Wednesday, 30 January 2013

'हे राम' नहीं थे गांधी के आखिरी शब्‍द, जानिए आखिरी समय की कहानी.........11813

'हे राम' नहीं थे गांधी के आखिरी शब्‍द, जानिए आखिरी समय की कहानी.........

नई दिल्‍ली. दुनिया को शांति और अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को 30 जनवरी 1948 को दिल्‍ली में गोली मार दी गई थी। गोली लगने के बाद गांधी के मुंह से निकले आखिरी शब्‍द को लेकर कई तरह की बातें सामने आती रही हैं। अब तक कहा जाता रहा है कि नाथूराम गोडसे ने बिड़ला भवन में जिस वक्‍त गांधी को गोली मारी तो राष्‍ट्रपिता के मुंह से 'हे राम' निकले थे। लेकिन स्वतंत्रता सेनानी और गांधी के निजी सचिव के तौर पर काम कर चुके वी कल्याणम का दावा है कि यह सच नहीं है।
उस घटना के वक्‍त गांधी के ठीक पीछे खड़े कल्‍याणम ने कहा कि गोली लगने के बाद गांधी के मुंह से एक भी शब्‍द निकलने का सवाल ही नहीं था। हालांकि वह अक्‍सर कहते थे कि जब वह मरेंगे तो उनके होठों पर राम का नाम होगा। यदि वह बीमार होते या बिस्‍तर पर पड़े होते तो उनके मुंह से जरूर 'राम' निकलता। गांधी की हत्‍या की जांच के लिए गठित आयोग ने उस दिन राष्‍ट्रपिता के सबसे करीब रहे लोगों से पूछताछ करने की जहमत भी नहीं उठाई। फिर भी, यह दुनियाभर में मशहूर हो गया कि गांधी के मुंह से निकले आखिरी शब्‍द 'हे राम' थे, लेकिन इसे कभी साबित नहीं किया जा सका।

मैं ज्‍यादा दिनों तक जीना नहीं चाहता

अपने आखिरी दिनों में गांधी अपनी प्रार्थनाओं के बाद अक्‍सर कहा करते थे कि अब वह ज्‍यादा दिनों तक जीना नहीं चाहते हैं। बंटवारे के बाद देश में शुरू हुई हिंसा से वह बेहद दुखी रहते थे। वह नहीं चाहते थे कि ऐसी घटनाओं को वह चुपचाप देखते रहें। शायद ऊपर वाले ने भी गांधी की यह प्रार्थना सुन ली और उन्‍हें प्रार्थना के लिए जाते वक्‍त मृत्‍यु मिली। वह मरीजों की तरह बिस्‍तर पर नहीं पड़े और बिना किसी पीड़ा के ही स्‍वर्ग सिधार गए।

10 दिन पहले भी हुआ था हमला

बिड़ला भवन में प्रार्थना सभा के दौरान गांधी पर 10 दिन पहले भी हमला हुआ था। मदन लाल नाम के एक पंजाबी शरणार्थी ने गांधी को निशाना बनाकर बम फेंका था लेकिन उस वक्‍त गांधी बाल-बाल बच गए। बम सामने की दीवार पर फटा जिससे दीवार टूट गई। गांधी ने कभी नहीं सोचा होगा कि कोई उन्‍हें जान से मारना चाहता है। गांधी ने दिल्ली में अपना पहला आमरण अनशन शुरू किया था जिसमें साम्प्रदायिक हिंसा को तत्काल समाप्त करने और पाकिस्तान को 50 करोड़ रुपये का भुगतान करने के लिए कहा गया था। गांधी जी को डर था कि पाकिस्तान में अस्थिरता और असुरक्षा से भारत के प्रति उनका गुस्सा और बढ़ जाएगा तथा सीमा पर हिंसा फैल जाएगी। गांधी की जिद को देखते हुए सरकार ने इस रकम का भुगतान कर दिया लेकिन हिंदू संगठनों को लगा कि गांधी जी मुसलमानों को खुश करने के लिए चाल चल रहे हैं। बम ब्‍लास्‍ट की इस घटना को गांधी के इस फैसले से जोड़कर देखा गया।

