Sunday, 23 December 2012

लम्हा फिर आये एक लम्हे के लिए......154212


एक मुरझाता हुआ फूल, झुरियाँ पड़ती हुई ये त्वचा, सफ़ेद होते हुए ये बाल - ये सब हमको जीवन के एक सबसे दर्दभरी सच्चाई का अहसास दिलाते हैं - अस्थिरता । मौत एक जीवन की सच्चाई है और हम उससे कभी नहीं भाग सकते हैं । यह सबको अपना ग्रास बनाती है - हमारे परिवार के सदस्य, रिश्तेदार और यार-दोस्त । लेकिन फिर भी भूलावे और इस सत्य को नकारने की स्थिति में हमेशा रहते हैं । आखिर क्यों ? शायद हम अपनी आराम की स्थिति से बाहर निकलना नहीं चाहते और एक ऐसे भूलावे में रहना चाहते हैं कि मौत तो औरो को आयेगी और हमें नहीं और हम सदा ही ऐसे ही रहेंगें ।

हम ज़िंदगी से कुछ इस तरह से प्यार करते हैं कि इसे छोड़ना ही नहीं चाहते:

ऐ ज़िंदगी !
तेरे बिछुड़ने का ग़म हम सह नहीं सकते,
इस भरी महफ़िल में कुछ कह नहीं सकते,
हमारे गिरते आँसू पकड़ के तो देख,
वो भी कहेंगें कि हम तेरे बिना रह नहीं सकते ।

ज़िंदगी में कितने मोड़ आते हैं, कितने लम्हें आते हैं और हर लम्हा दूसरे लम्हे के लिए पीछे छूट जाता है । लेकिन ज़िंदगी का सबसे कीमती लम्हा वह होता है जब हम उस परवरदिगार की याद में बिताते हैं, पर ऐसे लम्हे कम ही होते हैं और यह भँवरा मन हर वक़्त दुनिया के मृग-मारीचिका जैसे छलावे में मशगूल रहता है और अपने निज लक्ष्य को ताक पर रख देता है । ये दुनिया के बाहरी बन्धन दलदल की तरह हमें कीचड में घुसाते चले जाते हैं और हम अपने शरीर के बन्धनों में इतना जकड जाते हैं कि अपने निज अस्तित्व को भूल कर शरीर को ही अपना अस्तित्व मान लेने की भूल कर बैठते हैं । दुःख और तकलीफें कुछ इस कदर घेर लेती हैं कि हमारी आत्मा लहूलुहान होकर उस लम्हें की याद में कराह उठती है जिस लम्हें में वह परमात्मा के नज़दीक थी:

लम्हा लम्हा इन्तजार किया उस हसीं लम्हें के लिए,
और वो लम्हा आया भी बस एक लम्हे के लिए,
गुजारिश यही है खुदा से के काश वो,
लम्हा फिर आये एक लम्हे के लिए ।

सन्त हमें बताते हैं कि हमें दुनिया में रहते हुए भी दुनिया का बन कर नहीं रहना है, लेकिन यह भाव रखना बहुत ही मुश्किल है जब हम इस दुनिया में धकेले जाते हैं जहां हर वक़्त कुछ ना कुछ नयी खोज और आविष्कार होते रहते हैं । हमारा मन बहुत ही चंचल और चलायमान है । जब हमारे बाल सफ़ेद होने लगते हैं तो हम ब्यूटी-पार्लर में जाते हैं अपने बाल रंगवाने के लिए, जिससे हम जवान दिख सकें - उस डाई के नुकसान देने वाले कारणों पर कोई नहीं विचार नहीं करता । जब हमारी चमड़ी पर झुरियां पड़ती हैं तो हम त्वचा की विशेष क्रीम लगाते हैं । जब हमारी नज़र कमज़ोर होती है तो हम चश्मे की बजाय कोंटक्ट-लेन्स पहनना पसन्द करते हैं - हम क्या-क्या नहीं करते अपनी ज़वानी को वापिस लाने के लिए । लेकिन एक वक़्त ऐसा आता है जब ज़वानी की मस्ती के बाद बुढापे का मन्ज़र तय करना पड़ता है और फिर एक दिन यह दुनिया छोड़कर जाना पड़ता है:

हँसने के बाद क्यों रुलाती है ये दुनिया,
जाने के बाद क्यूँ भुलाती है दुनिया,
ज़िंदगी में क्या कोई कसर बाकी थी,
जो मर जाने के बाद भी ज़लाती है दुनिया ।

