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Tuesday, 18 December 2012

गुरु कैसा होना चाहिए ?.............151112

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परमार्थ में पूरे फायदे के लिए आध्यात्मिक साहित्य में गुरु की आवश्यकता बताई गयी है | गुरु कैसा होना चाहिए ? गुरु पूर्ण होना चाहिये क्योंकि पूर्ण गुरु के द्वारा ही पूर्ण होना चाहिये | इसलिए संतों ने मुर्शिदे कामिल का गुण गाया है |

आत्मिक उन्नति के भी दर्जे हैं और बिना पूर्ण गुरु के पूर्ण आध्यात्मिक उपलब्धि नहीं हो सकती है | यदि एम्.एस.सी करना हो तो बी. एस. सी. पास शिक्षक से काम नहीं चलेगा, बल्कि एम्. एस. सी पास शिक्षक की आवश्यकता होगी | इसी प्रकार परमार्थ में भी अलग-अलग दर्जे हैं, जिनका साध-गति, सन्त-गति और परम सन्त-गति कह कर वर्णन किया जाता है |

परमार्थ में सही लक्ष्य पर पहुँचने के लिए हमें सन्त-गति वाले शिक्षक की ज़रुरत पड़ती है | साध-गति वाले शिक्षक द्वारा, जो तन-मन के पिंज़रे से मुक्त और तीन गुणों (सिफते सिलासा) से पार हो गया है, से भी काम चल सकता है | पर साध-गति वाला गुरु भी शिष्य के सम्मुख सन्त-गति का आदर्श रखता है | इससे कम गति वाले गुरु से काम नहीं चलेगा और परमार्थ में कभी पूर्णता हासिल नहीं होगी | गुरु नानक साहिब फरमाते हैं:

काचे गुर ते मुकति न हूआ ॥
केती नारि वरु एकु समालि ॥
गुरमुखि मरणु जीवणु प्रभ नालि ॥
दह दिस ढूढि घरै महि पाइआ ॥
मेलु भइआ सतिगुरू मिलाइआ ॥२१॥ (SGGS 932)


Through a false guru, liberation is not found. There are so many brides of the One Husband Lord - consider this. The Gurmukh dies, and lives with God. Searching in the ten directions, I found Him within my own home. I have met Him; the True Guru has led me to meet Him. ||21||

पूर्ण गुरु के मस्तक पर एम. एस. सी. पास की तरह कोई चिन्ह नहीं लगा होता, उसकी संगति करने पर अपनी योग्यता से वे अपने आप प्रकट हो जाते हैं | जब शिष्य को ऐसा गुरु मिलता है तो वह पहले ही दिन अपनी सारी योग्यता उसके सामने प्रकट नहीं कर देता | जैसे जैसे साधक की योग्यता प्रकट होती है, वह उस पर अपनी अधिक योग्यता प्रकट करता है | पहले तो वह एक बुज़ुर्ग (पूजनीय) के रूप में प्रकट होता है और फिर सचमुच मुर्शिद के रूप में प्रकट होता है | वह यहाँ ही नहीं रूकता, वह मुर्शिद से फना-अल्लाह खुदी में मिटा कर खुदा में लीन हो जाने वाला दिखाई देता है और उसके ज़मलो-ज़लाल में और परमात्मा के नूर में कोई फर्क नहीं होता है |

पूर्ण गुरु या मुर्शिदे कामिल की पहचान करना कोई आसान काम नहीं | हम उसके प्रकट चिन्ह-चक्र, रहन-सहन और उससे प्राप्त परमार्थ के लाभ से थोडा कुछ जान सकते हैं | वह सदा दयालु और रहमदिल होता है और सबको सामान दृष्टी से देखता है | वह सम-दृष्टी और निर्वैर होता है, उसके लिए निन्दा और स्तुती एक सामान हैं | गुरु अमरदास जी फरमाते हैं:

सतिगुरू सदा दइआलु है भाई विणु भागा किआ पाईऐ ॥
एक नदरि करि वेखै सभ ऊपरि जेहा भाउ तेहा फलु पाईऐ ॥
नानक नामु वसै मन अंतरि विचहु आपु गवाईऐ ॥४॥६॥ (SGGS 602)


The True Guru is forever merciful, O Siblings of Destiny; without good destiny, what can anyone obtain? He looks alike upon all with His Glance of Grace, but people receive the fruits of their rewards according to their love for the Lord. O Nanak, when the Naam, the Name of the Lord, comes to dwell within the mind, then self-conceit is eradicated from within. ||4||6||

गुरु राम दास जी फरमाते हैं:

वाहु वाहु सतिगुरु पुरखु है जिनि सचु जाता सोइ ॥
जितु मिलिऐ तिख उतरै तनु मनु सीतलु होइ ॥
वाहु वाहु सतिगुरु सति पुरखु है जिस नो समतु सभ कोइ ॥
वाहु वाहु सतिगुरु निरवैरु है जिसु निंदा उसतति तुलि होइ ॥
वाहु वाहु सतिगुरु सुजाणु है जिसु अंतरि ब्रहमु वीचारु ॥
वाहु वाहु सतिगुरु निरंकारु है जिसु अंतु न पारावारु ॥
वाहु वाहु सतिगुरू है जि सचु द्रिड़ाए सोइ ॥
नानक सतिगुर वाहु वाहु जिस ते नामु परापति होइ ॥२॥ (SGGS 1421)