सिक्‍योरिटी चाहने वाले वालों को जीने का हक नहीं : गांधी

गांधी कहा करते थे कि उनकी जिंदगी ईश्‍वर के हाथ में है और यदि उन्‍हें मरना हुआ तो कोई बचा नहीं सकता है। उन्‍होंने एक बार कहा था, 'जो आजादी के बजाय सुरक्षा चाहते हैं उन्‍हें जीने का कोई हक नहीं है।' हालांकि बिड़ला भवन के गेट पर एक पहरेदार जरूर रहता था। तत्‍कालीन गृह मंत्री सरदार पटेल ने एहतियात के तौर पर बिड़ला हाउस पर एक हेड कांस्‍टेबल और चार कांस्‍टेबलों की तैनाती के आदेश दिए थे। गांधी की प्रार्थना के वक्‍त बिड़ला भवन में सादे कपड़ों में पुलिस तैनात रहती थी और हर संदिग्‍ध शख्‍स पर नजर रखती थी। हालांकि पुलिस ने सोचा कि एहतियात के तौर पर यदि प्रार्थना सभा में हिस्‍सा लेने के लिए आने वाले लोगों की तलाशी लेकर उन्‍हें बिड़ला भवन के परिसर में घुसने की इजाजत दी जाए तो अच्‍छा रहेगा। लेकिन गांधी जी को पुलिस का यह आइडिया पसंद नहीं आया। पुलिस के डीआईजी लेवल के एक अफसर ने भी गांधी से इस बारे में बात की और कहा कि उनकी जान को खतरा हो सकता है लेकिन गांधी नहीं माने।

सरदार पटेल से आखिरी मुलाकात

देश को आजाद हुए अभी महज पांच महीने ही बीते थे कि मीडिया में पंडित नेहरू और सरदार पटेल के बीच मतभेदों की खबर आने लगी थी। गांधी ऐसी खबरें सामने आने से बेहद दुखी थे और इसका जवाब देना चाहते थे। वह यहां तक चाहते थे कि वो सरदार पटेल को इस्‍तीफा देने को कह दें ताकि नेहरू ही सरकार का पूरा कामकाज देखें। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। उन्‍होंने 30 जनवरी 1948 को पटेल को बातचीत के लिए चार बजे शाम को बुलाया और प्रार्थना खत्‍म होने के बाद इस मसले पर बातचीत करने को कहा। लेकिन नियति को यह मंजूर नहीं था। पटेल अपनी बेटी मणिबेन के साथ तय समय पर गांधी के पास पहुंच गए थे।
 'हे राम' नहीं थे गांधी के आखिरी शब्‍द, जानिए आखिरी समय की कहानी...

नई दिल्‍ली. दुनिया को शांति और अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को 30 जनवरी 1948 को दिल्‍ली में गोली मार दी गई थी। गोली लगने के बाद गांधी के मुंह से निकले आखिरी शब्‍द को लेकर कई तरह की बातें सामने आती रही हैं। अब तक कहा जाता रहा है कि नाथूराम गोडसे ने बिड़ला भवन में जिस वक्‍त गांधी को गोली मारी तो राष्‍ट्रपिता के मुंह से 'हे राम' निकले थे। लेकिन स्वतंत्रता सेनानी और गांधी के निजी सचिव के तौर पर काम कर चुके वी कल्याणम का दावा है कि यह सच नहीं है।
उस घटना के वक्‍त गांधी के ठीक पीछे खड़े कल्‍याणम ने कहा कि गोली लगने के बाद गांधी के मुंह से एक भी शब्‍द निकलने का सवाल ही नहीं था। हालांकि वह अक्‍सर कहते थे कि जब वह मरेंगे तो उनके होठों पर राम का नाम होगा। यदि वह बीमार होते या बिस्‍तर पर पड़े होते तो उनके मुंह से जरूर 'राम' निकलता। गांधी की हत्‍या की जांच के लिए गठित आयोग ने उस दिन राष्‍ट्रपिता के सबसे करीब रहे लोगों से पूछताछ करने की जहमत भी नहीं उठाई। फिर भी, यह दुनियाभर में मशहूर हो गया कि गांधी के मुंह से निकले आखिरी शब्‍द 'हे राम' थे, लेकिन इसे कभी साबित नहीं किया जा सका।

