Monday, 28 January 2013

26 Ekadashi in Hindu Dharm........11113




हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशियाँ होती हैं। जब अधिकमास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। यहाँ 26 एकादशियों के नामों के वर्णन के साथ ही उनकी जानकारी भी हैं।

सभी उपवासों में एकाद्शी व्रत श्रेष्ठतम कहा गया है. एकाद्शी व्रत की महिमा कुछ इस प्रकार की है, जैसे सितारों से झिलमिलाती रात में पूर्णिमा के चांद की होती है. इस व्रत को रखते वाले व्यक्ति को अपने चित, इंद्रियों, आहार और व्यवहार पर संयम रखना होता है. एकाद्शी व्रत का उपवास व्यक्ति को अर्थ-काम से ऊपर उठकर मोक्ष और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है.

एकादशी - यथानाम-तथाफल
EKADASHI - RESULT, SO AS THE NAME

प्रत्येक वर्ष में बारह माह होते है. और एक माह में दो एकादशी होती है. अमावस्या से ग्यारहवीं तिथि, एकाद्शी तिथि, शुक्ल पक्ष की एकाद्शी कहलाती है. इसी प्रकार पूर्णिमा से ग्यारहवीं तिथि कृ्ष्ण पक्ष की एकाद्शी कहलाती है. इस प्रकार हर माह में दो एकाद्शी होती है. जिस वर्ष में अधिक मास होता है. उस साल दो एकाद्शी बढने के कारण 26 एकाद्शी एक साल में आती है. यह व्रत प्राचीन समय से यथावत चला आ रहा है. इस व्रत का आधार पौराणिक, वैज्ञानिक और संतुलित जीवन है.


एकाद्शी व्रत के फल
RESULT OF EKADASHI VRAT

एकाद्शी का व्रत जो जन पूर्ण नियम, श्रद्धा व विश्वास के साथ रखता है, उसे पुन्य, धर्म, मोक्ष की प्राप्ति होती है. इस उपवास के विषय में यह मान्यता है कि इस उपवास के फलस्वरुप मिलने वाले फल अश्वमेघ यज्ञ, कठिन तपस्या, तीर्थों में स्नान-दान आदि से मिलने वाले फलों से भी अधिक होते है. यह उपवास, उपवासक का मन निर्मल करता है, शरीर को स्वस्थ करता है, ह्रदय शुद्ध करता है, तथा सदमार्ग की ओर प्रेरित करता है. तथा उपवास के पुन्यों से उसके पूर्वज मोक्ष प्राप्त करते है.

एकाद्शी व्रत के नियम
LAW OF EKADASHI VRAT

व्रतों में एकादशी के व्रत को सबसे उच्च स्थान दिया गया है, इसलिये इस व्रत के नियम भी अन्य सभी व्रत- उपवास के नियमों से सबसे अधिक कठोर होते है. इस उपवास में तामसिक वस्तुओं का सेवन करना निषेध माना जाता है. वस्तुओं में मांस, मदिरा, प्याज व मसूर दाल है. दांम्पत्य जीवन में संयम से काम लेना चाहिए.

दातुन में नींबू, जामून या आम की टहनी को प्रयोग करना चाहिए. यहां तक की उपवास के दिन पेड का पत्ता भी नहीं तोडना चाहिए. सूक्ष्म से सूक्ष्म जीवों को भी हानि न हो, इस बात का ध्यान रखना चाहिए. झूठ बोलने और निंदा सुनना भी उपवास के पुन्यों में कमी करता है.

सभी एकादशियों के नाम व तिथियां इस प्रकार है. 


एकादशी का नाममासपक्ष 
  1. कामदा एकादशीचैत्रशुक्ल
  2. वरूथिनी एकादशीवैशाखकृष्ण
  3. मोहिनी एकादशीवैशाखशुक्ल
  4. अपरा एकादशीज्येष्ठकृष्ण
  5. निर्जला एकादशीज्येष्ठशुक्ल
  6. योगिनी एकादशीआषाढ़कृष्ण
  7. देवशयनी एकादशीआषाढ़शुक्ल
  8. कामिका एकादशीश्रावणकृष्ण
श्रावणशुक्ल
10. अजा एकादशीभाद्रपदकृष्ण
11. पद्मा एकादशीभाद्रपदशुक्ल
12. इंदिरा एकादशीआश्विनकृष्ण
13. पापांकुशा एकादशीआश्विनशुक्ल
14. रमा एकादशीकार्तिककृष्ण
15. देव प्रबोधिनी एकादशीकार्तिकशुक्ल
16. उत्पन्ना एकादशीमार्गशीर्षकृष्ण
17. मोक्षदा एकादशीमार्गशीर्षशुक्ल
18. सफला एकादशीपौषकृष्ण
19. पुत्रदा एकादशीपौषशुक्ल
20. षटतिला एकादशीमाघकृष्ण
21. जया एकादशीमाघशुक्ल
22. विजया एकादशीफाल्गुनकृष्ण
23. आमलकी एकादशीफाल्गुनशुक्ल
24. पापमोचिनी एकादशीचैत्रकृष्ण
25. पद्मिनी एकादशीअधिकमासशुक्ल
26. परमा एकादशीअधिकमासकृष्ण


Kamada Ekadashi Vrat Katha


1. कामदा एकादशी व्रत


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कामदा एकदशी व्रत चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की एकादशीको कामदा एकादशी के नाम से जाना जाता है.  कामदा एकादशी अपने नाम के अनुरुप सभी कामनाओं की पूर्ति करती है. इस व्रत को करने से सभी पापों का नाश होता है. इस एकादशी के फलों के विषय में कहा जाता है, कि यह एकादशी ठिक उसी प्रकार फल देती है, जिस प्रकार अग्नि लकडी को जला देती है. यह भी व्यक्ति के पापों को समाप्त कर देती है. कामदा एकादशी के पुन्य प्रभाव से पाप नष्ट होते है, और संतान की प्राप्ति होती है. इस व्रत को करने से परलोक में स्वर्ग की प्राप्ति होती है.  

कामदा एकादशी व्रत विधि | Kamada Ekadashi Vrat Vidhi 

चैत्र शुक्ल पक्ष कि एकादशी तिथि में इस व्रत को करने से पहले कि रात्रि अर्थात व्रत के पहले दिन दशमी को जौ, गेहूं और मूंग की दाल आदि का भोजन नहीं करना चाहिए(On the previous night of Kamada Ekadashi, i.e., the 10th date, things like Barley, Wheat and Moong Pulse should not be eaten.) भोजन में नमक का प्रयोग करने से भी बचना चाहिए. और दशमी तिथि में भूमि पर ही शयन करना चाहिए. इस व्रत की अवधि 24 घंटे की होती है. दशमी तिथि के दिन से ही व्रत के नियमों का पालन करना चाहिए.   
एकादशी व्रत करने के लिये व्यक्ति को प्रात: उठकर, शुद्ध मिट्टी से स्नान करना चाहिए. स्नान करने के लिये तिल और आंवले के लेप का प्रयोग भी किया जा सकता है. मिट्टी और तिल एक लेप से स्नान करने के बाद, भगवान श्री विष्णु जी की पूजा करनी चाहिए. सबसे पहले धान्य रख कर, धान्यों के ऊपर मिट्टी या तांबें का घडा रखा जाता है. घडे पर लाल वस्त्र बांध कर, धूप, दीप से पूजन करना चाहिए. और भगवान कि पूजा धूप, दीप, पुष्प की जाती है.   

कामदा एकादशी व्रत कथा | Kamada Ekadashi Vrat Katha in Hindi

पुराने समय में पुण्डरीक नामक राजा था, उसकी भोगिनीपुर नाम कि नगरी थी. उसके खजाने सोने चांदी से भरे रह्ते थे. वहां पर अनेक अप्सरा, गंधर्व आदि वास करते थें. उसी जगह ललिता और ललित नाम के स्त्री-पुरुष अत्यन्त वैभवशाली घर में निवास करते थें. उन दोनों का एक-दूसरे से बहुत अधिक प्रेम था. कुछ समय ही दूर रहने से दोनों व्याकुल हो जाते थें.   
एक समय राजा पुंडरिक गंधर्व सहित सभा में शोभायमान थे. उस जगह ललित गंधर्व भी उनके साथ गाना गा रहा था. उसकी प्रियतमा ललिता उस जगह पर नहीं थी. इससे ललित उसको याद करने लगा. ध्यान हटने से उसके गाने की लय टूट गई. यह देख कर राजा को क्रोध आ गया. ओर राजा पुंडरीक ने उसे श्राप दे दिया. मेरे सामने गाते हुए भी तू अपनी स्त्री का स्मरण कर रहा है. जा तू अभी से राक्षस हो जा, अपने कर्म के फल अब तू भोगेगा.
राजा पुण्डरीक के श्राप से वह ललित गंधर्व उसी समय विकराल राक्षस हो गया, उसका मुख भयानक हो गया. उसके नेत्र सूर्य, चन्द्र के समान लाल होने लगें. मुँह से अग्नि निकलने लगी. उसकी नाक पर्वत की कन्दरा के समान विशाल हो गई. और गर्दन पहाड के समान लगने लगी. उसके सिर के बाल पर्वत पर उगने वाले वृ्क्षों के समान दिखाई देने लगे़. उस की भुजायें, दो-दो योजन लम्बी हो गई. इस तरह उसका आठ योजन लम्बा शरीर हो गया. राक्षस हो जाने पर उसकों महान दु:ख मिलने लगा और अपने कर्म का फल वह भोगने लगा.    
अपने प्रियतम का जब ललिता ने यह हाल देख तो वह बहुत दु;खी हुई. अपने पति के उद्वार करने के लिये वह विचार करने लगी. एक दिन वह अपने पति के पीछे घूमते-घूमते विन्धाजल पर्वत पर चली गई. उसने उस जगह पर एक ऋषि का आश्रम देखा. वह शीघ्र ही उस ऋषि के सम्मुख गई. और ऋषि से विनती करने लगी.   
उसे देख कर ऋषि बोले की हे कन्या तुम कौन हो, और यहां किसलिये आई हों, ललिता बोली, हे मुनि, मैं गंधर्व कन्या ललिता हूं, मेरा पति राजा पुण्डरीक के श्राप से एक भयानक राक्षस हो गया है. इस कारण मैं बहुत दु:खी हूं. मेरे पति के उद्वार का कोई उपाय बताईये.  
इस पर ऋषि बोले की हे, गंधर्व कन्या शीघ्र ही चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी आने वाली है. उस एकादशी के व्रत का पालन करने से, तुम्हारे पति को इस श्राप से मुक्ति मिलेगी. मुनि की यह बात सुनकर, ललिता ने आनन्द पूर्वक उसका पालन किया. और द्वादशी के दिन ब्राह्मणों के सामने अपने व्रत का फल अपने पति को दे दिया, और भगवान से प्रार्थना करने लगी.
हे प्रभो, मैनें जो यह व्रत किया है, उसका फल मेरे पति को मिलें, जिससे वह इस श्राप से मुक्त हों. एकादशी का फल प्राप्त होते ही, उसका पति राक्षस योनि से छुट गया. और अपने पुराने रुप में वापस आ गया. इस प्रकार इस वर को करने से व्यक्ति के समस्त पाप नष्ट हो जाते है.

Varuthini Ekadashi


2. बरूथनी एकादशी

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वैशाख मास के कृ्ष्ण पक्ष की एकादशी बरुथनी एकादशी के नाम से जानी जाती है. यह व्रत सुख सौभाग्य का प्रतीक है. इस दिन जरुरतमंद को दान देने से करोडों वर्ष तक ध्यान मग्न होकर तपस्या करने तथा कन्यादान के भी फलों से बढकर बरूथनी एकादशी व्रत के फल कहे गये है.   
बरूथनी एकादशी करने वाले व्यक्ति को खासतौर पर उस दिन दातुन का प्रयोग करने, परनिंदा करने, क्रोध करने, और असत्य बोलने से बचना चाहिए. इसके अतिरिक्त इस व्रत में तेल युक्त भोजन भी नहीं किया जाता है. इसकी कथा सुनने से सौ ब्रह्मा हत्याओं का दोष नष्ट होता है. इस प्रकार यह व्रत बहुत ही फलदायक कहा गया है.  

बरूथनी एकादशी व्रत महत्व | Importance of Varuthini Ekadashi Vrat

बरूथनी एकादशी व्रत को करने से दु:खी व्यक्ति को सुख मिलते है. राजा के लिये स्वर्ग के मार्ग खुल जाते है. इस व्रत का फल सूर्य ग्रहण के समय दान करने से जो फल प्राप्त होता है, वही फल इस व्रत को करने से प्राप्त होता है. इस व्रत को करने से मनुष्य लोक और परलोग दोनों में सुख पाता है. और अंत समय में स्वर्ग जाता है. 
शास्त्रों में कहा गया है, कि इस व्रत को करने से व्यक्ति को हाथी के दान और भूमि के दान करने से अधिक शुभ फलों की प्राप्ति होती है. सभी दानों में सबसे उतम तिलों का दान कहा गया है. तिल दान से श्रेष्ठ स्वर्ण दान कहा गया है. और स्वर्ण दान से भी अधिक शुभ इस एकादशी का व्रत करने का उपरान्त जो फल प्राप्त होता है, वह कहा गया है.       

बरूथनी एकादशी व्रत विधि | Varuthini Ekadasi Vrat Vidhi

वैशाख मास के कृ्ष्ण पक्ष की बरूथनी एकादशी का व्रत करने के लिये, उपवासक को दशमी तिथि के दिन से ही एकादशी व्रत के नियमों का पालन करना चाहिए. व्रत-पालन में दशमी तिथि की रात्रि में ही सात्विक भोजन करना चाहिए. और भोजन में मासं-मूंग दाल और चने, जौ, गेहूं का प्रयोग नहीं करना चाहिए. इसके अतिरिक्त भोजन में नमक का प्रयोग भी नहीं होना चाहिए. 
तथा शयन के लिये भी भूमि का प्रयोग ही करना चाहिए.  भूमि शयन भी अगर श्री विष्णु की प्रतिमा के निकट हों तो और भी अधिक शुभ रहता है. इस व्रत की अवधि 24 घंटों से भी कुछ अधिक हो सकती है. यह व्रत दशमी तिथि की रात्रि के भोजन करने के बाद शुरु हो जाता है, और इस व्रत का समापन द्वादशी तिथि के दिन प्रात:काल में ब्राह्माणों को दान आदि करने के बाद ही समाप्त होता है.      
बरुथनी एकादशी व्रत करने के लिए व्यक्ति को प्रात: उठकर, नित्यक्रम क्रियाओं से मुक्त होने के बाद, स्नान आदि करने के बाद व्रत का संकल्प लेना होता है.   स्नान करने के लिये एकादशी व्रत में जिन वस्तुओं का पूजन किया जाता है, उन वस्तुओं से बने लेप से स्नान करना शुभ होता है.
इसमें आंवले का लेप, मिट्टी आदि और तिल का प्रयोग किया जा सकता है. प्रात: व्रत का संकल्प लेने के बाद  श्री विष्णु जी की पूजा की जाती है. पूजा करने के लिये धान्य का ढेर रखकर उस पर मिट्टी या तांबे का घडा रखा जाता है. घडे पर लाल रंग का वस्त्र बांधकर, उसपर भगवान श्री विष्णु जी की पूजा, धूप, दीप और पुष्प से की जाती है. 

बरूथनी एकादशी व्रत कथा | Varuthini Ekadashi Vrat Katha

प्राचीन समय में नर्मदा तट पर मान्धाता नामक राजा राय सुख भोग रहा था. राजकाज करते हुए भी वह अत्यन्त दानशील और तपस्वी था. एक दिन जब वह तपस्या कर रहा था. उसी समय एक जंगली भालू आकर उसका पैर चबाने लगा. थोडी देर बाद वह राजा को घसीट कर वन में ले गया. तब राजा ने घबडाकर, तपस्या धर्म के अनुकुल क्रोध न करके भगवान श्री विष्णु से प्रार्थना की. भक्त जनों की बाद शीघ्र सुनने वाले श्री विष्णु वहां प्रकट हुए़.
तथा भालू को चक्र से मार डाला. राजा का पैर भालू खा चुका था. इससे राजा बहुत ही शोकाकुल था. विष्णु जी ने उसको दु:खी देखकर कहा कि हे वत्स, मथुरा में जाकर तुम मेरी वाराह अवतार मूर्ति की पूजा बरूथनी एकादशी का व्रत करके करों, इसके प्रभाव से तुम पुन: अंगों वाले हो जाओगें. भालू ने तुम्हारा जो अंग काटा है, वह अंग भी ठिक हो जायेगा. यह तुम्हारा पैर पूर्वजन्म के अपराध के कारण हुआ है. राजा ने इस व्रत को पूरी श्रद्वा से किया और वह फिर से सुन्दर अंगों वाला हो गया.  

व्रत के दिन ध्यान रखने योग्य बातें | Things to remember for Varuthini Vrat

बरूथनी एकादशि का व्रत करने वाले को दशमी के दिन से निम्नलिखित दस वस्तुओं का त्याग करना चाहिए. 
1. कांसे के बर्तन में भोजन नहीं करना चाहिए.
2. मांस नहीं खाना चाहिए.
3. मसूर की दान नहीं खानी चाहिए.
4. चना नहीं खाना चाहिए.
5. करोदें नहीं खाने चाहिए.
6. शाक नहीं खाना चाहिए.
7. मधु नहीं खाना चाहिए.
8. दूसरे से मांग कर अन्न नहीं खाना चाहिए.
9. दूसरी बार भोजन नहीं करना चाहिए.
10. वैवाहिक जीवन में संयम से काम लेना चाहिए. 

Mohini Ekadasi Vrat


3. मोहिनी एकादशी

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वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी मोहिनी एकादशी कहलाती है. इस दिन भगवान पुरुषोतम राम की पूजा करने का विधि-विधान है. व्रत के दिन भगवान की प्रतिमा को स्नानादि से शुद्ध कर श्वेत वस्त्र पहनाये जाते है. वर्ष 2011 में 13 मई के दिन मोहिनी एकादशी का व्रत किया जायेगा. व्रत के दिन उच्चासन पर बैठकर धूप, दीप से आरती उतारते हुए, मीठे फलों से भोग लगाना चाहिए.  