Waaho! Waaho! Blessed and Great is the True Guru, the Primal Being, who has realized the True Lord. Meeting Him, thirst is quenched, and the body and mind are cooled and soothed. Waaho! Waaho! Blessed and Great is the True Guru, the True Primal Being, who looks upon all alike. Waaho! Waaho! Blessed and Great is the True Guru, who has no hatred; slander and praise are all the same to Him. Waaho! Waaho! Blessed and Great is the All-knowing True Guru, who has realized God within. Waaho! Waaho! Blessed and Great is the Formless True Guru, who has no end or imitation. O Nanak, Blessed and Great is the True Guru, through whom the Naam, the Name of the Lord, is received. ||2||

गुरु का रहन-सहन विशेष प्रकार का होता है जो उन्हें आम जीवों से अलग करता है |

पूर्ण गुरु दाता होता है, याचक (मंगता) नहीं | वह अपने शिष्य की एक सुईं तक स्वीकार नहीं करता | उसे उनकी किसी भी चीज़ की चाह नहीं और न मोहताजी है | वह अपने निर्वाह के लिए खुद कमाई करता है और दूसरों को भी देता है | किसी पर बोझ नहीं डालता और अपना निर्वाह करके दीन-दुखियों की सहायता करता है | गुरु नानक देव जी फरमाते हैं:

गिआन विहूणा गावै गीत ॥
भुखे मुलां घरे मसीति ॥
मखटू होइ कै कंन पड़ाए ॥
फकरु करे होरु जाति गवाए ॥
गुरु पीरु सदाए मंगण जाइ ॥
ता कै मूलि न लगीऐ पाइ ॥
घालि खाइ किछु हथहु देइ ॥
नानक राहु पछाणहि सेइ ॥१॥ (SGGS 1245)


The one who lacks spiritual wisdom sings religious songs. The hungry Mullah turns his home into a mosque.
The lazy unemployed has his ears pierced to look like a Yogi. Someone else becomes a pan-handler, and loses his social status. One who calls himself a guru or a spiritual teacher, while he goes around begging - don't ever touch his feet. One who works for what he eats, and gives some of what he has - O Nanak, he knows the Path. ||1||

वह अपनी शिक्षा या उपदेश का कोई मेहनताना या दक्षिणा नहीं लेता | सबको मुफ्त देता है | जिस प्रकार प्रकृति की अन्य वस्तुएँ - हवा, पानी और सूर्य का प्रकाश सबके लिए मुफ्त है, उसी प्रकार उसकी शिक्षा भी मुफ्त है |

उसका श्रंगार विनय और नम्रता होता है | सब तरफ से समर्थ होने के बावजूद वह अपने बारे में डींगें नहीं मारता की मैं यह या वह कर सकता है | वह जब भी कुछ कहता है तो कहेगा कि मालिक करने वाला है, मेरा मुर्शिद (गुरु) ही सबकुछ कर रहा है | सच है, वृक्ष की शाखा जब फलों से लद जाती है तो वह झुक जाती है | जो स्वयं को तुच्छ समझता है, वास्तव में वही बड़ा है | गुरु अर्जुन देव फरमाते हैं:

सगल पुरख महि पुरखु प्रधानु ॥
साधसंगि जा का मिटै अभिमानु ॥
आपस कउ जो जाणै नीचा ॥
सोऊ गनीऐ सभ ते ऊचा ॥
जा का मनु होइ सगल की रीना ॥
हरि हरि नामु तिनि घटि घटि चीना ॥
मन अपुने ते बुरा मिटाना ॥
पेखै सगल स्रिसटि साजना ॥
सूख दूख जन सम द्रिसटेता ॥
नानक पाप पुंन नही लेपा ॥६॥


Among all persons, the supreme person is the one who gives up his egotistical pride in the Company of the Holy.
One, who sees himself as lowly, shall be accounted as the highest of all. One, whose mind is the dust of all, recognizes the Name of the Lord, Har, Har, in each and every heart. One who eradicates cruelty from within his own mind, looks upon the entire world as his friend? One who looks upon pleasure and pain as one and the same, O Nanak, is not affected by sin or virtue.

उसका किसी से विरोध नहीं होता औए न ही किसी के व्यवहार से कोई शिकायत | यदि कोई उससे वैर भी करे तो वह उसे क्षमा कर देता है | किसी की नुक्ता-चीनी (टीका-टिप्पणी) नहीं करता और न निन्दा करता है | उसका सबके साथ प्यार रहता है | शत्रुता रखने वाले के साथ भी वह प्यार करता है | 'अपने वैरियों से भी प्यार करो' का सिद्धांत उसके जीवन में प्रकट होता है |

वह पवित्रता, परम ज्ञान, परम सत्य और रूहानियत का उज्ज्वल सूर्य होता है | उसमें आफताब जैसी चमक और माहताब जैसी शीतलता होती है | उसका जीवन पूर्ण परमार्थी होता है | परमार्थ के इच्छुक, पतंगों की भांति उसको चरों तरफ से घेर लेते हैं और उससे आत्मिक लाभ लेकर अपना जन्म सफल कर लेते हैं |

वह कोई विशेष भेष धारण नहीं करता और न ही मन को काबू में लाने के लिए शरीर को कष्ट देने वाले साधन अपनाता है | उसकी युक्ति सहज और सरल है जो कोई भी इन्सान कर सकता है | वह लोगों को दिखाने के लिए करामातें करके मदारियों का सा खेल कभी नहीं करता | वह सब शक्तियों का मालिक होते हुए भी उनको गुप्त रखता है | मौज हो तो कभी आवश्यकतानुसार उनका उपयोग भी कर लेता है | उसके शिष्यों को तो सदा ही उसकी रहमत पहुँचती रहती है |

पूरे गुरु का आचरण क्या होता है और उनकी संगति का प्रभाव क्या होता है ?