मैं ज्‍यादा दिनों तक जीना नहीं चाहता

अपने आखिरी दिनों में गांधी अपनी प्रार्थनाओं के बाद अक्‍सर कहा करते थे कि अब वह ज्‍यादा दिनों तक जीना नहीं चाहते हैं। बंटवारे के बाद देश में शुरू हुई हिंसा से वह बेहद दुखी रहते थे। वह नहीं चाहते थे कि ऐसी घटनाओं को वह चुपचाप देखते रहें। शायद ऊपर वाले ने भी गांधी की यह प्रार्थना सुन ली और उन्‍हें प्रार्थना के लिए जाते वक्‍त मृत्‍यु मिली। वह मरीजों की तरह बिस्‍तर पर नहीं पड़े और बिना किसी पीड़ा के ही स्‍वर्ग सिधार गए। 

10 दिन पहले भी हुआ था हमला

बिड़ला भवन में प्रार्थना सभा के दौरान गांधी पर 10 दिन पहले भी हमला हुआ था। मदन लाल नाम के एक पंजाबी शरणार्थी ने गांधी को निशाना बनाकर बम फेंका था लेकिन उस वक्‍त गांधी बाल-बाल बच गए। बम सामने की दीवार पर फटा जिससे दीवार टूट गई। गांधी ने कभी नहीं सोचा होगा कि कोई उन्‍हें जान से मारना चाहता है। गांधी ने दिल्ली में अपना पहला आमरण अनशन शुरू किया था जिसमें साम्प्रदायिक हिंसा को तत्काल समाप्त करने और पाकिस्तान को 50 करोड़ रुपये का भुगतान करने के लिए कहा गया था। गांधी जी को डर था कि पाकिस्तान में अस्थिरता और असुरक्षा से भारत के प्रति उनका गुस्सा और बढ़ जाएगा तथा सीमा पर हिंसा फैल जाएगी। गांधी की जिद को देखते हुए सरकार ने इस रकम का भुगतान कर दिया लेकिन हिंदू संगठनों को लगा कि गांधी जी मुसलमानों को खुश करने के लिए चाल चल रहे हैं। बम ब्‍लास्‍ट की इस घटना को गांधी के इस फैसले से जोड़कर देखा गया।

सिक्‍योरिटी चाहने वाले वालों को जीने का हक नहीं : गांधी

गांधी कहा करते थे कि उनकी जिंदगी ईश्‍वर के हाथ में है और यदि उन्‍हें मरना हुआ तो कोई बचा नहीं सकता है। उन्‍होंने एक बार कहा था, 'जो आजादी के बजाय सुरक्षा चाहते हैं उन्‍हें जीने का कोई हक नहीं है।' हालांकि बिड़ला भवन के गेट पर एक पहरेदार जरूर रहता था। तत्‍कालीन गृह मंत्री सरदार पटेल ने एहतियात के तौर पर बिड़ला हाउस पर एक हेड कांस्‍टेबल और चार कांस्‍टेबलों की तैनाती के आदेश दिए थे। गांधी की प्रार्थना के वक्‍त बिड़ला भवन में सादे कपड़ों में पुलिस तैनात रहती थी और हर संदिग्‍ध शख्‍स पर नजर रखती थी। हालांकि पुलिस ने सोचा कि एहतियात के तौर पर यदि प्रार्थना सभा में हिस्‍सा लेने के लिए आने वाले लोगों की तलाशी लेकर उन्‍हें बिड़ला भवन के परिसर में घुसने की इजाजत दी जाए तो अच्‍छा रहेगा। लेकिन गांधी जी को पुलिस का यह आइडिया पसंद नहीं आया। पुलिस के डीआईजी लेवल के एक अफसर ने भी गांधी से इस बारे में बात की और कहा कि उनकी जान को खतरा हो सकता है लेकिन गांधी नहीं माने।

सरदार पटेल से आखिरी मुलाकात

देश को आजाद हुए अभी महज पांच महीने ही बीते थे कि मीडिया में पंडित नेहरू और सरदार पटेल के बीच मतभेदों की खबर आने लगी थी। गांधी ऐसी खबरें सामने आने से बेहद दुखी थे और इसका जवाब देना चाहते थे। वह यहां तक चाहते थे कि वो सरदार पटेल को इस्‍तीफा देने को कह दें ताकि नेहरू ही सरकार का पूरा कामकाज देखें। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। उन्‍होंने 30 जनवरी 1948 को पटेल को बातचीत के लिए चार बजे शाम को बुलाया और प्रार्थना खत्‍म होने के बाद इस मसले पर बातचीत करने को कहा। लेकिन नियति को यह मंजूर नहीं था। पटेल अपनी बेटी मणिबेन के साथ तय समय पर गांधी के पास पहुंच गए थे।


शहीद दिवस : 30 जनवरी पर विशेष !