मोहिनी एकादशी व्रत का महत्व | Importance of Mohini Ekadashi Vrat

मोहिनी एकादशी व्रत करने से व्यक्ति के सभी पाप और दु:ख नष्ट होते है.  वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि में जो व्रत होता है. वह मोहिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है. इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य़ मोह जाल से छूट जाता है. अत: इस व्रत को सभी दु:खी मनुष्यों को अवश्य करना चाहिए. मोहिनी एकादशी के व्रत के दिन इस व्रत की कथा अवश्य सुननी चाहिए.  

मोहिनी एकादशी व्रत विधि | Mohini Ekadashi Vrat Vidhi

मोहिनी एकादशी व्रत जिस व्यक्ति को करना हों, उस व्यक्ति को व्रत के एक दिन पूर्व ही अर्थात दशमी तिथिके दिन रात्रि का भोजन कांसे के बर्तन में नहीं करना चाहिए. दशमी तिथि में भी व्रत दिन रखे जाने वाले नियमों का पालन करना चाहिए.  जैसे इस रात्रि में एक बार भोजन करने के पश्चात दूबारा भोजन नहीं करना चाहिए. रात्रि के भोजन में भी प्याज और मांस आदि नहीं खाने चाहिएं. इसके अतिरिक्त जौ, गेहुं और चने आदि का भोजन भी सात्विक भोजन की श्रेणी में नहीं आता है.

एकादशी व्रत की अवधि लम्बी होने के कारण मानसिक रुप से तैयार रहना जरूरी है. इसके अलावा व्रत के एक दिन पूर्व से ही भूमि पर शयन करना प्रारम्भ कर देना चाहिए. तथा दशमी तिथि के दिन भी असत्य बोलने और किसी को दु:ख देने से बचना चाहिए. इस प्रकार व्रत के नियमों का पालन दशमी तिथि की रात्रि से ही करना आवश्यक है.   

व्रत के दिन एकादशी तिथि में उपवासक को प्रात:काल में सूर्योदय से पहले उठना चाहिए. और प्रात:काल में ही नित्यक्रियाएं कर, शुद्ध जल से स्नान करना चाहिए. स्नान के लिये किसी पवित्र नदी या सरोवर का जल मिलना श्रेष्ठ होता है. अगर यह संभव न हों तो घर में ही जल से स्नान कर लेना चाहिए. स्नान करने के लिये कुशा और तिल एक लेप का प्रयोग करना चाहिए. शास्त्रों के अनुसार यह माना जाता है, कि इन वस्तुओं का प्रयोग करने से व्यक्ति पूजा करने योग्य होता है.    

स्नान करने के बाद साफ -शुद्ध वस्त्र धारण करने चाहिए. और भगवान श्री विष्णु जी के साथ-साथ भगवान श्री राम की पूजा की जाती है. व्रत का संकल्प लेने के बाद ही इस व्रत को शुरु किया जाता है. संकल्प लेने के लिये इन दोनों देवों के समक्ष संकल्प लिया जाता है.   

देवों का पूजन करने के लिये कुम्भ स्थापना कर, उसके ऊपर लाल रंग का वस्त्र बांध कर पहले कुम्भ का पूजन किया जाता है, इसके बाद इसके ऊपर भगवान कि तस्वीर या प्रतिमा रखी जाती है. प्रतिमा रखने के बाद भगवान का धूप, दीप और फूलों से पूजन किया जाता है. तत्पश्चात व्रत की कथा सुनी जाती है.     

मोहिनी एकादशी व्रत कथा | Mohini Ekadashi Vrat Katha

सरस्वती नदी के तट पर भद्रावती नाम की एक नगरी थी. इस नगरी में घृ्त नाम का राजा रहता था. उसके राज्य में एक धनवान वैश्य रहता था. वह बडा धर्मात्मा और विष्णु का भक्त था. उसके पांच पुत्र थे. बडा पुत्र महापापी था, जुआ खेलना, मद्धपान करना और सभी बुरे कार्य करता था. उसके माता-पिता ने उसे कुछ धन देकर घर से निकाल दिया.

माता-पिता से उसे जो मिला था, वह शीघ्र ही समाप्त हो गया. इसके बाद जीवनयापन के लिए उसने चोरी आदि करनी शुरु कर दी. चोरी करते हुए, पकडा गया. दण्ड अवधि बीतने पर उसे नगरी से निकाल दिया गया. एक दिन उसके हाथ शिकार न लगा. भूखा प्यासा वह एक मुनि के आश्रम में गया. और हाथ जोडकर बोला, मैं आपकी शरण में हूँ, मुझे कोई उपाय बतायें, इससे मेरा उद्वार होगा.  

उसकी विनती सुनकर, मुनि ने कहा की तुम वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि के दिन व्रत करों. अनन्त जन्मों के पापों से तुम्हे मुक्ति मिलेगी. मुनि के कहे अनुसार उसने मोहिनी एकादशी व्रत किया. ओर पाप मुक्त होकर वह विष्णु लोक चला गया.   


Apara (Achala) Ekadashi


4. अपरा (अचला) एकादशी

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ज्येष्ठ मासके कृ्ष्ण पक्ष की एकादशी अपरा एकादशी या अचला एकादशी के नाम से जानी जाती है. इस व्रत को करने से ब्रह्माहत्या, परनिन्दा, भूत योनि आदि जैसे बुरे कर्मों से छुटकारा मिलता है. इसके करने से कीर्ति, पुन्य तथा धन में अभिवृ्द्धि होती है.   

अपरा (अचला) एकादशी के फल | Fruits of Apara (Achala) Ekadashi

अपरा एकादशी व्रत करने से व्यक्ति को अपार धन वृ्द्धि देती है. यह एकादशी पुण्यों को देने वाली और पापों को नष्ट करने वाली है. जो मनुष्य़ इस व्रत को करता है. उसकी इस लोक में प्रसिद्ध होती है. अपरा एकादशी के प्रभाव से ब्रह्मा हत्या जैसे पाप नष्ट होते है, झूठी गवाही, असत्य भाषण, झूठा वेद पढना, झूठा शास्त्र बनाना आदि सभी के पाप नष्ट होते है. 
जो फल तीनों पुष्करों में स्नान करने से या कार्तिक मास में स्नान करने से अथवा गंगाजी के तट पर पितरों को पिंड दान करने से मिलता है. वह फल अपरा एकाद्शी का व्रत करने से मिलता है. सिंह राशि के व्यक्तियोम को वृ्हस्पति वार के दिन गोमती में स्नान, करने से कुम्भ में श्री केदारनाथ जी के दर्शन करने से तथा बद्रिकाश्रम में रहने से तथा सूर्य-चन्द्र ग्रहण में कुरुक्षेत्र में स्नान करने से जो फल मिलता है. वही फ अपरा एकादशी का व्रत करने से प्राप्त होता है. 
इसके अतिरिक्त जो फल हाथी घोडे के दान, यज्ञ करने , स्वर्ण दान करने से जो फल मिलता है. वह फल अपरा एकादशी का व्रत करने से मिलता है. गौ व भूमि स्वर्ण के दान का फल भी इसके फल के बराबर होता है.  अपरा का व्रत पाप रुपी अन्धकार के लिये सूर्य के समान है. इसलिये जहां तक हो सके प्रत्येक व्यक्ति को इस व्रत को करने का प्रयास करना चाहिए. 

अपरा (अचला) एकाद्शी व्रत विधि | Achala (Apara) Ekadashi Vrat Vidhi

अपरा एकादशी व्रत करने की विधि अन्य एकादशी के व्रतों कि विधि के समान ही होती है. इस व्रत की अवधि 24 घंटों से अधिक होती है. इस व्रत का प्रारम्भ दशमी तिथि से ही किया जाता है. दशमी तिथि से ही भोजन और आचार-विचार में संयम रखना चाहिए. रात्रि में भूमि पर शयन कर, सात्विक विचार मन में लाने चाहिए.  तथा वैवाहिक जीवन में ब्रहाचार्य का पालन करना चाहिए.  
एकादशी तिथि में प्रात: काल में जल्द उठना चाहिए. अन्य क्रियाओं से निवृ्त होकर स्नान आदि कर, व्रत का संकल्प लेना चाहिए. और श्री विष्णु की पूजा करनी चाहिए. पूरे दिन व्रत कर सांय काल में फल आदि से भगवान को भोग लगा कर, श्री विष्णु जी की पूजा धूप, दीप और फूलों से करनी चाहिए. एकादशी व्रत में रात्रि में विष्णु जी का पाठ करते हुए जागरण किया जाता है.  

अचला (अपरा) एकादशी व्रत कथा | Achala (Apara) Ekdashi Vrat Katha in Hindi

एक बार की बात है, महिध्वज नामक एक धर्मात्मा राजा था. जिसके छोटा भाई बज्रध्वज बडा ही क्रूर, अधर्मी तथा अन्यायी था. वह अपने बडे भाई से बडा द्वेष रखता था. साथ ही वह स्वभाव से अवसरावादी था. एक रात्रि उसने अपने बडे भाई की हत्या कर दी. और देह को पीपल के पेड के नीचे गाड़ दिया. मृ्त्यु के उपरान्त वह पीपल के वृ्क्ष पर उत्पात करने लगा. अकस्मात एक दिन धौम्य नामक ऋषि उधर से गुजरा. उन्होने तपोबल से पीपल एक पेड से नीचे उतारा. और विधा का उपदेश दिया. और प्रेत्मात्मा से मुक्ति के लिये उसे अपरा एकादशी व्रत करने का मार्ग दिखाया. 

Nirjala Ekdashi Vrat Vidhi


5. निर्जला एकादशी

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ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी निर्जला एकादशी के नाम से जानी जाती है. इस एकादशी को भीमसेनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है. ऋषि वेदव्यास जी के अनुसार इस एकादशी को भीमसेन ने धारण किया था. इसी वजह से इस एकादशी का नाम भीमसेनी एकादशी पडा. शास्त्रों के अनुसार इस व्रत को करने से व्यक्ति को दीर्घायु तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है. इस एकादशी व्रत को निर्जल रखा जाता है. अर्थात इस व्रत में जल का सेवन नहीं करना चाहिए.    
इस एकादशी को करने से वर्ष की 24 एकादशियों के व्रत के समान फल मिलता है. यह व्रत करने के पश्चात द्वादशी तिथि में ब्रह्मा बेला में उठकर स्नान,दान तथा ब्राह्माण को भोजन कराना चाहिए. इस दिन "ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप करके गौदान, वस्त्रदान, छत्र, फल आदि दान करना चाहिए.  

निर्जला एकादशी व्रत फल | Fruits of Nirjala Ekadashi Vrat

निर्जला एकादशी व्रत के दिन अन्न का सेवन नहीं किया जाता है. मिथुन संक्रान्ति के मध्य ज्येष्ठ मास की शुक्लपक्ष की एकादशी को निर्जल व्रत किया जाता है. इस एकादशी व्रत में स्नान और आचमन में जल व्यर्थ नहीं करना चाहिए. आचमन करने के लिये कम से कम जल का प्रयोग करना चाहिए. शास्त्रों के अनुसार आचमन में अधिक जल का प्रयोग व्यक्ति के पापों में वृ्द्धि करता है. इसके अतिरिक्त इस एकादशी के दिन भोजन भी नहीं करना चाहिए. भोजन करने से व्रत के फल नष्ट हो जाते है. 
सूर्योदय से लेकर सूर्योस्त तक मनुष्य़ जलपान न करें, तो उससे 24 एकादशियों के व्रत करने के समान फल प्राप्त होते है. इसके अतिरिक्त द्वादशी के दिन सूर्योदय से पहले ही उठना चाहिए. इसके पश्चात भूखे ब्राह्माण को भोजन कराना चाहीए.  इसके बाद ही भोजन करना चाहिए.    
इस एकादशी का व्रत करना सभी तीर्थों में स्नान करने के समान है. निर्जला एकादशी का व्रत करने से मनुष्य सभी पापोम से मुक्ति पाता है. जो मनुष्य़ निर्जला एकादशी का व्रत करता है. उनको मृ्त्यु के समय मानसिक और शारीरिक कष्ट नही होता है. यह एकादशी पांडव एकादशी के नाम से भी जानी जाती है. इस व्रत को करने के बाद जो व्यक्ति स्नान, तप और दान करता है, उसे करोडों गायों को दान करने के समान फल प्राप्त होता है. 

निर्जला एकादशी व्रत विधि  | Nirjala Ekadashi Vrat (Fast) Vidhi 

निर्जला एकादशी का व्रत करने के लिये दशमी तिथि से ही व्रत के नियमों का पालन करना चाहिए. इस एकादशी में निर्जल व्रत करना चाहिए. और दिन में "ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का उच्चारण करना चाहिए. इस दिन गौ दान करने का भी विशेष विधि-विधान है. इस दिन व्रत करने के अतिरिक्त स्नान, तप आदि कार्य करना भी शुभ रहता है. 
जो मनुष्य़ इस व्रत को करता है.  इस व्रत में सबसे पहले श्री विष्णु जी की पूजा करनी चाहिए. इस दिन ब्राह्माणों को दक्षिणा, मिष्ठान आदि देना चाहिए. व्रत के दिन इसकी कथा अवश्य सुननी चाहिए. तथा व्रत की रात्रि में जागरण करना चाहिए.  

निर्जला एकादशी व्रत कथा | Nirjala Ekadasi Vrat Katha in Hindi

एक समय की बात है, भीमसेन ने व्यास जी से कहा की हे भगवान, युधिष्ठर, अर्जुन, नकुल, सहदेव, कुन्ती तथा द्रौपदी सभी एकादशी के दिन व्रत करते थे. मगर मैं, कहता हूँ कि मैं भूख बर्दाश्त नहीं कर सकता. मैं दान देकर वासुदेव भगवान की अर्चना करके प्रसन्न कर सकता हूं. मैं बिना काया कलेश की ही फल चाहता हूं
इस पर वेद व्याद जी बोले, हे भीमसेन, अगर तुम स्वर्गलोक जाना चाहते हो, तो दोनों एकादशियों का व्रत बिना भोजन ग्रहण किये करों. ज्येष्ठ मास की एकादशी का निर्जल व्रत करना विशेष शुभ कहा गया है. इस व्रत में आचमन में जल ग्रहण कर सकते है. अन्नाहार करने से व्रत खंडित हो जाता है. व्यास जी की आज्ञा अनुसार भीमसेन ने यह व्रत किया और वे पाप मुक्त हो गये.  

Yogini Ekadashi Vrat Katha




6. योगिनी एकादशी

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योगिनी एकादशी व्रत आषाढ मास के कृ्ष्ण पक्ष कीएकादशी को किया जाता है(Yogni Ekadashi Vrat is observed on Ekadashi of Krishna Paksha, Ashad Masa).  इस दिन व्रत करके भगवान नारायण की मूर्ति को स्नान कराकर भोग लगाते है. इसके बाद पुष्प, धूप, दीप से आरती उतारनी चाहिए. गरीब ब्राह्माणों को दान देना कल्याणकारी रहता है. इस एकादशी के दिन पीपल के पेड की पूजा करने से सभी पाप नष्ट होते है. और उपवासक को अंत में स्वर्ग लोक की प्राप्ति होती है.

योगिनी एकादशी व्रत फल | Fruits of  Yogini Ekadashi Vrat (Fast)

आषाढ मास के कृ्ष्ण पक्ष की एकादशी योगिनी एकादशी कहलाती है. इस व्रत को करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते है(This fast frees the person from all his sins). और इस लोक में तथा परलोक में व्यक्ति को मुक्ति प्राप्त होती है. इस एकादशी का महत्व तीनों लोकों में प्रसिद्ध है.योगिनी एकादशी व्रत करने से पहले की रात्रि में ही व्रत एक नियम शुरु हो जाते है. दशमी तिथि की रात्रि में ही व्यक्ति को जौं, गेहूं और मूंग की दाल जैसे तामसिक प्रकृ्ति के भोजन नहीं ग्रहण करने चाहिए.
इसके अतिरिक्त व्रत के दिन क्योकि नमक युक्त भोजन नहीं किया जाता है. इसलिये दशमी तिथि की रात्रि में नमक का सेवन नहीं करना चाहिए. व्रत दशमी तिथि कि रात्रि से शुरु होकर द्वादशी तिथि के प्रात:काल में दान कार्यो के बाद समाप्त होता है.
एकादशी तिथि के दिन प्रात: स्नान आदि कार्यो के बाद, व्रत का संकल्प लिया जाता है. स्नान करने के लिये मिट्टी का प्रयोग करना शुभ रहता है. इसके अतिरिक्त स्नान के लिये तिल के लेप का प्रयोग भी किया जा सकता है. स्नान करने के बाद कुम्भ स्थापना की जाती है, कुम्भ के ऊपर श्री विष्णु जी कि प्रतिमा रख कर पूजा की जाती है. और धूप, दीप से पूजन किया जाता है. व्रत की रात्रि में जागरण करना चाहिए.

