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Thursday, 24 January 2013

महान शास्त्रीय गायक और भारत रत्न पंडित भीमसेन जोशी........................................8613

महान शास्त्रीय गायक और भारत रत्न पंडित भीमसेन जोशी.................

भारत रत्न सम्मानित पंडित भीमसेन जोशी (जन्म-4 फ़रवरी, 1922, गड़ग, कर्नाटक - मृत्यु- 24 जनवरी, 2011 पुणे, महाराष्ट्र) किराना घराने के महत्त्वपूर्ण शास्त्रीय गायक हैं। उन्होंने 19 साल की उम्र से गायन शुरू किया था और वह सात दशकों तक शास्त्रीय गायन करते रहे। भीमसेन जोशी ने कर्नाटक को गौरवान्वित किया है। भारतीय संगीत के क्षेत्र में इससे पहले एम. एस. सुब्बालक्ष्मी, उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ान, पंडित रविशंकर और लता मंगेशकर को 'भारत रत्न' से सम्मानित किया जा चुका है। उनकी योग्यता का आधार उनकी महान संगीत साधना है। देश विदेश में लोकप्रिय हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के महान गायकों में उनकी गिनती होती है। अपने एकल गायन से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में नए युग का सूत्रपात करने वाले पंडित भीमसेन जोशी कला और संस्कृति की दुनिया के छठे व्यक्ति हैं जिन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्‍न से सम्मानित किया गया है। किराना घराने के भीमसेन गुरुराज जोशी ने गायकी के अपने विभिन्‍न तरीकों से एक अद्भुत गायन की रचना की है।
देश का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान मिलने के बारे में जब उनके पुत्र श्रीनिवास जोशी ने उन्हें बताया तो भीमसेन जोशी ने पुणे में कहा–
"मैं उन सभी हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायकों की तरफ से इस सम्मान को स्वीकार करता हूं जिन्होंने अपनी ज़िंदगी संगीत को समर्पित कर दी।"

जन्म

कर्नाटक के गड़ग में 14 फ़रवरी 1922 को उनका जन्म हुआ। उनके पिता 'गुरुराज जोशी' स्थानीय हाई स्कूल के हेडमास्टर और कन्नड़ , अंग्रेज़ी और संस्कृत के विद्वान थे। उनके चाचा जी.बी जोशी चर्चित नाटककार थे तथा उन्होंने धारवाड़ की मनोहर ग्रन्थमाला को प्रोत्साहित किया था। उनके दादा प्रसिद्ध कीर्तनकार थे। पाठशाला के रास्ते में 'भूषण ग्रामोफ़ोन शॉप' थी। ग्राहकों को सुनाए जा रहे गानों को सुनने के लिए किशोर भीमसेन खड़े हो जाते थे। एक दिन उन्होंने 'अब्दुल करीम ख़ान' का गाया राग वसंत में फगवा 'बृज देखन को' और 'पिया बिना नहि आवत चैन'- ठुमरी सुनी। कुछ ही दिनों पश्चात उन्होंने कुंडगोल के समारोह में सवाई गंधर्व को सुना। मात्र ग्यारह वर्षीय भीमसेन के मन में उन्हें गुरु बनाने की इच्छा हुई। पुत्र की संगीत में रुचि होने का पता चलने पर गुरुराज ने 'अगसरा चनप्पा' को भीमसेन का संगीत शिक्षक नियुक्त किया। एक बार पंचाक्षरी गवई ने भीमसेन को गाते हुए सुनकर चनप्पा से कहा, ‘इस लड़के को सिखाना तुम्हारे बस की बात नहीं , इसे किसी बेहतर गुरु के पास भेजो।’