'बापू' के सत्य, अहिंसा के मार्ग को विश्व समुदाय युगों-युगों तक याद करने के साथ ही विषम परिस्थितियों में चिंतन करता रहेगा. महात्मा गांधी ने जर्मन तानाशाह को भी अहिंसा का महत्व समझाने का प्रयास किया था. ‘हम कभी नहीं चाहेंगे कि देश में ब्रिटिश शासन का खात्मा जर्मनी की मदद से हो बल्कि अहिंसा ऐसा रास्ता है जो दुनिया की सबसे हिंसक शक्तियों के गठजोड़ को भी पराजित करने की क्षमता रखता है.’
गांधीजी को अहिंसा की अपनी जीवन भर की साधना और आजाद एकजुट भारत के अपने सपनों को बिखरते देखने का दुख था. अपने जीवन के ऐन आखिरी दिन महात्मा गांधी ने ..और न जीने की कामना.. भी व्यक्त की थी.
मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म 2 अक्तूबर 1869 को हुआ था. दुनियाभर में इस दिन को अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के नाम से मनाया जाता है. वह
भारत एवं भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख राजनैतिक एवं आध्यात्मिक नेता थे. अहिंसा के मार्ग पर चलकर उन्होंने भारत को आजादी दिलाकर पूरी दुनिया में जनता के नागरिक अधिकारों एवं स्वतंत्रता के प्रति आंदोलन के लिए प्रेरित किया.
महात्मा अथवा महान आत्मा एक सम्मान सूचक शब्द जिसे सबसे पहले रवीन्द्रनाथ टेगौर ने प्रयोग किया और भारत में उन्हें बापू के नाम से भी याद किया जाता है.
गांधीजी ने रोजगार अहिंसक सविनय अवज्ञा प्रवासी वकील के रूप में दक्षिण अफ्रीका में भारतीय समुदाय के लोगों के नागरिक अधिकारों के लिए संघर्ष हेतु प्रयुक्त किया. 1915 में उनकी वापसी के बाद उन्होंने भारत में किसानों, कृषि मजदूरों और शहरी श्रमिकों को अत्याधिक भूमि कर और भेदभाव के विरूद्ध आवाज उठाने के लिए एकजुट किया.
1921 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की बागडोर संभालने के बाद गांधी जी ने देशभर में गरीबी से राहत दिलाने,महिलाओं के अधिकारों का विस्तार, धार्मिक एवं जातीय एकता का निर्माण, आत्म-निर्भरता के लिए अस्पृश्‍यता का अंत आदि के लिए बहुत से आंदोलन चलाएं.
गांधीजी का प्रमुख लक्ष्‍य विदेशी राज से मुक्ति दिलाने वाले स्वराज की प्राप्ति था. गांधीजी ने ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीयों पर लगाए गए नमक कर के विरोध में 1930 में दांडी मार्च और इसके बाद 1942 में ब्रिटिश भारत छोड़ो छेड़ा. दक्षिण अफ्रीका और भारत में उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा. गांधीजी ने असहयोग, अहिंसा तथा शांतिपूर्ण प्रतिकार को अंग्रेजों के खिलाफ़ शस्त्र के रूप में उपयोग किया.
गांधीजी ने सभी परिस्थितियों में अहिंसा और सत्य का पालन किया और सभी को इनका पालन करने के लिए वकालत भी की. उन्होंने आत्म-निर्भरता वाले पंरपरागत भारतीय 'पोशाक धोती और सूत से बनी शॉल पहनी जिसे उसने स्वयं ने 'चरखे' पर सूत कातकर हाथ से बनाया था.
30 जनवरी 1948 को गांधीजी की उस समय गोली मारकर हत्या कर दी गई जब वे नई दिल्ली के बिड़ला भवन के मैदान में थे. प्रार्थना स्थल पर गोली लगने के बाद गांधीजी को उनके कक्ष में ले जाया गया. गांधीजी का हत्यारा नाथूराम गोड़से था. गोड़से और उसके सह षड्यंत्रकारी नारायण आप्टे को बाद में केस चलाकर 15 नवंबर 1949 को फांसी दे दी गई. गांधी जी का नई दिल्ली में राजधाट पर स्मारक है.
शहीद दिवस : 30 जनवरी पर विशेष !