योगिनी एकाद्शी व्रत कथा | Yogini Ekadashi Vrat Katha in Hindi

अलकापुरी नाम की नगरी में एक कुबेर नाम का राजा राज्य करता था. वह शिव जी का परम भक्त था. पूजा में वह फूलों का प्रयोग करता था. और उसकी पूजा के लिये हेममाली फूल लाता है. हेममाली की विशालाक्षी नाम की उसकी सुन्दर स्त्री थी. एक दिन वह मानसरोवर से पुष्प आने के बाद पूजा कार्य में न लग कर, अपनी स्त्री के साथ रमण करने लगा. जब राजा कुबेर को उसकी राह देखते -देखते दोपहर हो गई. तो उसने क्रोधपूर्वक अपने सेवकों को आज्ञा दी. 
"तुम जाकर हेममाली का पता लगाओं", कि वह अभी फूल लेकर क्यों नहीं आया है? जब यक्षों ने उसका पता लगा लिया, तो वह कुबेर के पास जाकर कहने लगे, हे राजन, वह माली अभी तक अपनी स्त्री के साथ रमण कर रहा है. यज्ञों की बात सुन्कर कुबेर ने हेममाली को बुलाने की आज्ञा दी. हेममाली राजा कुबेर के सम्मुख जाकर डर से कांपता हुआ उपस्थित हुआ.
तुमने समय पर पुष्प न ला कर, मेरे परम पूजनीय देव भगवान शिव का अपमान किया है. मैं तुझे श्राप देता हूं, कि तू स्त्री का वियोग भोगेगा. और मृ्त्यु लोग में जाकर कोढी हो जायेगा. कुबेर के श्राप से वह उसी क्षण स्वर्ग से पृ्थ्वी लोक पर आ गिरा. और कोढी हो गया. उसकी स्त्री भी उसी समय उससे बिछुड गई. मृ्त्युलोक में आकर उसने महा दु;ख भोगे.
परन्तु शिव जी की भक्ति के प्रभाव से उनकी बुद्धि मलीन न हुइ और पिछले जन्म के कर्मों का स्मरण करते हुए. वह हिमालय पर्वत की तरफ चल दिया. वहां पर चलते -चलते उसे एक ऋषि मिले. ऋषि के आश्रम में पहुंच गया. वे ऋषि बहुत तपशाली थे. उस समय वे दूसरे ब्रह्मा के समान प्रतीत हो रहे थें. हेममाली वहां गया और उनको प्रणाम करके उनके चरणों में गिर पडा.
उसे देख कर ऋषि बोले के तुमने क्या बुरा कार्य किया है, जो तुम्हारी आज यह दशा है. इस पर हेममाली ने अपनी सारी व्यथा ऋषि को सुना दी. यह सब सुनकर ऋषि ने कहा की तुमने मेरे सम्मुख सत्य कहें है, इसलिये मैं तुम्हारे उद्वार में तुम्हारी सहायता करूंगा. तुम आषाढ मास के कृ्ष्ण पक्ष की योगिनी नामक एकादशी का विधि-पूर्वक व्रत करों. तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जायेगें. इस पर हेममाली बहुत प्रसन्न हुआ. और मुनि के वचनों के अनुसार योगिनी एकाद्शी का व्रत किया. इसके प्रभाव से वह फिर से अपने पुराने रुप में वापस आ गया. और अपनी स्त्री के साथ प्रसन्न पूर्वक रहने लगा. 
योगिनी व्रत की कथा श्रवण का फल अट्ठासी सहस्त्र ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर है. इसके व्रत से समस्त पाप दूर होते है.

Devshayani Ekadashi Katha




7. देवशयनी एकादशी

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आषाढ़ शुक्ल एकादशी को देवशयनी एकादशी कहते हैं. पुराणों में ऎसा उल्लेख है, कि इस दिन से भगवान श्री विष्णु चार मास की अवधि तक पाताल लोक में निवास करते है. कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी से श्री विष्णु उस लोक के लिये गमन करते है. आषाढ मास से कार्तिक मास के मध्य के समय को चातुर्मास कहते है. इन चार माहों में भगवान श्री विष्णु क्षीर सागर की अनंत शय्या पर शयन करते है. इसलिये इन माह अवधियों में कोई भी धार्मिक कार्य नहीं किया जाता है.
इस अवधि में कृ्षि और विवाहादि सभी शुभ कार्यो करने बन्द कर दिये जाते है. इस काल को भगवान श्री विष्णु का निद्राकाल माना जाता है. इन दिनों में तपस्वी एक स्थान पर रहकर ही तप करते है. धार्मिक यात्राओं में भी केवल ब्रज यात्रा की जा सकती है. ब्रज के विषय में यह मान्यता है, कि इन चार मासों में सभी देव एकत्रित होकर तीर्थ ब्रज में निवास करते है. बेवतीपुराण में भी इस एकादशी का वर्णन किया गया है. यह एकादशी उपवासक की सभी कामनाएं पूरी करती है. एक एकादशी को "प्रबोधनी" (Prabodhni Ekadashi) के नाम से भी जाना जाता है.

देवशयनी एकादशी व्रत विधि | Devshayani Ekadashi Vrat Vidhi (Procedure)

देवशयनी एकादशी व्रत को करने के लिये व्यक्ति को इस व्रत की तैयारी दशमी तिथि की रात्रि से ही करनी होती है. दशमी तिथि की रात्रि के भोजन में किसी भी प्रकार का तामसिक प्रवृ्ति का भोजन नहीं होना चाहिए. भोजन में नमक का प्रयोग करने से व्रत के शुभ फलों में कमी होती है. और व्यक्ति को भूमि पर शयन करना चाहिए. और जौ, मांस, गेहूं तथा मूंग की दान का सेवन करने से बचना चाहिए. यह व्रत दशमी तिथि से शुरु होकर द्वादशी तिथि के प्रात:काल तक चलता है. दशमी तिथि और एकाद्शी तिथि दोनों ही तिथियों में सत्य बोलना और दूसरों को दु:ख या अहित होने वाले शब्दों का प्रयोग करने से बचना चाहिए. 
इसके अतिरिक्त शास्त्रों में व्रत के जो सामान्य नियम बताये गए है, उनका सख्ती से पालन करना चाहिए. एकाद्शी तिथि में व्रत करने के लिये सुबह जल्दी उठना चाहिए. नित्यक्रियाओं को करने के बाद, स्नान करना चाहिए. एकादशी तिथि का स्नान अगर किसी तीर्थ स्थान या पवित्र नदी में किया जाता है, तो वह विशेष रुप से शुभ रहता है. किसी कारण वश अगर यह संभव न हो, तो उपवासक इस दिन घर में ही स्नान कर सकता है. स्नान करने के लिये भी मिट्टी, तिल और कुशा का प्रयोग करना चाहिए.
स्नान कार्य करने के बाद भगवान श्री विष्णु जी का पूजन करना चाहिए. पूजन करने के लिए धान्य के ऊपर कुम्भ रख कर, कुम्भ को लाल रंग के वस्त्र से बांधना चाहिए. इसके बाद कुम्भ की पूजा करनी चाहिए. जिसे कुम्भ स्थापना के नाम से जाना जाता है. कुम्भ के ऊपर भगवान की प्रतिमा या तस्वीर रख कर पूजा करनी चाहिए. ये सभी क्रियाएं करने के बाद धूप, दीप और पुष्प से पूजा करनी चाहीए.

देवशयनी एकादशी व्रत कथा | Devshayani Ekadasi Vrat Katha in Hindi

प्रबोधनी एकादशी से संबन्धित एक पौराणिक कथा प्रचलित है. सूर्यवंशी मान्धाता नम का एक राजा था. वह सत्यवादी, महान, प्रतापी और चक्रवती था. वह अपनी प्रजा का पुत्र समान ध्यान रखता है. उसके राज्य में कभी भी अकाल नहीं पडता था.
एक समय राजा के राज्य में अकाल पड गया. और प्रजा अन्न की कमी के कारण अत्यन्त दु:खी रहने लगी. राज्य में यज्ञ होने बन्द हो गयें. एक दिन प्रजा राजा के पास जाकर प्रार्थना करने लगी की हे राजन, समस्त विश्व की सृष्टि का मुख्य कारण वर्षा है. इसी वर्षा के अभाव से राज्य में अकाल पड गया है. और अकाल से प्रजा अन्न की कमी से मर रही है.
यह देख दु;खी होते हुए राजा ने भगवान से प्रार्थना की हे भगवान, मुझे इस अकाल को समाप्त करने का कोई उपाय बताईए. यह प्रार्थना कर मान्धाता मुख्य व्यक्तियोम को साथ लेकर वन की और चल दिया. घूमते-घूमते वे ब्रह्मा के पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम में पहुंच गयें. उस स्थान पर राजा रथ से उतरा और आश्रम में गया. वहां मुनि अभी प्रतिदिन की क्रियाओं से निवृ्त हुए थें.
राजा ने उनके सम्मुख प्रणाम क्या, और मुनि ने उनको आशिर्वाद दिया, फिर राजा से बोला, कि हे महर्षि, मेरे राज्य में तीन वर्ष से वर्षा नहीं हो रही है. चारों और अकाल पडा हुआ है. और प्रजा दु:ख भोग रही है. राजा के पापों के प्रभाव से ही प्रजा को कष्ट मिलता है. ऎसा शास्त्रों में लिखा है, जबकि मैं तो धर्म के सभी नियमों का पालन करता हूँ.

इस पर ऋषि बोले की हे राजन, यदि तुम ऎसा ही चाहते हो, तो आषाढ मास के शुक्ल पक्ष की पद्मा नाम की एकादशी का विधि-पूर्वक व्रत करो. एक व्रत के प्रभाव से तुम्हारे राज्य में वर्षा होगी. और प्रजा सुख प्राप्त करेगी.

मुनि की बात सुनकर राजा अपने नगर में वापस आया और उसने एकादशी का व्रत किया. इस व्रत के प्रभाव से राज्य में वर्षा हुई और मनुष्यों को सुख प्राप्त हुआ. देवशयनी एकाद्शी व्रत को करने से भगवान श्री विष्णु प्रसन्न होते है. अत: मोक्ष की इच्छा करने वाले व्यक्तियों को इस एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए.

Kamika Ekadashi Vrat Katha




8. कामिका एकादशी

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कामिका एकादशी सावन माह के कृ्ष्ण पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है. वर्ष 2011 में कामिका एकादशी 26 जुलाई के दिन की रहेगी.  इस एकादशी के दिन भगवान श्री कृ्ष्ण की पूजा करने से फल मिलता है. वही फल गांअ, काशी और अन्य तीर्थ स्थानों में स्नान करने से मिलने वाले फल के समान होता है. इस एकादशी का व्रत करने के लिये प्रात: स्नान करके भगवान श्री विष्णु को भोग लगाना चाहिए. आचमन के पश्चात धूप, दीप, चन्दन आदि पदार्थों से आरती उतारनी चाहिए. 

कामिका एकादशी व्रत महत्व | Importance of Kamika Ekadasi Vrat

कामिका एकादशी व्रत के दिन श्री हरि का पूजन करने से व्यक्ति के पितरों के भी पप दूर होते है. उपवास करने वाला व्यक्ति पाप रूपी संसार से उभर कर, मोक्ष की ओर अग्रसर होता है. इस एकादशी के विषय में यह मान्यता है, कि जो मनुष्य़ श्रावण मास में भगवान श्रीधर की पूजा करता है, उसके द्वारा गंधर्वों और नागों की सभी की पूजा हो जाती है. लालमणी मोती, दूर्वा और मूंगे आदि से पूजा होने के बाद भी भगवानश्री विष्णु उतने संतुष्ट नहीं होते, जितने की तुलसी पत्र से पूजा होने के बाद होते है. जो व्यक्ति तुलसी पत्र से श्री केशव का पूजन करता है. उसके जन्म भर का पाप नष्ट होते है.     
श्रावण मास के कृ्ष्ण पक्ष की एकाद्शी का नाम कामिका है. इस एकादशी की कथा सुनने मात्र से ही यज्ञ करने समान फल प्राप्त होते है. कामिका एकादशी के व्रत में शंख, चक्र, गदाधारी श्री विष्णु जी की पूजा होती है. जो मनुष्य इस एकाद्शी को धूप, दीप, नैवेद्ध आदि से भगवान श्री विष्णु जी कि पूजा करता है. उसे गंगा स्नान करने के फल से भी बडा फल मिलता है. 

कामिका एकाद्शी व्रत विधि | Kamika Ekadashi Vrat Vidhi

एकादशी तिथि का व्रत दशमी तिथि से ही प्रारम्भ समझना चाहिए. एकाद्शी व्रत तभी सफल होत है, जब इस व्रत के नियमों का पालन दशमी तिथि से ही किया जाता है. जिस व्यक्ति को दशमी तिथि का व्रत करना हो, उस व्यक्ति को दशमी तिथि में व्यवहार को सात्विक रखना चाहिए. सत्य बोलना और मधुर बोलना चाहिए. ऎसी कोई बात नहीं करनी चाहिए. कि जो किसी को दू:ख पहुंचाये. 
व्रत की अवधि लम्बी होती है. इसलिये उपवासक में दृढ संकल्प का भाव होना चाहिए. एक बार व्रत शुरु करने के बाद मध्य में कदापि नहीं छोडना चाहिए. दशमी तिथि के दिन रात्रि के भोजन में मांस, जौ, शहद जैसी वस्तुओं का प्रयोग नहीं करना चाहिए. और एक बार भोजन करने के बाद रात्रि में दोबारा भोजन नहीं करना चाहिए. दशमी तिथि से ही क्योकि व्रत के नियम लागू होते है, इसलिये भोजन में नमक नहीं होना चाहिए. भोजन करने के बाद व्यक्ति को भूमि पर शयन करना चाहिए. और पूर्ण रुप से ब्रहाचार्य का पालन करना चाहिए.       
व्रत के दिन अर्थात एकादशी तिथि के दिन सुबह जल्दी उठना चाहिए. स्नान से पहले नित्यक्रियाओं से मुक्त होना चाहिए. और स्नान करने के लिये मिट्टी, तिल और कुशा का प्रयोग करना चाहिए. यह स्नान अगर किसी तीर्थ स्थान में किया जाता है, तो सबसे अधिक पुन्य देता है. विशेष परिस्थितियों में घर पर ही स्नान किया जा सकता है.         
स्नान करने के बाद साफ वस्त्र धारण करने चाहिए. और भगवान श्री विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लेना चाहिए. इसके बाद भगवान का पूजन करना चाहिए. पूजन करने के लिये सर्वप्रथम कुम्भ स्थापना की जाती है. कुम्भ के ऊपर भगवान श्री विष्णु जी की प्रतिमा रखी जाती है, और उसका पूजन धूप, दीप, पुष्प से किया जाता है.      

कामिका एकादशी व्रत कथा | Kamika Ekadashi Vrat Katha in Hindi

प्राचीन काल में किसी गांव में एक ठाकुर जी थे. क्रोधी ठाकुर का एक ब्राह्मण से झगडा हो गया. परिणाम स्वरुप ब्राह्मणों ने भोजन करने से इंकार कर दिया. तब उन्होने एक मुनि से निवेदन किया कि हे भगवान, मेरा पाप कैसे दूर हो सकता है. इस पर मुनि ने उसे कामिका एकाद्शी व्रत करने की प्रेरणा दी. ठाकुर जी ने ठिक वैसा ही किया. रात्रि में भगवान की मूर्ति के पास जब वह  शयन कर रहा था. तभी उसे स्वपन आया. हे ठाकुर तेरा पाप दूर हो गया है.  अब तू ब्राह्माण की तेहरवीं करके ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हो गया है.

Pavitra Akadashi



9. पवित्रा एकादशी



हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पवित्रा/पुत्रदा एकादशी कहते हैं। इस दिन भगवान विष्णु के निमित्त व्रत किया जाता है।

पवित्रा एकादशी व्रत कानियम पालन दशमी तिथि  की रात्रि से ही शुरु करें व ब्रह्मचर्य का पालन करें। एकादशी के दिन सुबह नित्य कर्मों से निवृत्त होकर साफ वस्त्र पहनकर भगवान विष्णु की प्रतिमा के सामने बैठकर व्रत का संकल्प लें। इस दिन यथा संभव उपवास करें। उपवास में अन्न ग्रहण नहीं करें संभव न हो तो एक समय फलाहारी कर सकते हैं।

इसके बाद भगवान विष्णु की पूजा विधि विधान से करें। (यदि आप पूजन करने में असमर्थ हों तो पूजन किसी योग्य ब्राह्मण से भी करवा सकते हैं।) भगवान विष्णु को पंचामृत से स्नान कराएं। स्नान के बाद उनके चरणामृत को व्रती (व्रत करने वाला) अपने और परिवार के सभी सदस्यों के अंगों पर छिड़के और उस चरणामृत को पीए। इसके बाद भगवान को गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि पूजन सामग्री अर्पित करें।

विष्णु सहस्त्रनाम का जप एवं उनकी कथा सुनें। रात को भगवान विष्णु की मूर्ति के समीप हो सोएं और दूसरे दिन यानी द्वादशी के दिन वेदपाठी ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान देकर आशीर्वाद प्राप्त करें। इस प्रकार पवित्रा एकादशी व्रत करने से योग्य पुत्र की प्राप्ति होती है।

Aja (Kamika) Ekadashi Vrat Vidhi


10. अजा एकादशी

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भाद्रपद कृ्ष्ण पक्ष की एकादशी अजा या कामिका एकादशी के नाम से जानी जाती है. इस दिन की एकादशी के दिनभगवान श्री विष्णु जी की पूजा करनी चाहिए. रात्रि जागरण तथा व्रत करने से व्यक्ति के सभी पाप दूर होते है. इस एकादशी के फल लोक और परलोक दोनों में उतम कहे गये है. अजा एकाद्शी व्रत करने से व्यक्ति को हजार गौदान करने के समान फल प्राप्त होते है. उसके जाने अनजाने में किए गये सभी पाप समाप्त होते है. और जीवन में सुख-समृ्द्धि दोनों की उसे प्राप्ति होती है.     