गुरु की खोज

एक दिन भीमसेन घर से भाग लिए। उस घटना को याद कर वह विनोद में कहते हैं - 'ऐसा करके उन्होंने परिवार की परम्परा ही निभाई थी।' मंजिल का पता नहीं था। रेल में बिना टिकट बैठ गये और बीजापुर तक का सफर किया। टी.टी. को राग भैरव में 'जागो मोहन प्यारे' और 'कौन-कौन गुन गावे' सुना कर मुग्ध कर दिया। साथ के यात्रियों पर भी उनके गायन का जादू चल गया। सहयात्रियों ने रास्ते में खिलाया- पिलाया। अंतत: वह बीजापुर पहुँच गये। गलियों में गा गा कर और लोगों के घरों के बाहर रात गुज़ार कर दो हफ़्ते बीत गये। एक संगीत प्रेमी ने सलाह दी, ‘संगीत सीखना हो तो ग्वालियर जाओ।’
उन्हें पता नहीं था ग्वालियर कहाँ है। वह एक अन्य ट्रेन पर सवार हो गये। इस बार पुणे पहुँच गये। उन्हें नहीं पता था कि पुणे उनका स्थायी निवास स्थान बनेगा। रेल गाड़ियाँ बदलते और रेलकर्मियों से बचते-बचाते भीमसेन आख़िर ग्वालियर पहुँच गये। वहाँ के 'माधव संगीत विद्यालय' में प्रवेश ले लिया। किंतु भीमसेन को किसी कक्षा की नहीं, एक गुरु की ज़रूरत थी। भीमसेन तीन साल तक गुरु की खोज में भटकते रहे। फिर उन्हें 'करवल्लभ संगीत सम्मेलन' में विनायकराव पटवर्धन मिले। विनायकराव को आश्चर्य हुआ कि सवाई गन्धर्व उसके घर के बहुत पास रहते हैं। सवाई गन्धर्व ने भीमसेन को सुनकर कहा, "मैं इसे सिखाऊँगा यदि यह अब तक का सीखा हुआ सब भुला सके।” डेढ़ साल तक उन्होंने भीमसेन को कुछ नहीं सिखाया। एक बार भीमसेन के पिता उनकी प्रगति का हाल जानने आए, उन्हें आश्चर्य हुआ कि वह अपने गुरु के घर के लिए पानी से भरे बड़े बड़े घड़े ढो रहे हैं। भीमसेन ने अपने पिता से कहा-"मैं यहाँ खुश हूँ। आप चिन्ता न करें।"

पहला संगीत प्रदर्शन

भीमसेन ने सबसे पहले 19 साल की उम्र में अपना पहला संगीत प्रदर्शन किया। उनका पहला एल्बम 20 वर्ष की आयु में निकला जिसमें कन्‍नड और हिन्दी में कुछ धार्मिक गीत थे। अपने गुरु की याद में उन्होंने वार्षिक 'सवाई गंधर्व संगीत समारोह' प्रारम्भ किया। पुणे में यह समारोह हर साल दिसंबर में होता है। भीमसेन के पुत्र भी शास्त्रीय गायक एवं संगीतकार हैं।

भारत रत्न

कर्नाटक में जन्मे भीमसेन जोशी अंतिम 50 से अधिक वर्षों से पुणे में रहे। कला और संस्कृति के क्षेत्र से संबंधित उनसे पहले सत्यजीत रे, कर्नाटक संगीत की कोकिला एम.एस.सुब्बालक्ष्मी, पंडित रविशंकर, लता मंगेशकर और उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ को भारत रत्न मिल चुका है। भीमसेन दूसरे शास्त्रीय गायक हैं जिन्हें भारत रत्न मिला है।

भीमसेन जोशी को 1972 में पद्म श्री से सम्मानित किया जा चुका है।
भारत सरकार द्वारा कला के क्षेत्र में सन् 1985 में पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
पंडित जोशी को सन् 1999 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया जा चुका है।
भीमसेन जोशी को 4 नवम्बर, 2008 को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान, भारत रत्‍न पुरस्कार दिया गया।
उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है।
इनसे पहले 1998 में सुब्बालक्ष्मी को शास्त्रीय गायन के लिए यह पुरस्कार मिला था। 1954 में भारत रत्न की शुरुआत होने के बाद से कुल 41 प्रमुख हस्तियों को यह पुरस्कार मिल चुका है।

अविस्मरणीय संगीत

पंडित भीमसेन जोशी को मिले सुर मेरा तुम्हारा के लिए याद किया जाता है जिसमें उनके साथ बालमुरली कृष्णा और लता मंगेशकर ने जुगलबंदी की है। जोशी को पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्म श्री सहित कई पुरस्कार मिल चुके हैं।

किराना घराना

विभिन्‍न घरानों के गुणों को मिलाकर वह अद्भुत गायन प्रस्तुत करते हैं। पंडित जोशी किराना घराने के गायक हैं। उन्हें उनके ख़्याल शैली और भजन गायन के विशेष रूप से जाना जाता है।

निधन

देश के महान शास्त्रीय गायक और भारत रत्न से सम्मानित पंडित भीमसेन जोशी जी का सोमवार सुबह पुणे के एक अस्पातल में निधन हो गया। वह 89 वर्ष के थे। शास्त्रीय संगीत को नई ऊंचाइयों पर ले जाने वाले पं. जोशी जी की आवाज़ अब हमेशा के लिए खामोश हो गई है। जोशी जी पिछले दो साल से बीमार थे।
पुण्यतिथि पर :: महान शास्त्रीय गायक और भारत रत्न पंडित भीमसेन जोशी 