उसके पास बैठने से या उसका ध्यान देकर बैठने से मन का दौड़ना रूक जाता है और कुछ स्थिरता प्राप्त होती है | गुरु अर्जुन साहिब फरमाते हैं:


जिन डिठिआ मनु रहसीऐ किउ पाईऐ तिन्ह संगु जीउ ॥
संत सजन मन मित्र से लाइनि प्रभ सिउ रंगु जीउ ॥


Gazing upon them, my mind is enraptured. How can I join them and be with them? They are Saints and friends, good friends of my mind, who inspire me and help me tune in to God's Love.

उनसे पवित्रता की रश्मियाँ निकलती हैं जो अपूर्व तेज और सौन्दर्य से भरपूर होती है, जिनके नूर और रंग का ऐसा असर होता है कि उसका अक्षर बयान नहीं कर सकते | उनके अन्दर चुम्बकीय कसीस और आकर्षण होता है | वह अध्यात्म के भेद भरे वचनों द्वारा आत्मा को अन्तर में ऊपर की ओर खींचता है और एक अकथनीय सरूर और आनन्द का अनुभव प्रदान करता है |

उनके नेत्रों और मस्तक पर एकटक देखने से एक विशेष प्रकार की झलक दिखाई देगी जो एक कशिश जैसी प्रतीत होती है, जिसके द्वारा शिष्य को अपनी आत्मा एकत्रित करते हुए, स्थूल से सूक्ष्म मण्डलों में चढ़ती हुई मालूम देगी और उसकी चेतनता बढ़ेगी |

उसके (गुरु के) अन्दर शांति और समता होती है, उसकी संगति हमारे अन्दर आनन्द की धारा बहा देती है | उससे मिलकर आनन्द प्राप्त होता है | सब मुश्किलें आसान हो जाती है और परम पद की प्राप्ति होती है | गुरु रामदास जी फरमाते हैं:

जिसु मिलिऐ मनि होइ अनंदु सो सतिगुरु कहीऐ ॥
मन की दुबिधा बिनसि जाइ हरि परम पदु लहीऐ ॥१॥ (SGGS 168)

Meeting Him, the mind is filled with bliss. He is called the True Guru. Double-mindedness departs, and the supreme status of the Lord is obtained. ||1||

वह ओज (ओजस) से भरपूर होता है, जिसके कारण उसका मुख जगमगाता है | उसकी आवाज़ दिल को खींचने वाली होती है और नेत्रों का एक विशेष प्रकार का प्रकाश मन को मोहने और बेंधने वाला होता है | सन्तों से ओज की रश्मियों (प्रताप की किरणे) निकलकर आकाश-मण्डल पर प्रभाव डालती हैं | उनके वचनों में एक विशेष प्रकार का निराला प्रभाव होता है | वे सुनने वालों के ह्रदय में प्रवेश करते चले जाते हैं | उनकी उपस्थति जीवों को जाग्रत और उन्नत करने वाली होती है |

उसकी नज़र हमारी आन्तरिक अवस्था को देखने वाली होती है और वह उस अवस्था के अनुसार शिक्षा देता है | जब कोइ उसके पास जाता है तो वह उसकी आन्तरिक स्थिति को ऐसे देख लेता है जिस प्रकार शीशे के बर्तन में रखी हुई चीज़ दिखाई देती है, पर वह परदापोश (जीवों के दोषों को प्रकट नहीं करता) होता है | किसी भी भाव के साथ कोई जाए, भ्रमर (भंवरा) जाये या भिड़ (ततैया), फूल की भांति दोनों को सुगन्ध देता है | कोई उसके दर से खाली नहीं लौटता है | जो उसके पास जाते हैं, वे ऐसे संस्कार लेकर जाते हैं जो शीघ्र या देर से (कर्मों के अनुसार) उभर आते हैं | जब ऐसी हस्तियों के दर्शन हो जाएँ तो समझों आपके भले दिन आने शुरू हो गये | गुरु अर्जुन देव जी फरमाते हैं:

जब ते दरसन भेटे साधू भले दिनस ओइ आए ॥
महा अनंदु सदा करि कीरतनु पुरख बिधाता पाए ॥१॥
अब मोहि राम जसो मनि गाइओ ॥
भइओ प्रगासु सदा सुखु मन महि सतिगुरु पूरा पाइओ ॥१॥ रहाउ ॥ (SGGS 671)


Ever since I obtained the Blessed Vision of the Darshan of the Holy, my days have been blessed and prosperous.
I have found lasting bliss, singing the Kirtan of the Praises of the Primal Lord, the Architect of destiny. Now, I sing the Praises of the Lord within my mind. My mind has been illumined and enlightened, and it is always at peace; I have found the Perfect True Guru.