अजा एकादशी व्रत विधि | Aja Ekadasi Vrat Vidhi

भाद्रपद, कृ्ष्ण पक्ष की एकादशी तिथि के दिन की एकादशी अजा नाम से पुकारी जाती है. इस एकादशी का व्रत करने के लिये व्यक्ति को दशमी तिथि को व्रत करने वाले व्यक्ति को व्रत संबन्धी कई बातों का ध्यान रखना चाहिए.  इस दिन व्यक्ति को निम्न वस्तुओं का त्याग करना चाहिए. 
1. व्रत की दशमी तिथि के दिन व्यक्ति को मांस कदापि नहीं खाना चाहिए. 
2. दशमी तिथि की रात्रि में मसूर की दाल खाने से बचना चाहिए. इससे व्रत के शुभ फलों में कमी होती है. 
3. चने नहीं खाने चाहिए. .
4. करोदों का भोजन नहीं करना चाहिए. 
5. शाक आदि भोजन करने से भी व्रत के पुन्य फलों में कमी होती है.  
6. इस दिन शहद का सेवन करने एकाद्शी व्रत के फल कम होते है.   
7. व्रत के दिन और व्रत से पहले के दिन की रात्रि में कभी भी मांग कर भोजन नहीं करना चाहिए. 
8. इसके अतिरिक्त इस दिन दूसरी बार भोजन करना सही नहीं होता है. 
9. व्रत के दिन और दशमी तिथि के दिन पूर्ण ब्रह्माचार्य का पालन करना चाहिए. 
10. व्रत की अवधि मे व्यक्ति को जुआ नहीं खेलना चाहिए. 
11. एकाद्शी व्रत हो, या अन्य कोई व्रत व्यक्ति को दिन समयावधि में शयन नहीं करना चाहिए. 
12. दशमी तिथि के दिन पान नहीं खाना चाहिए. 
13. दातुन नहीं करना चाहिए. किसी पेड को काटना नहीं चाहिए.
14. दुसरे की निन्दा करने से बचना चाहिए. 
15. झूठ का त्याग करना चाहिए.    
अजा एकादशी का व्रत करने के लिए उपरोक्त बातों का ध्यान रखने के बाद व्यक्ति को एकाद्शी तिथि के दिन शीघ्र उठना चाहिए. उठने के बाद नित्यक्रिया से मुक्त होने के बाद, सारे घर की सफाई करनी चाहिए. और इसके बाद तिल और मिट्टी के लेप का प्रयोग करते हुए, कुशा से स्नान करना चाहिए. स्नान आदि कार्य करने के बाद, भगवान श्री विष्णु जी की पूजा करनी चाहिए. 
भगवान श्री विष्णु जी का पूजन करने के लिये एक शुद्ध स्थान पर धान्य रखने चाहिए. धान्यों के ऊपर कुम्भ स्थापित किया जाता है. कुम्भ को लाल रंग के वस्त्र से सजाया जाता है. और स्थापना करने के बाद कुम्भ की पूजा की जाती है. इसके पश्चात कुम्भ के ऊपर श्री विष्णु जी की प्रतिमा या तस्वीर लगाई जाती है. अब इस प्रतिमा के सामने व्रत का संकल्प लिया जाता है. बिना संकल्प के व्रत करने से व्रत के पूर्ण फल नहीं मिलते है. संकल्प लेने के बाद भगवान की पूजा धूप, दीप और पुष्प से की जाती है.      

अजा एकाद्शी व्रत कथा | Aja Ekadashi Vrat Katha in hindi

प्राचीन काल में एक चक्रवती राजा राज्य करता था. उसका नाम हरिशचन्द्र था. वह अत्यन्त वीर प्रतापी था और सत्यवादी था.  उसने अपने एक वजन को पूरा करने के लिये अपनी स्त्री और पुत्र को बेच डाला था. और वह स्वयं भी एक चाण्डाल का सेवक बन गया था. 
उसने उस चाण्डाल के यहां कफन देने का काम किया. परन्तु उसने इस दुष्कर कार्य में भी सत्य का साथ न छोडा. जब इस प्रकार रहते हुए उसको बहुत वर्ष हो गये तो उसे अपने इस नीच कर्म पर बडा  दु:ख हुआ, और वह इससे मुक्त होने का उपाय खोजने लगा. वह उस जगह सदैव इसी चिन्ता में लगा रहता था. 
कि मै, क्या करूँ, एक समय जब कि वह चिन्ता कर रहा था, तो गौतम ऋषि आये, राजा ने इन्हें, देखकर प्रणाम किया और अपनी दु:ख की कथा सुनाने लगे. महर्षि राजा के दु:ख से पूर्ण वाक्यों को सुनकर अत्यन्त दु:खी हुये और राजा से बोले की हे राजन, भादों के कृ्ष्णपक्ष में एक एकाद्शी होती है. एकाद्शी का नाम अजा है. तुम उसी अजा नामक एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करो, तथा रात्रि को जागरन करो. इससे तुम्हारे समस्त पाप नष्ट हो जायेगें. गौतम ऋषि राजा से इस प्रअर कहकर चले गये़. 
अजा नाम की एकाद्शी आने पर राजा ने मुनि के कहे अनुसार विधि-पूर्वक व्रत था रात्रि जागरण किया. उसी व्रत के प्रभाव से राजा के समस्त पाप नष्ट हो गए.  उस समय स्वर्ग में नगाडे बजने लगे तथा पुष्पों की वर्षो होने लगी. उसने अपने सामने ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र और महादेवजी को खडा पाया.  उसने अपने मृ्तक पुत्र को जीवित करने तथा स्त्री को वस्त्र तथा आभूषणों से युक्त देखा. 
व्रत के प्रभाव से उसको पुन: राज्य मिल गया. अन्त समय में वह अपने परिवार सहित स्वर्ग लोक को गया. यह सब अजा एकाद्शी के व्रत का प्रभाव था. जो मनुष्य इस व्रत को विधि-विधान पूर्वक करते है. तथा रात्रि में जागरण करते है. उनके समस्त पाप नष्ट हो जाते है. और अन्त में स्वर्ग जाते है. इस एकादशी की कथा के श्रवण मात्र से ही अश्वमेघ यज्ञ के समान फल मिलता है.  

Padma Ekadashi-Vaman Jayanti Vrat Vidhi


11. पद्मा एकादशी-वामन जयन्ती

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भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकाद्शी तिथि पदमा एकादशी के नाम से जानी जाती है. इस व्रत को करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती है. इस तिथि में वामन देव का पूजन अवश्य करना चाहिए. भादों मास की एकादशी वामन एकादशी के नाम से जानी जाती है. इस दिन यज्ञोपवीत से वामन की प्रतिमा स्थापित कर, अर्ध्य दान करने से,फल, फूल चढाने, और उपवास करने से व्यक्ति का कल्याण होता है. 
वर्ष 2011 में, 09 सितम्बर के दिन यह व्रत किया जायेगा. इस एकादशी को एक अन्य मत के अनुसार भादों मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि के दिन यह व्रत किया जाता है. एकादशी तिथि के दिन किया जाने वाला व्रत पदमा एकादशी के नाम से जाना जाता है. जबकि एक अन्य मत यह कहता है, कि एकादशी व्रत होने के कारण इस व्रत को एकाद्शी तिथि में ही किया जाना चाहिए. 08 सितम्बर के दिन पदमा एकाद्शी व्रत और 09 सितम्बर के दिन द्वादशी तिथि रहेगी. इस दिन वामन एकादशी व्रत किया जा सकेगा., इसका व्रत करना विशेष कल्याणकारी रहेगी.   
अर्ध्य देने समय निम्न मंत्र का प्रयोग करना चाहिए.

देवेश्चराय देवाय, देव संभूति कारिणे ।

प्रभवे सर्व देवानां वामनाय नमो नम: ।।

इसकी पूजा करने का एक दूसरा विधान भी है. पूजा के बाद 52 पेडा और 52 दक्षिणा रखकर भोग लगाया जाता है. फिर एक डलिया में एक कटोरी चावल, एक कटोरी शरबत, एक कटोरी चीनी, एक कटोरी दही ब्राह्माण को दान दी जाती है. इसी दिन व्रत का उद्यापन भी करना चाहिए. उध्यापन में ब्राह्माणों को एक छाता, खडाऊँ तथा दक्षिणा देकर विदा करना चाहिए. इस व्रत को करने से स्वर्ग कि प्राप्ति होती है.  

वामन एकादशी व्रत फल | Fruits of Vaman Ekadashi Vrat

वामन एकाद्शी भादों की शुक्ल पक्ष की एकादशी कहलाती है. इस एकादशी को जयन्ती एकाद्शी भी कहते है. इस एकाद्शी का व्रत करने से समस्त पापों का नाश होता है. इस जयंती एकादशी व्रत को करने से नीच पापियों का उद्वार हो जाता है. अगर कोई व्यक्ति परिवर्तनी एकाद्शी के दिन भगवान श्री विष्णु जी कई की पूजा करता है. उसे मोक्ष कि प्राप्ति होती है. 
इस एकादशी के फलों के विषय में जरा से भी संदेह नहीं है, कि जो व्यक्ति इस एकादशी के दिन वामन रुप की पूजा करता है, वह ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों की पूजा करता है. इस एकादशी का व्रत करने के बाद उसे इस संसार में कुछ भी करना शेष नहीं रहता है. वामन एकाद्शी के दिन के विषय में एक मान्यता है, कि इस दिन भगवान श्री विष्णू जी करवट बदलते है. इसी वजह से इस एकादशी को परिवर्तिनी एकाद्शी भी कहते है. 

वामन एकादशी व्रत कथा | Vamana Ekadashi Vrat Katha in Hindi

त्रेतायुग में बलि नाम का एक दानव था. वह भक्त, दानी, सत्यवादी तथा ब्राह्माणों की सेवा करने वाला था. साथ ही वह सदैव ही यज्ञ और तप आदि किया करता था. वह अपनी भक्ति के प्रभाव से स्वर्ग में इन्द्र के स्थान पर राज्य करने लगा. इन्द्र तथा अन्य देवता इस बात को सहन न कर सके, और भगवान के पास जाकर प्रार्थना करने लगे. अन्त में भगवान श्री विष्णु ने वामन रुप धारण किया. 
और राजा बलि से याजना की, हे राजन, तुम मुझे तीन पग भूमि दे दों. इससे तुम्हें तीन लोक दान का फल प्राप्त होगा. राजा बलि ने इस छोटी सी याचना को स्वीकार कर लिया. और राजा भूमि देने को तैयार हो गया. ऎसे में भगवान श्री विष्णु जी ने अपना आकार बढाया. प्रथम पग में भूमि, दूसरे पग में नभ और तीसरे पग रखने से पहले उन्होने पहूंचा की पैर कहां रखूं. इतना सुनकर राजा बलि ने अपना सिर नीचा कर लिया. और भगवान विष्णु ने तीसरा पैर राजा बलि के सिर पर रख दिया. ऎसे में भक्त दानव पाताल लोक चला गया. 
पाताल लोक में राजा बलि ने विनीत की, तो  भगवान विष्णु जी ने कहा की में तुम्हारे पास सदैव रहूंगा. तभी से भादों के शुक्ल पक्ष की परिवर्तिनी नामक एकादशी के दिन मेरी एक प्रतिमा राजा बलि के पास रहती है. और एक क्षीर सागर में शेषनाग पर शय करती रहती है. इस एकाद्शी के दिन भगवान श्री विष्णु सोते हुए करवट बदलते है. इस दिन त्रिलोकी के नाथ श्री विष्णु भगवान की पूजा की जाती है. इस दिन चावल और दही सहित चांदी का दान करने का विशेष विधि-विधान है.  

Indira Ekadashi Vrat Vidhi


12. इन्दिरा एकादशी

Indira Ekadashi
आश्चिन कृ्ष्ण पक्ष की एकादशी को इन्दिरा एकादशी कहा जाता है. इस एकादशी के दिन शालीग्राम की पूजा कर व्रत किया जाता है. इस एकादशी के व्रत करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते है. इस व्रत के फलों के विषय में एक मान्यता प्रसिद्ध है, कि इस व्रत को करने से नरक मे गए, पितरों का उद्वार हो जाता है. इस एकादशी की कथा (Indira Ekadashi Story) को सुनने मात्र से यज्ञ करने के समान फल प्राप्त होते है. 

इन्दिरा एकादशी व्रत कथा | Indira Ekadashi Vrat Katha in Hindi

प्राचीन सतयुग में महिष्मति नाम कि नगरी में इन्द्रसेन नाम का एक प्रतापी राजा राज्य करता है. वह पुत्र, पौत्र, धन धान्य आदि से पूर्ण और सदैव शत्रुओं का नाश करने वाला था. एक समय जबकी राजा अपनी राज सभा में सुख पूर्वक बैठा था. उसी समय महर्षि नारद जी वहां आयें. नारदजी को देखकर राजा आसन से उठे और अर्ध्य आदि से उनकी पूजा करके उन्हें आसन दिया. नारद जी ने कहा की, हे राजन, मै आपकी धर्म परायणता देख कर अति प्रसन्न हुआ.
नारद जी ने राजा को बताया कि एक बार मै, ब्रह्मालोक को छोडकर यमलोक गया था. उस समय यमराज की सभा के मध्य में तुम्हारे पिता को बैठे देखा. तुम्हारे पिता महान ज्ञानी, दानी तथा धर्मात्मा थे, उन्होने एकादशी का व्रत मध्य में छोड दिया था. उसके कारण उन्हें यमलोक में जाना पडा. आपके पिता का एक समाचार लेकर मैं तुम्हारे पास आया हूँ, तुम्हारे पिता ने कहा है, की मैं मेरे पुत्र का नाम इन्द्रसेन है, जो कि महिष्मति नाम की नगरी में राज्य करता है. 
यदि मेरा पुत्र आश्चिन मास के कृ्ष्ण पक्ष की इन्दिरा एकादशी का व्रत करेगा, तो इस व्रत के फल से मुझे मुक्ति प्राप्त हो जाएगी. इन्दिरा एकाद्शी के फल से मैं इस लोक को छोडकर स्वर्ग लोक में चला, जाऊंगा. जब राजा ने अपने पिता के ऎसे दु:ख भरे वाक्यों को सुनकर उसे बहुत दु:ख हुआ. और राजा नारद जी से इन्दिरा एकादशी का व्रत करने की विधि पूछने लगे.

इन्दिरा एकादशी व्रत विधि | Indira Ekadashi Vrat Vidhi

नारद जी ने बताया की आश्चिन मास की कृ्ष्ण पक्ष की दशमी के दिन प्रात:काल में श्रद्वासहित स्नान आदि करना चाहिए. इसके बाद दोपहर में भी स्नान करना चाहिए. स्नान आदि करने के बाद श्रद्वा पूर्वक अपने पितरों का श्राद्व करना चाहिए.  
इसके अगले दिन एकादशी तिथि के दिन इन्दिरा एकादशी का व्रत करना चाहिए. एकादशी के दिन उपवासक को जल्द उठना चाहिए. उठने के बाद नित्यक्रिया कार्यों से मुक्त हो जाना चाहिए. तत्पश्चात उसे स्नान और दांतुन करनी चाहिए. और इसके पश्चात ही श्रद्वा पूर्वक व्रत का संकल्प लेना चाहिए. एकादशी तिथि के व्रत में रात्रि के समय में ही फल ग्रहण किये जा सकते है.
तथा द्वादशी तिथि में भी दान आदि कार्य करने के बाद ही स्वयं भोजन ग्रहण करना चाहिए. एकादशी तिति की दोपहर को सालिग रामजी जी मूर्ति को स्थापित किया जाता है,जिसकी स्थापना के लिये किसी ब्राह्माण को बुलाना चाहिए. ब्राह्माण को बुलाक उसे भोजन कराना चाहिए.
और दक्षिणा देनी चाहिए. बनाये गये भोजन में से कुछ हिस्से गौ को भी देने चाही. और भगवान श्री विष्णु की धूप, दीप, नैवेद्ध आदि से पूजा करनी चाहिए. एकादशी रात्रि में सोना नहीं चाहिए. पूरी रात्रि जागकर भगवान विष्णु का पाठ या मंत्र जाप करना चाहिए. अन्यथा भजन, किर्तन भी किया जा सकता है. अगले दिन प्रात: स्नान आदि कार्य करने के बाद ब्राह्माणों को दक्षिणा देने के बाद ही अपने परिवार के साथ मौन होकर भोजन करना चाहिए. 
इन्दिरा एकाद्शी के व्रत को कोई भी व्यक्ति अगर आलस्य रहित करता है, तो उसके पूर्वज अवश्य ही स्वर्ग को जाते है. राजा ने नारद जी से इन्दिरा एकादशी व्रत की विधि सुनने के बाद, एकादशी आने पर इस व्रत को किया, और परिवार सहित इस व्रत को करने से आकाश से फूलों की वर्षा हुई. और राजा के पिता यमलोक से निकल कर स्वर्ग लोग में चले गये. राजा स्वयं भी इस एकादशी के प्रभाव से इस लोक में सुख भोग कर अन्त में स्वर्ग लोक को चला गया.    
इस एकादशी की कथा को सुनने मात्र से ही व्यक्ति के सभी पाप नष्ट होते है.  

Papankusha Ekadashi (Pashankusha) Vrat Vidhi


13. पापांकुशा एकादशी

papankusha_ekadashiपापाकुंशा एकादशी व्रत फल | Papakunsha Ekadashi Vrat Result 
इस एकादशी के दिन मनोवांछित फल कि प्राप्ति के लिये श्री विष्णु भगवान कि पूजा की जाती है. इस एकादशी के पूजने से व्यक्ति को स्वर्ग लोक की प्राप्ति होती है. जो मनुष्य कठिन तपस्याओं के द्वारा फल प्राप्त करते है. वही फल एक एकादशी के दिन क्षीर -सागर में शेषनाग पर शयन करने वाले श्री विष्णु को नमस्कार कर देने से ही मिल जाते है. और मनुष्य को यमलोक के दु:ख नहीं भोगने पडते है. यह व्रत आश्विन शुक्ल एकादशी को किया जाता है.
पापाकुंशा एकादशी के फलों के विषय में कहा गया है, कि हजार अश्वमेघ और सौ सूर्ययज्ञ करने के फल,इस एकादशी के फल के सोलहवें, हिस्से के बराबर भी नहीं होता है. अर्थात इस एकादशी व्रत के समान अन्य कोई व्रत नहीं है. इस एकादशी का व्रत करने से मनुष्य को स्वस्थ शरीर और सुन्दर जीवन साथी की प्राप्ति होती है.
इसके अतिरिक्त जो व्यक्ति इस एकादशी की रात्रि में जागरण करता है, उन्हें, बिना किसी रोक के स्वर्ग मिलता है. यह एकाद्शी उपवासक के मातृपक्ष के दस और पितृपक्ष के दस पितरों को विष्णु लोक लेकर जाती है. इस एकादशी के दिन भूमि, गौ, अन्न, जल, वस्त्र और छत्र आदि का दान करता है, उन्हें यमराज के दर्शन नहीं मिलते है. इसके अलावा जो व्यक्ति तालाब, बगीचा, धर्मशाला, प्याऊ, अन्न क्षेत्र आदि बनवाते है, उन्हें पुन्य फलों की प्राप्ति होती है. धर्म करने वाले को सभी सुख मिलते है.

