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Sunday, 23 December 2012

कुछ कोशिश तो कर तू ओ बन्दे, सारा दोष खुदा में मडना ठीक नहीं.......154512

Every seeker on the spiritual path soon realizes that life is much more than just the sum of his physical and material achievements. Being an offspring of an all-caring Father, whose imprint is stamped indelibly on the marked soul, he receives an inner calling to discover his rich heritage. This call within comes from the One who does speak with his tongue but who speaks directly to the depths of the aspirant’s inner being. This inner calling usually comes with a hint of a voice, a vision or simply a vague sense of emptiness. – a void that no amount of material gratification can fulfil.

Whenever you feel yourself lonely,
Whenever you feel pangs of separation,
Remember I never left you alone,
You can see me in your reflection.

By abandoning himself in love and total surrender, seeker begins to understand the mystery of God’s existence as well his true identity.

How can you go far from me, dear !
How can you cast away from heart, dear !
I am that unforgettable fragrance, so near !
Throbbing your heart through breathings, my dear !





परमार्थ का खोजी परमार्थ के रास्ते में चलता हुआ जल्दी ही समझ जाता है कि ज़िंदगी जिस्मानी और दुनियावी उपलब्धियों के जोड़ से कुछ और ज़्यादा है । उस परम दयालु परम पिता की सन्तान होते हुए, जिसका छाप उसकी आत्मा पर अमित होते हुए, उसके अन्तर्मन में एक पुकार लगातार आती है अपने असल वजूद को पहचानने की और अपने अंशी के साथ विसाल करने की । यह अन्तर में उठी हुई पुकार उस परवरदिगार से आती है जो खुद तो ज़बान से बोलता नहीं है पर सीधा इंसान के अन्तर्मन की गहराई में जाकर बोलता है । हमें दुनिया की हज़ार नियामतें भी मिल जाए पर फिर भी अन्दर एक तड़प रहती है जैसे कि कुछ खो गया है और उससे विसाल करने की आरज़ू रहती है । यह अन्तर्मन की पुकार या तो किसी अन्दर की आवाज़, या कुछ धुंधली झलक, या फिर काटता हुआ सूनेपन का अहसास - एक ऐसा सूनापन जिसे इस ज़हाँ की उपलब्धियां नहीं भर सकती हैं ।

अकेला महसूस करो जब तुम तन्हाई में,
याद मेरी आये जब जुदाई में,
महसूस करना तुम्हारे पास ही हूँ में,
जब चाहे देख लेना अपनी ही परछाई में ।

अपने आप को उस परवरदिगार के इश्क़ में समर्पण करके और अपने आपको उस के करम पर छोड़कर, साधक धीरे-धीरे उस परमात्मा के अस्तित्व के रहस्य को और अपने आप के वास्तविक अस्तित्व को पहचानने लगता है । फिर बन्दे और परवरदिगार में कोई फासला नहीं रहता । दोनों मिल कर एकमेक हो जाते हैं ।

हम से दूर सनम जाओगे कैसे ?
दिल से हमको भूलाओगे कैसे ?
हम तो वो खुशबु हैं जो,
साँसों के ज़रिये दिल में उतर जाती है,
खुद की साँसों को रोक पायोगे कैसे ?

Setting foot on the spiritual journey with a dedicated and determined heart, the seeker undertakes to gain liberation from the clutches of the world – a journey of realization of the soul and ultimate reality. The sincere seeker may be imperfect in many ways, but he needs only to perfect his love for God. Through the guidance of perfect master, he learns the technique of piercing the dark veils within himself. Although the journey within is not a complicated affair in itself, it requires sincere yearning, perseverance and an indomitable spirit.

A light shining in core of my heart,
Seems next to impossible,
Being aware of Your divine vision,
Appears to be so unreal,
When efforts goes invain,
To explore myself,
Meeting you in person,
Appears unreal and impossible.


दृढ संकल्प के साथ जब साधक रूहानियत की मंजिल पर कदम रखता है, तब वह दुनिया के बन्धनों से आज़ाद होने के लिए पुरजोर कोशिश करता है - अपनी रूह के वजूद को जानने की कोशिश और उस परम सत्य को जानने की प्रक्रिया । साधक के अन्दर बहुत सारी कमियाँ हो सकती है पर वो कोई ज़्यादा अहमियत नहीं रखती, ज़रुरत है अपने आप को उसके इश्क में कुर्बान करने की । कामिल मुर्शिद की रहनुमाई में वह अपने अन्तर के अँधेरे पर्दों को चीरने में वह सफल रहता है । वैसे तो अन्तर का सफ़र ज़्यादा मुश्किल नहीं है पर यह दिल की तड़प, अध्यवसाय (निरन्तर प्रयत्न ), अदम्य साहस इस पर चलने के लिए ज़रूरी है ।

