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Tuesday, 18 December 2012

Hindi poetrey................151212

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 Winter--

कोहरे के आलिंगन में
है भोर ने आँखे खोली
चारों ओर देख कुहासा
न निकली उसकी बोली ।

सरजू भैया मिलें कहीं
तो उनसे सब बोलो
क्यों ओढ़े हो बर्फ रजाई
अब तो आंखे खोलो ।

दर्शन दो, हे आदित्य
जन जीवन क्यों ठहराया है
जड़ चेतन सब कंपकंपा रहे
कैसा कहर बरपाया है ।

नरम धूप का वह टुकड़ा
गुनगुनी सी कितनी भली लगे
फैला दो अपना उजास
चराचर को भी गति मिले

करूँ किसको मैं नमस्कार
तुम तो बस छिपकर बैठे हो
करूँ किसको अर्ध्य अर्पण
तुम तो बस रूठे बैठे हो ।

रक्त जम गया है नस में
पल्लव भी मुरझाया है
डोर खींच ली जीवन की
निर्धन का हांड कंपाया है । 

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आ मेरी नन्ही परी, तुझे गले से लगा लूँ
मेरे आँगन की है तू गोरैया, सौ सौ बार लूँ तेरी बलेयाँ
लाडो मेरी तू चहकती रहे, माँ की सांसो में हरदम महकती रहे
मेरा अक्स है तू, मेरी छाया बनी, सपना बनकर मेरी पलकों में है पली

कितनी सुंदर है तू, मेरी कोमल कली
है कितनी मुलायम, हीरे की कनी
है तू पांच बरस की और मैं पचपन
तुझमे है पाया मैंने बचपन

वो बाबा का आँगन वो आँगन में खटिया
वो अल्हड सी इठलाती बाबा की बिटिया
तितली पकड़ते वो नन्हे फ़रिश्ते
अमरुद चुराते वो शैतान बच्चे

दुःख का कतरा कभी तुम्हे छू न पाए
दाता हर सुख तेरी झोली में गिराए
मुझसे भी ऊँची तू उठती जाये
तुझे देख देख मेरा जिया हरसाए

दुःख कोई जिंदगी में , आने न पाए
सुख का सावन , सदा झूले में झुलाये
तूने भर दिया, मेरे जीवन का सूनापन
तुझमें ही पाया है ,मैंने अपनापन

दुआओं से भर दूँ, मैं दामन तेरा
माँ की ममता बनेगी, कवच तेरा
तू यूँ ही सदा खिलखिलाती रहे
जिंदगी तेरी बस मुस्कुराती रहे

रोम रोम में तू, माँ के है बसती
माँ की आत्मा , तुझमें ही बसती । 
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सृष्टि की जननी बनकर
है सृष्टा का भेस धरा
वृहत वसुंधरा से बढ़कर
रचयिता ने शरण स्वर्ग भरा ।


माँ कहलाई महिमा पाई
ममता दुलार लुटाती हो
देवों ने भी स्तुति गाई
हर रिश्ते से गुरुतर हो ।



सहोदरा सा रूप मनोरम
छवि अपनी कितनी सुखकर
दो बोल स्नेह भरे अनुपम
लाज बचाने आये ईश्वर ।



भरी पड़ी धरती सारी
सीता जैसी सतियों से
अनुसूया और गार्गी तारी
इस जग को असुरों से ।



इतिहास साक्षी है अपना
अवतरित हुईं दुर्गा कितनी
रानी झाँसी सी वीरांगना
मीरा सी जोगन कितनी ।



कनिष्ठा पर गोवर्धन उठाये
कान्हा कितने इतराते हैं
बरसाने वाली उन्हें नचाये
संग लय ताल ठुमकते हैं ।



हर रूप तुम्हारा रहे अनूप
तुम अनुकरणीय पथगामिनी
युग बदला तुम रहीं अनुरूप
अल्पज्ञ जो कहते अनुगामिनी ।



नारी विस्मय रूप तुम्हारा
नमन करे यह जग सारा
भोर मुखर ले दीप्त सहारा
निशा ढले पा मौन पसारा .
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एक दीया कहे एक दीये से ,

 आओ चलें तम की ओर। 
फैलाएं उजियाप्रकाश का ,
ज्योतिर्मय हो चाहू ओर।

लौ से लौ मिले , 
जगमग है सृष्टि सारी
मिटकर भी दें चांदनी , 
दीप हम, किस्मत हमारी । 


