Sunday, 23 December 2012

नया साल मुबारक........Happy New Year...... 154612


 डाकिए ने अपने माथे का पसीना पोंछा और कुछ हाँफते हुए कहा, "नया साल मुबारक हो।"
"इस ठंड में इतना पसीना क्यों आ रहा है भाई?" मैंने कुछ सहानुभूति जताई।
वह हँसा, "जब इतना बोझ लाद कर चलूँगा, तो पसीना तो आएगा ही। सारे देश को आ रहा है। साले कार्ड छापने वाले इन्हें मूर्ख बना रहे हैं और ये डाक के डब्बों में कार्ड डाल-डाल कर हमारी कमर दोहरी किए दे रहे हैं।"
"यह सारा बोझ किसका है?" मैंने उसकी साइकिल के हैंडल से टँगे, कार्डों से अटे, थैलों की ओर देखा, "नए वर्ष का?"
"नहीं! दासता का।" वह कटु ढंग से मुस्कराया।
"दासता क्यों भाई?" मैंने डाकिए से इतनी गंभीर उक्ति की अपेक्षा नहीं की थी, "सारा संसार नया वर्ष मना रहा है। सारी वसुधा एक कुटुंब है।"
"ठीक कहो हो साहब।" वह बोला, "मेरा चचेरा भाई मेरे साथ के घर में रहता है। जब उसकी घर वाली को अपनी भैंस के गोबर के उपले पाथने होते हैं तो हमारे घर की दीवार पर पाथ देती है। पूछो कि ससुरी यह क्या कर रही है? तो उत्तर देती है, "अरे तो क्या हो गया। एक ही तो घर है। दोनों में कोई अंतर है क्या?" और जो कभी मेरी घर वाली अपनी भैंस उसके घर में बाँध दे तो उसे खोल कर काँजी घर ही पहुँचा आवे है। तब एक ही कुटुंब नहीं रहता।"
"इसका क्या अर्थ हुआ?" मैंने उजबक के समान उसकी ओर देखा।
"इसका अर्थ हुआ कि जब गोरों को अपना कूड़ा हमारे देश में फेंकना होता है तो सारी वसुधा एक कुटुंब होती है।" उसने उत्तर दिया, "कूड़ा फेंकने के लिए भी तो इसी वसुधा पर कोई स्थान चाहिए। किंतु यदि हम अपना घर स्वच्छ रखना चाहें तो उन्हें कष्ट होने लगता है। वसुधा एक कुटुंब है तो वे हमारा एक भी पर्व क्यों नहीं मनाते? वसुधा एक कुटुंब है तो हमारे विमानों का अपहरण क्यों होता है। होता है तो कोई हमारे सहायता को क्यों नहीं आता। दुष्टों को दंड क्यों नहीं दिया जाता?"
"कहते तो तुम ठीक ही हो। वे नहीं मानते कि वसुधा एक कुटुंब है।" मैंने कहा, "यह तो हमारी अपनी उक्ति है। उनका चिंतन तो अभी वहाँ तक पहुँचा ही नहीं है।"
"हमारा भी नहीं पहुँचा है।" वह बोला, "पहुँचा होता तो हमारी माँ भी हमें चैत्र बैसाख कुछ सिखाती। हर समय जनवरी फरवरी ही नहीं चलती।"
"पर सारी दुनिया में आज उन्हीं की चलती है। हम कर ही क्या सकते हैं?" मैंने पूछा।
"दो काम कर सकते हैं साहब।" वह मेरी ओर देख कर मुस्करा रहा था।
"क्या?" मैंने पूछा।
"मदिरा पी कर हा-हू कर सकते हैं या फिर अपने राष्ट्रीय स्वाभिमान की मृत्यु पर लज्जा से धरती में गड़ सकते हैं।"
"तुम बहुत कठोर हो।" मैंने कहा।
"बिना कठोर हुए कहीं देश की लाज बची है?"
"किंतु संसार के साथ मिल कर चलने में क्या हानि है?"
"महाराणा प्रताप अकबर से मिल कर चलते तो क्या हानि थी?" उसने मेरी आँखों में देखा, "शिवाजी औरंगजेब से मिल कर चलते तो क्या हानि थी? सुभाष और गांधी अंग्रेज़ों से मिल कर चलते तो क्या हानि थी? बस हम विदेशियों की दासता का बोझ ही तो ढोते, जैसे आज ढो रहे हैं।" उसने कार्डों से भरे थैलों की ओर देखा।
"पर तब हम उनके राजनीतिक दास होते।" मैंने कहा, "स्वतंत्रता तो हम सबका अधिकार है।"
"सांस्कृतिक पराधीनता तो राजनीतिक पराधीनता से भी बुरी है। सांस्कृतिक स्वतंत्रता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता कब तक बची रहेगी?" उसने साइकिल आगे बढ़ाई, "अच्छा चलता हूँ। यदि आप चाहते हैं कि आपके बच्चे अमरीकियों के झूठे बर्तन न धोएँ तो जा कर उनको सिखाइए कि इस देश में सप्ताह के दिन सोमवार और मंगलवार होते है संडे मंडे नहीं। वर्ष के महीने चैत्र और बैसाख होते हैं, जनवरी फ़रवरी नहीं। जन्म देने और पालन-पोषण करने वाले माता-पिता होते हैं, मॉम-डैड नहीं। उनके चरण स्पर्श कर उन्हें प्रणाम किया जाता है, दूर से हाय-हाय नहीं किया जाता।"

वह साइकिल पर बैठ कर चला गया। मैं उसे देखता ही रह गया। 
 नरेंद्र कोहली
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