
प्रार्थना स्थल की ओर जाते हुए 
गांधी जी अपनी 200 गज की अंतिम यात्रा पर निकले,  देर हो जाने के कारण उन्होंने लान के बीच से हो कर अपने कदम प्रार्थना स्थल की ओर बढाए। दिन भर की तरह-तरह की समस्याओं के बावजूद वे अच्छे मूड में लग रहे थे। आभा मनु से बात करते-करते वे प्रार्थना स्थल तक पहुंच ही रहे थे कि गुरुबचन सिंह भी इनसे आ मिला पर वह उनके सामने नहीं चला। वहां देश दुनिया के सैंकडों लोग इकट्ठा थे सब की आंखें बापू पर टिकी हुईं थीं। गांधीजी हाथ जोडे अभिवादन स्वीकारते आगे बढ रहे थे, लोग उन्हें आगे जाने का रास्ता दे रहे थे। उनके रास्ता बदलने के कारण गोडसे ने भी अपना निर्धारित प्लान बदल लिया। बीच लान में चलते हुए वे ठीक गोडसे के सामने आ गए। उसने अपने हाथ जोडे जिसमें
बिरला हॉउस, जहाँ गोली मारी गयी  
 छोटी इटालियन बेरेट्टा पिस्तौल दबी हुई थी। उन्हें सामने पा  वह बोला "नमस्ते गांधीजी",  गांधीजी ने भी उसे हाथ जोड कर जवाब दिया। गोडसे कुछ झुका,  मनु ने सोचा वह गांधी जी के पांव छूना चाहता है, उसने कहा भाई बापू को पहले ही देर हो चुकी है उन्हें परेशान ना करो। जाने दो। तभी गोडसे ने मनु को धक्का दिया और गांधीजी पर तीन  गोलियां दाग दीं, जो उनके पेट और सीने में जा धसीं।  गांधी जी धीरे-धीरे जमीन पर गिरते चले गये,  उनके मुंह से हे  राम, हे राम....  का उच्चारण हो रहा था। हाथ अभी भी जुडे हुए थे,  चेहरा पीला पडता जा रहा था, शाल पूरी तरह खून से लाल हो चुका था। कुछ क्षणों में ही उनकी आत्मा परमात्मा से जा मिली। इस समय घडी 5.17 बजा रही थी।
चिर निद्रा 

पता नहीं उन्हें अपनी मौत का एहसास हो चुका था तभी तो उन्होंने मनु से कहा था कि यदि कोई मुझे गोली मारे तो मरते वक्त मेरे मुंह पर कराह नहीं भगवान का नाम हो।
  
राज घाट 
जिंदगी भर यात्रा कर,  सच्चाई का पक्ष लेते हुए,  अहिंसक तरीके से अपनी बातों को मनवाते हुए देश भर में शांति की अलख जगाने वाले,  अपने लिए रत्ती भर की चाह ना रखने वाले एक आम इंसान की महात्मा बनने की कहानी कैसे खौफनाक तरीके से खत्म हुई। शायद प्रभू को यही मंजूर था।
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सहायता,  स्टीफन मर्फी, गांधीजी के सचिव व सहायक, की 30 जनवरी 47 की रिपोर्ट से साभार  
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