एक चिराग भी ज़ले मेरे दिल में,
बहुत दूर की बात है,
हों तेरे नूरानी ज़लवे से वाकिफ,
नामुमकिन सी बात है,
ज़ब खुद से मिलने पर,
हमें पाबंदियाँ,
तुझसे मिलना तो बहुत,
दूर की बात है ।

The journey of the spiritual seeker is often adorned with many trials and setbacks. The inner vibrations and chatter of mind clouds his vision, the warm embrace that was once experienced at the start of journey is replaced by an interior coldness and the weary spirit is filled with extreme uncertainty. Saint Therese of Lisieux herself encountered this vast darkness within:

He permitted my soul to be invaded by the thickest darkness, and that the thought of heaven, up until then so sweet to me, be no longer anything but the cause of struggle and torment. (Praying in the Presence of Our Lord with Saint Therese of Lisieux)

However, it is precisely at this point of dejection that we must remember not to permit our imperfections and struggle to cripple our determination, but to travel in this stillness and rejoice in our weakness, for those inner upheavals serve a particular purpose in our eternal pilgrimage. Saint Teresa of Avila says:

When you have grown still on purpose while everything around you is asking for your chaos, you will find the doors between every room of interior castle thrown open, the path home to your true love unobstructed after all.

परमार्थी साधक की अन्तर की यात्रा बहुत कठिन इम्तहानों और रुकावटों से गुज़रती है । मन की चंचलता और तरंगें इसको आगे जाने से रोकती हैं और जिस गरम आगोश से यात्रा की शुरुवात हुई थी, अब एक आन्तरिक ठण्ढेपन की सिहरन के अहसास से भर उठता है, और थकी हुई बोझिल आत्मा अति अधिक आशंका और बैचैनी से सिहर उठती है । लिसीअक्ष की सन्त थीरिसी कहती हैं:

उसने मेरी अन्तरात्मा में बहुत ही गहन अँधेरे का अतिक्रमण होने दिया, और उस मीठे और हसीन स्वर्ग का विचार अब मानों संघर्ष और यातना का कारण बन गया ।

लेकिन निराशा और खिन्नता के ऐसे नाज़ुक वक़्त पर हमें अपनी कमजोरियों और संघर्षों को दृढ संकल्प पर हावी नहीं होने देना चाहिए बल्कि उस एकान्त और सूनेपन में चलते रहना और अपनी कमजोरियों पर मुस्कराने की आदत डाल लेनी चाहिए, क्योंकि ये अन्दर की कसमकस भी हमारी इस अनातन यात्रा में एक विशेष प्रयोजन को पूरा करती है । अविला की सन्त टेरेसा कहती हैं:

जब आप अपने सफ़र में एक ठहराव महसूस करते हो और आपके चारों तरफ एक कोलाहाल का माहौल छा गया है, तब आप पाओगे कि उस रूहानी महल के सब द्वार आपके लिए खुल गए हैं और आप बेरोकटोक उस परवरदिगार के महल का रास्ता तय कर सकते हो ।

The beloved Father is looking everywhere for a sincere disciple who will remain faithful and loving even when he is left alone in the wilderness. Although he sends him hardships with one hand, he sends comforts with other. He is standing right beside him with love, forgiveness and benediction in his heart so long as the seeker stretches out his hand to reach this. Such is the kindness and mercy that he is always ready to support the struggling aspirant. Therese of Lisieux says in ‘My Vocation is Love’ :

By practicing all the virtues, keep lifting your little foot to climb the stairs of sanctity, and do not even think that you will be able to get up even to the first step. No; but God only asks for your good will.

At the top of these stairs, He (God) is looking at you lovingly. Soon conquered by your vain efforts, he will come down himself and taking you in His arms, will carry you forever in his kingdom...

परम पिता परमात्मा हमेशा ऐसे शिष्यों की तलाश में रहता है जो हमेशा वफादार और उसके इश्क में मस्त रहते हैं और हर हाल में खुश रहते हैं, चाहे उनको बिलकुल सुनसान और वीरान जंगल में क्यों न छोड़ दिया जाए । वह एक तरफ से तकलीफें भेजता है पर दूसरी तरफ उनकी हर तरह से संभाल करता है । वह उनके साथ हमेशा रहता है और उनके सिर पर अपनी रहमत भरा हाथ हमेशा रखता है । कदम-कदम पर माफी और आशीर्वाद उसको मिलता रहता है जब भी वह साधक अपने हाथ दुआ में उसके आगे फैलाता है । उसकी दया और रहमत का दामन अपने बन्दों के लिए हमेशा खुला रहता है । लिसियक्ष की सन्त थेरेसा 'माई वोकेशन इज लव' में कहती हैं:

पूर्ण निष्ठा और अच्छी नियत से तुम अपने छोटे और कमज़ोर क़दमों से उस निर्मल और पवित्र सीढ़ियों पर कदम रखने की हिम्मत करो, और ये मत सोचो कि तुममें पहली सीढी चढ़ने की भी काबलियत नहीं है । परमेश्वर तुम्हारी निष्ठा और मेहनत का कायल है । वह उन सीढ़ियों के ऊपर तुम्हारे तरफ प्यार से देख रहा है । जब वह तुम्हारी असफल कोशिश को देखेगा तब वह खुद मजबूर होकर नीचे आयेगा और तुम्हें खुद अपनी बाहों में ले लेगा और तुम्हें अपने परम धाम ले जाएगा ।

शराबी इलज़ाम शराब को देता है,
आशिक़ इलज़ाम शबाब को देता है,
कोई नहीं करता कबूल अपनी भूल,
काँटा भी इलज़ाम गुलाब को देता है,
कुछ कोशिश तो कर तू ओ बन्दे,
सारा दोष खुदा में मडना ठीक नहीं ।

The sincere seeker, realizing his own weaknesses, and believing in the truth that strength can only be fortified by perseverance, effort and practice, will at once begin to exert himself. He begins to realize that in order to attain personal communion with God, he must not be overcome by doubts and confusion but continually stay in tune with Him. Ultimately, it is the grace and mercy – the mystery of God’s love – that will bring soul back to its ultimate goal. God’s grace is abundant, and when he the weary soul’s sincere efforts, he will take the yearning soul back to the eternal home. But the sincere seeker’s contribution to this great journey, however small, is highly significant, for it is the disciple’s effort to move towards the Lord that invokes his grace. The great Persian saint, Rumi expresses this beautifully:

----and just the moment, when you are all confused, leaps forth a voice, hold me close, I’m love, and I’m always yours. (Roya R. Rad, Rumi and Self Psychology)

Having attained personal communion with God, the soul then realizes that the darkness he endured within was a necessary design in God’s plan. The soul had to be purified to be prepared for the divine union. God’s love is so fathomless, boundless and inexhaustible that envelops the soul.

The drunkard blames the wine,
The lover blames the beauty,
No one blames himself,
Even the thorn blames the roses,
Make some small efforts, O seeker !
It is not right to blame God for your follies.

निष्ठावान साधक, अपनी कमजोरियों का अहसास करते हुए, और यह विश्वास करते हुए कि हिम्मत दृढ संकल्प, कड़ी मेहनत और निरन्तर प्रयास से आयेगी, अपने को उस कोशिश में पूर्ण तन्मयता से लगा देगा । वह जानने लगता है कि अगर उसे परमात्मा से विसाल चाहिए तो शंकाओं और भ्रांतियों पर विजय पाकर हर वक़्त उसके साथ लिव लगाने का यत्न करेगा । अन्तत: यह उसकी दया और कृपा है - उसके प्यार का रहस्य - जो आत्मा को उस के साथ मिलाता है । मालिक की दया असीम है और जब वह साधक की निष्ठा और कोशिश देखता है तब वह ज़रूर उसे अपने से मिलाने में पूर्ण मदद करता है । लेकिन साधक की लगन, निष्ठा और मेहनत ज़रूरी है, चाहे वो कितनी भी थोड़ी सी भी क्यों न हो पर उसकी दया को पाने में बहुत काम करती है । फारस के महान सन्त, मौलाना रोम फरमाते हैं:

----और उस वक़्त जब तुम बहुत ही अस्त-व्यस्त और परेशान होगे, तब एक आवाज़ आयेगी, मुझे नज़दीक पकड़ कर रखो, मैं प्यार हूँ, और में हमेशा तुम्हारा हूँ।

मालिक से विसाल करके आत्मा को आभास होता है कि ये अन्धेरेपन और सूनेपन का अहसास मालिक ने जानबूझकर करवाया था । आत्मा को उस परम निर्मल परमात्मा से मिलने के पहले यह शुद्धिकरण होना भी ज़रूरी था । परमात्मा का प्यार अनहद, अपार और असीम है और साधक उसमें डूब कर असीम आनन्द और शान्ति का अनुभव करता है जो बयान के बाहर है । गूंगा गुड़ का स्वाद कैसे बताये ? जो चखे वो ही जाने ।

हर बार दिल से ये पैगाम आये,
जुबाँ खोलूँ तो तेरा नाम आये,
तुम्हीं क्यों भाए दिल को क्या मालूम,
जब नज़रों के सामने हसीं तमाम आये ।
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