सन्त सतगुरु कुल मालिक का सच्चा पुत्र होता है, उसके लिए सब जातियाँ, धर्म, पंथ, सम्प्रदाय एक है, वह सब देह-धारियों में एक परमात्मा को देखता है |

हिंदू कहूँ तो मैं नहीं, मुसलमान भी नाहिं |

पांच तत्व का पुतला, गैबी खेले माहिं || (कबीर साखी संग्रह, प्र. ७५)

धर्म और जाति के पक्षपात के बगैर, वह सारे संसार को निडर होकर समान उपदेश देता है | उसके लिए सारी खलकत मालिक के बच्चे हैं और वह सबको सम-दृष्टि से देखता है | गुरु राम दास फरमाते हैं:

सतिगुरु पुरखु दइआलु है जिस नो समतु सभु कोइ ॥
एक द्रिसटि करि देखदा मन भावनी ते सिधि होइ ॥
सतिगुर विचि अम्रितु है हरि उतमु हरि पदु सोइ ॥
नानक किरपा ते हरि धिआईऐ गुरमुखि पावै कोइ ॥१॥ (SGGS 300)


The True Guru, the Primal Being, is kind and compassionate; all are alike to Him. He looks upon all impartially; with pure faith in the mind, He is obtained. The Ambrosial Nectar is within the True Guru; He is exalted and sublime, of Godly status. O Nanak, by His Grace, one meditates on the Lord; the Gurmukhs obtain Him. ||1||

वह किसी को अपने धर्म छोड़ने और किसी नए धर्म को स्वीकार करने का उपदेश नहीं देता है | उसका सम्बन्ध केवल आत्मा से है | आप किसी भी धर्म के हो उसे चिन्ता ही नहीं, केवल तुम्हारे अन्दर परमार्थ की चाह होना आवश्यक है | उसके लिए धर्म और जाति का कोई प्रश्न नहीं उठता | कबीर साहिब फरमाते हैं :

हिल-मिल खेलूँ शब्द महि, अंतर रही न रेख |
समझे का मत एक है, क्या पंडत क्या शेख ||

वह निडर होकर केवल आत्मिक मार्ग का उपदेश देता है जो प्रत्येक मनुष्य के अन्दर मौजूद है और बाहरी शरीअत और कर्मकांड के नियमों से परे है | वह सच्चा हाजी (मालिक की दरगाह तक पहुँचा हुआ ) है | जहाँ कहीं भी पूरा गुरु मिले, उससे रूहानी लाभ उठा लेना चाहिये | मौलाना रूम (इरान के महान सूफी फकीर) फरमाते हैं - 'यदि तुझे हज करने की आरज़ू है तो किसी हाजी को साथ ले ले, वह हिंदू हो या तुर्क या अरबी, कोई भी हो, परवाह मत कर, तू उसकी ज़ाहिरी शक्ल पर मत जा, उसके अंदरूनी ध्येय, ज़माल और रसाई को देख | तुझे उससे कोई बाहरी रिश्तेदारी थोड़ी जोड़नी है | उससे केवल रूहानी विज्ञान की शिक्षा लेकर दूसरे विज्ञानों की तरह, उस इल्म की कमाई करनी है |

मरदे-हज्जी हमरही हाजी तलब, ख्वाह हिन्दू ख्वाह तुर्क ओ या अरब,
मनिगर अंदर नक्श ओ अंदर रंगे-ऊ, बनिगर अंदर अज्म ओ दर आहंगे-ऊ | (मसनवी मौलाना रूम, दफ्तर १, प्र. ३०४)

वह मालिक का अवतार होता है | जिस प्रकार कुल मालिक बिना ज़बान के सन्तों-महात्माओं को उपदेश देता है, वह भी अपने शिष्यों को अपनी अन्दरूनी अनुभव की शक्ति से बिना ज़बान उपदेश देता है | मौलाना रूम साहिब फरमाते हैं कि मुर्शिद मालिक की तरह निराकार, इन्द्रियों से परे है, वह अपने मुरीदों को बिना ज़बान उपदेश देता है |

शैखे फअआल अस्त बे आलत चू हक्क, बा मुरीदा दाद बे गुफ्ते सबक | (मसनवी मौलाना रूम, दफ्तर २, प्र. १३४)

संतो की शिक्षा बे-ज़बानी की ज़बान (मूक-भाषा) है, जो लिखने-पढने का विषय नहीं | यह रूह की ज़बां द्वारा दी जाती है और रूह ही इसका अनुभव करती है | रूह रब का अंश है और उसका भेद है | रूह बिना तालु और ज़बान के बोलती है | नियाज़ बरेलवी फरमाते हैं:

अम्रे-रब्बी अस्त रूह व् सर्रें खुदास्त,
ज़िक्रे-बेकामो-बेज़बान ऊ रास्त | (दीवाने नियाज़ बरेलवी, प्र. ४०)

गुरु अंगद देव जी फरमाते हैं कि वहाँ ये इन्द्रियां काम नहीं करती हैं, बिना इन्द्रियों के सब काम होते हैं:

अखी बाझहु वेखणा विणु कंना सुनणा ॥
पैरा बाझहु चलणा विणु हथा करणा ॥
जीभै बाझहु बोलणा इउ जीवत मरणा ॥
नानक हुकमु पछाणि कै तउ खसमै मिलणा ॥१॥ (SGGS 139)


