Saturday, 15 December 2012

Hindi poetry.............149312

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माँ

बंद होने वाला है

तुम्हारा चूल्हा

जिसमे झोंक कर

पेड़ की सूखी डालियाँ

पकाती हो तुम खाना

कहा जा रहा है

तुम्हारा चूल्हा नहीं है

पर्यावरण के अनुकूल

माँ

मुझे याद है

बीन लाती थी तुम

जंगलों, बगीचों से

गिरे हुए पत्ते

सूखी टहनियां

जलावन के लिए

नहीं था तुम्हारे संस्कार में

तोडना हरी पत्तियाँ

जब भी टूटती थी

कोई हरी पत्ती

तुम्हे उसमे दिखता था

मेरा मुरझाया चेहरा

जबकि

कहा जा रहा है

तुम्हारे संस्कार नहीं हैं

पर्यावरण के अनुकूल

तुम्हारा चूल्हा

प्रदूषित कर रहा है

तीसरी दुनिया को


पहली और

दूसरी दुनिया के लोग

एक जुट हो रहे हैं

हो रहे हैं बड़े बड़े सम्मेलन

तुम्हारे चूल्हे पर

तुम्हारे चूल्हे के ईंधन पर

हो रहे हैं तरह तरह के शोध

मापे जा रहे हैं

कार्बन के निशान

तुम्हारे घर आँगन की

हवाओं में

वातानुकूलित कक्षों में

हो रही है जोरदार बहसे 

कहा जा रहा है कि

तुम प्रदूषित कर रही हो

अपनी धरती

गर्म कर रही हो

विश्व को

और तुम्हारे चूल्हे की ओर से बोलने वाले

घिघियाते से प्रतीत होते हैं

प्रायोजित से  लग रहे  है

शोध अनुसन्धान

और तम्हारे चूल्हे के प्रतिनिधि भी

माँ !

मौन हैं सब

यह जानते हुए कि

जीवन भर जितने पत्ते और टहनियां 

जलाओगी तुम,

उतना कार्बन

एक भवन के  केन्द्रीयकृत वातानुकूलित यन्त्र  से

उत्सर्जित होगा कुछ ही घंटे में

वे लोग छुपा रहे हैं

तुमसे तथ्य भी

नहीं बता रहे कि

तुम्हारा चूल्हा

कार्बन न्यूट्रल है

क्योंकि यदि तुम्हारे चूल्हे में

जलावन न भी जले फिर भी

कार्बन उत्सर्जन तो होगा ही

लकड़ियों से

बस उसकी गति होगी

थोड़ी कम

और तुम्हारा ईंधन तो

घरेलू है,

 उगाया जा सकता है

आयात करने की ज़रूरत नहीं

लेकिन बंद होना है

तुम्हारे चूल्हे को

तुम्हारे अपने ईंधन को

और जला दी जाएगी

तुम्हारी आत्मनिर्भरता

तुम्हारे चूल्हे के साथ ही .

माँ ! एक दिन

नहीं रहेगा तुम्हारा चूल्हा !
by  Arun chand roy
तुम्हें जल्दी थी जाने की

हमेशा की तरह

वैसी ही जैसे आने के वक्त थी

बिना कोई दस्तक दिए

किसी की इजाजत का इंतजार किये

बस मुंह उठाये चले आये

धड़धड़ाते हुए

चंद सिगरेटों का धुंआ कमरे में फेंका


मौसम के गुच्छे 

उठाकर टेबल पर रख दिए

थोड़ा सा मौन लटका दिया उस नन्ही सी कील पर

जिस पर पहले कैलेंडर हुआ करता था

फिर एक दिन उठे और

बिना कुछ कहे ही चले गये

जैसे कुछ भूला हुआ काम याद आ गया हो

न..., कोई वापसी का वादा नहीं छोड़ा तुमने

लेकिन बहुत कुछ भूल गये तुम जाते वक्त

तुम भूल गये ले जाना अपना हैट

जिसे तुम अक्सर हाथ में पकड़ते थे

लाइटर जिसे तुम यहां-वहां रखकर

ढूंढते फिरते थे

लैपटाप का चार्जर,

अधखुली वार एंड पीस,

तुम भूल गये दोस्तोवस्की के अधूरे किस्से

खिड़की के बाहर झांकते हुए

गहरी लंबी छोड़ी हुई सांस

तुम समेटना भूल गये 

अपनी खुशबू

अपना अहसास जिसे घर के हर कोने में बिखरा दिया
 था तुमने

टेबल पर तुम्हारा अधलिखा नोट

तुम ले जाना भूल गये अपनी कलाई घड़ी

जिसकी सुइयों में एक लम्हा भी मेरे नाम का दर्ज 
नहीं

आज सफाई करते हुए पाया मैंने कि

तुम तो अपना होना भी यहीं भूल गये हो

अपना दिल भी

अपनी जुंबिश भी

अपना शोर भी, अपनी तन्हाई भी

अपनी नाराजगी भी, अपना प्रेम भी


सचमुच बेसलीका ही रहे तुम

न ठीक से आना ही आया तुम्हें

न जाना ही...

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