पापाकुंशा एकादशी व्रत विधि | Method of Padmanabha Ekadashi Fast (Vidhi)

पापाकुंशा एकाद्शी व्रत के विषय में यह कहा जाता है, कि इस व्रत की महिमा अपरम्पार है. इस एकादशी व्रत में श्री विष्णु जी का पूजन करने के लिए वह धूप, दीप, नारियल और पुष्प का प्रयोग किया जाता है.
दशमी तिथि एक के दिन से ही व्रत के सभी नियमों का पालन करना चाहिए. दशमी तिथि के दिन सात धान्य अर्थात गेहूं, उडद, मूंग, चना, जौ, चावल और मसूर की दाल का सेवन नहीं करना चाहिए. क्योकि इन सातों धान्यों की पूजा एकादशी के दिन की जाती है. दशमी तिथि के दिन झूठ नहीं बोलना चाहिए. और किसी का अहित नहीं करना चाहिए. जहां तक हो सके दशमी तिथि और एकादशी तिथि दोनों ही दिनों में कम से कम बोलना शुभ रहता है. इससे पाप कम होने की संभावना रहती है. एकाद्शी तिथि की प्रथम रात्रि में भोजन में नमक और तामसिक वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए. और पूर्ण ब्रह्राचार्य का पालन करना चाहिए. दशमी तिथि की रात्रि में एक बार भोजन करने के बाद, कुछ नहीं खाना चाहिए.
और एकादशी तिथि के दिन सुबह उठकर स्नान आदि कार्य करने के बाद व्रत का संकल्प लेना चाहिए. संकल्प लेने के बाद घट स्थापना की जाती है. और उसके ऊपर श्री विष्णु जी की मूर्ति रखी जाती है. इस व्रत को करने वाले व्यक्ति को रात्रि में विष्णु के सहस्त्रनाम का पाठ करना चाहिए. इस व्रत का समापन एकादशी तिथि में नहीं होता है. बल्कि द्वादशी तिथि की प्रात: में ब्राह्माणों को अन्न का दान और दक्षिणा देने के बाद ही यह व्रत समाप्त होता है.

पापांकुशा एकादशी व्रत कथा | Pasankusha Ekadashi Fast Story in Hindi

(Vrat Katha)

विन्ध्यपर्वत पर महा क्रुर और अत्यधिक क्रोधन नामक एक बहेलिया रहता था. उसने बुरे कार्य करने में सारा जीवन बीता दिया. जीवन के अंतिम भाग आने पर यमराज ने उसे अपने दरबार में लाने की आज्ञा दी. दूतोण ने यह बात उसे समय से पूर्व ही बता दी. मृ्त्युभय से डरकर वह अंगिरा ऋषि के आश्रम में गया. और यमलोक में जाना न पडे इसकी विनती करने लगा.
अंगिरा ऋषि ने उसे आश्चिन मास कि शुक्ल पक्ष कि एकादशी के दिन श्री विष्णु जी का पूजन करने की सलाह दी़. इस एकादशी का पूजन और व्रत करने से वह अपने सभी पापों से मुक्त होकर विष्णु लोक को गया.

Rama Ekadashi Vidhi-Vrat


14. रमा एकादशी 

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रमा एकादशी व्रत कार्तिक मास के कृ्ष्ण पक्ष की एकादशी को किया जाता है. वर्ष 2011 में 23 अक्तूबर के दिन रमा एकादशी व्रत किया जायेगा. इस दिन भगवान श्री केशव का संपूर्ण वस्तुओं से पूजन किया जाता है. इस एकादशी के दिन नैवेद्ध तथा आरती कर प्रसाद वितरित करके ब्राह्माणों को खिलाया जाता है. और दक्षिणा भी बांटी जाती है. 

रमा एकादशी व्रत फल | Fruits of Rama Ekadashi Vrat

कार्तिक मास के कृ्ष्णपक्ष की एकादशी का नाम रमा एकादशी है. इस एकादशी को रम्भा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है. इसका व्रत करने से समस्त पाप नष्ट होते है.  

रमा एकादशी व्रत कथा | Rama Ekadashi Vrat Katha in Hindi

प्राचीन काल की बात है, एक बार मुचुकुन्द नाम का एक राजा राज्य करता था. उसके मित्रों में इन्द्र, वरूण, कुबेर और विभीषण आदि थे. वह प्रकृ्ति से सत्यवादी था.  तथा वह श्री विष्णु का परम भक्त था. उसका राज्य में कोई पाप नहीं होता है. उसके यहां एक कन्या ने जन्म लिया. बडे होने पर उसने उस कन्या का विवाह राजा चन्द्रसेन के पुत्र साभन के साथ किया. 
एक समय जब चन्द्रभागा अपने ससुराल में थी, तो एक एकादशी पडी. एकादशी का व्रत करने की परम्परा उसने मायके से मिली थी. चन्द्रभागा का पति सोचने लगा कि मैं शारीरिक रुप से अत्यन्त कमजोर हूँ. मैं इस एकादशी के व्रत को नहीं कर पाऊंगा. व्रत न करने की बात जब चन्द्रभागा को पता चली तो वह बहुत परेशान हुई़.
चन्द्रभागा ने कहा कि मेरे यहां एकादशी के दिन कोई भी भोजन नहीं कर सकता. अगर आप भोजन करना ही चाहते है, तो किसी ओर स्थान पर चले जाईये़ यदि आप यहां पर रहेगें, तो आपको व्रत अवश्य ही करना पडेगा. अपनी पत्नी की यह बात सुनकर शोभन बोला कि तब तो मैं यही रहूंगा और व्रत अवश्य ही करूंगा. 
यह सोच कर उसने एकादशी का व्रत किया, व्रत में वह भूख प्यास से पीडित होने लगा. सूर्य भगवान भी अस्त हो गए. और जागरण की रात्रि हुई़. वह रात्रि सोभन को दु:ख देने वाली थी. दूसरे दिन प्रात: से पूर्व ही सोभन इस संसार से चल बसा.  
राजा ने उसके मृ्तक शरीर को दहन करा दिया. चन्द्रभागा अपने पति की आज्ञानुसार अपने पिता के घर पर ही रही़. रमा एकादशी के प्रभाव से सोभन को एक उतम नगर प्राप्त हुआ, जो सिंहासन से युक्त था, परन्तु यह राज्य अध्रुव ( अदृश्य)  था. यह एक ऎसा राज्य था. जो अपने आप में अनोखा था.
एक बार उसकी पत्नी के राज्य का एक ब्राह्माण भ्रमण के लिए निकला, उसने मार्ग में सोभन का नगर देखा. और सोभन ने उसे बताया कि उसे रमा एकादशी के प्रभाव से यह नगर प्राप्त हुआ है. सोभन ने ब्राह्माण से कहा की मेरी पत्नी चन्द्र भागा से इस नगर के बारे में और मेरे बारे में कहना. वह सब ठिक कर देगी.
ब्राह्माण ने वहां आकर चन्द्रभागा को सारा वृ्तान्त सुनाया. चन्द्रभागा बचपन से ही एकादशी व्रत करती चली आ रही थी. उसने अपनी सभी एकादशियों के प्रभाव से अपने पति और उसके राज्य को यथार्थ का कर दिया. और अन्त में अपने पति के साथ दिव्यरुप धारण करके तथा दिव्य वस्त्र अंलकारों से युक्त होकर आनन्द पूर्वक अपने पति के साथ रहने लगी. जो जन रमा एकादशी का व्रत करते है. उनके ब्रह्माहत्या आदि के पाप नष्ट होते है.

Prabhodhini Ekadashi - Tulsi Vivah (Kartik Ekadashi Vrat Vidhi) Devothani Ekadashi


15. प्रबोधनी एकादशी

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कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवोत्थान एकाद्शी या देव उठावनी एकादशी के नाम से जाना जाता है. कुछ स्थानों में इसे प्रबोधनी एकाद्शी भी कहा जाता है. देवोत्थानी एकाद्शी के संबन्ध में एक मान्यता प्रसिद्ध है. भाद्रपद की एकादशी को ही भगवान श्री विष्णु ने अपना चार मास का विश्राम समाप्त किया था. इस तिथि के बाद ही शादी-विवाह आदि के शुभ कार्य शुरु होते है. वर्ष 2011 में 6 नवम्बर की रहेगी.     

प्रबोधनी एकाद्शी व्रत कथा | Prabodhini Ekadashi Vrat Katha

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रबोधनी एकाद्शी के व्रत का फल एक सहस्त्र अश्वमेघ यज्ञों के बराबर होता है. इस व्रत को करने से व्यक्ति के सात जन्मों के पाप नष्ट होते है. इस व्रत के विषय में कहा जाता है, कि जिस वस्तु को प्राप्त करना कठिन होता है. वह वस्तु इस व्रत को करने से प्राप्त हो जाती है. यह एकादशी महान पाप भी क्षण मात्र में नष्ट करती है. 
अनेक जन्मों के बुरे पाप इस प्रबोधनी एकादशी का व्रत करने से समाप्त हो जाते है. जो मनुष्य अपने स्वभावनुसार इस प्रबोधनी एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करतें है. उन्हें इस व्रत के शुभ फल प्राप्त होता है. इस व्रत को करने के बाद जो व्यक्ति रात्रि में जागरण भी करता है, उसकी दस पीढियां विष्णु लोक में जाकर वास करती है. और नरक में अनेक दु:खों को भोगते हुए उसके पितृ विष्णु लोक में जाकर सुख भोगते है.
प्रबोधनी एकादशी के विषय में कहा गया है,कि समस्त तीर्थों में जाने था, गौ, स्वर्ण, भूमि आदि के दान का फल और कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की प्रबोधनी एकादशी के रात्रि के जागरण के फल एक बराबर होते है. इस संसार में उसी का जीवन सफल है, जिसने प्रबोधनी एकादशी का व्रत किया है. संसार में जितने तीर्थ स्थान है, वे सभी एकत्र होकर इस एकादशी को करने वाले व्यक्ति के घर में होते है. देवोत्थानी एकादशी करने से व्यक्ति धनवान, योगी, तपस्वी तथा इन्द्रियों को जीतने वाला बनता है. इस व्रत को करने से व्यक्ति भगवान श्री विष्णु का प्रिय बन जाता है.  

प्रबोधिनी एकादशी व्रत विधि | Prabodhini Ekadasi Vrat Vidhi

व्रत करने वाले को दशमी के दिन मांस और प्याज तथा मसूर की दान इत्यादि वस्तुओं का त्याग करना चाहिए. दशमी तिथि की रात्रि को ब्रह्माचार्य का पालन करना चाहिए. प्रात: काल में लकडी की दातुन का प्रयोग नहीं करना चाहिए. निम्बू, जामुन या आम के पत्ते लेकर चबा ले और ऊंगळी से कंठ शुद्ध करना चाहिए. वृ्क्ष से पत्ता तोडना भी वर्जित होता है. चबाने के लिये गिरा हुआ पत्ता लेकर सेवन करना चाहिए. फिर स्नान कर मंदिर में जाना चाहिए. गीता पाठ करना या गीता पाठ का श्रवण करना चाहिए. प्रभु के सामने यह प्रण करना चाहिए कि, मै, इस व्रत को पूरी श्रद्वा और विश्वास के साथ करूंगा. व्रत के दिन "ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय"   इस द्वादश अक्षर के मंत्र का जाप करना चाहिए. 
एकादशी के दिन झाडू नहीं देनी चाहिए. क्योकि इससे सूक्ष्म जीव मर जाते है. तथा बाल नहीं कटाने चाहिए. अधिक नहीं बोलना चाहिए. अन्न दान में नहीं लेना चाहिए. झूठ आदि से बचके रहना चाहिए. इस दिन भोग लगाने के लिये मूळी, आम, अंगूर, केला और बादाम का प्रयोग किया जा सकता है. द्वादशी के दिन ब्राह्माणों को मिष्ठान दक्षिणा से प्रसन्न कर परिक्रमा लेनी चाहिए.  

Utpanna Ekadashi Vrat Vidhi


16. उत्पन्ना एकाद्शी

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उत्पन्ना एकादशी का व्रत मार्गशीर्ष मास के कृ्ष्ण पक्ष में किया जाता है. इस दिन भगवान श्री कृ्ष्ण की पूजा करने का विधान है. व्रत वाले को दशमी के दिन रात में भोजन नहीं करना चाहिए. एकादशी के दिन ब्रह्रा बेला में भगवान का पुष्प, धूप, दीप, अक्षत से पूजन करके पूजन करना चाहिए. इस व्रत में केवल फलों का ही भोग लगाया जाता है. इस व्रत को करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है. 
  

उत्पन्ना एकादशी व्रत विधि | Utpanna Ekadasi Vrat Vidhi
उत्पन्ना एकादशी का व्रत जो जन करता है, वही सभी सुखों को भोगकर अंत में श्री विष्णु जी की शरण में चला जाता है. इस एकादशी को करने वाले व्यक्ति को सबसे पहले दशमी तिथि की सायं में दातुन नहीं करनी चाहिए. और रात को दो बार भोजन नहीं करना चाहिए. एकादशी की सुबह संकल्प नियम के अनुसार कार्य करना चाहिए. दोपहर को संकल्प पूर्वक स्नान करना चाहिए. स्नान करने से पहले शरीर पर मिट्टी का लेप करना चाहिए. चंदन और लेप लगाते समय निम्न मंत्र का जाप करना चाहिए.
अश्व क्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुकान्ते वसुन्धरे
उवृ्तापि बराहेण कृ्ष्णे न सताबाहुना ।
मृ्तिके हरमें पाप तन्मया पूर्वक संचितम 
त्वयाहतेन पापेन गच्छामि परमागतिम ।।

स्नान करने के बाद धूप, दीप, नैवेद्ध से भगवान का पूजन करना चाहिए. रात को दीपदान करना चाहिए. ये सतकर्म भक्ति पूर्वक करने चाहिए. उस रात को नींद का त्याग करना चाहिए. एकादशी को दिन और रात्रि में भजन सत्संग आदि शुभ कर्म करने चाहिए. उस दिन श्रद्वापूर्वक ब्राह्माणों को दक्षिणा देनी चाहिए. और उनसे अपनी गलतियों की क्षमा मांगनी चाहिए. और अगर संभव हों, तो इस मास के दोनों पक्षों की एकादशी के व्रतों को करना चाहिए.

उत्पन्ना एकादशी व्रत फल | Fruits of Utpanna Ekadashi Vrat

इस विधि के अनुसार जो व्यक्ति व्रत करता है, उनको तीर्थ और दर्शन करने से जो पुन्य़ मिलता है. वह एकादशी व्रत के पुन्य के सोलहवें, भाग के बराबर भी नही़ है. इसके अतिरिक्त  व्यतीपात योग, संक्रान्ति में तथा चन्द्र-सूर्य ग्रहण में दान देने से और कुरुक्षेत्र में स्नान करने से जो पुन्य मिलता है. वही पुन्य मनुष्य को एकादशी का व्रत करने से प्राप्त होता है. दश श्रेष्ठ ब्राह्माणों को भोजन कराने से जो पुन्य मिलता है. वह पुन्य एकादशी के पुन्य के दशवें भाग के बराबर होता है.
  
निर्जल व्रत करने का आधा फल एक बार भोजन करने के बराबर होता है. एकादशी का व्रत करने से ही यज्ञ, दान, तप आदि मिलते है. अन्यथा नही, अत: एकादशी को अवश्य ही करना चाहिए. इस व्रत में शंख से जल नहीं पीना चाहिए. एकादही व्रत का फल हजार यज्ञों से भी अधिक है. 

उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा | Utpanna Ekadasi Fast Story in Hindi 

सतयुग में एक महा भयंकर दैत्य हुआ था. उसका नाम मुर था. उस दैत्य ने इन्द्र आदि देवताओं पर विजय प्राप्त कर उन्हें, उनके स्थान से गिरा दिया. तब देवेन्द्र ने महादेव जी से प्रार्थना की " हे शिव-शंकर, हम सब देवता मुर दैत्य के अत्याचारों से दु:खित हो, मृ्त्युलोक में अपना जीवन व्यतीत कर रहे है.
  
आप कृपा कर इस विपति से बाहर आने का उपाय बतलाईये़. शंकरजी बोले इसके लिये आप श्री विष्णु जी की शरण में जाईये.  इन्द्र तथा अन्य देवता महादेवजी के बचनों को सुनकर क्षीर सागर गये. जहां पर भगवान श्री विष्णु शेषशय्या पर शयन कर रहे थे़ भगनान को शयन करते देखकर, देवताओं सहित सभी ने श्री विष्णु जी दैत्य के अत्याचारों से मुक्त होने के लिये विनती की.
श्री विष्णु जी ने बोला की यह कौन सा दैत्य है, जिसने देवताओं को भी जीत लिया है. यह सुनके दैत्य के विषय में देवराज इन्द्र बताने लगे, उस दैत्य की ब्रह्मा वंश में उत्पत्ति हुई थी, उसी दैत्य के पुत्र का नाम मुर है. उसकी राजधानी चन्द्रावती है. उस चन्द्रावती नगरी में वह मुर नामक दैत्य निवास करता है. जिसने अपने बल से समस्त विश्व को जीत लिया है. और सभी देवताओं पर उसने राज कर लिया. इस दैत्य ने अपने कुल के इन्द्र, अग्नि, यम, वरूण, चन्द्रमा, सूर्य आदि लोकपाल बनाये है. वह स्वयं सूर्य बनकर सभी को तपा रहा है.  और स्वयं ही मेघ बनकर जल की वर्षा कर रहा है. अत: आप उस दैत्य से हमारी रक्षा करें.
इन्द्र देव के ऎसे वचन सुनकर भगवान श्री विष्णु बोले -देवताओं मै तुम्हारे शत्रुओं का शीघ्र ही संकार करूंगा. अब आप सभी चन्द्रावती नगरी को चलिए. इस प्रकार भगवान विष्णु देवताओं के साथ चल रहा था. उस समय दैत्यपति मुर अनेकों दैत्यों के साथ युद्ध भूमि में  गरज रहा था. दैत्य ने देवताओं को देखा तो उसने देवताओं से भी युद्ध प्रारम्भ कर दिया.
जब दैत्यों ने भगवान श्री विष्णु जी को युद्ध भूमि में देखा तो उन पर अस्त्रों-शस्त्रों का प्रहार करने लगे. भगवान श्री विष्णु मुर को मारने के लिये जिन-जिन शास्त्रों का प्रयोग करते वे सभी उसके तेज से नष्ट होकर उस पर पुष्पों के समान गिरने लगे़ भगवान श्री विष्णु उस दैत्य के साथ सहस्त्र वर्षों तक युद्ध करते रहे़ परन्तु उस दैत्य को न जीत सके. 
अंत में विष्णु जी शान्त होकर विश्राम करने की इच्छा से बद्रियाकाश्रम में एक लम्बी गुफा में वे शयन करने के लिये चले गये. दैत्य भी उस गुफा में चला गया, कि आज मैं श्री विष्णु को मार कर अपने सभी शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर लूंगा. उस समय गुफा में एक अत्यन्त सुन्दर कन्या उत्पन्न हुई़ और
दैत्य के सामने आकर युद्ध करने लगी. दोनों में देर तक युद्ध हुआ. उस कन्या ने उसको धक्का मारकर मूर्छित कर दिया. 
और उठने पर उस दैत्य का सिर काट दिया. वह दैत्य सिर कटने पर मृ्त्यु को प्राप्त हुआ. उसी समय श्री विष्णु जी की निद्रा टूटी तो उस दैत्य को किसने मारा वे ऎसा विचार करने लगे. यह दैत्य आपको मारने के लिये तैयार था. तब मैने आपके शरीर से उत्पन्न होकर इसका वध किया है. भगवान श्री विष्णु ने उस कन्या का नाम एकादशी रखा क्योकि वह एकादशी के दिन श्री विष्णु के शरीर से उत्पन्न हुई थी.  