To see without eyes; to hear without ears; to walk without feet; to work without hands; to speak without a tongue-like this, one remains dead while yet alive. O Nanak, recognize the Hukam of the Lord's Command, and merge with your Lord and Master. ||1||

मौलाना रूम भी फरमाते हैं कि उन मण्डलों में चलने के लिये ये पैर नहीं चाहियें, और न ही खाने के लिये ज़बान और उड़ने के लिये पंख, सुनने के लिये इन कानों और देखने के लिये इन आँखों की आवश्यकता नहीं है:

बे परो बे पा सफ़र मी करदमे,
बे लबो-दंदां शकर मी खरदमे,
चश्म बस्ता आलमे मी दीदमे | (मसनवी मौलाना रूम, दफ्तर १, प्र. २२८-२२९)
अर्थात वहाँ हम बिना परों के और बिना पैरों के सफ़र करते हैं, बिना होठों और दाँतों के शक्कर खाते हैं और आँखें बंद करके उस आलम को देखते हैं |

कई बार परमार्थ के खोजियों को उनके सत्संग में कोई प्रश्न करने की ज़रुरत नहीं होती है | वे अपनी दया द्वारा ह्रदय में उठते हुए प्रश्नों के या जो प्रश्न वे दिल में लेकर आते हैं, उनके उत्तर बिना पूछे दे देते हैं |

जब-जब सन्त अवतरित होते हैं, वे केवल राम नाम और आंतरिक अभ्यास पर जोर देते हैं और साफ-साफ बता देते हैं कि मालिक बाहरी साधनों से नहीं मिलता है | वह घट के अन्दर है, उसे वहीं खोजो, तुम्हारा घट ही सच्चा हरि-मन्दिर है, उसके अन्दर प्रवेश करने से मालिक के दर्शन होंगें | गुरु अमरदास जी इसकी पुष्टि करते हैं |

गुर परसादी वेखु तू हरि मंदरु तेरै नालि ॥
हरि मंदरु सबदे खोजीऐ हरि नामो लेहु सम्हालि ॥१॥
मन मेरे सबदि रपै रंगु होइ ॥
सची भगति सचा हरि मंदरु प्रगटी साची सोइ ॥१॥ रहाउ ॥
हरि मंदरु एहु सरीरु है गिआनि रतनि परगटु होइ ॥
मनमुख मूलु न जाणनी माणसि हरि मंदरु न होइ ॥२॥ (SGGS 1346)


By Guru's Grace, see that the Temple of the Lord is within you. The Temple of the Lord is found through the Word of the Shabad; contemplate the Lord's Name. O my mind, be joyfully attuned to the Shabad. True is devotional worship, and True is the Temple of the Lord; True is His Manifest Glory. This body is the Temple of the Lord, in which the jewel of spiritual wisdom is revealed. he self-willed manmukhs do not know anything at all; they do not believe that the Lord's Temple is within.

मनुष्य का एक अद्भुत वस्तु है, यदि आन्तरिक आँखे खुल जायें तो सचमुच यह परमात्मा का घर है, 'यह शरीर प्रभु का मन्दिर है |' यह सच्ची नस्जिद है जिसके अन्दर रब मिलता है | मौलाना रूम फरमाते हैं:

मस्जिद अस्त आँ दिल किह जिस्माश साजिद अस्त | (मसनवी मौलाना रूम, दफ्तर ४, प्र. १३९)

अर्थात यह ह्रदय मसजिद है और शरीर सिजदा करने का स्थान है | बाईबल भी कहती है - "उसने मनुष्य को अपने स्वरुप पर बनाया" ( बाईबल, जौन १:२७) | Bible also says, “God made man in His own image.” (John 1:26).

कुदरती मस्जिदों और मंदिरों (इन शरीरों) में रहनेवाले लोग बाहर क्यों भटक रहे हैं ? यह ठीक नहीं | जो काया को छोड़कर मालिक को दुसरे स्थानों पर ढूँढते हैं, वे उसे नहीं पा सकते हैं | बू अली कलन्दर फरमाते हैं:

यार दर तू पस चीरा ऐ बेखबर.
यार दर खुद तू चिह गर्दी दर ब-दर | (मसनवी बू अली कलन्दर, प्र. २५)

अर्थात: प्रीतम तो तेरी बगल में है, तू क्यों बेखबर है, वह तो तेरे अन्दर है, तू दर-ब-दर क्यों फिर रहा है ? गुरु रामदास जी फरमाते हैं:

काइआ कोटु अपारु है अंदरि हटनाले ॥
गुरमुखि सउदा जो करे हरि वसतु समाले ॥
नामु निधानु हरि वणजीऐ हीरे परवाले ॥
विणु काइआ जि होर थै धनु खोजदे से मूड़ बेताले ॥
से उझड़ि भरमि भवाईअहि जिउ झाड़ मिरगु भाले ॥१५॥ (SGGS 309)


The human body is a great fortress, with its shops and streets within. The Gurmukh who comes to trade gathers the cargo of the Lord's Name. He deals in the treasure of the Lord's Name, the jewels and the diamonds.
Those who search for this treasure outside of the body, in other places, are foolish demons. They wander around in the wilderness of doubt, like the deer who searches for the musk in the bushes. ||15||