'बापू' के सत्य, अहिंसा के मार्ग को विश्व समुदाय युगों-युगों तक याद करने के साथ ही विषम परिस्थितियों में चिंतन करता रहेगा. महात्मा गांधी ने जर्मन तानाशाह को भी अहिंसा का महत्व समझाने का प्रयास किया था. ‘हम कभी नहीं चाहेंगे कि देश में ब्रिटिश शासन का खात्मा जर्मनी की मदद से हो बल्कि अहिंसा ऐसा रास्ता है जो दुनिया की सबसे हिंसक शक्तियों के गठजोड़ को भी पराजित करने की क्षमता रखता है.’
गांधीजी को अहिंसा की अपनी जीवन भर की साधना और आजाद एकजुट भारत के अपने सपनों को बिखरते देखने का दुख था. अपने जीवन के ऐन आखिरी दिन महात्मा गांधी ने ..और न जीने की कामना.. भी व्यक्त की थी. 
मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म 2 अक्तूबर 1869 को हुआ था. दुनियाभर में इस दिन को अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के नाम से मनाया जाता है. वह
भारत एवं भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख राजनैतिक एवं आध्यात्मिक नेता थे. अहिंसा के मार्ग पर चलकर उन्होंने भारत को आजादी दिलाकर पूरी दुनिया में जनता के नागरिक अधिकारों एवं स्वतंत्रता के प्रति आंदोलन के लिए प्रेरित किया. 
महात्मा अथवा महान आत्मा एक सम्मान सूचक शब्द जिसे सबसे पहले रवीन्द्रनाथ टेगौर ने प्रयोग किया और भारत में उन्हें बापू के नाम से भी याद किया जाता है.
गांधीजी ने रोजगार अहिंसक सविनय अवज्ञा प्रवासी वकील के रूप में दक्षिण अफ्रीका में भारतीय समुदाय के लोगों के नागरिक अधिकारों के लिए संघर्ष हेतु प्रयुक्त किया. 1915 में उनकी वापसी के बाद उन्होंने भारत में किसानों, कृषि मजदूरों और शहरी श्रमिकों को अत्याधिक भूमि कर और भेदभाव के विरूद्ध आवाज उठाने के लिए एकजुट किया.
1921 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की बागडोर संभालने के बाद गांधी जी ने देशभर में गरीबी से राहत दिलाने,महिलाओं के अधिकारों का विस्तार, धार्मिक एवं जातीय एकता का निर्माण, आत्म-निर्भरता के लिए अस्पृश्‍यता का अंत आदि के लिए बहुत से आंदोलन चलाएं. 
गांधीजी का प्रमुख लक्ष्‍य विदेशी राज से मुक्ति दिलाने वाले स्वराज की प्राप्ति था. गांधीजी ने ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीयों पर लगाए गए नमक कर के विरोध में 1930 में दांडी मार्च और इसके बाद 1942 में ब्रिटिश भारत छोड़ो छेड़ा. दक्षिण अफ्रीका और भारत में उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा. गांधीजी ने असहयोग, अहिंसा तथा शांतिपूर्ण प्रतिकार को अंग्रेजों के खिलाफ़ शस्त्र के रूप में उपयोग किया.
गांधीजी ने सभी परिस्थितियों में अहिंसा और सत्य का पालन किया और सभी को इनका पालन करने के लिए वकालत भी की. उन्होंने आत्म-निर्भरता वाले पंरपरागत भारतीय 'पोशाक धोती और सूत से बनी शॉल पहनी जिसे उसने स्वयं ने 'चरखे' पर सूत कातकर हाथ से बनाया था.
30 जनवरी 1948 को गांधीजी की उस समय गोली मारकर हत्या कर दी गई जब वे नई दिल्ली के बिड़ला भवन के मैदान में थे. प्रार्थना स्थल पर गोली लगने के बाद गांधीजी को उनके कक्ष में ले जाया गया. गांधीजी का हत्यारा नाथूराम गोड़से था. गोड़से और उसके सह षड्यंत्रकारी नारायण आप्टे को बाद में केस चलाकर 15 नवंबर 1949 को फांसी दे दी गई. गांधी जी का नई दिल्ली में राजधाट पर स्मारक है.
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