Mokshada Ekadashi - Vrat Vidhi (Geeta Jayanthi Ekadasi)


17. मोक्षदा एकादशी

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मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोक्षदा एकादशी  कहा जाता है. इसी दिन भगवान श्री कृ्ष्ण ने महाभारत के प्रारम्भ होने से पूर्व अर्जुन को श्रीमद भगवतगीता का उपदेश दिया था. इस दिन श्री कृ्ष्ण व गीता का पूजन करना चाहिए. इसके बाद आरती करके उसका पाठ करना चाहिए. मोक्षदा एकाद्शी को दक्षिण भारत में वैकुण्ठ एकादशी के नाम से भी जाना जता है. 
गीता में भगवान श्री कृ्ष्ण ने कर्मयोग पर विशेष बल दिया है. ब्राह्राण भोजन कराकर दान आदि कार्य करने से विशेष फल प्राप्त होते है. वर्ष 2011 में यह एकादशी 6 दिसम्बर की रहेगी. मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी अनेकों पापों को नष्ट करने वाली है. यह एकादशी मोक्षदा के नाम से प्रसिद्ध है. इस दिन भगवान श्री दामोदर की पूजा, धूप, दीप नैवेद्ध आदि से भक्ति पूर्वक करनी चाहिए.  

मोक्षदा एकाद्शी व्रत विधि | Mokshada Ekadashi Vrat Vidhi

एकादशी व्रत के दिन मुख्य रुप से दस वस्तुओं का सेवन नहीं किया जाता है. जौ, गेहूं, उडद, मूंग, चना, चावल और मसूर की दाल दशमी तिथि के दिन नहीं खानी चाहिए. इसके अतिरिक्त मांस और प्याज आदि वस्तुओं का भी त्याग करना चाहिए. दशमी तिथि के दिन उपवासक को ब्रह्माचार्य करना चाहिए. और अधिक से अधिक मौन रहने का प्रयास करना चाहिए. बोलने से व्यक्ति के द्वारा पाप होने की संभावनाएं बढती है, यहां तक की वृ्क्ष से पत्ता भी नहीं तोडना चाहिए.  
व्रत के दिन मिट्टी के लेप से स्नान करने के बाद ही मंदिर में पूजा करने के लिये जाना चाहिए. मंदिर या घर में श्री विष्णु पाठ करना चाहिए. और भगवान के सामने व्रत का संकल्प लेना चाहिए. दशमी तिथि के दिन विशेष रुप से चावल नहीं खाने चाहिए. परिवार के अन्य सदस्यों को भी इस दिन चावल खाने से बचना चाहिए.
व्रत में भोग लगाने के लिये फलों का प्रयोग करना चाहिए. इस व्रत का समापन द्वादशी तिथि के दिन ब्राह्माणों को दान-दक्षिणा देने के बाद ही होता है. व्रत की रात्रि में जागरण करने से व्रत से मिलने वाले शुभ फलों में वृ्द्धि होती है.         

मोक्षदा एकाद्शी व्रत कथा | Geeta Jayanthi Ekadasi Vrat Katha

मोक्षदा एकादशी व्रत को करने से व्यक्ति के पूर्वज जो नरक में चले गये है, उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति होती है. इसकी कथा इस प्रकार है. प्राचीन गोकुल नगर में वैखानस नाम का एक राजा राज्य करता था. उसके राज्य में चारों वेदों के ज्ञाता ब्राह्माण रहते थे. एक रात्रि को स्वप्न में राजा ने अपने पिता को नर्क मे पडा देखा, अपने पिता को इस प्रकार देख कर उसे बहुत दु:ख हुआ. 
प्रात:काल होते ही वह ब्राह्माणों के सामने अपनी स्वप्न कथा कहने लगा. अपने पिता को इस प्रकार देख कर मुझे सभी ऎश्वर्य व्यर्थ महसूस हो रही है. आप लोग मुझे किसी प्रकार का तप,दान, व्रत आदि बताएं, जिससे मेरे पिता को मुक्ति प्राप्त हों. राजा के ऎसे वचन सुनकर ब्राह्माण बोले, यहां समीप ही एक भूत-भविष्य के ज्ञाता एक "पर्वत" नाम के मुनि है. आप उनके पास जाईए, वे आपको इसके बारे में बतायेगें. 
राजा ऎसा सुनकर मुनि के आश्रम पर गए़ उस आश्रम में अनेकों मुनि शान्त होकर तपस्या कर रहे थे. राजा ने जाकर  ऋषि को प्रणाम करके बताया कि अकस्मात एक विध्न आ गया है. यह सुनकर मुनि ने आंखे बंद कर ली. और कुछ देर बाद मुनि बोले कि आपके पिता ने अपने पिछले जन्म में एक दुष्कर्म किया था. उसी पाप कर्म के फल से तुम्हारा पिता नर्क में गए है.   
यह सुनकर राजा ने अपने पिता के उद्वार की प्रार्थना ऋषि से की. मुनि राजा की विनती पर बोले की मार्गशीर्ष मसके शुक्ल पक्ष में जो एकादशी होती है. उस एकादशि का आप उपवास करें. उस एकादशी के पुन्य के प्रभाव से ही आपके पिता को मुक्ति मिलेगी. मुनि के वचनों को सुनकर उसने अपने कुटुम्ब सहित मोक्षदा एकादशी का उपवास किया. उस उपवास के पुन्य को राजा ने अपने पिता को दे दिया. उस पुन्य के प्रभाव से राजा के पिता को मुक्ति मिल गई. और वे स्वर्ग में जाते हुए अपने पुत्र से बोले, हे पुत्र तुम्हारा कल्याण हों, यह कहकर वे स्वर्ग चले गए. 

Saphala Ekadasi Vrat Vidhi-Katha


18. सफला एकादशी



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सफला एकादशी व्रत पौष मास के कृ्ष्ण पक्ष की एकाद्शी के दिन किया जाता है. इस दिन भगवान नारायण की पूजा का विशेष विधि-विधान है. इस व्रत को धारण करने वाले व्यक्ति को व्रत के दिन प्राता: स्नान करके, भगवान कि आरती करनी चाहिए. और भगवान को भोग लगाना चाहिए. ब्राह्मणों तथा गरीबों, को भोजन अथवा दान देना चाहिए. रात्रि में जागरण करते हुए कीर्तन पाठ आदि करना चाहिए. रात्रि में जागरण करते हुए कीर्तन पाठ करना अत्यन्त फलदायी रहता है. इस व्रत को करने से समस्त कार्यो में सफलता मिलती है. यह एकादशी अपने नाम के अनुसार व्यक्ति को सफलता देती है.   

सफला एकादशी व्रत फल | Saphala Ekadashi Vrat Benefits

पौष माह के कृ्ष्ण पक्ष की एकाद्शी का नाम सफला है. इस एकाद्शी के देवता नारायण है. सफला एकादशी के विषय में कहा गया है, कि यह एकाद्शी व्यक्ति को सहस्त्र वर्ष तपस्या करने से जिस पुन्य की प्रप्ति होती है. वह पुन्य भक्ति पूर्वक रात्रि जागरण सहित सफला एकादशी का व्रत करने से मिलता है. 
एकादशी का व्रत करने से जो पुन्य प्राप्त होता है, वह पुन्य कुरुक्षेत्र तीर्थ स्थान में सूर्यग्रहण के समय स्नान करने से भी प्राप्त नहीं होता है. सफला एकादशी से कई पीढियों के पाप दूर होते है. एकादशी व्रत व्यक्ति के ह्रदय को शुद्ध करता है. और जब यह व्रत श्रद्वा और भक्ति के साथ किया जाता है. तो मोक्ष देता है. 

सफला एकादशी व्रत विधि | Safala Ekadasi Vrat Vidhi

सफला एकादशी के व्रत में देव श्री नारायण का पूजन किया जाता है. जिस व्यक्ति को सफला एकाद्शी का व्रत करना हों. जिस व्यक्ति को यह व्रत करना हो, उस व्यक्ति के लिए व्रत के नियम दशमी तिथि से ही प्रारम्भ हो जाते है. उसे व्रत के दिन व्रत के सामान्य नियमों का पालन करना चाहिए. और जहां, तक हो सके व्रत के दिन उसे सात्विक भोजन करना चाहिए. तथा भोजन में उसे नमक का प्रयोग बिल्कुल नहीं करना चाहिए. भोजन के लिये तांबे के बर्तन का प्रयोग करना भी उचित नहीं रह्ता है. दशमी तिथि कि रात्रि में एक बार ही भोजन करना चाहिए. 
एकादशी के दिन उपवासक को शीघ्र उठकर, स्नाना आदि कार्यो से निवृ्त होने के बाद व्रत का संकल्पभगवान श्री विष्णु के सामने लेना चाहिए. संकल्प लेने के बाद धूप, दीप, फल आदि से भगवान श्री विष्णु और नारायण देव का पंचामृ्त से पूजन करना चाहिए. 
उपवासक को व्रत के दिन की अवधि में दिन में सोना नहीं चाहिए. और रात्रि में भी उसे विष्णु नाम का पाठ करते हुए जागरण करना चाहिए. द्वादशी तिथि के दिन स्नान करने के बाद ब्राह्माणों को अन्न और धन की दक्षिणा देकर इस व्रत का समापन किया जाता है.    

सफला एकादशी व्रत कथा | Saphala Ekadashi Vrat Katha in Hindi

चम्पावती नगरी में एक महिष्मान नाम का राजा राज्य करता था. उस राजा के चार पुत्र थें. उन पुत्रों में सबसे बडा लुम्पक, नाम का पुत्र महापापी था. वह हमेशा बुरे कार्यो में लगा रहता था. यहां तक की ऎसे कार्यो में अपने पिता क धन व्यर्थ करने से भी पीछे नहीं हटता था.   
वह सदैव देवता, ब्राह्माण, वैष्णव आदि की निन्दा किया करता था. जब उसके पिता को अपने बडे पुत्र के बारे में ऎसे समाचार प्राप्त हुए, तो उसने उसे अपने राज्य से निकाल दिया. जब लुम्पक सबके द्वारा त्याग दिया गया, तब वह सोचने लगा, कि अब मैं क्या करूं.? कहाँ जाऊँ? अन्त में उसने रात्रि को पिता की नगरी में चोरी करने की ठानी.
वह दिन में बाहर रहने लगा और रात को अपने पिता कि नगरी में जाकर चोरी तथा अन्य बुरे कार्य करने लगा. रात्रि में जाकर निवासियों को मारने और कष्ट देने लगा. पहरेदान उसे पकडते और राजा का पुत्र मानकर छोड देते थे. जिस वन में वह रहता था. वह भगवान को बहुत प्रिय था. उस वन में एक बहुत पुराना पीपल का वृक्ष के नीचे, महापापी लुम्पक रहता था. कुछ दिनों के बाद पौष माह के कृ्ष्ण पक्ष की दशमी के दिन वह शीत के कारण मूर्छित हो गया. शीत के कारण उसके हाथ-पैर जकड गयें. उस दिन वह रात्रि उसने बडी कठिनता से बिताई. अगले दिन प्रात: होने पर भी उसकी मूर्छा न गई. दोपहर में गर्मी होने पर उसे होश आया.  
शरीर में कमजोरी होने के कारण वह कुछ खा भी न सकें, आसपास उसे जो फल मिलें, उसने वे पीपल कि जड के पास रख दिये. और कहा कि इन फलों को हे भगवान आप ही खा लिजिए. ऎसा कहकर वह फिर से मूर्छित गया. रात्रि में उसकी मूर्छा खुली. उस महापापी के इस व्रत से तथा रात्रि जागरण से भगवान अत्यन्त प्रसन्न हुए. और उसके समस्त पाप नष्ट हो गये़ 
लुम्पक ने जब अपने सभी पाप नष्ट होने की बात सुनी तो वह बहुत प्रसन्न हुआ. वह शीघ्र सुन्दर वस्त्र धारन कर अपने पिता के पास गया. उसके पिता ने उसे अपना राज्य सौंपकर वन का रास्ता लिया.

Putrada Ekadashi Katha-Vidhi


19. पुत्रदा एकादशी व्रत

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Putrada Ekadashi Vrat

हिन्दु कैलेण्डर के अनुसार प्रतिवर्ष पुत्रदा एकादशी का व्रत पौष माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है. इस दिन भगवान नारायण की पूजा की जाती है. सुबह स्नान आदि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करने के पश्चात श्रीहरि का ध्यान करना चाहिए. सबसे पहले धूप-दीप आदि से भगवान नारायण की अर्चना की जाती है, उसके बाद  फल-फूल, नारियल, पान, सुपारी, लौंग, बेर, आंवला आदि व्यक्ति अपनी सामर्थ्य अनुसार भगवान नारायण को अर्पित करते हैं. पूरे दिन निराहार रहकर संध्या समय में कथा आदि सुनने के पश्चात फलाहार किया जाता है. इस दिन दीप दान करने का महत्व है.

पुत्रदा एकादशी व्रत का महत्व | Importance of Putrada Ekadashi Fast

इस व्रत के नाम के अनुसार ही इसका फल है. जिन व्यक्तियों को संतान होने में बाधाएं आती है अथवा जो व्यक्ति पुत्र प्राप्ति की कामना करते हैं उनके लिए पुत्रदा एकादशी का व्रत बहुत ही शुभफलदायक होता है. इसलिए संतान प्राप्ति के लिए इस व्रत को व्यक्ति विशेष को अवश्य रखना चाहिए, जिससे उसे मनोवांछित फलों की प्राप्ति हो सके (By observing this fast a person may get his wish of having a child fulfilled).

पुत्रदा एकादशी व्रत की कथा | Putrada Ekadashi Fast Story

प्राचीन काल में भद्रावतीपुरी नगर में राजा सुकेतुमान राज्य करते थे.  शादी के कई वर्ष बीत जाने पर भी उनको पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई. राजा और उसकी रानी दोनों इस बात को लेकर चिन्ताग्रस्त रहते थे. दोनों सदैव ही शोकाकुल रहने लगे. राजा के पितर भी यह सोचकर चिन्ताग्रस्त थे कि राजा का वंश आगे न चलने पर उन्हें तर्पण कौन करेगा औन उनका पिण्ड दान करेगा. राजा भी इसी चिन्ता से अधिक दु:खी थे कि उनके मरने के बद उन्हें कौन अग्नि देगा. एक दिन इसी चिन्ता से ग्रस्त राजा सुकेतुमान अपने घोडें पर सवार होकर वन की ओर चल दिए. वन में चलते हुए वह अत्यन्त घने वन में चले गए जहाँ तरह-तरह के जानवरों की आवाजें सुनाई दे रही थी.

वन में चलते-चलते राजा को बहुत प्यास लगने लगी. वह पानी की तलाश में वन में और अंदर की ओर चले गए जहाँ उन्हें एक सरोवर दिखाई दिया. राजा ने देखा कि सरोवर के पास ऋषियों के आश्रम भी बने हुए है और बहुत से मुनि वेदपाठ कर रहे हैं. राजा अपने घोडे़ से उतरा उसने सरोवर से पानी  पीया. तभी राजा का दांया नेत्र फड़कने लगा. राजा ने इसे शुभ संकेत समझा. राजा ने सभी मुनियों को बारी-बारी से सादर प्रणाम किया. ऋषियों ने राजा को आशीर्वाद दिया और बोले कि राजन हम आपसे प्रसन्न हैं. तब राजा ने ऋषियों से उनके एकत्रित होने का कारण पूछा. मुनि ने कहा कि वह विश्वेदेव हैं और सरोवर के निकट स्नान के लिए आये हैं. आज से पाँचवें दिन माघ मास का स्नान आरम्भ हो जाएगा और आज पुत्रदा एकादशी है. जो मनुष्य इस दिन व्रत करता है उन्हें पुत्र की प्राप्ति होती है.

राजा सुकेतुमान ने यह सुनते ही कहा हे विश्वेदेवगण यदि आप सभी मुझ पर प्रसन्न हैं तब आप मुझे पुत्र रत्न की प्राप्ति का आशीर्वाद दें. मुनि बोले हे राजन आज पुत्रदा एकादशी का व्रत है.आप आज इस व्रत को रखें और भगवान नारायण की आराधना करें. राजा ने मुनि के कहे अनुसार विधिवत तरीके से पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा. विधिवत तरीके से अनुष्ठान किया. अगले दिन द्वादशी को पारण किया. इसके बाद राजा ने सभी मुनियों को बार-बार झुककर प्रणाम किया और अपने महल में वापिस आ गये. कुछ समय के पश्चात रानी गर्भवती हो गई. नौ महीने बाद रानी ने एक सुकुमार पुत्र को जन्म दिया, जो आगे चलकर शूरवीर तथा प्रजापालक बना.