जो अपने शरीर की बजाय उसको कहीं और ढूँढते हैं, वे मूर्ख हैं, वे हिरणों की भाँति कस्तूरी को झाड़ियों में ढूँढते हैं और भ्रम-वश उजाड़ों में भटकते फिरते हैं | जो कुछ ब्रह्माण्ड के अन्दर है, वही पिंड के अन्दर है | उसके खोज अपने अन्दर करो | हम गलती करके बाहर पोथी-पुस्तकों में, नदियों सरोवरों में, जंगलों-पहाड़ों में, इन्सान के बनाये मंदिरों-मसजिदों में और अन्य तीर्थ-स्थानों पर खोजते हैं, पर उन्हें प्राप्ति नहीं होती | यदि हमको घट के मार्ग का भेद मिल जाता तो उसे पा लेते, पर सच्चे गुरु के बिना हम काया के अन्दर प्रवेश नहीं कर सकते हैं | गुरु अमरदास साहिब फरमाते हैं:

गुर परसादी वेखु तू हरि मंदरु तेरै नालि ॥
हरि मंदरु सबदे खोजीऐ हरि नामो लेहु सम्हालि ॥१॥
मन मेरे सबदि रपै रंगु होइ ॥
सची भगति सचा हरि मंदरु प्रगटी साची सोइ ॥१॥ रहाउ ॥
हरि मंदरु एहु सरीरु है गिआनि रतनि परगटु होइ ॥
मनमुख मूलु न जाणनी माणसि हरि मंदरु न होइ ॥२॥ (SGGS 1346)


By Guru's Grace, see that the Temple of the Lord is within you. The Temple of the Lord is found through the Word of the Shabad; contemplate the Lord's Name. O my mind, be joyfully attuned to the Shabad. True is devotional worship, and True is the Temple of the Lord; True is His Manifest Glory. This body is the Temple of the Lord, in which the jewel of spiritual wisdom is revealed. The self-willed manmukhs do not know anything at all; they do not believe that the Lord's Temple is within. ||2||

पूर्ण गुरु की शिक्षा यथार्थ, सत्य और अमली साईंस यानी क्रियात्मक और व्यवहारिक है, केवल काल्पनिक और बौद्धिक विचार नहीं | वे जब भी उपदेश देते हैं, बड़ी प्रतीति और पक्के विश्वास के साथ देते हैं | उनका उपदेश सुना-सुनाया या पढ़ा-पढ़ाया नहीं होता है | यह उनका निजी अनुभव है, जो सारे सन्तों-महात्माओं का सामान विषय है | उनके आत्मिक अनुभव अन्य महात्माओं के अनुभवों से मिलते हैं | वे लोगों को अंध-विश्वास में नहीं फँसाते, उन्होनें स्वयं मालिक को प्रत्यक्ष किया है | गुरु अर्जुन देव फरमाते हैं:

नैण पसंदो सोइ पेखि मुसताक भई ॥
मै निरगुणि मेरी माइ आपि लड़ि लाइ लई ॥३॥
बेद कतेब संसार हभा हूं बाहरा ॥
नानक का पातिसाहु दिसै जाहरा ॥४॥३॥१०५॥ (SGGS 397)


He is so beautiful to my eyes; beholding Him, I have been bewitched. I am worthless, O my mother; He Himself has attached me to the hem of His robe. He is beyond the world of the Vedas, the Koran and the Bible. The Supreme King of Nanak is immanent and manifest.

महाराष्ट्र के महान सन्त नामदेव फरमाते हैं:

सोइन कटोरी अम्रित भरी ॥
लै नामै हरि आगै धरी ॥२॥
एकु भगतु मेरे हिरदे बसै ॥
नामे देखि नराइनु हसै ॥३॥
दूधु पीआइ भगतु घरि गइआ ॥
नामे हरि का दरसनु भइआ ॥४॥३॥ (SGGS 1163-64)


Taking the golden cup, Naam Dayv filled it with the ambrosial milk, and placed it before the Lord. This one devotee abides within my heart, the Lord looked upon Naam Dayv and smiled. The Lord drank the milk, and the devotee returned home. Thus did Naam Dayv come to receive the Blessed Vision of the Lord's Darshan.

वे सच्चे हाजी हैं, वे कहते हैं, अभ्यास करो और अपनी आँखों से दीदार करो | शम्स तबरेज़ फरमाते हैं:

बी-ख्वाहद चश्मे -सिर्र मअशूक दीदन, कलामश रा बिगोशे-खुद शुनीदन |
निहां अंदर निहां बीनद ज़मालश, बिगोशे हिस्से फहम बकुनद कमालश ||

अर्थात: अपनी आँखों से प्यारे को देखना चाहिये, उसके कलाम को खुद सुनना चाहिये | आँखे बंद करो आगे अन्धेरा है, उसके पार उसके ज़माल (शोभा) को देखना चाहिये, उसके कमाल (अद्भुत दया) को निजी अनुभव द्वारा ही समझ सकोगे |