आधुनिक युग, विज्ञानं और तकनीकी विकास ने नये-नए अद्भुत आयाम खोल दिए हैं । आदमी चंद्रमा पर जाकर आ चुका है और क्राईओजनिक (परिशीतन) आभियान्त्रिकी, रोबोटिक्स (यन्त्रमानवशास्त्र) और क्लोनिंग (प्रतिरूपण) में बहुत ही असाधारण उपलब्धि हासिल कर चुका है । लेकिन इतने सब विकास के बाद भी वह अपने मन की कमजोरियों का इलाज़ नहीं ढूँढ पाया है और न ही मौत पर विजय हासिल कर पाया है । हमारा मानवीय अस्तित्व सिर्फ एक थोड़े से अस्थायी पड़ाव से ज़्यादा कुछ नहीं, हमारा इस धरती पर सफ़र अल्पकालिक है । हम परागमन की अवस्था में हैं और कितने जन्मों से अपने असली घर में जाने की तड़प में जी रहे हैं । हर जन्म में जब आत्मा इस शरीर से जुदा होती है तो बहुत तड़पती है क्योंकि उसका असली मंज़र अभी बाकी रह गया ।

मोमबत्ती के अन्दर का धागा बोला,
मैं जलती हूँ तो तू क्यों पिघलने लगी ?
मोमबत्ती बोली, किया जिसको दिलों-जान से इश्क,
वो बिछड़े तो आँसू निकलते ही हैं ।

इसलिए यह ज़रूरी है कि हम साहस करें और आगे बढें - अपने मौत के डर को निकाल दें और इस भौतिक अस्तित्व से ऊपर उठकर मौत पर विजय पा लें । किसी पूर्ण सन्त का आसरा लें और जीते जी मरने की कला सीखें । जब हम अपने भजन, सुमिरन में मेहनत करेंगें तो राम-नाम का बीज एक दिन ज़रूर फलित होगा और हमें ज़िंदगी के हर मोड़ पर सहायता करेगा । जहाँ प्यार पनपता है वहाँ अनुशासन और हुक्मबरदारी लाजमी है । पूर्ण गुरु द्वारा दिखाए रास्ते पर चलते हुए, अपने कर्तव्य का निष्ठापूर्वक पालन करते हुए, हम धीरे-धीरे राम-नाम के प्रभाव से परिवर्तित होते जाते हैं ।

साँसों के सिलसिले को ना दो ज़िंदगी का नाम,
ऐसे तो हर ऐरा-गैरा ज़िंदगी जी लेता है,
जीने के बाबजूद कुछ लोग तो जैसे मर गये,
कुछ ऐसे रहे कि जीते जी मर कर जी उठे ।

एक मुरझाया हुआ गुलाब, बदन पर झुरियों का जाल, सफ़ेद होते हुए बाल - ज़िंदगी का हर अनुभव और सम्बन्ध एक ख़त्म होने वाली तारीख के साथ आता और अन्त में हम कुछ भी अपने साथ नहीं ले जा सकते हैं - अपना शरीर तक भी नहीं । लेकिन इस अन्त का रंज क्यों ? हमें तो खुले दिल से मौत का स्वागत करना चाहिए जैसे एक दुल्हन अपने नए घर जाने की खुशी में झूम उठती है अपने दुल्हे से मिलन की खुशी में । आईये अपने असली घर में जाने की तैयारी करें ।

मौत कोई डरने की चीज़ नहीं है । यह तो सिर्फ आत्मा की शरीर छोड़ने की प्रक्रिया है । शरीर छोड़ने के बाद साधक की आत्मा सूक्ष्म, कारण और अन्य उच्च मण्डलों में भ्रमण करती है और फिर साधना के बाद फिर अपने शरीर में लौट आती है । मौत के बाद बहुत ही उम्दा ज़िंदगी है जो हमें दिखाई नहीं देती क्योंकि हमने जीते जी मरने की तरकीब नहीं सीखी है ।

क्या बात है किस का गम मुझे बहुत है ?
कुछ दिन से ये आँख में आँसू बहुत हैं ।

मिल लेता हूँ तुझ से तेरा ज़िक्र करके,
इतना ही तेरा करम बहुत है ।

मेरा घर आप ही जगमगा उठेगा,
तेरी दहलीज़ पर एक कदम बहुत है ।

मिल जाये अगर तेरी रफ़ाक़त,
मुझ को तो ये ही जन्म बहुत है ।

क्या शब् से हमें सवाल करना ?
तेरे दीदार का ज़लवा ही बहुत है ।

क्यों बुझने लगेंगें चिराग मेरे ?
अब तो तूफ़ान की हवा भी बहुत कम है ।

चुप क्यों हो गए अब ये लब ?
ज़लवें बयान करने के लिए ज़ुबां कम है ।
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