इस प्रकार जो व्यक्ति इस व्रत को रखते हैं उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है. संतान होने में यदि बाधाएं आती हैं तो इस व्रत के रखने से वह दूर हो जाती हैं. जो मनुष्य इस व्रत के महात्म्य को सुनता है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है.

Shatatila Ekadashi Vrat Katha-Vidhi


20. षटतिला एकादशी व्रत

हिन्दु कैलेण्डर के अनुसार प्रतिवर्ष माघ मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को षटतिला एकादशी का व्रत रखा जाता है. षटतिला एकादशी के दिन तिलों का छ: प्रकार से उपयोग किया जाता है. जैसे - तिल से स्नान करना, तिल का उबटन लगाना, तिल से हवन करना, तिल से तर्पण करना, तिल का भोजन करना और तिलों का दान करना - ये छ: प्रकार के उपयोग हैं. इसलिए इसे षटतिला एकादशी व्रत कहा जाता है.
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षटतिला एकादशी व्रत का महत्व | Importance of Shatatila Ekadashi Vrat

इस दिन जो व्यक्ति श्रद्धा भाव से षटतिला एकादशी का व्रत रखते हैं, उनके सभी पापों का नाश होता है. इसलिए माघ मास में पूरे माह व्यक्ति को अपनी समस्त इन्द्रियों पर काबू रखना चाहिए. काम, क्रोध, अहंकार, बुराई तथा चुगली का त्याग कर भगवान की शरण में जाना चाहिए. माघ माह की कृष्ण पक्ष की एकादशी को व्रत रखना चाहिए. इससे मनुष्य के सभी पाप समाप्त हो जाएंगें तथा उसे स्वर्ग की प्राप्ति होगी. 
षटतिला एकादशी व्रत विधि | Shatatila Ekadashi Fast Method

एक बार दालभ्य ऋषि ने पुलस्त्य ऋषि से पूछा कि पृथ्वी लोक पर मनुष्य अनेक प्रकार के दुर्व्यसनों मेम फंसा रहता है, अन्य लोगों की चुगलियाँ करता है. ब्राह्मण हत्या, चोरी तथा अन्य बहुत से पाप कर्म करता है फिर भी उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है. दालभ्य ऋषि बोले कि आप मुझे ये बताएं कि ये मनुष्य कौन सा दान अथवा पुण्य कर्म करते हैं जिससे इनके सभी पापों का नाश होता है. तब पुलस्त्य ऋषि ने कहा कि हे ऋषिवर आज मैं आपको वह भेद बताता हूँ जो आज तक किसी को स्वर्ग लोक में भी नहीं पता है. ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा देवताओं के देव इन्द्र को भी इस भेद के बारे में जानकारी नहीं है.


पुलस्त्य ऋषि ने कहा कि माघ मास लगते ही मनुष्य को सुबह स्नान आदि करके शुद्ध रहना चाहिए.अपनी समस्त इन्द्रियों को अपने संयम रखकर भगवान का स्मरण करना चाहिए. व्यक्ति पुष्य नक्षत्र में तिल तथा कपास को गोबर में मिलाकर उसके 108 कण्डे बनाकर रख लें. माघ मास की षटतिला एकादशी को सुबह स्नान आदि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें. व्रत करने का संकल्प करके भगवान विष्णु जी का ध्यान करना चाहिए. यदि व्रत आदि में किसी प्रकार की भूल हो जाए तब भगवान कृष्ण जी से क्षमा याचना करनी चाहिए. रात्रि में गोबर के 108 कंडों से हवन करना चाहिए. रात भर जागरण करके भगवान का भजन करना चाहिए. अगले दिन धूप-दीप और नैवेद्य से भगवान का भजन-पूजन करने के पश्चात खिचडी़ का भोग लगाना चाहिए. यदि किसी व्यक्ति के पास पूजन की पर्याप्त सामग्री उपलब्ध नहीं है तब वह सौ सुपारियों से भगवान का पूजन कर सकता है तथा अर्ध्यदान कर सकता है. अर्ध्य देते समय आप निम्न मंत्र का उच्चारण करना चाहिए -


कृष्ण कृष्ण कृपालुस्त्वमगतीनां गतिर्भव ।
संसारार्णवमग्नानां प्रसीद पुरुषोत्तम ॥
नमस्ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन ।
सुब्रह्मण्य नमस्तेSस्तु महापुरुष पूर्वज ॥
गृहाणार्ध्यं मया दत्तं लक्ष्म्या सह जगत्पते ।। 



व्यक्ति इस प्रार्थना को ऎसे भी बोल सकते हैं कि हे प्रभु आप दीनों को शरण देने वाले हैं. संसार के सागर में फंसे हुए लोगों का उद्धार करने वाले हैं. हे पुंडरीकाक्ष ! हे विश्वभावन ! हे सुब्रह्मण्य ! हे पूर्वज ! हे जगत्पते ! आपको नमस्कार है. आप लक्ष्मी जी सहित मेरे दिए अर्ध्य को स्वीकार करें. इसके बाद व्यक्ति को ब्राह्मण की पूजा करनी चाहिए. ब्राह्मण को जल से भरा घडा़, छाता, जूते तथा वस्त्र देने चाहिए. इसके अतिरिक्त यदि किसी व्यक्ति की सामर्थ्य है तब वह काली गाय का दान ब्राह्मण को कर सकता है. जो भी व्यक्ति इस षटतिला एकादशी के व्रत को करता है उसे तिलों से भरा घडा़ भी ब्राह्मण को दान करना चाहिए. जितने तिलों का दान वह करेगा उतने ही ह्जार वर्ष तक वह स्वर्गलोक में रहेगा. 
 
षटतिला एकादशी व्रत कथा | Shatatila Ekadashi Fast Story

एक बार भगवान विष्णु ने नारद जी को एक सत्य घटना से अवगत कराया और नारदजी को एक षटतिला एकादशी के व्रत का महत्व बताया. इस एकादशी को रखने की जो कथा भगवान विष्णु जी ने नारद जी को सुनाई वह इस प्रकार से है -


प्राचीन काल में पृथ्वी लोक में एक ब्राह्मणी रहती थी. वह हमेशा व्रत करती थी लेकिन किसी ब्राह्मण अथवा साधु को कभी दान आदि नहीं देती थी. एक बार उसने एक माह तक लगातार व्रत रखा. इससे उस ब्राह्मणी का शरीर बहुत कमजोर हो गया था. तब भगवान विष्णु ने सोचा कि इस ब्राह्मणी ने व्रत रख कर अपना शरीर शुद्ध कर लिया है अत: इसे विष्णु लोक में स्थान तो मिल जाएगा परन्तु इसने कभी अन्न का दान नहीं किया,. इससे ब्राह्मणी की तृप्ति होना कठिन है. इसलिए भगवान विष्णु ने सोचा कि वह भिखारी का वेश धारण करके उस ब्राह्मणी के पास जाएंगें और उससे भिक्षा मांगेगे. यदि वह भिक्षा दे देती है तब उसकी तृप्ति अवश्य हो जाएगी और भगवान विष्णु भिखारी के वेश में पृथ्वी लोक पर उस ब्राह्मणी के पास जाते हैं और उससे भिक्षा माँगते हैं. वह ब्राह्मणी विष्णु जी से पूछती है - महाराज किसलिए आए हो? विष्णु जी बोले मुझे भिक्षा चाहिए. यह सुनते ही उस ब्राह्मणी ने मिट्टी का एक ढे़ला विष्णु जी के भिक्षापात्र में डाल दिया. विष्णु जी उस मिट्टी के ढेले को लेकर स्वर्गलोक में लौट आये.


कुछ समय के बाद ब्राह्मणी ने अपना शरीर त्याग दिया और स्वर्ग लोक में आ गई. मिट्टी का ढेला दान करने से उस ब्राह्मणी को स्वर्ग में सुंदर महल तो मिल गया परन्तु उसने कभी अन्न का दान नहीं किया था इसलिए महल में अन्न आदि से बनी कोई सामग्री नहीं थी. वह घबराकर विष्णु जी के पास गई और कहने लगी कि हे भगवन मैंने आपके लिए व्रत आदि रखकर आपकी बहुत पूजा की उसके बावजूद भी मेरे घर में अन्नादि वस्तुओं का अभाव है. ऎसा क्यों है? तब विष्णु जी बोले कि तुम पहले अपने घर जाओ. तुम्हें मिलने और देखने के लिए देवस्त्रियाँ आएँगी, तुम अपना द्वार खोलने से पहले उनसे षटतिला एकादशी की विधि और उसके महात्म्य के बारे में सुनना तब द्वार खोलना. ब्राह्मणी ने वैसे ही किया. द्वार खोलने से पहले षटतिला एकादशी व्रत के महात्म्य के बारे में पूछा. एक देवस्त्री ने ब्राह्मणी की बात सुनकर उसे षटतिला एकादशी व्रत के महात्म्य के बारे में जानकारी दी. उस जानकारी के बाद ब्राह्मणी ने द्वार खोल दिए. देवस्त्रियों ने देखा कि वह ब्राह्मणी न तो गांधर्वी है और ना ही आसुरी है. वह पहले जैसे मनुष्य रुप में ही थी. अब उस ब्राह्मणी को दान ना देने का पता चला. अब उस ब्राह्मणी ने देवस्त्री के कहे अनुसार षटतिला एकादशी का व्रत किया. इससे उसके समस्त पापों का नाश हो गया. वह सुंदर तथा रुपवति हो गई. अब उसका घर अन्नादि सभी प्रकार की वस्तुओं से भर गया.


इस प्रकार सभी मनुष्यों को लालच का त्याग करना चाहिए. किसी प्रकार का लोभ नहीं करना चाहिए. षटतिला एकादशी के दिन तिल के साथ अन्य अन्नादि का भी दान करना चाहिए. इससे मनुष्य का सौभाग्य बली होगा. कष्ट तथा दरिद्रता दूर होगी. विधिवत तरीके से व्रत रखने से स्वर्ग लोक की प्राप्ति होगी.

Jaya Ekadashi Vrat Vidhi-Katha


21. जया एकादशी व्रत

Jaya Ekadasi
जया एकाद्शी व्रत माघ मास की शुक्ल पक्ष की एकाद्शी को किया जाता है.  इस तिथि को भगवान केशव की पुष्प, जल, अक्षत, रोली तथा सुंगन्धित पदार्थों से पूजन किया  जाता है.  जया एकादशी के दिन व्रत कर श्री कृष्ण की आरती की जाती है. भगवान को भोग लगाये गये प्रसाद को बांटकर स्वयं भी खाया जाता है. 

जया एकादशी व्रत महत्व | Importance of Jaya Ekadashi Vrat 

माघ मास के शुक्लपक्ष की एकाद्शी तिथि के दिन जो एकादशी होती है, उसका नाम जया एकादशी है.  यह एकादशी सभी पापों को हरने वाली और उतम कही गई है. पवित्र होने के कारण यह उपवासक के सभी पापों का नाश करती है. तथा इसका प्रत्येक वर्ष व्रत करने से मनुष्यों को भोग और मोक्ष की प्राप्ति होती है. यहां तक की इस एकादशी को ब्रह्महत्या जैसे पापों से भी मुक्ति मिलती है.    

जया एकादशी व्रत विधि | Jaya Ekadashi Vrat Vidhi

एकादशी व्रत में श्री भगवान विष्णु जी का पूजन किया जाता है. परन्तु जया एकाद्शी में श्री केशव के साथ साथ श्री विष्णु जी का पूजन करना चाहिए. जिस व्यक्ति को यह व्रत करना हो, उसे व्रत से एक दिन पूर्व स्वयं को मानसिक रुप से व्रत के लिये तैयार करना चाहिए. दशमी तिथि की संध्या में भोजन करने के बादएकाद्शी तिथि के प्रात:काल में जया एकादशी व्रत का संकल्प लेना चाहिए. और उसके बाद धूप, दीप, फल से पहले श्री कृ्ष्ण जी की पूजा करनी चाहिए. और इसके बाद में श्री विष्णु जी का भी पंचामृ्त से पूजन करना चाहिए.   
पूरे दिन व्रत करें, और रात्रि में जागरण करने का विधि-विधान होता है. विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करते हुए, पूरी रात्रि जागरण करना शुभ होता है. अगर रात्रि में व्रत करना संभव न हों तो रात्रि में फलाहार किया जा सकता है. द्वादशी के दिन प्रात: स्नान करने के बाद ब्राह्माणों को भोजन कराना चाहिए. और यथा सामर्थय दक्षिणा देकर विदा करना चाहिए. इससे जीवन के सभी पापों से मुक्ति मिलती है.   

जया एकादशी व्रत कथा | Jaya Ekadshi Vrat Katha in Hindi

एक समय की बात है, इन्द्र की सभा में एक गंधर्व गीत गा रहा था. परन्तु उसका मन अपनी प्रिया को याद कर रहा है. इस कारण से गाते समय उसकी लय बिगड गई. इस पर इन्द्र ने क्रोधित होकर उसे श्राप दे दिया, कि तू जिसकी याद में खोया है. वह राक्षसी हो जाए. 
देव इन्द्र की बात सुनकर गंधर्व ने अपनी गलती के लिये इन्द्र से क्षमा मांगी, और देव से विनिती की कि वे अपना श्राप वापस ले लें. परन्तु देव इन्द्र पर उसकी प्रार्थना का कोई असर न हुआ. उन्होने उस गंधर्व को अपनी सभा से बाहर निकलवा दिया. गंधर्व सभा से लौटकर घर आया तो उसने देखा की उसकी पत्नी वास्तव में राक्षसी हो गई.
अपनी पत्नी को श्राप मुक्त करने के लिए, गंधर्व ने कई यत्न किए. परन्तु उसे सफलता नहीं मिली. अचानक एक दिन उसकी भेंट ऋषि नारद जी से हुई. नारद जी ने उसे श्राप से मुक्ति पाने के लिये माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत और भगवत किर्तन करने की सलाह दी. नारद जी के कहे अनुसार गंधर्व ने एकाद्शी का व्रत किया. व्रत के शुभ प्रभाव से उसकी पत्नी राक्षसी देह से छुट गई.   

व्रत के दिन ध्यान रखने योग्य बातें | Things to Remember for Jaya Ekadashi Fast

एकादशी का व्रत करने वाले को दशमी के दिन से निम्नलिखित विषयों का त्याग करना चाहिए.
1. व्रत के दिन जुआ नहीं खेलना चाहिए.
2. दिन में शयन नहीं करना चाहिए.
3. व्रत कि रात्रि में भी श्री विष्णु पाठ का जाप करते हुए जागरण करना चाहिए.
4. पान नहीं खाना चाहिए.
5. दांतुन नहीं करना चाहिए.
6. दूसरे की निन्दा नहीं करनी चाहिए.
7. दुष्टजनों का साथ नहीं देना चाहिए.
8.  झूठ नहीं बोलना चाहिए.
9. पूर्ण ब्रह्माचार्य का पालन करना चाहिए.
10. दशमी तिथि में रात्रि में दूसरी बार भोजन नहीं करना चाहिए.
11. इसके अतिरिक्त शहद, शाक, करोदों, चना, मसूर की दाल, मांस, जौ का सेवन नहीं करना चाहिए. 

Vijaya Ekadashi Vrat Katha-Vidhi



22. विजया एकादशी व्रत

प्रत्येक चन्द्र मास में दो एकादशी होती है. इस प्रकार एक वर्ष में 24 एकादशी होती है. जिस वर्ष में अधिमास होता है. उस वर्ष में 26 एकादशियां होती है. एकादशी का शाब्दिक अर्थ चन्द मास की ग्यारहवीं तिथि से है. चन्द्र माह के दो भाग होते है. एक कृष्ण पक्ष और दुसरा शुक्ल पक्ष. दोनों पक्षों की ग्यारवीं तिथि एकादशी तिथि कहलाती है.
सभी एकदशियों के अलग-अलग नाम है. माह और पक्ष के अनुसार एकादशी व्रत का नाम रखा गया है. जैसे-फाल्गुण मास के कृष्ण पक्ष की एकाद्शी को विजया एकादशी के नाम से जाना जाता है. एकादशी व्रत करने से व्यक्ति के शुभ फलों में वृ्द्धि होती है. और पाप कर्मों का नाश होता है.  एकादशी व्रत करने से उपावासक व्रत से संबन्धित मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है. सभी एकादशी अपने नाम के अनुरुप फल देती है. 

विजया एकादशी व्रत विधि | Vijaya Ekadasi Vrat Vidhi 

एकाद्शी व्रत के विषय में यह मान्यता है, कि एकादशी व्रत करने से स्वर्ण दान, भूमि दान, अन्नदान और गौदान से अधिक पुन्य फलों की प्राप्ति होती है. एकादशी व्रत के दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है. व्रत पूजन में धूप, दीप, नैवेध, नारियल का प्रयोग किया जाता है.    
विजया एकादशी व्रत में सात धान्य घट स्थापना की जाती है. सात धान्यों में गेंहूं, उड्द, मूंग, चना, जौ, चावल और मसूर है. इसके ऊपर श्री विष्णु जी की मूर्ति रखी जाती है. इस व्रत को करने वाले व्यक्ति को पूरे दिन व्रत करने के बाद रात्रि में विष्णु पाठ करते हुए जागरण करना चाहिए. 
व्रत से पहले की रात्रि में सात्विक भोजन करना चाहिए. और रात्रि भोजन के बाद कुछ नहीं लेना चाहिए. एकादशी व्रत 24 घंटों के लिये किया जाता है. व्रत का समापन द्वादशी तिथि के प्रात:काल में अन्न से भरा घडा ब्राह्माण को दिया जाता है. यह व्रत करने से दु:ख-और दारिद्रय दूरे होते है. और अपने नाम के अनुसार विजया एकादशी व्यक्ति को जीवन के कठिन परिस्थितियों में विजय दिलाती है. समग्र कार्यो में विजय दिलाने वाली विजया एकादशी की कथा इस प्रकार है.  