सन्त ग्रंथों-पोथियों पर निर्भर नहीं होते | सब धर्म-पुस्तकों में महापुरुषों का ही वर्णन किया गया है | सन्त-जन स्वयं ही शरीर-धारी और चलते-फिरते वेद और ग्रन्थ हैं | ग्रन्थ-शास्त्र उन्हीं से ही निकले हैं | वे ये सबकुछ हैं और इससे भी बढकर और भी बहुत कुछ हैं | सन्तों की शिक्षा सच्ची मुक्ति की शिक्षा है, जिसके द्वारा सब बन्धन टूट जाते हैं और जीवों को अमर-पद की प्राप्ति होती हैं |

मलार की वार में गुरु नानक सतगुरु की पहचान इस प्रकार बताते हैं: सुजान सतगुरु वह है जो हमें इसी घर (शरीर) के अन्दर हमारा सच्चा घर दिखला दे | हमारे अन्दर जो पांच धुनें (जो शब्द की निशानी है) हो रही हैं, उनको सुना दे | सब द्वीप, लोक, पाताल और खण्ड आश्चर्यजनक हैं, क्योंकि इनके अन्दर राम नाम की रसीली धुनें धुनकार दे रही है जो सच्चे मालिक के तख़्त से आ रही है | गुरु साहिब उपदेश देते हैं कि तुम सुखमन के अन्दर उस शब्द को सुनकर सुन्न-मण्डल में लिव लगाओ | यह अकथ कथा है, उसके साथ मन को जोड़ो, सब आशा-मनसा ख़त्म हो जायेगी | जब ह्रदय-कमल उलटेगा, वह अमृत से भर जायेगा, उस अमृत-रस को पीकर तुम्हारा मन कहीं नहीं दौड़ेगा | यह अजपा जाप है, जो बिना जपे अपने आप हो रहा है, कभी नहीं बिसरेगा | शब्द रूपी वह अजपा जाप उस 'आदि जुगादि' प्रभु में समा रहा है | सब सखियाँ (परमार्थ के खोजी) जो पांच शब्दों को प्राप्त कर लेती है (कमाई करती हैं ), वे गुरुमुख हैं और अपने निज घर को पा लेती हैं | गुरु साहिब फरमाते है कि जो कोई शब्द को खोजकर इस घर को प्राप्त कर ले, मैं उसका दास हूँ:

घर महि घरु देखाइ देइ सो सतिगुरु पुरखु सुजाणु ॥
पंच सबद धुनिकार धुनि तह बाजै सबदु नीसाणु ॥
दीप लोअ पाताल तह खंड मंडल हैरानु ॥
तार घोर बाजिंत्र तह साचि तखति सुलतानु ॥
सुखमन कै घरि रागु सुनि सुंनि मंडलि लिव लाइ ॥
अकथ कथा बीचारीऐ मनसा मनहि समाइ ॥
उलटि कमलु अम्रिति भरिआ इहु मनु कतहु न जाइ ॥
अजपा जापु न वीसरै आदि जुगादि समाइ ॥
सभि सखीआ पंचे मिले गुरमुखि निज घरि वासु ॥
सबदु खोजि इहु घरु लहै नानकु ता का दासु ॥१॥ (SGGS 1291)


The True Guru is the All-knowing Primal Being; He shows us our true home within the home of the self. The Panch Shabad, the Five Primal Sounds, resonate and resound within; the insignia of the Shabad is revealed there, vibrating gloriously. Worlds and realms, nether regions, solar systems and galaxies are wondrously revealed. The strings and the harps vibrate and resound; the true throne of the Lord is there. Listen to the music of the home of the heart - Sukhmani, peace of mind. Lovingly tune in to His state of celestial ecstasy. Contemplate the Unspoken Speech, and the desires of the mind are dissolved. The heart-lotus is turned upside-down, and is filled with Ambrosial Nectar. This mind does not go out; it does not get distracted. It does not forget the Chant which is chanted without chanting; it is immersed in the Primal Lord God of the ages. All the sister-companions are blessed with the five virtues. The Gurmukhs dwell in the home of the self deep within. Nanak is the slave of that one who seeks the Shabad and finds this home within. ||1||

सब महात्माओं की वाणियाँ यही कहती है कि जो आत्मा को शब्द के साथ जोड़ सके, वही सच्चा गुरु है | गुरु नानक साहिब फरमाते हैं:

सबदु बुझाए सतिगुरु पूरा ॥
सरब कला साचे भरपूरा ॥
अफरिओ वेपरवाहु सदा तू ना तिसु तिलु न तमाई हे ॥१४॥ (SGGS 1021)


The Word of the Shabad is understood through the Perfect True Guru. The True Lord is overflowing with all powers.
You are beyond our grasp, and forever independent. You do not have even an iota of greed. ||14||

वह शिष्यों को किसी बाहरमुखी साधन के भ्रमजाल में नहीं डालता | उसकी पवित्र शिक्षा सिर्फ यही होती है कि अपने अन्दर प्रवेश करके शब्द की कमाई करो | पूरे गुरु की यही निशानी है कि शिष्य के अन्दर अनहद शब्द बजने लगे | गुरु अर्जुन देव जी फरमाते हैं:

कहु नानक जिसु सतिगुरु पूरा ॥
वाजे ता कै अनहद तूरा ॥५॥४०॥९१॥ (SGGS 393)

Says Nanak, one whose True Guru is Perfect - the unblown bugles of ecstasy vibrate for him. |

जो 'राम नाम' में रमा हुआ है, वही सतगुरु है | वह कलियुग में जीवों को पार ले जाने का जहाज है | जो गुरुमुख होता है वह इस जहाज पर चढ़कर भवसागर से पार हो जाता है और अपने अन्दर सच को पा लेता है | गुरु अमरदास जी फरमाते हैं:

नामि रता सतिगुरू है कलिजुग बोहिथु होइ ॥
गुरमुखि होवै सु पारि पवै जिना अंदरि सचा सोइ ॥(SGGS 552)

The True Guru is imbued with the Naam, the Name of the Lord; He is the boat in this Dark Age of Kali Yuga.
One who becomes Gurmukh crosses over; the True Lord dwells within him.