दीवाली हो सबके जीवन में , 
प्रकाश लिए सब आगे जाएँ ।
स्वप्नों में भी जो हो इच्छा 
ईश्वर पूरी करते जाएँ ।

महालक्ष्मी का हो आगमन , 
सबके नेह कुटीर में ,
रुनझुन रुनझुन सी गूंजें , 
सबके परिवेश में ।

हर पल बढे एक दीया , 
मान , सम्मान और वैभव का ।
लौ उसकी जलती रहे , 
इंधन गरिमा - स्नेह का ।


लौ देख तुम्हे मुस्काती रहे
 कि न हो भेंट दीये के तल से ।
दीवाली आपको हो मुबारक ,
शुभकामनाएं  मन से ।
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जेठ की तपती दुपहरी 
धरा थी शुष्क दग्ध 
मेघ आये ले सुनहरी 
पावस की बूंदे लब्ध 

संचार सा होने लगा
जी उठी जीवन मिला 
सोया हुआ पंछी जगा 
सुन पुकार कुमुद खिला

अंगार हो  रही धरती 
धैर्य थी धारण किए 
दहकती ज्वाला गिरती
अडिगता का प्रण लिए 

मुरझा गए पुष्प तरू  
मोर मैना थे उदास 
सोचती थी क्या करूँ 
जाए बुझ इसकी प्यास 

सूख गए नदी नार 
ताल तलैया गए रीत 
मछलियाँ पड़ी कगार 
गाये कौन सरस गीत 

टिमटिम उदासी का दीया  
आई ये कैसी रवानी 
हल ने मुख फेर लिया 
पगडण्डी छाई वीरानी    

घन छाये घनघोर बरस 
तृप्ति का उपहार लिए 
इन्द्रधनुष दे जाओ दरस 
रंगों का मनुहार लिए 
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स्मृति की सीप से 

एक मोती है उपजा 

स्निग्ध श्वेत धवल 

लगता है कुछ तुम सा




स्नेह का पल्लव 

लाने को है आतुर सा 

प्रीत का पुष्प 

लगता है कुछ तुम सा




बिछोह के घन 

भर देते हैं तम सा 

जरूर बरसेगा अनुराग

लगता है कुछ तुम सा



लिए कुटिल मुस्कान

निराशा की निशा 

होगा आशा का सवेरा 

लगता है कुछ तुम सा



सपनों का पुलिंदा 

प्रतीक्षा में  कसमसाता 

कभी तो होगा सच 

लगता है कुछ तुम सा




नभ में सरकता चंदा 

मेरे आँगन जो पहुंचा

करता है ताक-झांक 

लगता है कुछ तुम सा




गौरैया का भोर गान 

गुनगुन भ्रमर सा 

पिहू पिहू पपीहा 

लगता है कुछ तुम सा



मंदिर में मंत्रोच्चार 

ईश्वर उसमें बसा 

शंख का जय गान 
लगता है कुछ तुम सा .

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गतिमान है  धुरी पर 

परिक्रमा करनी है पूरी 

प्रहर गिनती पोरों पर

कहीं दूर न हो  दूरी



गर्भ में बैठे मानिक मोती 

एक दूजे से बतियाते हैं 

धीर धरा हमको ढोती

तभी अमूल्य कहाते हैं



दिखती कितनी शान्तमना

धधकता भीतर ज्वालामुखी 

जल का अपार सैलाब बना 

माथे हिमगिरि पर न दुखी 



बनी सारथि सृष्टि की 

सृष्टा का आधार हो तुम 

वाहिनी बनी चराचर की 

कंचन सी कल्पना तुम



पल पल पल्लवित जीवन

जीने की उमंग तुमसे  

तुम हो कितनी पावन 

धर्म कर्म परिभाषा तुमसे 



देवों ने भी जन्म लिया 

आँचल में छिप जाने को 

ममता का मीठा भोग दिया

मठ में पूजे जाने को 



आज धरा है तार तार 

लहू से लहूलुहान हुई 

मानवता सिसके द्वार  

अपनों से ही बर्बाद हुई 



आस लगाये धैर्य धारिणी 

धानी चूनर खोएगी नहीं 

अमन चैन की खेवन हारिणी

पृथ्वी कभी थकती नहीं .     

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