विजया एकादशी व्रत कथा | Vijaya Ekadasi Vrat Katha

कथा के अनुसार विजया एकादशी के दिन भगवान श्री राम लंका पर चढाई करने के लिये समुद्र तट पर पहुंच़े थे. समुद्र तट पर पहुंच कर भगवान श्री राम ने देखा की सामने विशाल समुद्र है. और उनकी पत्नी देवी सीता रावण कैद में है. इस पर भगवान श्री राम ने समुद्र देवता से मार्ग देने की प्रार्थना की. परन्तु समुद्र ने जब श्री राम को लंका जाने का मार्ग नहीं दिया तो भगवान श्री राम ने ऋषि गणों से इसका उपाय पूछा. ऋषियों में भगवान राम को बताया की प्रत्येक शुभ कार्य को शुरु करने से पहले व्रत और अनुष्ठान कार्य किये जाते है. व्रत और अनुष्ठान कार्य करने से कार्यसिद्धि की प्राप्ति होती है. और सभी कार्य सफल होते है. हे भगवान आप भी फाल्गुण मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत विधिपूर्वक किजिए. 
व्रत करने के लिये एक मिट्टी के घडे को सात प्रकार के धान्यों से भरिए. उसके ऊपर पीपल, आम, बडौर गुलर के पत्ते रखिए. इसके अतिरिक्त एक अलग बर्तन में जौ भरकर कलश स्थापित किजिए. जौ से भरे बर्तन में श्री लक्ष्मी नारायण कि तस्वीर स्थापित किजिए और इन सभी का विधिपूर्वक पूजन किजिए. एकादशी तिथि के दिन व्रत कर, रात्रि में जागरण किजिए. प्रात:काल जल सहित कलश सागर को अर्पित किजिए.    
भगवान श्री राम ने ऋषियों के कहे अनुसार व्रत किया, व्रत के प्रभाव से समुद्र आपको रास्ता देगा. और यह व्रत आपको रावण पर विजय भी दिलायेगा.  तभी से इस व्रत को विजय प्राप्ति के लिये किया जाता है.

Amalaki Ekadashi Vrat Katha


23. आमलकी एकादशी व्रत कथा


आमलकी एकादशी व्रत शुक्ल पक्ष की एकादशी को किया जाता है. इस व्रत में आंवले के वृक्ष की पूजा करने का विधि-विधान है. इस व्रत के विषय में कहा जाता है, कि यह एकादशी समस्त पापों का नाश करने वाली है.


सौ गायों को दान में देने के उपरान्त जो फल प्राप्त होता है. वही फल आमलकी एकादशी का व्रत करने से प्राप्त होता है. इस व्रत में आंवले के पेड का पूजन किया जाता है. आंवले के वृ्क्ष के विषय में यह मत है, कि इसकी उत्पति भगवान श्री विष्णु के मुख से हुई है. एकादशी तिथि में विशेष रुप से श्री विष्णु जी की पूजा की जाती है. आंवले के पेड की उत्पति को लेकर एक कथा प्रचलित है.

विष्णु जी के मुख से आंवले की उत्पति कैसे हुई? | Origin of Amla from Mouth of Lord Vishnu

विष्णु पुराण के अनुसार एक बार भगवान विष्णु के थूकने के फलस्वरुप उनके मुख से चन्दमा का जैसा एक बिन्दू प्रकट होकर पृ्थ्वी पर गिरा. उसी बिन्दू से आमलक अर्थात आंवले के महान पेड की उत्पति हुई. यही कारण है कि विष्णु पूजा में इस फल का प्रयोग किया जाता है.


श्रीविष्णु के श्री मुख से प्रकट होने वाले आंवले के वृ्क्ष को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है. इस फल के महत्व के विषय में कहा गया है, कि इस फल के स्मरणमात्र से गऊ दान करने के समान फल प्राप्त होता हे. यह फल भगवान विष्णु जी को अत्यधिक प्रिय है. इस फल को खाने से तीन गुणा शुभ फलों की प्राप्ति होती है.

आमलकी एकादशी व्रत कथा | Amalaki Ekadashi Vrat Katha

एक बार एक नगर था. इस नगर में सभी वर्गों के लोग मिलकर आनन्द पूर्वक रह्ते थें. लोगों का आपस में प्रेम होने के कारण धर्म और आस्था का निवास भी नगर में बना हुआ था. यह नगर चन्द्रवंशी नामक राजा के राज्य के अन्तर्गत आता था. उस राज्य में सभी सुखी थे, उस राज्य में विशेष रुप से श्री विष्णु जी की पूजा होती थी. और एकदशी व्रत करने की प्रथा उस नगर में प्राचीन समय से चली आ रही थी. राजा और प्रजा दोनों मिलकर एकादशी व्रत कुम्भ स्थापना करते थे. कुम्भ स्थापना के बाद धूप, दीप, नैवेद्य, पंचरत्न आदि से पूजा की जाती थी.


एक बार एकादशी व्रत करने के समय सभी जन मंदिर में जागरण कर रहे थे. रात्रि के समय एक शिकारी आया जो भूखा था, और वह लगभग सभी पापों का भागी था. मंदिर में अधिक लोग होने के कारण शिकारी को भोजन चुराने का अवसर न मिल सका और उस शिकारी को वह रात्रि जागरण करते हुए बितानी पडी. प्रात:काल होने पर सब जन अपने घर चले गए. और शिकारी भी अपने घर चला गया. कुछ समय बीतने के बाद शिकारी कि किसी कारणवश मृ्त्यु हो गई.


उस शिकारी ने अनजाने में ही सही क्योकि आमलकी एकादशी व्रत किया था, इस वजह से उसे पुन्य प्राप्त हुआ, और उसका जन्म एक राजा के यहां हुआ. वह बहुत वीर, धार्मिक, सत्यवादी और विष्णु भक्त था. दान कार्यो में उसकी रुचि थी. एक बार वह शिकार को गया और डाकूओं के चंगुल में फंस गया. डाकू उसे मारने के लिए शस्त्र का प्रहार करने लगे. राजा ने देखा की डाकूओं के प्रहार का उस पर कोई असर नहीं हो रहा है.


और कुछ ऎसा हुआ की डाकूओं के शस्त्र स्वंय डाकूओं पर ही वार करने लगे. उस समय एक शक्ति प्रकट हुई, और उस शक्ति ने सभी डाकूओं को मृ्त्यु लोक पहुंचा दिया. राजा ने पूछा की इस प्रकार मेरी रक्षा करने वाला कौन है.? इसके जवाब में भविष्यवाणी हुई की तेरी रक्षा श्री विष्णु जी कर रहे है. यह कृ्पा आपके आमलकी एकादशी व्रत करने के प्रभावस्वरुप हुई है. इस व्रत को करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है. 

Papmochani Ekadashi Vrat Vidhi


24.पापमोचनी एकादशी व्रत

papmochani_ekadasi
पाप मोचनी एकादशी व्रत चैत्र मास के कृ्ष्ण पक्ष की एकादशी को किया जाता है.  पापमोचनी एकादशी व्रत व्यक्ति को उसके सभी पापों से मुक्त कर उसके लिये मोक्ष के मार्ग खोलती है. इस एकादशी को पापो को नष्ट करने वाली, एकादशी के रुप में भी जाना जाता है. वर्ष 2011 में पापमोचनी एकादशी व्रत 30 मार्च के दिन किया जायेगा. इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु जी का पूजन करना चाहिए. अगर कोई व्यक्ति इस पूजा को षोडशोपचार के रुप में करने पर व्रत के शुभ फलों में वृ्द्धि होती है. 

पापमोचनी व्रत विधि | Papmochani Ekadasi Vrat Vidhi

एकादशी व्रत में श्री विष्णु जी का पूजन किया जाता है. पापमोचनी एकादशी व्रत करने के लिये उपवासक को इससे पूर्व की तिथि में सात्विक भोजन करना चाहिए. एकादशी व्रत की अवधि 24 घंटों की होती है. इसलिए इस व्रत को प्रारम्भ करने से पूर्व स्वयं को व्रत के लिये मानसिक रुप से तैयार कर लेना चाहिए. एकाद्शी व्रत में दिन के समय में श्री विष्णु जी का स्मरण करना चाहिए. और रात्रि में भी पूरी रात जाकर श्री विष्णु का पाठ करते हुए जागरण करना चाहिए. 
व्रत के दिन सूर्योदय काल में उठना चाहिए. और स्नान आदि सभी कार्यो से निवृ्त होने के बाद व्रत का संकल्प करना चाहिए. संकल्प लेने के बाद भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए.  पूजा करने के बाद भगवान विष्णु की प्रतिमा के सामने बैठ्कर श्रीमद भागवत कथा का पाठ करना चाहिए. इस तिथि के दिन व्रत करने के बाद जागरण करने से कई गुणा फल प्राप्त होता है.
व्रत की रात्रि में भी निराहर रहकर, जागरण करने से व्रत के पुन्य फलों में वृ्द्धि होती है. व्रत के दिन भोग विलास की कामना का त्याग करना चाहिए. इस अवधि में मन में किसी भी प्रकार के बुरे विचार को लाने से बचना चाहिए.  व्रत करने पर व्रत की कथा का श्रवण अवश्य करना चाहिए.    
एकादशी व्रत का समापन द्वादशी तिथि के दिन प्रात:काल में स्नान करने के बाद, भगवान श्री विष्णु कि पूजा करने के बाद ब्राह्माणों को भोजन व दक्षिणा देकर करना चाहिए. यह सब कार्य करने के बाद ही स्वयं भोजन करना चाहिए.    

पापमोचनी एकादशी व्रत कथा | Papmochani Ekadashi Vrat Katha 

प्राचीन समय की बात है, चित्ररथ नाम का एक वन था. इस वन में गंधर्व कन्याएं और देवता सभी विहार करते थें. एक बार मेधावी नामक ऋषि इस वन में तपस्या कर रहा था. तभी वहां से एक मंजुघोषा नामक अप्सरा ऋषि को देख कर उनपर मोहित हो गई. मंजूघोषा ने अपने रुप-रंग और नृ्त्य से ऋषि को मोहित करने का प्रयास किया. उस समय में कामदेव भी वहां से गुजर रहे थें, उन्होने भी अप्सरा की इस कार्य में सहयोग किया. जिसके फलस्वरुप अप्सरा ऋषि की तपस्या भंग करने में सफल हो गई.
कुछ वर्षो के बाद जब ऋषि का मोहभंग हुआ, तो ऋषि को स्मरण हुआ कि वे तो शिव तपस्या कर रहे थें. अपनी इस अवस्था का कारण उन्होने अप्सरा को माना. और उन्होने अप्सरा को पिशाचिनी होने का श्राप दे दिया. शाप सुनकर मंजूघोषा ने कांपते हुए इस श्राप से मुक्त होने का उपाय पूछा. तब ऋषि ने उसे पापमोचनी एकादशी व्रत करने को कहा. स्वयं ऋषि भी अपने पाप का प्रायश्चित करने के लिये इस व्रत को करने लगें. दोनों का व्रत पूरा होने पर, दोनों को ही अपने पापों से मुक्ति मिली.  
तभी से पापमोचनी एकादशी का व्रत करने की प्रथा चली आ रही है. यह व्रत व्यक्ति के सभी जाने- अनजाने में किये गये पापों से मुक्ति दिलाता है. 

Padmini Ekadashi Vrat Katha


25. पद्मिनी एकादशी व्रत कथा महात्मय

पद्मिनी एकादशी (Padmini Ekadasi)  भगवान को अति प्रिय है । इस व्रत का विधि पूर्वक पालन करने वाला विष्णु लोक को जाता है । इस व्रत के पालन से व्यक्ति सभी प्रकार के यज्ञों, व्रतों एवं तपस्चर्या का फल प्राप्त कर लेता है। इस व्रत की कथा के अनुसार:
श्री कृष्ण कहते हैं त्रेता युग में एक परम पराक्रमी राजा कीतृवीर्य था। इस राजा की कई रानियां थी परतु किसी भी रानी से राजा को पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई। संतानहीन होने के कारण राजा और उनकी रानियां तमाम सुख सुविधाओं के बावजूद दु:खी रहते थे। संतान प्राप्ति की कामना से तब राजा अपनी रानियो के साथ तपस्या करने चल पड़े। हजारों वर्ष तक तपस्या करते हुए राजा की सिर्फ हडि्यां ही शेष रह गयी परंतु उनकी तपस्या सफल न रही। रानी ने तब देवी अनुसूया से उपाय पूछा। देवी ने उन्हें मल मास में शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करने के लिए कहा.
अनुसूया ने रानी को व्रत का विधान भी बताया। रानी ने तब देवी अनुसूया के बताये विधान के अनुसार पद्मिनी एकादशी का व्रत रखा। व्रत की समाप्ति पर भगवान प्रकट हुए और वरदान मांगने के लिए कहा। रानी ने भगवान से कहा प्रभु आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मेरे बदले मेरे पति को वरदान दीजिए। भगवान ने तब राजा से वरदान मांगने के लिए कहा। राजा ने भगवान से प्रार्थना की कि आप मुझे ऐसा पुत्र प्रदान करें जो सर्वगुण सम्पन्न हो जो तीनों लोकों में आदरणीय हो और आपके अतिरिक्त किसी से पराजित न हो। भगवान तथास्तु कह कर विदा हो गये। कुछ समय पश्चात रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया जो कार्तवीर्य अर्जुन के नाम से जाना गया। कालान्तर में यह बालक अत्यंत पराक्रमी राजा हुआ जिसने रावण को भी बंदी बना लिया था।

पद्मिनी एकादशी व्रत विधान
(Padmini Ekadashi Vrat Vidhi):

भगवान श्री कृष्ण ने एकादशी का जो व्रत विधान बताया है वह इस प्रकार है। एकादशी के दिन स्नानादि से निवृत होकर भगवान विष्णु की विधि पूर्वक पूजन करें। निर्जल व्रत रखकर पुराण का श्रवण अथवा पाठ करें। रात्रि में भी निर्जल व्रत रखें और भजन कीर्तन करते हुए जागरण करें। रात्रि में प्रति पहर विष्णु और शिव की पूजा करें। प्रत्येक प्रहर में भगवान को अलग अलग भेंट प्रस्तुत करें जैसे प्रथम प्रहर में नारियल, दूसरे प्रहर में बेल, तीसरे प्रहर में सीताफल और चथे प्रहर में नारंगी और सुपारी निवेदित करें।
द्वादशी के दिन प्रात: भगवान की पूजा करें फिर ब्राह्मण को भोजन करवाकर दक्षिणा सहित विदा करें इसके पश्चात स्वयं भोजन करें। इस प्रकार इस एकादशी का व्रत करने से मनुष्य जीवन सफल होता है, व्यक्ति जीवन का सुख भोगकर श्री हरि के लोक में स्थान प्राप्त करता है।

Parma Ekadashi Vrat vidhi katha


26. परमा हरिवल्लभा एकादशी व्रत विधि एवं कथा



अधिक मास में कृष्ण पक्ष में जो एकादशी आती है वह हरिवल्लभा अथवा परमा एकदशी के नाम से जानी जाती है ऐसा श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा है (additional months krishna paksha Parma Ekadashi). भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को इस व्रत की कथा व विधि भी बताई थी. भगवान में श्रद्धा रखने वाले आप भक्तों के लिए यही कथा एवं विधि प्रस्तुत है.

परमा एकादशी कथा (Parma Ekadasi Vrat Katha)

: काम्पिल्य नगरी में सुमेधा नामक एक ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ निवास करता था. ब्राह्मण धर्मात्मा था और उसकी पत्नी पतिव्रता. यह परिवार स्वयं भूखा रह जाता परंतु अतिथियों की सेवा हृदय से करता. धनाभाव के कारण एक दिन ब्रह्मण ने ब्रह्मणी से कहा कि धनोपार्जन के लिए मुझे परदेश जाना चाहिए क्योंकि अर्थाभाव में परिवार चलाना अति कठिन है.
ब्रह्मण की पत्नी ने कहा कि मनुष्य जो कुछ पाता है वह अपने भाग्य से पाता है. हमें पूर्व जन्म के फल के कारण यह ग़रीबी मिली है अत: यहीं रहकर कर्म कीजिए जो प्रभु की इच्छा होगी वही होगा। ब्रह्मण को पत्नी की बात ठीक लगी और वह परदेश नहीं गया. एक दिन संयोग से कण्डिल्य ऋषि उधर से गुजर रहे थे तो उस ब्रह्मण के घर पधारे। ऋषि को देखकर ब्राह्मण और ब्राह्मणी अति प्रसन्न हुए. उन्होंने ऋषिवर की खूब आवभगत की.
ऋषि उनकी सेवा भावना को देखकर काफी खुश हुए और ब्राह्मण एवं ब्राह्मणी द्वारा यह पूछे जाने पर की उनकी गरीबी और दीनता कैसे दूर हो सकती है, उन्होंने कहा मल मास में जो कृष्ण पक्ष की एकादशी (Mal mass Krishna Paksha Ekadashi) होती है वह परमा एकादशी (Parma Ekadasi) के नाम से जानी जाती है, इस एकादशी का व्रत आप दोनों रखें. ऋषि ने कहा यह एकादशी धन वैभव देती है तथा पाप का नाश कर उत्तम गति भी प्रदान करने वाली है. किसी समय में धनाधिपति कुबेर ने इस व्रत का पालन किया था जिससे प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उन्हें धनाध्यक्ष का पद प्रदान किया.
समय आने पर सुमेधा नामक उस ब्राह्मण ने विधि पूर्वक इस एकादशी का व्रत रखा जिससे उनकी गरीबी का अंत हुआ और पृथ्वी पर काफी समय तक सुख भोगकर वे पति पत्नी श्री विष्णु के उत्तम लोक को प्रस्थान कर गये.

परमा एकादशी व्रत विधान (Parma Ekadashi Vrat vidhan)

परमा एकादशी व्रत की विधि बड़ी ही कठिन है. इस व्रत में पांच दिनों तक निराहार रहने का व्रत लिया जाता है. व्रती को एकादशी के दिन स्नान करके भगवान विष्णु के समक्ष बैठकर हाथ में जल एवं फूल लेकर संकल्प करना होता है. संकलप के बाद भगवान की पूजा करनी होती है फिर पांच दिनों तक श्री हरि में मन लगाकर व्रत का पालन करना होता है. पांचवें दिन ब्रह्मण को भोजन करवाकर दान दक्षिणा सहित विदा करने के पश्चात व्रती को स्वयं भोजन करना होता है

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