जब कभी सन्त-महात्मा प्रकट होते हैं, वे कभी-कभी अपने आसपास कुछ ऐसे सामान बना कर रखते हैं, जो दुनियादारों को ठीक नहीं लगते हैं | इसका प्रयोजन केवल इतना ही है कि इनकी शोभा और महत्ता सुनकर जो दुनियादार और माया के गुलाम उनके पास इकट्ठे हो जाते हैं, वे मक्खी की भाँति उड़ जायें परन्तु सच्चे परमार्थियों को नुकसान न हो | यह निन्दा का समान वे आप जुटा लेते हैं, ताकि केवल अधिकारी लोग ही उनके पास आ सकें:

दरे-दरवेश रा दरबाँ न बायद, बबायद ता सगे-दुनिया न आयद |

अर्थ: (प्रश्न) क्या फकीरों के दर पर द्वारपाल नहीं चाहियें ? (उत्तर) अवश्य चाहिये ताकि दुनिया के कुत्ते न आ सकें |

उनके दर पर निन्दा चौकीदार का काम करती है, ताकि कोई अनाधिकारी जीव उनके पास न पहुँच सके |

भाई बाले जी की जन्म-साखी में चर्चा है कि गुरु नानक साहिब ने फरमाया, "कलियुग में सन्तों ने बहुत से अवतार धारण करके जीवों का उद्धार करना है |" तब भाई अजीते ने विनती की, "महाराज जी ! पूर्ण सन्तों की क्या परख होगी, कौन से शब्द का प्रयोग होगा और गुरुमुख शिष्य, पूर्ण सन्तों को किस प्रकार पहचानेगें ?" गुरु जी ने उत्तर दिया कि जब-जब सन्त मनुष्य-चोला धारण करके प्रकट होंगे, तब-तब सन्त नकली शरियत (कर्मकांड) वाले मजहबों के पाबन्द लोग सन्तों की बहुत निन्दा करेगें और सन्तों का संग कोई बिरला शिष्य करेगा | जो कोई एक-आध बिरला शिष्य आयेगा, उस शिष्य का नकली शिष्य बहुत निरादर करेगें यानी सन्तों का संग करनेवालों का बुरा समझेंगें |
उस समय राम-नाम के अभ्यास को भूलकर सब जीव बाहरमुखी वाणियाँ पढेंगें और नमाज़ पढने में लग जायेंगें और अनहद शब्द का मार्ग गुप्त हो जायेगा यानी जीव अन्य मन्त्रों के जाप में लग जायेंगें और अन्तर्मुख भक्ति से वंचित रह जायेंगें | जब आत्मा-शब्द का मार्ग बन्द हो जायेगा तब मैं सन्तों का स्वरुप धारण करके आऊँगा और उस समय अनहद शब्द का मार्ग प्रचलित होगा | जहाँ शब्द हो यह समझना कि मैं ही वहाँ हूँ |

सन्तों के प्रकट होने पर परमार्थ का सैलाब आ जाता है, इसलिए सच्चे खोजी उनके पास चारों और से इकट्ठे हो जाते हैं | उनकी संगत और उपदेश से सबको लाभ पहुँचता है | चाहे धर्मात्मा हो या पापी, जो भी उनके पास सच्चे दिल से पहुँचता है, उनकी आत्मिक तृप्ती की व्यवस्था हो जाती है | इसलिए यह देखने में भी आता है कि कई पापी, चोर और डाकू भी वहाँ इकठ्ठे हो जाते हैं जो उनसे आत्मिक लाभ लेकर धर्मात्मा बन जाते हैं | सतगुरु सच्चे धोबी होते हैं और हमारे पापों का मैल को धो देते हैं |

वे निस्वार्थता और कुर्बानी का सजीव उदाहरण होते हैं | उनका प्रभाव सबके दिलों पर जम जाता है | परमार्थ का प्रचार बड़े धूम-धाम से होता है | लोग बड़ी संख्या में एकत्रित हो जाते हैं और यह व्यवस्था देखकर दुनिया चकित हो जाती है |

वे समर्थ पुरुष होते हैं | वे अपने शिष्यों की, दूर हों या पास उनकी सम्भाल करते रहते हैं | उनके रहमत भरे हाथ कुल मालिक के हाथ से कम नहीं होते या यूँ समझो कि वह मालिक का ही हाथ होता है | उसका हाथ लम्बा होता है, जो सात आसमानों को भी पार कर सकता है | जैसे-जैसे शिष्य उनसे संपर्क बढाता जाता है, उसे नित्य गुण और करामातें दिखाई देती हैं और उनसे दया-मेहर प्राप्त होती है |


(To be continued)
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