भारत रत्न सम्मानित पंडित भीमसेन जोशी (जन्म-4 फ़रवरी, 1922, गड़ग, कर्नाटक - मृत्यु- 24 जनवरी, 2011 पुणे, महाराष्ट्र) किराना घराने के महत्त्वपूर्ण शास्त्रीय गायक हैं। उन्होंने 19 साल की उम्र से गायन शुरू किया था और वह सात दशकों तक शास्त्रीय गायन करते रहे। भीमसेन जोशी ने कर्नाटक को गौरवान्वित किया है। भारतीय संगीत के क्षेत्र में इससे पहले एम. एस. सुब्बालक्ष्मी, उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ान, पंडित रविशंकर और लता मंगेशकर को 'भारत रत्न' से सम्मानित किया जा चुका है। उनकी योग्यता का आधार उनकी महान संगीत साधना है। देश विदेश में लोकप्रिय हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के महान गायकों में उनकी गिनती होती है। अपने एकल गायन से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में नए युग का सूत्रपात करने वाले पंडित भीमसेन जोशी कला और संस्कृति की दुनिया के छठे व्यक्ति हैं जिन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्‍न से सम्मानित किया गया है। किराना घराने के भीमसेन गुरुराज जोशी ने गायकी के अपने विभिन्‍न तरीकों से एक अद्भुत गायन की रचना की है।
देश का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान मिलने के बारे में जब उनके पुत्र श्रीनिवास जोशी ने उन्हें बताया तो भीमसेन जोशी ने पुणे में कहा–
"मैं उन सभी हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायकों की तरफ से इस सम्मान को स्वीकार करता हूं जिन्होंने अपनी ज़िंदगी संगीत को समर्पित कर दी।"

जन्म

कर्नाटक के गड़ग में 14 फ़रवरी 1922 को उनका जन्म हुआ। उनके पिता 'गुरुराज जोशी' स्थानीय हाई स्कूल के हेडमास्टर और कन्नड़ , अंग्रेज़ी और संस्कृत के विद्वान थे। उनके चाचा जी.बी जोशी चर्चित नाटककार थे तथा उन्होंने धारवाड़ की मनोहर ग्रन्थमाला को प्रोत्साहित किया था। उनके दादा प्रसिद्ध कीर्तनकार थे। पाठशाला के रास्ते में 'भूषण ग्रामोफ़ोन शॉप' थी। ग्राहकों को सुनाए जा रहे गानों को सुनने के लिए किशोर भीमसेन खड़े हो जाते थे। एक दिन उन्होंने 'अब्दुल करीम ख़ान' का गाया राग वसंत में फगवा 'बृज देखन को' और 'पिया बिना नहि आवत चैन'- ठुमरी सुनी। कुछ ही दिनों पश्चात उन्होंने कुंडगोल के समारोह में सवाई गंधर्व को सुना। मात्र ग्यारह वर्षीय भीमसेन के मन में उन्हें गुरु बनाने की इच्छा हुई। पुत्र की संगीत में रुचि होने का पता चलने पर गुरुराज ने 'अगसरा चनप्पा' को भीमसेन का संगीत शिक्षक नियुक्त किया। एक बार पंचाक्षरी गवई ने भीमसेन को गाते हुए सुनकर चनप्पा से कहा, ‘इस लड़के को सिखाना तुम्हारे बस की बात नहीं , इसे किसी बेहतर गुरु के पास भेजो।’

गुरु की खोज

एक दिन भीमसेन घर से भाग लिए। उस घटना को याद कर वह विनोद में कहते हैं - 'ऐसा करके उन्होंने परिवार की परम्परा ही निभाई थी।' मंजिल का पता नहीं था। रेल में बिना टिकट बैठ गये और बीजापुर तक का सफर किया। टी.टी. को राग भैरव में 'जागो मोहन प्यारे' और 'कौन-कौन गुन गावे' सुना कर मुग्ध कर दिया। साथ के यात्रियों पर भी उनके गायन का जादू चल गया। सहयात्रियों ने रास्ते में खिलाया- पिलाया। अंतत: वह बीजापुर पहुँच गये। गलियों में गा गा कर और लोगों के घरों के बाहर रात गुज़ार कर दो हफ़्ते बीत गये। एक संगीत प्रेमी ने सलाह दी, ‘संगीत सीखना हो तो ग्वालियर जाओ।’
उन्हें पता नहीं था ग्वालियर कहाँ है। वह एक अन्य ट्रेन पर सवार हो गये। इस बार पुणे पहुँच गये। उन्हें नहीं पता था कि पुणे उनका स्थायी निवास स्थान बनेगा। रेल गाड़ियाँ बदलते और रेलकर्मियों से बचते-बचाते भीमसेन आख़िर ग्वालियर पहुँच गये। वहाँ के 'माधव संगीत विद्यालय' में प्रवेश ले लिया। किंतु भीमसेन को किसी कक्षा की नहीं, एक गुरु की ज़रूरत थी। भीमसेन तीन साल तक गुरु की खोज में भटकते रहे। फिर उन्हें 'करवल्लभ संगीत सम्मेलन' में विनायकराव पटवर्धन मिले। विनायकराव को आश्चर्य हुआ कि सवाई गन्धर्व उसके घर के बहुत पास रहते हैं। सवाई गन्धर्व ने भीमसेन को सुनकर कहा, "मैं इसे सिखाऊँगा यदि यह अब तक का सीखा हुआ सब भुला सके।” डेढ़ साल तक उन्होंने भीमसेन को कुछ नहीं सिखाया। एक बार भीमसेन के पिता उनकी प्रगति का हाल जानने आए, उन्हें आश्चर्य हुआ कि वह अपने गुरु के घर के लिए पानी से भरे बड़े बड़े घड़े ढो रहे हैं। भीमसेन ने अपने पिता से कहा-"मैं यहाँ खुश हूँ। आप चिन्ता न करें।"

पहला संगीत प्रदर्शन

भीमसेन ने सबसे पहले 19 साल की उम्र में अपना पहला संगीत प्रदर्शन किया। उनका पहला एल्बम 20 वर्ष की आयु में निकला जिसमें कन्‍नड और हिन्दी में कुछ धार्मिक गीत थे। अपने गुरु की याद में उन्होंने वार्षिक 'सवाई गंधर्व संगीत समारोह' प्रारम्भ किया। पुणे में यह समारोह हर साल दिसंबर में होता है। भीमसेन के पुत्र भी शास्त्रीय गायक एवं संगीतकार हैं।

भारत रत्न

कर्नाटक में जन्मे भीमसेन जोशी अंतिम 50 से अधिक वर्षों से पुणे में रहे। कला और संस्कृति के क्षेत्र से संबंधित उनसे पहले सत्यजीत रे, कर्नाटक संगीत की कोकिला एम.एस.सुब्बालक्ष्मी, पंडित रविशंकर, लता मंगेशकर और उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ को भारत रत्न मिल चुका है। भीमसेन दूसरे शास्त्रीय गायक हैं जिन्हें भारत रत्न मिला है।

भीमसेन जोशी को 1972 में पद्म श्री से सम्मानित किया जा चुका है।
भारत सरकार द्वारा कला के क्षेत्र में सन् 1985 में पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
पंडित जोशी को सन् 1999 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया जा चुका है।
भीमसेन जोशी को 4 नवम्बर, 2008 को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान, भारत रत्‍न पुरस्कार दिया गया।
उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है।
इनसे पहले 1998 में सुब्बालक्ष्मी को शास्त्रीय गायन के लिए यह पुरस्कार मिला था। 1954 में भारत रत्न की शुरुआत होने के बाद से कुल 41 प्रमुख हस्तियों को यह पुरस्कार मिल चुका है।

अविस्मरणीय संगीत

पंडित भीमसेन जोशी को मिले सुर मेरा तुम्हारा के लिए याद किया जाता है जिसमें उनके साथ बालमुरली कृष्णा और लता मंगेशकर ने जुगलबंदी की है। जोशी को पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्म श्री सहित कई पुरस्कार मिल चुके हैं।

किराना घराना

विभिन्‍न घरानों के गुणों को मिलाकर वह अद्भुत गायन प्रस्तुत करते हैं। पंडित जोशी किराना घराने के गायक हैं। उन्हें उनके ख़्याल शैली और भजन गायन के विशेष रूप से जाना जाता है।

निधन

देश के महान शास्त्रीय गायक और भारत रत्न से सम्मानित पंडित भीमसेन जोशी जी का सोमवार सुबह पुणे के एक अस्पातल में निधन हो गया। वह 89 वर्ष के थे। शास्त्रीय संगीत को नई ऊंचाइयों पर ले जाने वाले पं. जोशी जी की आवाज़ अब हमेशा के लिए खामोश हो गई है। जोशी जी पिछले दो साल से बीमार थे।
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